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विश्वकर्मा पूजा 2028: अमृत सिद्धि योग व सर्वार्थ सिद्धि योग में करें विश्वकर्मा पूजा

ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा से: जानिए 2028 में क्यों 16 सितंबर को होगी पूजा। 

विश्वकर्मा पूजा शनिवार, 16 सितंबर 2028 को आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाएगी। 

वेदों और पुराणों के अनुसार, ब्रह्मांड के पहले इंजीनियर और तीनों लोकों के निर्माणकर्ता भगवान विश्वकर्मा का जन्म महर्षि प्रभास और ब्रह्मविद्या की ज्ञाता भुवना (महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन) के पुत्र के रूप में हुआ था। विश्व में उनके 5 रूप पूजे जाते हैं और उनके 5 पुत्र थे। 

उन्होंने ही देवताओं के लिए द्वारिका, लंका, स्वर्गलोक, हस्तिनापुर और बज्र जैसी अद्भुत रचनाओं का निर्माण किया था।

17 सितंबर की जगह 16 सितंबर को क्यों मनाया जाएगा?

आमतौर पर विश्वकर्मा पूजा हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है, लेकिन यह त्योहार पूरी तरह सूर्य की गति यानी कन्या संक्रांति पर आधारित होता है। 

जिस दिन सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, उसी दिन यह पूजा होती है। वर्ष 2028 में सूर्य का कन्या राशि में गोचर (संक्रांति क्षण) 16 सितंबर 2028 को रात 08:23 बजे हो रहा है। चूंकि संक्रांति का यह महत्वपूर्ण क्षण 16 सितंबर को ही घटित हो रहा है, इसलिए ज्योतिषीय गणना और हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2028 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर के बजाय 16 सितंबर को ही मनाई जाएगी।

विश्वकर्मा भगवान की जन्म कथा वेदों और पुराणों पर आधारित है

भगवान विश्वकर्मा के 5 पुत्र थे।

विश्व में विश्वकर्मा के 5 रूप जाने जाते हैं।

भगवान विश्वकर्मा ने द्वारिका, लंका, स्वर्गलोक, बज्र और हस्तिनापुर का निर्माण किया था।

ब्रह्मांड का पहला इंजीनियर कहें जानें वाले भगवान विश्वकर्मा तीनों लोकों का निर्माणकर्ता है।

भगवान विश्वकर्मा की जन्म कथा वेदों और पुराणों में उल्लेख है।

भगवान विश्वकर्मा महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना थी, जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी। वह अष्टम बसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उसी से संपूर्ण शिल्प (निर्माण) विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ। पुराणों में कहीं-कहीं बृहस्पति की बहनों को योगसिद्धि और वरस्त्री नाम से भी जाना जाता है।

अब जानें ऋग्वेद, यजुर्वेद व महाभारत में भगवान विश्वकर्मा जन्म के संबंध में क्या लिखा है

ऋग्वेद में विश्वकर्मा सुक्ता के नाम से 11 श्लोक लिखी गई है। जिसके प्रत्येक मंत्र पर लिखा है। ऋषि विश्वकर्मा को भौवन देवता भी कहा गया है। यही सूक्ता यजुर्वेद में अध्याय 17 के, 16 से 31 मंत्रों के बीच भगवान विश्वकर्मा का नाम आया है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा शब्द का एक बार इन्द्र और सूर्य का स्वरूप भी बताया गया है।

परंतु महाभारत सहित अधिकांश पुराणों में प्रभास पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा के रूप में माना गया हैं। स्कंद पुराण में प्रभात खंड में यह स्लोक दिया गया है, जो प्रमाणित करता है कि प्रभास के पुत्र भगवान विश्वकर्मा थे।

बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी

प्रभासस्यं तस्य भार्या बसुनामष्टमस्य च

विश्वकर्मा सुतस्तस्य शिल्पकर्ता प्रजापति।

भगवान विश्वकर्मा के 05 पुत्र थे

भगवान विश्वकर्मा के 5 पुत्र थे। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार पांचों पुत्र अपने क्षेत्र में दक्ष थे। भगवान विश्वकर्मा के प्रथम पुत्र मनु थे, जो लोहा के औजार बनाने में कुशल थे।

दूसरा पुत्र मय थे, जो काष्ठ अर्थात लकड़ी के सामान बनाने में निपुण थे।

तीसरे पुत्र स्वष्ठा थे जो तांबा और कांस्य के वस्तु बनाने में पारांगत हासिल किए थे।

चौथा पुत्र शिल्पी थे जो पाषाण अर्थात पत्थर को तराश कर प्रतिमा बनाने में और पांचवां पुत्र दैवज्ञ थे, जो सोना चांदी के आभूषण बनाने में दक्ष थे।

भगवान विश्वकर्मा के उत्कृष्ट निर्माण

भगवान विश्वकर्मा वस्तु कला के अद्भुत निर्माता थे। भगवान विश्वकर्मा ने सतयुग में देवताओं के लिए स्वर्ग लोक बनाया था। उसी प्रकार द्वापर में कृष्ण की द्वारिका, कलियुग में पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर और त्रेता में रावण की लंका का निर्माण किया था। उसी प्रकार महर्षि दधीचि की हड्डियों से बनी ब्रज का निर्माण भी उन्होंने किया था। देवताओं के राजा इंद्र का प्रमुख हथियार बज्र है।

भगवान विश्वकर्मा के पांच स्वरूप है

भगवान विश्वकर्मा के पांच रूप है। इसका मतलब यह हुआ कि 5 तरह के भगवान विश्वकर्मा जगत में प्रसिद्ध है। भगवान विश्वकर्मा के 5 रूपों में प्रथम रूप विराट विश्वकर्मा का है, जो सृष्टि के रचयिता माने जाते हैं।

दूसरा रूप धर्म वंशी विश्वकर्मा का है, जो महान शिल्प विज्ञान के विधाता और ऋषि प्रभास के पुत्र कहे जाते हैं।

तीसरा रूप अंगिरावंशी विश्वकर्मा का है, जिसे आदि विश्वकर्मा, विज्ञान विधाता और वसु के पुत्र कहा जाता है।

चौथा रूप सुधन्वा विश्वकर्मा का है, जो महान शिल्पाचार्ज विज्ञान का जन्मदाता और अथवी के पुत्र हैं।

पांचवा भृगुवंशी विश्वकर्मा जो उत्कृष्ट शिल्प और विज्ञानाचार्य हैं जो शुक्राचार्य के पौत्र हैं।

02, 04 और 10 बहु विश्वकर्मा होते हैं

भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा दो बाहु चार बाहु और दस बाहु के होते हैं। उसी प्रकार एक मुख, चार मुख और पंचमुखी प्रतिमा भगवान विश्वकर्मा की जगत में मिलती है।

भगवान विश्वकर्मा की लीला और पुत्र प्राप्ति कथा

भगवान विश्वकर्मा की महता स्थापित करने वाली एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार वाराणसी में धर्म पर चलने वाला पुरुष रथकार अपनी पत्नी के साथ निवास करता था।

रथकार वस्तु कला में निपुण था। परंतु गरीब होने के कारण विभिन्न स्थानों में घूम घूम कर कार्य करता था। बहुत अधिक मेहनत करने के बाद भी भोजन से अधिक धन नहीं प्राप्त कर पाता था।

पति की तरह ही पत्नी पुत्र ना होने के कारण चिंतित कहती थी। पुत्र प्राप्ति के लिए पति और पत्नी ने हर तरह का प्रयास किया। साधु संत के यहां निहोरा लगाएं परंतु इच्छा पुरी नहीं हुई। अचानक एक दिन पड़ोसी ब्राह्मण ने रथकार की पत्नी से कहा कि तुम भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाओ।

तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। अमावस्या तिथि को भगवान विश्वकर्मा की महिमा सुनो। ब्राह्मण की बात सुनकर उसकी पत्नी ने अमावस्या तिथि को भगवान विश्वकर्मा की विधि विधान से पूजा अर्चना कर उनकी महात्म्य सुनी।

पूजा के उपरांत उन्हें धन धन्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुुई। दोनों सुखी जीवन बिताने लगे। भगवान विश्वकर्मा की महिमा का कोई अंत नहीं है। इसलिए आज विश्व भर के लोग भगवान विश्वकर्मा की शरण में जाकर पूरी आस्था रखते हैं।

पूजा सामग्री की सूची

भगवान विश्वकर्मा की पूजन करने के लिए निम्नलिखित सामानों की जरूरत भक्तों को पड़ेगी।

भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर, रोली, सिंदूर, अबीर, चंदन पाउडर, हल्दी का चूर्ण, इत्र, पीला सरसों, अक्षत, सुपारी, पान का पत्ता, फूल और माला, तुलसी पत्ता, धूपबत्ती, कच्चा सूत, रुई, कपूर, गुड़ का बतासा, मौसमी फल, नारियल, पंचामृत (दूध, दही, मधु, घी और गुड़) पंचगव्य (गोबर, गोमूत्र, दही, दूध और घी) गंगाजल, सात तरह का आनाज, मिट्टी का कलश, दीया, आम का पत्ता, केला का पत्ता, गरुड़ा, लाल कपड़ा और हवन की सामग्री।

जानें पंचांग के अनुसार कैसा रहेगा विश्वकर्मा पूजा का दिन

विश्वकर्मा पूजा 16 सितंबर, दिन शनिवार, तिथि द्वादशी दिन के 10:00 बज के 51:00 मिनट तक इसके बाद त्रयोदशी तिथि प्रारंभ हो जाएगा। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के दिन नक्षत्र अश्लेषा नक्षत्र के 12:21 बजे तक रहेगा। इसके बाद मघा नक्षत्र हो जायेगा।

प्रथम करण बव, द्वितीय करण बालव है। योग सिद्धि रहेगा। सूर्योदय 05:32 बजे पर और सूर्यास्त 05:47 बजे में होगा। चंद्रोदय 03:47 बजे पर और चंद्र अस्त रात 03:48 बजे में होगा।

सूर्य सिंह राशि में रात 08:10 बजे पर इसके बाद कन्या राशि में प्रवेश कर जाएंगे। चंद्रमा कर्क राशि में और आयन दक्षिणायन है। ऋतु शरद है। दिनमान 12 घंटा 12 मिनट का और रात्रिमान 11 घंटा 45 मिनट का रहेगा।

आनंदादि योग श्रीवत्स दिन के 12:00 बज के 21 मिनट तक इसके बाद वज्र हो जायेगा। होमाहुति गुरु, दिशाशूल पूर्व, राहुवास पूर्व, अग्निवास पाताल दिन के 02:14 बजे तक, इसके बाद पृथ्वी हो जायेगा। चंद्रवास दक्षिण दिशा में रहेगा।

पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त

अभिजीत मुहूर्त दिन के 11:15 से लेकर 12:04 तक रहेगा।
इस वर्ष विश्वकर्मा पूजा के दिन और अमृत योग का शुभ और सुखद संयोग बन रहा है। इस दौरान पूजा अर्चना करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा। सुबह 07:43 बजे से लेकर रात के 09:10 बजे तक अमृत सिद्धि योग रहेगा। इसके अलावा शुभ मुहूर्त और भी है। जिसे आप देख सकते हैं। इस मुहूर्त में भी पूजा करना उचित रहेगा।

सुबह 07:39 बजे से लेकर 09:11 बजे तक शुभ मुहूर्त रहेगा। दिन के 12:15 बजे से लेकर 01:48 बजे तक चार मुहूर्त, 01:48 बजे से लेकर 03:20 बजे तक लाभ मुहूर्त, 03:20 बजे से लेकर 04:52 बजे अमृत मुहूर्त रहेगा। शाम के समय पूजा करने वाले लोगों के लिए लाभ मुहूर्त जो संध्या 06:24 बजे से शुरू होकर 07:52 बजे तक रहेगा इस दौरान भी आप भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

कैसे करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा

भगवान विश्वकर्मा की पूजा विशेष विधि विधान से होता है। पूजा करने के पूर्व कर्ता को स्नानादि और नित्यक्रिया से निवृत्त होकर पत्नी सहित पूजा स्थल पर बैठे। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करें। तदुपरांत हाथ को गंगाजल से पवित्र कर पुष्प और अक्षत लेकर मंत्र उच्चारण करते हुए चारों ओर छिड़के। पीला सरसों लेकर दिग्बंधन अर्थात गठबंधन करें। साड़ी के पल्लू और गमछा के पल्लू में सरसों देकर उसे बांधे।

अपने हाथ में और पत्नी के हाथ में रक्षा सूत्र बांधने के बाद भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करें।

पुष्प और अक्षत पात्र में छोड़ें। दीप जलाएं। जल पैसा, सुपारी और अक्षत हाथ में लेकर संकल्प करें। गोबर से लीपे हुए भूमि पर चावल के घोल से अष्ट कमल बनाएं। उस स्थान पर सात तरह के अनाज रखें। कलश स्थापित करें। कलश में तांबे या पीतल का लोटा से जल डालें। जल में सुपारी पैसा और अक्षत डालकर कपड़े से ढक दें। चावल से भरा पात्र को आम के पत्ता डालकर उस पर नारियल रख दें।

भगवान विश्वकर्मा और विश्वकर्मा पूजा से जुड़े 5 अनोखे (यूनिक) प्रश्न और उनके सटीक उत्तर नीचे दिए गए हैं:
*01. भगवान विश्वकर्मा के पांच रूपों और उनके पांच पुत्रों का क्या संबंध है?
  • प्रश्न: भगवान विश्वकर्मा के पांच रूप कौन से हैं और उनके पांच पुत्रों से इसका क्या संबंध है?
  • उत्तर: हिंदू शास्त्रों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा के पांच मुख या रूप माने गए हैं—सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान। इन पांच रूपों से उनके पांच पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें पांच अलग-अलग शिल्प कलाओं का जनक माना जाता है:
    1. मनु: लोहे का काम करने वाले (लोहार)ौ
    2. मय: लकड़ी का काम करने वाले (बढ़ई)
    3. त्वष्टा: कांसे और तांबे का काम करने वाले (कसेरे)
    4. शिल्पी: पत्थर का काम करने वाले (मूर्तिकार/राजमिस्त्री)
    5. दैवज्ञ: सोने-चांदी का काम करने वाले (सुनार)
*02. रावण की सोने की लंका का निर्माण वास्तव में किसके लिए किया गया था?
  • प्रश्न: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने लंका का निर्माण मूल रूप से किसके लिए किया था?
  • उत्तर: अधिकांश लोग मानते हैं कि लंका रावण के लिए बनी थी, लेकिन वास्तव में भगवान विश्वकर्मा ने सोने की लंका का निर्माण भगवान शिव और माता पार्वती के निवास स्थान के लिए किया था। जब लंका के गृह प्रवेश (पुजा) के लिए परम ज्ञानी रावण को पुरोहित के रूप में बुलाया गया, तो उसने दक्षिणा में भगवान शिव से वही सोने की लंका मांग ली। भोलेनाथ ने मुस्कुराते हुए लंका रावण को दान में दे दी।
*03. भगवान विश्वकर्मा के माता-पिता कौन थे और उनका संबंध देवगुरु बृहस्पति से क्या है?
  • प्रश्न: वेदों और पुराणों के अनुसार भगवान विश्वकर्मा का जन्म किनके माध्यम से हुआ था?
  • उत्तर: पुराणों के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा के पिता अष्टम वसु महर्षि प्रभास थे। उनकी माता का नाम भुवना था, जो ब्रह्मविद्या की ज्ञाता थीं। भुवना, महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के गुरु बृहस्पति की सगी बहन थीं। इस प्रकार भगवान विश्वकर्मा देवगुरु बृहस्पति के भानजे (भांजे) हैं।
*04. देवताओं का अमोघ अस्त्र 'बज्र' (वज्र) किस धातु या वस्तु से बना था?
  • प्रश्न: देवराज इंद्र के सबसे शक्तिशाली अस्त्र 'वज्र' का निर्माण विश्वकर्मा जी ने किससे किया था?
  • उत्तर: असुरों के विनाश के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र की आवश्यकता थी। इसके लिए महर्षि दधीचि ने जन कल्याण के लिए अपनी हड्डियों का दान कर दिया था। भगवान विश्वकर्मा ने महर्षि दधीचि की उन पवित्र और तपोबल से अभिमंत्रित हड्डियों से देवताओं के राजा इंद्र के लिए 'वज्र' का निर्माण किया था, जो अचूक था।
*05. विश्वकर्मा पूजा की तारीख हर साल संक्रांति से क्यों तय होती है?
  • प्रश्न: अन्य हिंदू त्योहारों की तरह विश्वकर्मा पूजा चंद्रमा की तिथियों के बजाय सौर कैलेंडर (संक्रांति) से क्यों तय होती है?
  • उत्तर: हिंदू धर्म में अधिकतर त्योहार चंद्रमा की चाल (चंद्र मास) पर आधारित होते हैं, जिससे उनकी तारीखें हर साल बदलती हैं। लेकिन विश्वकर्मा पूजा सौर मास (सूर्य की गति) पर आधारित है। जब सूर्य सिंह राशि छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश (कन्या संक्रांति) करते हैं, तब यह पूजा होती है। यह दिन प्रायः व्यावसायिक और सौर गणना के अनुसार भाद्रपद महीने का अंतिम दिन होता है, इसलिए यह सौर कैलेंडर से ही तय होती है।

डिसक्लेमर

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