"मकर संक्रांति के पावन पर्व पर जानें गंगा के अवतरण, तिल-गुड़ के औषधीय गुणों और मकर संक्रांति के पौराणिक रहस्यों के बारे में विस्तार से पढ़ें।"
मकर संक्रांति: परंपरा, विज्ञान और आस्था का अनूठा संगम
मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सूर्य के उत्तरायण होने का दिव्य महापर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गंगा का अवतरण हुआ और भगवान विष्णु ने असुरों का अंत किया था। शास्त्रों में इसे मोक्षदायिनी और मनोकामना पूर्ण करने वाला पर्व माना गया है। तिल-गुड़ के सेवन से लेकर पवित्र नदियों में तर्पण और दान का विशेष महत्व है। क्या आप जानते हैं कि मकर संक्रांति के पीछे छिपे वैज्ञानिक और पौराणिक रहस्य क्या हैं? आइए, इस ब्लॉग के माध्यम से मकर संक्रांति की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और इसके स्वास्थ्यवर्धक पहलुओं को विस्तार से जानते हैं।
नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर
*मकर संक्रांति के दिन ही अवतरित हुई थी गंगा।
*भगवान विष्णु ने मकर संक्रांति के दिन असुरों का किया था वध।
*मकर सक्रांति के दिन माता यशोदा ने श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए रखी थी व्रत।
*पितरों को करें तिल से तर्पण, मिलेगी मुक्ति।
*किस प्रदेश में किस नाम से जाना जाता है मकर संक्रांति।
*मकर संक्रांति इन देवताओं का करें पूजन।
*तिल खाने के औषधीय गुण।
*मकर संक्रांति के संबंध में पौराणिक कथा।
*गुड़ सेहत के लिए है लाभदायक।
*चूड़ा में पाये जाते हैं कार्बोहाइड्रेट।
*भगवान भास्कर को खिचड़ी का भोग लगाना शुभ।
*मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा पूरा करती है।
*तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु से हुई थी।
*मकर संक्रांति के दिन कैसे करें पूजा, जानें विधि।
*मकर सक्रांति के दिन किस चीजों का करें दान।
*मकर सक्रांति के दिन चंद्रमा और सूर्य मकर राशि में।
*पूजा और तर्पण करने का शुभ मुहूर्त।
*भूलकर भी ना करें इस समय पूजा।
मकर संक्रांति के पौराणिक कथा
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं। शनि देव मकर संक्रांति के देवता है। इसलिए इस दिन को मकर सक्रांति कहा जाता है। शनि देव को मकर और कुंभ राशि के स्वामी माना जाता है।
जिस कारण से यह दिन पिता और पुत्र के अनोखे मिलन को दर्शाता है। कई जगहों पर इस त्यौहार को नई फसल और नई ऋतु के आगमन के तौर पर मनाया जाता है। वर्ष 2021 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मकर संक्रांति त्योहार मनाया जाएगा। इसके अलावा मकर संक्रांति कथा के विषय में महाभारत में भी वर्णन मिलताा है।
इसी दिन भीष्म पितामह ने प्राण त्यागे थे। मकर संक्रांति के दिन पितरों के उद्धार के लिए तिल से तर्पण करना शुभ होता है, क्योंकि महाराजा भागीरथ ने भी अपने पितरों के उद्धार के लिए इसी दिन तर्पण किया था। भगवान सूर्य, सूर्योदय के समय धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं।
इस दिन भगवान सूर्य को खिचड़ी का भोग लगाने की परंपरा है। परंपरा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन तिल से बने तिलकुट, चूड़ा, गुड़ और खिचड़ी खाने के साथ पतंग उड़ाने का भी विधान है। भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन प्रयास और गंगासगर में स्नान का विशेष महत्व है। जब सूर्य देव दक्षिणायन की ओर जाते हैं, अर्थात अशुभ। दक्षिण दिशा को यम का वास या यम के द्वार माना जाता है।
नरक के द्वार पहुंचते ही यमदूत मृत आत्मा को लेने आते हैं। उत्तर दिशा स्वर्ग का द्वार माना जाता है। जहां, मृत आत्मा को लेने देवदूत आते हैं। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है, उत्तरायण और दक्षिणायन। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा को पूरा करता है और उत्तर की ओर अग्रसर हो जाता है। इसलिए इस दिन से सूर्य उत्तर दिशा की ओर गतिमान हो जाता है। दक्षिणायन दिशा को दानव, दुष्ट और दुराचारियों का दिशा कहा जाता है जबकि उत्तरायण दिशा को देवताओं का दिशा माना जाता है।
इसी दिशा में स्वर्ग लोक है। मकर संक्रांति के संबंध में पौराणिक कथा संक्रांति कथा के विषय में महाभारत में भी वर्णन मिलता है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के महान योद्धा और कौरव सेना के सेनानायक गंगापुत्र भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। संक्रांति की महत्ता को जानते हुए उन्होंने अपनी मृत्यु के लिए इसी दिन को निर्धारित किये थे।
वे जानते थे कि सूर्य दक्षिणायन होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता है और उसे इस मृत्युलोक में पुनः जन्म लेना पड़ता है। महाभारत युद्ध के बाद जब सूर्य उत्तरायण हुआ तभी पितामह ने अपना प्राण त्यागे। वह दिन मकर संक्रांति था।
्मकर संक्रांति के दिन ही अवतरित हुई थी गंगा
धार्मिक मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से अवतरित होकर राजा भागीरथ के पीछे पीछे कपिल मुनि के आश्रम होते हुए गंगासागर तक पहुंची थी। मां गंगा के पवित्र जल से राजा भागीरथ ने अपने पितरों को तर्पण कर मोक्ष की प्राप्ति करा स्वर्ग लोक भेजने का काम किए थे।
मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर और प्रयागराज में स्नान करना काफी शुभ माना जाता है। भविष्य पुराण में गंगासागर और प्रयागराज में मकर संक्रांति पर्व के मौके पर गंगा स्नान करने का उल्लेख मिलता है।
मकर सक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। श्रीहरि ने सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस प्रकार यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है। मकर सक्रांति के दिन माता यशोदा ने श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए रखी थी व्रत यशोदा मां ने श्रीकृष्ण जन्म के बाद, प्राप्ति लिए व्रत रखी थी।
उस समय भगवान सूर्य उत्तरायण काल में पदार्पण कर रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। तभी से मकर सक्रांति व्रत का प्रचलन हुआ है। कहा जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु से हुई थी। इसलिए इसका प्रयोग करने से पापों से मुक्ति मिलती है। तिल का उपयोग से शरीर निरोग रहता है और शरीर में गर्मी आती है।
पितरों को करें तिल से तर्पण, मिलेगी मुक्ति।
मकर संक्रांति के दिन पितरों को तिल से तर्पण करना काफी शुभ होता है। इसी दिन महाराजा भागीरथ में अपने पितरों के लिए तर्पण किया था। तर्पण विधि पूर्वक करनी चाहिए, क्योंकि भगवान सूर्य सूर्योदय के समय धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस लिए सूर्योदय के समय ही पितरों को तर्पण करनी चाहिए। इसी दिन भगवान सूर्य को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मकर संक्रांति पर्व अलग-अलग तरह से मनाये जाते हैं। आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में संक्रांति कहा जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में लोग मनाते है। पंजाब और हरियाणा में लोहरी, असम में बिहू। मध्य भारत सहित बिहार और यूपी में मकर संक्रांति के नाम से प्रचलित है।
मकर संक्रांति इन देवताओं का करें पूजन।
मकर संक्रांति के दिन भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, भगवान गणेश, आदि शक्ति माता और सूर्य आराधना करने का दिन माना जाता है। इस दिन पितरों का तर्पण करने से, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। तिल खाने के औषधीय गुण मकर सक्रांति के दिन तिल खाने, लगाने और स्नान करने का धार्मिक, अध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है।
जानें तिल में और कौन-कौन से औषधीय गुण है।
तिल में कई तरह के पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कैल्शियम, काम्प्लेक्स बी, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, जिंक, कॉपर और मैग्नीशियम आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। तिल में मोनो सैचुरेटेड फैटी एसिड होता है। यह शरीर में बुरे केलेस्ट्रॉल को कम करके अच्छा केलेस्ट्रॉल को बनाने में मदद करता है। यह ह्रदय रोग, दिल का दौरा और अथेरोक्लेरोसिस की संभावना को कम करता है।
आयुर्वेद में तिल मधुमेह, कफ, पीत कारक, निम्न रक्तचाप में लाभ, स्तनों में दूध उत्पन्न करने वाला, गठिया, मल रोधक और वात नाशक माना जाता है। तिल की तासीर गर्म होता है। इसका सेवन सर्दियों में करने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
गुड़ सेहत के लिए है लाभदायक।
गुड़ का तासीर गर्म है। गुड़ में लवण, मैग्नेशियम, आयरन, विटामिन ए, बी, लौह तत्व, पोटेशियम, गंधक, फासफोरस और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। गुड़ खाने से मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहता है।
चूड़ा में पाये जाते हैं कार्बोहाइड्रेट
मकर संक्रांति के दिन तिलकुट और गुड़ के साथ चूड़ा का भी सेवन किया जाता है। चूड़ा में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन बी, मैंगनीज, फास्फोरस, आयरन, फाइबर, फैटी एसिड आदि तत्व पाए जाते हैं। चूड़ा खाने से पित्त को शांत करता है, यह शरीर को बल देता है।
मकर संक्रांति के दिन कैसे करें पूजा, जानें विधि
मकर संक्रांति के दिन अहले सुबह स्नान करने विधान है। इस दिन नदी, सरोवर, कुआं या घर में गंगाजल और तिल डालकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद पितरों को तिल मिले जल से तर्पण करना चाहिए। भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आदिशक्ति माता, शनि देव, और भगवान सूर्य को विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
सुहागन महिलाएं एक थाली में गुड़, तिल से बने लड्डू, चूड़ा और अपने सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा रख लें। थाली को रोली और चावल से सजा दें। इसके बाद उस थाली को अपने सास दे दें यदि आपकी अपनी सास नहीं है तो ननंद, जेठानी, या किसी भी ब्राह्मण स्त्री को भी दे सकते हैं।
मकर संक्रांति पूजा में लगने वाले सामग्रियों की सूची
मकर संक्रांति पूजा में लगने वाले सामग्रियों की सूची अगरबत्ती, पान का पत्ता, नारियल, सिक्के, फूल का माला, चावल, रोली, गंगाजल, फूलों का माला, कपूर, इत्र, सूर्य भगवान की तस्वीर, गुड़, तिल, चूड़ा, तिल का तेल, घी, दीया, मौली, चंदन और आम की लकड़ी प्रमुख हैं।
मकर सक्रांति के दिन किसकी किस चीज का करें दान
मकर संक्रांति के दिन गर्म वस्त्र, तिल से बने मिठाईयां, खिचड़ी के साथ पैसा आदि दान करने का शनि से त्रस्त प्रकोपों तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है। गरीब तथा अपाहिज और मजदूर वर्ग के सभी लोग शनि के प्रतिनिधि माने जाते हैं। इसलिए इस दिन बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और उन्हें तिल से बनी मिठाइयों और गर्म वस्त्र उपहार स्वरूप देना चाहिए, ऐसा करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं।
तिल के सामानों से सजा बाज़ार, खरीदारों की उमड़ी भीड़
मकर सक्रांति 14 जनवरी को है। मकर संक्रांति को लेकर तिल से बने सामानों से बाजार पट गया है। तिल से बने तिलकुट, तिलपट्टी, बादाम पट्टी, चूड़ा और मुड़ी से बने लड्डू, भिन्न-भिन्न धान के बने चूड़ा, गुड़ आदि सामानों से बाजार अटा पड़ा है। बाजार में गुड़ और चीनी से बने तिलकुट 140 से लेकर 350 रुपए प्रति किलो मिल रहे हैैं। उसी प्रकार चूड़ा 40 रुपए से लेकर 100 रुपए के बीच बाजार में उपलब्ध है। इस बार खोआ से भी बने तिलकुट बाजार में मिल रहे हैं।
तिलकुट जो खाने में सॉफ्ट और मुलायम हो। जिसमें तिल की सोंधी खुशबू आ रही हो। साथ ही गुड़ और तिल का मिश्रण चार और तीन का हो। यह बातें साकची टिना शेड स्थित भाई भुजिया वाले का मालिक हीरालाल साहू ने कहीं। बकौल साहू हम पिछले 40 वर्षों से तिलकुट बेच रहे हैं। हम गया से कारीगर लाकर यहीं पर तिलकुट का निर्माण करते हैं।
उन्होंने कहा कि तिलकुट बनाने के लिए तिल और गुड़ को धीमें आंच पर एक समय-सीमा तक पकाना पड़ता है। तिलकुट को कुटना ही कलाकारी है। गया के नाम पर शहर में दो नंबर का तिलकुट मिल रहा है। लोगों को सावधान रहने की जरूरत है।
प्राचीन बनाम आधुनिक मकर संक्रांति: एक तुलना
प्राचीन काल में मकर संक्रांति पूरी तरह से कृषि और खगोल विज्ञान से जुड़ी थी। यह ऋतु परिवर्तन का सूचक थी, जहाँ सूर्य का मकर राशि में प्रवेश शीत ऋतु के अंत और वसंत के आगमन की शुरुआत माना जाता था।
उस समय लोग नदियों में स्नान, पितृ तर्पण और अन्न दान को आत्मिक शांति का मार्ग मानते थे। आज, त्योहार का मूल भाव वही है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आधुनिकता के दौर में, पूजा की विधियों के साथ-साथ खान-पान में भी बदलाव आया है।
जहां पहले घर के बने पारंपरिक पकवान मुख्य थे, वहीं अब बाजारू संस्कृति का प्रभाव बढ़ा है। हालांकि, आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग इसे पूरी श्रद्धा और पुरानी परंपराओं के साथ मनाकर अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है।
मकर संक्रांति के अनसुलझे पहलू
मकर संक्रांति से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो सामान्यतः चर्चा में कम रहती हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से यह पृथ्वी की धुरी के झुकाव और सूर्य की स्थिति का एक सटीक गणित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से मानी जाती है, इसीलिए इसे 'तिल संक्रांति' भी कहते हैं।
एक गहरा अनसुलझा पहलू यह है कि मकर संक्रांति पर ग्रहों की विशेष स्थिति मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त मानी गई है। लोक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि यदि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय चंद्रमा की स्थिति अनुकूल हो, तो व्यक्ति के भाग्य में अकल्पनीय सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं। ये सूक्ष्म रहस्य ही इस पर्व को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।
समृद्धि और शांति के लिए 3 सरल टोटके सिर्फ परंपरा के अनुसार
तिल और जल का तर्पण: अपने पितरों की शांति के लिए तांबे के पात्र में जल, काले तिल और थोड़े से फूल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल अर्पित करें। यह दोषों को दूर करता है।
तिल का दान: अपनी आर्थिक बाधाओं को दूर करने के लिए जरूरतमंदों को गुड़ और तिल का दान करें। माना जाता है कि तिल का दान करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और रुके हुए काम बनते हैं।
*01. मकर संक्रांति पर खिचड़ी क्यों खाते हैं?
उत्तर: खिचड़ी को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। इसमें कार्बोहाइड्रेट और ऊर्जा होती है, जो सर्दियों में शरीर को ऊष्मा देती है। इसे भगवान भास्कर को भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।




