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नवमी तिथि को ही करें मृत पत्नी की श्राद्ध कर्म

"जानें श्राद्ध क्यों करते हैं, वार्षिक श्राद्ध और पितृ पक्ष में अंतर, पत्नी का श्राद्ध, वर्जित समय, सब्जी और महिलाओं द्वारा तर्पण के नियम" 

श्राद्ध कर्म के नियम तिथि, पितृ पक्ष, त्रिपिंडी और जरूरी जानकारी  

मुखड़ा: श्राद्ध कर्म का अर्थ, नियम और महत्व* 

श्राद्ध केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पितरों के प्रति कृतज्ञता और ऋण मुक्ति का संकल्प है। हिंदू मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा को तृप्ति और सद्गति तभी मिलती है जब संतान विधि-विधान से जल, तर्पण और भोजन अर्पित करे। 

तिथि का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि जिस तिथि को व्यक्ति ने देह त्यागी, उसी दिन पितृलोक से उनके आने का द्वार खुलता है। वार्षिक श्राद्ध, पितृ पक्ष और महालया श्राद्ध तीनों का उद्देश्य एक है पर समय और विस्तार अलग है। 

शास्त्रों में समय, स्थान, पवित्रता और सात्विक भोजन को सबसे बड़ा कारक माना गया है। इस ब्लॉग में हम श्राद्ध के जरूरी नियम, वर्जनाएं, अपवाद और अनसुलझे प्रश्नों को सरल भाषा में समझेंगे, ताकि आप श्रद्धा के साथ सही कर्म कर सकें और पितरों का आशीर्वाद पा सकें।

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

श्राद्ध कर्म के महत्वपूर्ण कारक कौन-कौन हैं। तिथि के अनुसार श्राद्ध क्यों करना चाहिए। 

पितरों के लिए प्रतिवर्ष आयोजित वार्षिक श्राद्ध, पितृ पक्ष और महालया श्राद्ध में क्या अंतर है। 

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अपनी मृतक पत्नी की श्राद्ध किस तिथि को करनी चाहिए।

श्राद्ध का महीना ज्ञात हो परंतु तिथि ज्ञात ना हो तब उस महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि या कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि अथवा अमावस्या तिथि के दिन श्राद्ध करना क्यों जरूरी है। 

शाम के समय, रात के समय, संधि काल और मध्य रात्रि में श्राद्ध करना क्यों मना है

मृत पत्नी की श्राद्ध कर्म करने का सबसे उचित तिथि नवमी तिथि है। इस दिन श्राद्ध कर्म करने पर मृतक की आत्मा को पूर्ण संतुष्टि मिलती है।

मृतक पत्नी की श्राद्ध कब करें

मृतक पत्नी का श्राद्ध नवमी तिथि को करनी चाहिए। नवमी के दिन ब्रह्मांड में रजोगुणी पृथ्वी-तत्त्व तथा आप-तत्त्व से संबंधित शिव तरंगों की अधिकता रहती है। ये शिव-तरंगें श्राद्ध में प्रक्षेपित होने वाली मंत्र-तरंगों की सहायता से सुहागन की लिंग देह को प्राप्त होती हैं । इस दिन शिव तरंगों का प्रवाह भूतत्त्व और आपतत्त्व से मिलकर संबंधित लिंग देह को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने में सहायता करता है

 इससे, सुहागिन के शरीर में पहले से स्थित स्थूल शक्ति तत्त्व का संयोग सूक्ष्म शिव शक्ति के साथ सरलता से होता है और सुहागिन की लिंग देह तुरंत ऊपरी लोकों की ओर प्रस्थान कर जाती है ।

इस दिन शिव तरंगों की अधिकता के कारण सुहागिन को सूक्ष्म शिव-तत्त्व जल्दी मिलता है । फल स्वरूप, उसके शरीर में स्थित सांसारिक आसक्ति के गहरे संस्कारों से युक्त बंधन टूटते हैं, जिससे उसे पति-बंधन से मुक्त होने में सहायता मिलती है। इसलिए, रजोगुणी शक्ति रूप की प्रतीक सुहागिन का श्राद्ध महालय (पितृपक्ष) में शिव तरंगों की अधिकता दर्शाने वाली नवमी तिथि के दिन करना चाहिए ।श्राद्ध के संबंध में जाने 09 आश्चर्यजनक जानकारियां, जो आपको जानना जरूरी है

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इस दिन वायुमंडल में पितरों के लिए सहायक यम तरंगें अधिक होती हैं । अतः, इस दिन जब पितरों का मंत्र से आह्वान किया जाता है, तब मंत्र की शक्ति यम तरंगों के माध्यम से पितरों तक पहुंची है । इससे पितर अल्पकाल में आकर्षित होते हैं और यम तरंगों के प्रबल प्रवाह पर आरूढ होकर, पृथ्वी के वायु मंडल में सहजता से प्रवेश करते हैं।

संध्याकाल, रात्रि काल और संधि काल के आसपास जो समय बीत रहा है, उस समय वायुमंडल रज और तम गुणों से दूषित रहता है। अतः जब लिंग देह श्राद्ध स्थल पर आते हैं तब उनके दुष्ट आत्मा के चंगुल में फंसने की आशंका अधिक हो जाती है। इसलिए उपयुक्त काल में श्राद्ध करना मना है।

मृत्यु तिथि पर क्यों करना चाहिए श्राद्ध

सभी तरह के कार्यों का कोई ना कोई कारण होता है। उसका प्रभाव कर्ता, समय और स्थल आदि पर निर्भर करता है। इन तीनों बिंदुओं के उचित मेल होने पर कार्य की सफलता सुनिश्चित हो जाती है। तथा कर्ता को विशेष लाभ मिलता है। जब कार्य ईश्वर की योजना अनुसार होता है तब वह इच्छा क्रिया और ज्ञान की सहायता से सद् गुण रूप धारण कर प्राणियों को सदगति प्रदान करता है।

व्यक्ति जिस तिथि और दिन को जन्म लेता है। अगर संयोग बस उस तिथि और जन्म श्राद्घ के समय आ जाए तो जीव के नाम से किए जाने वाले कार्य उसे ऊर्जा प्रदान करता है। श्राद्ध कार्य उस तिथि, समय और मुहूर्त पर करना लाभप्रद होता है।

उस दिन उन कर्मों का कालचक्र उनका प्रत्यक्ष होना तथा उसका परिणाम इन सभी के स्पंदन एक दूसरे के लिए सहायक होते हैं। जन्मतिथि विशिष्ट घटनाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक तरंगों को सक्रिय करती है। इसलिए मृतक तिथि के दिन श्राद्ध करना अति उत्तम और श्रेष्ठ होता है।

पितृपक्ष में ही क्यों करें श्राद्ध व पिंडदान

पितृपक्ष में वायुमंडल में रज-तमात्मक तथा यम तरंगों की अधिकता होती है। इसलिए पितृपक्ष में श्राद्ध करने से रज-तमात्मक कोष वाले पितरों के लिए पृथ्वी के वायुमंडल में आना आसान हो जाता है । इससे ज्ञात होता है कि हिन्दू धर्म में बताए गए धार्मिक कृत्य विशिष्ट काल में करना अधिक कल्याणकारी है।

वार्षिक श्राद्ध करने के बाद भी पितृ पक्ष में श्राद्ध करना क्यों आवश्यक है

वार्षिक श्राद्ध या पुण्यतिथि मनाने पर सिर्फ एक पितर का और पितृपक्ष में श्राद्ध करने पर सभी पितरों को मुक्ति मिल जाती है। वार्षिक श्राद्ध किसी एक व्यक्ति की मृत्यु तिथि पर किया जाता है। इसलिए, ऐसे श्राद्ध से उस विशेष पितर को मुक्ति मिलती है और उसका ऋण चुकाने में सहायता होती है । यह हिन्दू धर्म में व्यक्तिगत स्तर पर ऋण मुक्ति की एकल उपासना है।

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पिंडदान व तर्पण करने की सरल विधि

दूसरी ओर पितृपक्ष में श्राद्ध कर सभी पितरों का ऋण चुकाना, समाजिक उपासना है । व्यष्टि ऋण चुकाने से उस विशेष पितर के प्रति कर्तव्य पालन होता है तथा समष्टि ऋण चुकाने से एक साथ सभी पितरों से लेन-देन पूरा होता है। जिनसे हमारा घनिष्ठ संबंध होता है।

उन्हीं की एक-दो पीढियों के पितरों का हम श्राद्ध करते हैं। क्योंकि उन पीढियों से हमारा प्रत्यक्ष संबंध रहा होता है । ऐसे पितरों में, अन्य पीढियों की अपेक्षा पारिवारिक आसक्ति अधिक होती है

उसी तरह इस आसक्ति-बंधन से मुक्त कराने के लिए वार्षिक श्राद्ध करना आवश्यक होता है । इनकी तुलना में उनके पहले के पितरों से हमारा उतना गहरा संबंध नहीं रहता। उनके लिए पितृपक्ष में सामूहिक श्राद्ध करना उचित है। इसलिए, वार्षिक श्राद्ध तथा पितृपक्ष का महालय श्राद्ध, दोनों करना आवश्यक है। 

संध्या काल, रात्रि काल और संधि काल में वर्जित है श्राद्ध करना

संध्या काल, रात्रि काल और संधि काल के निकट के समय में लिंग देहों से संबंधित ऊर्जा-तरंगों का प्रवाह तीव्र रहता है । इसका लाभ उठाकर अनेक अनिष्ट शक्तियां इस गतिमान ऊर्जा स्रोत के साथ पृथ्वी के वायुमंडल में आती हैं । इसलिए, इस समय को ‘रज-तम तरंगों के आगमन का समय भी कहते हैं ।

संध्या काल में तिर्यक तरंगें अधिकता रहती हैं। संधि काल में विस्फुटित तरंगें की अधिकता रहती हैं। तथा रात्रि के समय विस्फुटित, तिर्यक और यम तीनों प्रकार की तरंगें एक साथ बहती रहती हैं । इसलिए, इस समय वातावरण अत्यंत ऊष्ण ऊर्जा से प्रभारित रहता है । श्राद्ध के समय जब विशिष्ट पितर के लिए संकल्प और आवाहन किया जाता है, तब उनका वासना युक्त लिंग देह वायुमंडल में आता है ।

पूर्वज पड़ जाते हैं बुरी शक्तियों के चंगुल में

ऐसे समय यदि वायुमंडल रज-तम कणों से प्रभारित रहेगा, तब उसमें संचार करने वाली अनिष्ट शक्तियां, पितरों का मार्ग रोक सकती हैं । कभी-कभी तो दुष्ट शक्तियां किसी पितर को अपने नियंत्रण में लेकर उनसे बुरा कर्म करवाते हैं । इससे उन्हें नरक वास भोगना पडता है । इसलिए, यथा संभव वर्जित समय में श्राद्धादि कर्म नहीं करने चाहिए।

इससे पता चलता है कि हिन्दू धर्म में बताए गए कर्मों का विधि सहित पालन करना कितना महत्त्वपूर्ण है । विधि-विधान से धर्मकर्म करने पर ही इष्ट फल की प्राप्ति होती है ।

संध्या समय श्राद्ध करना मना है

सायं काल के समय में प्रचूर मात्रा में रज-तम तरंगों से भरा रहता है । उस समय ब्रह्मांड में भी पृथ्वी और आप तत्त्वों की सहयोग से सक्रिय रज-तमात्मक तरंगें की मात्रा अधिक होती हैं। ये तरंगें भारी होने के कारण इनका आकर्षण नीचे अर्थात पाताल की ओर होता है । इन तरंगों से वातावरण में निर्मित अति दबाव वाले क्षेत्र के कारण, धरती से संबंधित तिर्यक एवं विस्फुटित तरंगें सक्रिय होती हैं। संध्या के समय श्राद्ध और तर्पण करने से हमारे पूर्वज दुष्ट शक्तियों के चंगुल में फंसकर पाताल लोक चले जाते हैं। इसलिए संध्या समय श्राद्ध नहीं करनी चाहिए।

3 पितृ शांति टोटके

*01. तिल और जल का टोटका*: हर शनिवार सुबह नहाकर दक्षिण दिशा में मुंह करके एक लोटा जल में काले तिल डालकर पितरों का नाम लेकर अर्पित करें। साथ में "ॐ पितृभ्यो नमः" 11 बार जपें। मान्यता है इससे पितृ दोष शांत होता है।

*02. गाय और कौवे को भोजन*: श्राद्ध के दिन या हर अमावस्या को रोटी पर घी और गुड़ लगाकर गाय को खिलाएं। पहली रोटी का टुकड़ा कौवे के लिए छत पर रखें। कौवा पितरों का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद ही घर में भोजन करें।

*03. पीपल की परिक्रमा*: सोमवार को छोड़कर किसी भी दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाकर 07 बार परिक्रमा करें। परिक्रमा के समय पितरों से क्षमा और आशीर्वाद मांगे। शाम से पहले यह काम पूरा कर लें। मान्यता है कि पीपल में पितर वास करते हैं और इससे घर में शांति आती है।

10 मुख्य प्रश्नों के उत्तर

*01.प्रश्न: श्राद्ध कर्म के महत्वपूर्ण कारक और तिथि अनुसार क्यों?*  

उत्तर: 

*कारक*: शुद्धता, सही तिथि, योग्य ब्राह्मण, कुश, तिल, जल, गाय को ग्रास और सात्विक भोजन।  

*तिथि का कारण*: शास्त्र कहते हैं जिस तिथि को मृत्यु हुई उसी तिथि पर पितर पृथ्वी पर आते हैं। उसी दिन किया गया दान सीधे उन्हें मिलता है।

*02.प्रश्न: वार्षिक श्राद्ध, पितृ पक्ष और महालया में अंतर?*  

उत्तर: 

*वार्षिक श्राद्ध*: मृत्यु तिथि पर हर साल घर में किया जाता है।  

*पितृ पक्ष*: भाद्रपद कृष्ण पक्ष के 15 दिन, इसमें सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का सामूहिक श्राद्ध होता है।  

*महालया*: पितृ पक्ष की अंतिम अमावस्या। इसे सर्वपितृ अमावस्या कहते हैं। जिनकी तिथि याद नहीं, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।

*03.प्रश्न: मृतक पत्नी का श्राद्ध किस तिथि को?

उत्तर: 

पत्नी का श्राद्ध मृत्यु की तिथि पर ही होगा। यदि वह सुहागिन थीं तो कई जगह नवमी तिथि को "अविधवा नवमी" पर भी किया जाता है। सटीक नियम के लिए कुल परंपरा और पंडित से परामर्श लें।

*04. प्रश्न: तिथि न पता हो तो एकादशी या अमावस्या क्यों?*  

उत्तर: 

यदि महीना पता है पर तिथि नहीं, तो शास्त्र में विकल्प दिए हैं। शुक्ल एकादशी को देवता, कृष्ण एकादशी को पितर और अमावस्या को सभी पितरों के लिए मान्य माना गया है। अमावस्या को "सर्व पितृ मोक्ष" का दिन कहा गया है इसलिए सबसे सुरक्षित विकल्प है।

*05. प्रश्न: शाम, रात, संधि काल और मध्य रात्रि में मना क्यों?* 

उत्तर: 

श्राद्ध का समय "कुतप काल" यानी दिन का मध्य भाग माना गया है। शाम और रात में राक्षसी शक्तियां सक्रिय मानी जाती हैं, जिससे पितरों तक अर्पण पहुंचने में बाधा हो सकती है। संधि काल में देव और पितर दोनों की बेला नहीं होती। इसलिए शुद्ध दिन के उजाले में करना जरूरी है।

*06.प्रश्न: त्रिपिंडी श्राद्ध किस दिन और कितने पंडित?*  

उत्तर: 

त्रिपिंडी श्राद्ध 03 पीढ़ियों के पितरों के मोक्ष के लिए त्र्यंबकेश्वर, गया आदि तीर्थ में किया जाता है। सामान्यतः भाद्रपद कृष्ण पक्ष में या किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है। इसमें 03 ब्राह्मण और 01 आचार्य कुल 04 पंडित की आवश्यकता होती है।

*07. प्रश्न; महिलाएं पितरों को जल दे सकती हैं?*  

उत्तर: 

हां। आधुनिक और कई परंपराओं में महिलाएं तर्पण और जल अर्पित कर सकती हैं। मुख्य भोजन और पिंड दान अक्सर पुरुष या योग्य ब्राह्मण से कराया जाता है, पर जल देना, दीप जलाना वर्जित नहीं है।

*08.प्रश्न: घर में पितरों का स्थान?*  

उत्तर: 

दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। घर में दक्षिण मुखी दीवार पर उनकी तस्वीर लगाएं। भोजन बनाते समय पहली रोटी गाय और कौवे के लिए निकालें।

*09. प्रश्न: कौन सी सब्जी बनाएं और कौन सी नहीं?*  

उत्तर: 

*बनाएं*: लौकी, तोरई, कद्दू, बैंगन, अरबी, आलू।

*न बनाएं*: लहसुन, प्याज, मसूर दाल, बैंगन कुछ परंपराओं में वर्जित, मूली, जीरा। भोजन सात्विक और बिना तामसिक सामग्री के हो।

**10. प्रश्न: क्या श्राद्ध का खाना किसी के घर खाना चाहिए?*  

उत्तर: 

नहीं। श्राद्ध का भोजन प्रसाद रूप में घर के लोग और आमंत्रित ब्राह्मण ही ग्रहण करें। इसे बेचना या बाहर ले जाना अनुचित माना गया है।

अनसुलझे पहलू 

श्राद्ध को लेकर कई प्रश्न आज भी खुले हैं। पहला, क्या विदेश में रहने वाले लोग भारत में पंडित से कराएं या स्वयं करें? शास्त्र देश-काल के अनुसार लचीलापन देते हैं, इसलिए मानसिक संकल्प और तर्पण को भी मान्य माना गया है। 

दूसरा, बेटी क्या पिता का श्राद्ध कर सकती है? जिनके पुत्र नहीं हैं, वहां बेटी, दामाद या भतीजा अधिकारी माने जाते हैं, पर हर समाज की मान्यता अलग है। 

तीसरा, पितृ दोष और श्राद्ध का सीधा संबंध वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है, फिर भी पीढ़ियों का अनुभव इसे मनोवैज्ञानिक शांति से जोड़ता है। चौथा, ऑनलाइन दान और वर्चुअल तर्पण मान्य है या नहीं। परंपरावादी इसे नहीं मानते, पर सुविधा के कारण कई लोग इसे विकल्प के रूप में अपनाते हैं। 

पांचवां, श्राद्ध में खर्च कितना हो। शास्त्र कहते हैं श्रद्धा से एक पत्ते और जल से भी पितर तृप्त होते हैं, आडंबर जरूरी नहीं। इन पहलुओं पर अंतिम निर्णय कुल गुरु और पारिवारिक परंपरा से लेना बेहतर है। 

डिस्क्लेमर 

यह लेख सामान्य धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दिए गए नियम, तिथियां, विधियां और मान्यताएं विभिन्न संप्रदायों, क्षेत्रों और पंचांगों के अनुसार बदल सकती हैं। 

हम किसी भी एक परंपरा को अंतिम सत्य नहीं मानते। श्राद्ध एक संवेदनशील धार्मिक कर्म है, इसलिए इसे करने से पहले अपने कुल पुरोहित, योग्य ब्राह्मण या स्थानीय मंदिर के विद्वान से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें। 

लेख में बताए गए भोजन, दिशा और टोटकों का उद्देश्य आस्था को मार्गदर्शन देना है, किसी को भयभीत करना या अंधविश्वास फैलाना नहीं। यदि आपके परिवार में कोई विशेष रीति-रिवाज है तो उसी का पालन करें। 

स्वास्थ्य, कानूनी या वित्तीय सलाह के रूप में इसे न लें। हम इस जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। अंतिम निर्णय आपका और आपके धर्मगुरु का होगा।



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