क्या आपको पता है भगवान भोलेनाथ की जगह शिवलिंग की पूजा क्यों की जाती है। कैसे प्राप्त हुआ भगवान भोलेनाथ को डमरू, त्रिशूल और नाग देवता जानें विस्तार से।
शिवलिंग पूजा का रहस्य - क्यों निराकार हैं महादेव और क्या है डमरू, त्रिशूल, नाग का असली अर्थ?
हिंदू धर्म में जब भी भगवान शिव का नाम आता है तो मन में एक ही छवि उभरती है - जटाओं में गंगा, गले में वासुकी नाग, हाथ में डमरू और त्रिशूल, और कैलाश पर ध्यान में लीन भोलेनाथ। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम शिव की सुंदर मूर्ति की जगह एक काले पत्थर यानी शिवलिंग की पूजा क्यों करते हैं? आखिर क्यों शिवलिंग पर दिन-रात जल चढ़ाया जाता है? भगवान शिव को उनका प्रिय डमरू, विनाशकारी त्रिशूल और गले का नाग कैसे प्राप्त हुआ?
इन सभी सवालों के जवाब हमारी पौराणिक कथाओं और वेद-पुराणों में छिपे हैं। कई कथाओं में शिवलिंग की उत्पत्ति को ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को तोड़ने वाले अनंत ज्योति-स्तंभ से जोड़ा गया है, तो कहीं दारुवन की एक रहस्यमयी घटना से। इसी तरह डमरू से संस्कृत के स्वरों की उत्पत्ति मानी जाती है और त्रिशूल को तीनों गुणों का प्रतीक कहा जाता है।
तो आइए, रंजीत के इस ब्लॉग पर हम सरल भाषा में विस्तार से जानते हैं कि शिवलिंग की पूजा का असली रहस्य क्या है और भोलेनाथ के हर श्रृंगार के पीछे कौन सी गहरी कहानी है।
शिवलिगं कैसे हुई उत्पत्ति और क्यों की जाती जलाभिषेक
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय की बात है। एक बार कुछ स्त्रियां जंगल में लकड़ियां काटकर लाने के लिए गई हुई थी। उस समय भगवान शिव अपने मूलभूत रूप में अर्थात पूरी तरह नग्न हालत में उन सभी स्त्रियों के पास पहुंच गए और अठखेलियां करने लगे।
यह देखकर सभी स्त्रियों शर्म से लज्जित हो गई और अपने आश्रम में वापस लौट गई। लेकिन कुछ स्त्रियां भगवान शिव के इस रूप को देखकर मोहित और आकर्षित हो गयी। वे स्त्रियां काम वासना में इतनी ज्यादा उन्मादी हो गई की उन्हें अच्छे-बुरे का भान नहीं रहा। जिसके बाद वे स्त्रियां भगवान शिव का अलिंगन कर छेड़छाड़ करने लगी। रतिक्रिया करने के लिए भोलेनाथ को उकसाने लगी।
ऋषियों के श्राप से कटा शिवजी का लिंग
उसी समय वही रास्ते से कुछ ऋषि गुजर रहे थे। भगवान शिव को इस अवस्था में देखकर वह बहुत ज्यादा क्रोधित हो उठे और बोले कि हे शिव वेद मार्ग पर चलने वाले तुम इस प्रकार वेदों के विरुद्ध कार्य क्यों कर रहे हो तुम। वास्तव में इस तरह के कार्य तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम देवों के देव महादेव हो।
ऋषियों के बात सुनकर भगवान भोलेनाथ ने कोई जबाव नही दिया। जिसके बाद सभी ऋषि और ज्यादा क्रोधित हो उठे और उन्हें श्राप दे दिया कि तुम्हारा लिंग कटकर जमीन पर गिर जाए।
अग्नि पिंड बना शिवजी लिंग
इसके बाद तीनों लोकों में त्राहिमाम मच गया। देवताओं और ऋषियों ने मिलकर अग्नि को समाप्त करने के लिए तरह-तरह के उपाय करने लगे। जलधारा से उसकी लिंग की अग्नि को समाप्त करने की कोशिश की जाने लगी।
सभी तरह के उपाय व्यर्थ हो गए।जिसके बाद ऋषियों को अपनी भूल का अहसास हुआ। इस समस्या का समाधान पाने के लिए सभी ऋषि ब्रह्मा जी के पास गए। ऋषियों ने ब्रह्मा जी को पूरी बात बताई। ब्रह्मा जी के पास भी इस समस्या का कोई समाधान नही थी।
जिसके बाद ब्रह्मा जी ने सभी ऋषियों को भगवान विष्णु के पास जाने को कहा। सभी ऋषि भगवान विष्णु के पास जाने लगे। रास्ते में ही भगवान विष्णु मिल गए। उन्होंने सभी ऋषियों से पार्वती जी के पास जाने के लिए कहा।
भगवान विष्णु ने कहा कि इस ज्योतिर्लिंग पार्वती जी के अलावा कोई धारण नहीं कर सकता। यह सुनकर सभी ऋषियों ने माता पार्वती की आराधना करने लगे। माता पार्वती प्रसन्न हुई। माता पार्वती ने अग्नि पींड से छुटकारा दिलवाने के लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी।
मां पार्वती बनी कल्याण कर्त्ता
जिसके बाद सभी ऋषियों के आग्रह पर माता पार्वती ने उस ज्योतिर्लिंग को अपनी योनि में धारण कर लिया। उसी समय से उस ज्योतिर्लिंग की पूजा तीनों लोकों में की जाने लगी। उसी समय से शिवलिंग व पार्वती भग की प्रतिमा का पूजन संसार में आरंभ हुआ था।
शिवलिंग की उत्पत्ति की दूसरी पौराणिक कथा
ब्रह्मा और विष्णु का विवाद: सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर बहस छिड़ गई कि दोनों में से सबसे शक्तिशाली कौन है। अग्निस्तंभ का प्रकट होना: उनके अहंकार को शांत करने के लिए भगवान शिव एक अनंत और प्रज्वलित प्रकाश के स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में उन दोनों के बीच प्रकट हुए। आदि और अंत की खोज: उस स्तंभ का न तो आदि (शुरुआत) मिल रहा था और न ही अंत। शिवजी ने घोषणा की कि जो इस स्तंभ के छोर को पहले ढूंढ लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा।
ब्रह्मा और विष्णु का प्रयास: भगवान विष्णु वराह रूप लेकर नीचे की ओर गए और ब्रह्माजी हंस रूप लेकर ऊपर की ओर गए, लेकिन दोनों को उसका छोर नहीं मिला।
शिवलिंग का रूप: विष्णुजी ने अपनी असफलता स्वीकार की, जबकि ब्रह्माजी ने झूठ बोला। तब शिवजी ने अपने वास्तविक निराकार ज्योतिर्लिंग स्वरूप का बोध कराया, जिसे बाद में पूजनीय शिवलिंग के रूप में स्थापित किया गया।
शिवलिंग का अर्थ'लिंग' शब्द का अर्थ है — वह प्रतीक या चिह्न, जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है और जिसमें अंततः सब कुछ लीन हो जाता है।
(यह प्रतीक बताता है कि परमात्मा का कोई रूप नहीं है, और शिवलिंग शिव और शक्ति (ब्रह्मांडीय चेतना और ऊर्जा) का मिला-जुला स्वरूप है। ) क्या आप इस कथा के अलावा शिवलिंग के प्रतीकात्मक अर्थ या विभिन्न प्रकार के शिवलिंगों (जैसे पार्थिव या स्फटिक लिंग) के बारे में भी जानना चाहते हैं?
किस पुराण में है यह कथा?
वामन पुराण और कूर्म पुराण: इन पुराणों में स्पष्ट रूप से वर्णन है कि जब शिवजी दारुवन में दिगंबर (नग्न) रूप में भिक्षा मांगने पहुंचे, तो ऋषियों की पत्नियां उनके दिव्य तेज से सम्मोहित हो गईं। अनजान ऋषियों ने क्रोध में आकर शिवजी को अपना लिंग (तेज/प्रतीक) त्यागने का श्राप दे दिया।
शिव महापुराण और स्कंद पुराण: शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में भी दारुवन की इस घटना का उल्लेख है, जहां ऋषियों की अज्ञानता के कारण यह घटना घटित हुई।
भोलेनाथ के नाग ,त्रिशुल और डमरू का रहस्य जानें शिव और नाग का रहस्य
भगवान शिव के गले में नाग सुशोभित है। जो नागों के राजा कहे जाते हैं। भगवान शिव के गले में जो नाग है उसका नाम वासुकी है। यह नागलोक पर राज किया करते थे। वासुकी ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। जिसकी वजह से भगवान शिव ने वासुकी नाग को नागलोक का राजा होने का वरदान दे दिया। साथ ही वासुकी नाग को अपने गले में हमेशा लिपटे रहने का भी वरदान भोलेनाथ ने दें दिया।
शिवजी और त्रिशुल का रहस्य
विद्वानों के अनुसार जब भगवान शिव प्रकट हुए थे। उस समय वह रज,तम और सत यह गुण लेकर सृष्टि में आए थे। भगवान शिव के इन तीन गुणों की वजह से त्रिशुल की उत्पत्ति हुई थी। इन तीनों गुणों को समान रखने के लिए ही भगवान शिव ने इन तीनों के रूप में त्रिशुल ही उत्पत्ति की और इस त्रिशुल को अपने हाथ में रखा।
शिवजी और डमरू का रहस्य
भगवान शिव के हाथ में डमरू भी सुशोभित है। पुराणों के अनुसार जब देवी सरस्वती ने सृष्टि में प्रकट हुई थी तो उन्होंने ध्वनि को जन्म दिया था। लेकिन इस ध्वनि के पास सुर और संगीत नही थे। इसलिए भगवान शिव ने नाचते हुए चौदह बार अपने डमरु को बजाया। जिसकी वजह से संगीत उत्पन्न हुआ था। इसलिए डमरू को ब्रह्म स्वरूप भी कहा जाता है।
शिवलिंग पूजा की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार वाराणसी के वन में एक भील रहा करता था।जिसका नाम गुरुद्रुह था। वह वन में रहने वाले प्राणियों का शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।
तभी उसे वन में एक झील दिखाई दी। उसने सोचा मैं यहीं पेड़ पर चढ़कर शिकार की राह देखता हूं। कोई न कोई जंगली जानवर यहां पानी पीने जरूर आएगा।
यह सोचकर वह पात्र में जल भरकर बेल के पेड़ (बिल्व वृक्ष) पर चढ़ गया। उस वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित था। थोड़ी देर बाद वहां एक हिरनी आई।
शिकारी बोला कि तुम्हें मारकर मैं अपने परिवार का भरण-पोषण करूंगा। शिकारी गुरुद्रुह की बात सुनकर हिरनी बोली कि मेरे नौनिहाल बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे।
बच्चों को मैं अपनी बहन को देकर आपस लौट आऊंगी। हिरनी के ऐसा कहने पर शिकारी ने उसे जाने दिया।
थोड़ी देर बाद उक्त हिरनी की बहन उसे खोजते हुए झील के पास आ गई। शिकारी ने उसे देखकर पुन: अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाया। इस बार भी रात के दूसरे प्रहर में बेल वृक्ष के पत्ते व जल शिवलिंग पर गिरने से शिव के दूसरे पहर की पूजा हो गई।
उस हिरनी ने भी अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर रखकर आने की बात शिकारी से कहीं। शिकारी ने उस हिरनी को भी जाने दिया। थोड़ी देर बाद वहां एक हिरन अपनी हिरनी को खोजते हुए झील पर आया।
इस बार भी उसी तरह बेलपत्र और जल गिरा और तीसरे प्रहर में भी शिवलिंग की पूजा हो गई। वह हिरन भी अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आने की बात शिकारी से कहकर चला गया।
जब वह तीनों हिरनी और हिरन मिले तो अपने वचन की प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण तीनों हिरन और हिरनी शिकारी के पास आ गए। सबको एक साथ देखकर शिकारी बहुत ज्यादा खुश हुआ और उसने फिर से अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाया जिससे चौथे प्रहर की पूजा शिवलिंग की हो गई।
इस प्रकार शिकारी गुरुद्रुह दिनभर भूखा-प्यासा रहा। साथ ही वह रातभर जागता रहा। इस प्रकार चारों प्रहर की पूजा अंजाने में ही उसनेे शिव की पूजा कर दिया। शिकारी ने शिवरात्रि का व्रत रातभर जागकर संपन्न किया। चारों पहर की पूजा करने के प्रभाव से उसके सारे पाप तत्काल ही खत्म हो गया।
पुण्य प्राप्त होते ही शिकारी ने सभी हिरनों को मारने का विचार छोड़ दिया।
उसी समय शिवलिंग से भगवान भोलेनाथ प्रकट हुए और उन्होंने शिकारी गुरुद्रुह को वरदान दिया कि त्रेतायुग में तुम भील कुल में जन्म लेगा। भगवान राम तुम्हारे घर आएंगे और तुम्हारे साथ दोस्ती करेंगे। भगवान श्रीराम के कृपा से तुझे मोक्ष भी प्राप्त करोगे। इस प्रकार अंजाने में किए गए शिवरात्रि व्रत से भगवान शंकर ने शिकारी को मोक्ष प्राप्त होने का रास्ता दिखा दिया।
अनसुलझे पहलू - जो अक्सर लोग नहीं समझ पाते
शिवलिंग को लेकर सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल यही है कि क्या यह केवल शारीरिक प्रतीक है? संस्कृत में लिंग का अर्थ 'चिन्ह' या 'प्रतीक' होता है, न कि केवल जननांग। स्कंद पुराण में कहा है - "आकाशं लिंगमित्याहु:" अर्थात आकाश ही लिंग है।
दूसरा पहलू जलाभिषेक का है। वामन पुराण की दारुवन कथा में लिंग के अग्नि-पिंड बनने का वर्णन है। यह अग्नि काम, क्रोध और अहंकार की प्रतीकात्मक अग्नि है। इसीलिए उस पर निरंतर जल चढ़ाया जाता है ताकि सृष्टि का ताप शांत रहे। विज्ञान के नजरिए से भी शिवलिंग पर जलधारा रेडिएशन और ऊर्जा को संतुलित करने का प्रतीक माना जाता है।
तीसरा अनसुलझा रहस्य - योनि-पीठ। इसे माता पार्वती की योनि नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की रचनात्मक ऊर्जा यानी आधार-पीठ कहा गया है। शिव निराकार चेतना हैं, शक्ति उनका आधार है। दोनों के बिना सृजन असंभव है।
चौथा - डमरू, त्रिशूल और नाग का भौतिक रूप में न मिलना। ये तीनों मानव चेतना के 3 तत्व हैं - डमरू नाद यानी शब्द-ब्रह्म, त्रिशूल - सत्व, रज, तम का संतुलन और वासुकी नाग - कुंडलिनी शक्ति जो गले में नहीं, चेतना में लिपटी है। इसलिए शिवलिंग पूजा मूर्ति पूजा नहीं, बल्कि निराकार से साकार तक की यात्रा है।
आपके ब्लॉग के लिए 5 यूनिक प्रश्न-उत्तर
*प्रश्न 01: भगवान शिव के साकार रूप की जगह शिवलिंग की पूजा ही क्यों की जाती है?
उत्तर: शिव पुराण के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु जब शिव के आदि-अंत को नहीं खोज पाए, तब शिव ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। उसी अनंत ज्योति को लिंग कहा गया। मूर्ति एक रूप को दर्शाती है, जबकि लिंग रूप-रहित, अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक है। इसलिए शिव भक्त निराकार की पूजा लिंग के रूप में करते हैं।
*प्रश्न 02: शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र ही क्यों चढ़ाया जाता है?
उत्तर: पौराणिक कारण - दारुवन में शिवलिंग अग्नि-पिंड बन गया था, उसे शांत करने के लिए देवताओं ने जलाभिषेक शुरू किया। आयुर्वेदिक कारण - शिवलिंग पर लगा शिलाजीत और गर्मी से निकलने वाली ऊर्जा को जल ठंडा करता है। बेलपत्र में औषधीय गुण होते हैं जो जल के साथ मिलकर वातावरण को शुद्ध करते हैं।
*प्रश्न 03: भगवान शिव को वासुकी नाग ने ही क्यों चुना?
उत्तर: समुद्र मंथन के समय वासुकी को रस्सी बनाया गया था। मंथन के बाद देवताओं ने वासुकी को छोड़ दिया। तब वासुकी ने शिव की कठोर तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर उसे अपने गले में स्थान दिया। इसका दार्शनिक अर्थ है कि शिव ने अहंकार और भय रूपी नाग को वश में कर लिया है। जो व्यक्ति भय को जीत लेता है, वही शिव बनता है।
*प्रश्न 04: त्रिशूल और डमरू का वैज्ञानिक रहस्य क्या है?
उत्तर: त्रिशूल के तीन शूल - इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति के प्रतीक हैं। साथ ही यह हमारे नाड़ी तंत्र - इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का भी प्रतीक है। डमरू से 14 माहेश्वर सूत्र निकले थे, जिनसे पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण बनाया। डमरू का आकार दो त्रिकोणों से मिलकर बना है जो शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है और इससे निकलने वाली ध्वनि ब्रह्मांड की पहली ध्वनि 'नाद' मानी जाती है।
*प्रश्न 05: क्या घर में सभी प्रकार के शिवलिंग रखे जा सकते हैं?
उत्तर: नहीं। शास्त्रों में 5 मुख्य लिंग बताए गए हैं - पार्थिव मिट्टी का, स्फटिक, पारद, नर्मदेश्वर और बाणलिंग। घर के लिए सबसे शुभ नर्मदेश्वर और स्फटिक लिंग माना जाता है। पारद लिंग की पूजा के लिए विशेष नियम और शुद्धता चाहिए। अंगूठे से बड़ा शिवलिंग घर में नहीं रखना चाहिए। बड़ा शिवलिंग केवल मंदिर में ही पूजनीय होता है।
डिस्क्लेमर
*Disclaimer: इस ब्लॉग "रंजीत के ब्लॉग" पर प्रस्तुत की गई सभी जानकारी पौराणिक ग्रंथों जैसे वामन पुराण, कूर्म पुराण, शिव महापुराण, स्कंद पुराण और लोक-प्रचलित कथाओं पर आधारित है। इन कथाओं का उद्देश्य किसी भी धर्म, जाति, समुदाय या मान्यता को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि केवल धार्मिक जानकारी और जिज्ञासा को साझा करना है।
हम यह दावा नहीं करते कि यहां दी गई हर कथा शत-प्रतिशत ऐतिहासिक या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है। पुराणों में एक ही घटना के कई अलग-अलग रूप मिलते हैं, इसलिए पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे श्रद्धा और प्रतीकात्मक दृष्टिकोण से देखें। शिवलिंग की उत्पत्ति से जुड़ी दारुवन की कथा को कई विद्वान रूपक और प्रतीकात्मक कथा मानते हैं, जिसका उद्देश्य काम वासना पर नियंत्रण का संदेश देना है, न कि अश्लीलता
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