"अगर आप गयाजी तीर्थ में पिंड दान अर्थात श्राद्ध करने जा रहे हैं, तो आपको इन जानकारियों का आत्मसात करना पड़ेगा। पिंडदान के दौरान यह अनमोल जानकारियां आपको बहुत ज्यादा काम आएगा"
गया जी में पिंडदान श्राद्ध कैसे करें: तिथि, नियम, विधि और जरूरी जानकारी*
गया जी में पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्व है। मान्यता है कि गयाजी में किया गया श्राद्ध पितरों को सीधे मोक्ष दिलाता है। अगर आप गया जी तीर्थ में पिंडदान करने जा रहे हैं तो कुछ जरूरी नियम जानना आवश्यक है।
पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को किया जाता है। अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध चतुर्दशी को और जिनकी तिथि याद न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को होता है। कौओं को पितरों का रूप माना गया है, इसलिए उन्हें पहला अंश देना जरूरी है।
श्राद्ध का अधिकार सबसे पहले बड़े बेटे को, फिर पत्नी, पुत्री या सगे भतीजे को होता है। श्राद्ध दोपहर में ही करें, रात में वर्जित है। तिल, कुश, जौ और गंगाजल से तर्पण करने पर पितर तृप्त होते हैं। सही तिथि और विधि से गयाजी में किया गया पिंडदान पितृ दोष से मुक्ति दिलाता है।
*02.अकाल मृत्यु वाले को चतुर्दशी को करें श्राद्ध
*03.तिथि ज्ञात ना होने पर अमावस्या को करें श्राद्ध
*04.कौओं के भेस में आपके घर आते हैं पितर
*05.बच्चों का श्राद्ध करना वर्जित
*06.बड़े बेटा ही करें माता-पिता का श्राद्ध
*07.रात को श्राद्ध करना वर्जित
*08.श्राद्ध के भोजन में करें तिल का प्रयोग
कैसा हो भोजन श्राद्ध में। श्राद्ध के भोजन में जौ, माटर औ सरसों का उपयोग श्रेष्ठ है। भोजन में वही पकवान बनाएं जो आपके पितर की पसंद है। गंगाजल, शहद, कुश और तिल भोजन बनाने में सबसे ज्यादा जरूरी है। तिल ज्यादा होने पर उसका फल अक्षय मिलता है। ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
*09.ब्राह्मणों को दे दक्षिणा
श्राद्ध के दौरान तर्पण में दूध, तिल, कुश, पुष्प और गंध मिश्रित जल से पितरों को तृप्त (तर्पण) किया जाता है। ब्राह्मणों को भोजन करा और पिंडदान करने से ही पितरों को गंध के रूप में भोजन मिलता है। श्राद्ध कारने फल दक्षिणा (धन) देने पर ही मिलता है।
श्राद्ध के दौरान क्या खाएं और क्या ना खाएं
श्राद्ध का भोजन सात्विक, पवित्र और पितरों की पसंद का होना चाहिए। शास्त्रों में जौ, चावल, मूंग, मटर, सरसों का तेल, गाय का दूध, घी, दही, शहद, गंगाजल, कुश और काले तिल को श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ बताया गया है। भोजन में खीर, पूड़ी, कद्दू की सब्जी, तोरई, उड़द की दाल, और पितरों की प्रिय वस्तुएं बनाएं। तिल का प्रयोग विशेष फलदायी है, इससे पितर प्रसन्न होते हैं।
श्राद्ध के दिन प्याज, लहसुन, मसूर दाल, बैंगन, हींग, गाजर, शलजम, मूली, काला नमक, मदिरा और मांसाहार पूरी तरह वर्जित है। बासी भोजन, बाहर का बना खाना या किसी और का जूठा भोजन न बनाएं न परोसें। लौकी, करेला और कड़वे पदार्थ भी निषेध हैं। भोजन लोहे या स्टील के बर्तन में न बनाएं। मिट्टी, कांसे या पत्तल में भोजन बनाना उत्तम है।
श्राद्ध का भोजन बिना चखे सबसे पहले गाय, कुत्ता, कौआ और ब्राह्मण को अर्पित करें। भोजन बनाते समय मौन रहें और मन में पितरों का स्मरण करें। श्रद्धा से बना सात्विक भोजन ही पितरों तक गंध रूप में पहुंचता है और आशीर्वाद दिलाता है।
*श्राद्ध के दौरान क्या करें और क्या ना करें -
*क्या करें:*
1. *तिथि का पालन करें*: पिता के लिए अष्टमी, माता के लिए नवमी, अकाल मृत्यु के लिए चतुर्दशी और अज्ञात तिथि के लिए अमावस्या को श्राद्ध करें।
2. *दोपहर में श्राद्ध करें*: कुतप काल यानी दोपहर 11:36 से 12:24 के बीच श्राद्ध करना सर्वोत्तम है।
3. *तर्पण जरूर करें*: काले तिल, कुश, जल और पुष्प से तर्पण करें। यह पितरों को सीधे तृप्त करता है।
4. *पंचबलि निकालें*: गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी के लिए भोजन का अंश जरूर निकालें।
5. *ब्राह्मण भोजन*: योग्य ब्राह्मण को भोजन कराएं और यथाशक्ति दक्षिणा दें। बड़े बेटे को ही मुख्य कर्ता बनना चाहिए।
6. *पवित्रता रखें*: स्नान करके सफेद या पीले वस्त्र पहनें। मन-कर्म-वचन से शुद्ध रहें।
*क्या ना करें:*
1. *रात में श्राद्ध न करें*: संध्या या रात के समय श्राद्ध करना शास्त्रों में मना है।
2. *क्रोध-झगड़ा न करें*: श्राद्ध के दिन वाद-विवाद, अपशब्द और नकारात्मकता से बचें।
3. *बाल-नाखून न काटें*: पूरे पितृपक्ष में क्षौर कर्म वर्जित है।
4. *नया सामान न खरीदें*: इस अवधि में वाहन, भूमि, या सोना खरीदना शुभ नहीं माना जाता।
5. *श्राद्ध का भोजन न चखें*: ब्राह्मण और पंचबलि से पहले खुद भोजन न करें।
6. *बच्चों का श्राद्ध न करें*: जिन बच्चों के दांत न निकले हों उनका श्राद्ध नहीं किया जाता।
