रक्षा बंधन 13 अगस्त 2030 दिन मंगलवार को मनाया जाएगा। यह त्यौहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।
रक्षा बंधन 2030: 13 अगस्त को बन रहा अद्भुत महासंयोग, जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और 03 सिद्ध उपाय
वर्ष 2030 का रक्षा बंधन पर्व अत्यंत विशेष और भक्तिमय होने जा रहा है। 13 अगस्त 2030, दिन मंगलवार को श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर भाई-बहन के अटूट प्रेम का यह पावन त्योहार पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।
ज्योतिष और पंचांग की दृष्टि से यह दिन केवल रक्षाबंधन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस दिन एक साथ कई दुर्लभ धार्मिक योग और पर्वों का अद्भुत संगम बन रहा है। 13 अगस्त को आडल योग, गायत्री जयंती, पंचम मंगला गौरी व्रत, ऋग्वेद उपकर्म, यजुर्वेद उपकर्म, हयग्रीव जयंती और विश्व संस्कृत दिवस का एक साथ आना इसे अति फलदायी और सिद्ध दिन बनाता है।
शास्त्रों के अनुसार, ऐसे दिव्य संयोगों में रक्षा सूत्र (राखी) बांधने से भाई-बहन के रिश्ते में मिठास, दीर्घायु और सुख-समृद्धि का वास होता है। मंगला गौरी व्रत के कारण बहनों को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है, वहीं गायत्री जयंती और उपकर्म के प्रभाव से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
यदि आप भी इस पावन अवसर पर अपनी पूजा को निष्फल होने से बचाना चाहते हैं और ग्रहों के शुभ प्रभाव प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस लेख में आपको मिलेंगे प्रामाणिक तथ्य, सटीक मुहूर्त और जीवन बदलने वाले सिद्ध उपाय।
पूर्णिमा तिथि: 12 अगस्त दिन सोमवार को शाम 06:23 बजे से शुरू होकर 13 अगस्त मंगलवार को शाम 04:13 बजे तक रहेगा।
रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त
रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई में शुभ मुहूर्त, चर मुहूर्त, लाभ मुहूर्त, अमृत मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त और विजय मुहूर्त के दौरान बांधे।
अब जानें राखी बांधने के लिए किस समय में आएगा कौन सा मुहूर्त
बहन जहां भाई की कलाई पर राखी बांधकर अपनी रक्षा की गुहार लगाती है। वही भाई उसे आजीवन रक्षा करने का वचन देता है।
भद्रा पर क्या कहता है मुहूर्त चिंतामणि ग्रंथ
क्या आपको पता है भद्राकाल भगवान सूर्य की बेटी और शनिदेव की बहन है। पौराणिक कथा के अनुसार संज्ञा ने अपने गर्भ से पुत्र वैवस्वत मनु और यमराज एवं बेटी यमुना नामक तीन संतानों को जन्म लिया।
महारानी संज्ञा ने संकल्प लिया कि वह कठोर तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को किसी भी कीमत में कम करेंगी। अपने नौनिहालों के पालन और भगवान सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिए उन्होंने एक तरीका निकाली। उन्होंने अपने तप से अपनी ही तरह की एक अद्वितीय महिला को उत्पन्न किया।
उसका अद्वितीय महिला का नाम संवर्णा रखा। उक्त महिला संज्ञा की छाया की तरह थी। इसलिए इनका नाम छाया पड़ गया। संज्ञा ने छाया से कहा कि अब से मेरे बच्चों और सूर्यदेव की संपूर्ण जिम्मेदारी तुम्हारी ऊपर रहेगी।
यह राज की बात सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिए। यह कहकर संज्ञा वहां से चली आती। अपने पिता के घर पहुची तो पिता ने कहा कि ये तुमने अच्छा नहीं किया। पति का घर इस प्रकार नहीं छोड़ना चाहिए।
पुत्री तुम पुन: अपने पति के पास जाओ। पिता ने जब शरण नहीं दी तो संज्ञा वन में चली गई। घोड़ी का रूप धारण करके घोर तपस्या में लीन हो गई।
दूसरी ओर सूर्यदेव को जरा भी एहसास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं संवर्णा है। संवर्णा अपने नारी धर्म का पालन करती रही और छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के संयोग से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया। भद्रा और शनि देव सगे भाई-बहन हैं। इस लिए दोनों का स्वभाव उग्र है।
पौराणिक कथाएं रक्षाबंधन के संबंध में
रक्षाबंधन के संबंधित 06 कहानियां लेख में पढ़ने को मिलेगा। कृष्ण और द्रौपदी की कथा, कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा की कथा,चंद्रशेखर आजाद और गरीब बुढ़िया, हिमायू और कर्मावती, सिकंदर और राजा पुरू, राजा बलि और भगवान वामन की कथा एक साथ दिया गया है।
राजा बलि को पहली बार माता लक्ष्मी ने बांधी थी राखी
रक्षाबंधन का संबंध वामन अवतार से संबंधित है। प्रथम बार राजा बलि के कलाई में माता लक्ष्मी ने राखी बांधकर अपने पति भगवान विष्णु को राजा बलि के दरबार से मुक्त करायी थी।
पौराणिक कथा के संबंध में कहा जाता है कि जब राजा बलि ने एक सौ यज्ञ पूर्ण कर 101 यज्ञ शुरू की तो इंद्र के आसन डोलने लगा। इंद्र को अंदेशा हो गया कि कहीं राजा बलि स्वर्ग पर अधिकार ना कर ले।
इंद्रादि देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की गुहार लगाई। भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेश धारण कर लिया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि भिक्षा के रूप में दान में मांग ली।
दूसरी ओर गुरु शुक्राचार्य ने भगवान विष्णुुु है को वामन केे रूप धारण किए हुए ब्राह्मण को पहचान लिया और राजा बलि को इस बारे में सावधान कर दिया कि यह ब्राह्मण नहीं भगवान विष्णु है।
परंतु दानवीर राजा बलि ने अपने वचन से नहीं मुकरा और तीन पग भूमि दान देने का वचन दे दिया।
वामन रूप धारण किए भगवान विष्णु ने एक पग में संपूर्ण स्वर्ग लोक नाप लिया। दूसरे पग में पूरी पृथ्वी को नाप दिया। तीसरा पैर प्रभु कहां रखे बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया।
अपना वचन नहीं निभाता तो वह पापी कहलाता। आखिर उसने अपना सिर भगवान के आगे रख दिया और कहा कि आप अब आपना पैैर मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन बने भगवान विष्णु ने ऐसा ही किया।
देखते ही राजा बलि पाताल लोक पहुंच गया। जब बलि पाताल लोक में चला गया। तब बलि ने अपने भक्ति के बल से भगवान को दिन रात अपने द्वारपाल बनने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को दानव राजा बलि के द्वारपाल (रक्षक) बनना पड़ा।
भगवान के पाताल लोक में निवास करने से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा यदि स्वामी पताल में द्वारपाल बनकर रहेंगे तो बैकुंठ का क्या होगा। इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। माता लक्ष्मी राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षा सूत्र बांधकर अपना भाई बना लिया।
माता लक्ष्मी ने राजा बलि से उपहार स्वरूप अपने पति भगवान विष्णु को मांग लिया। माता लक्ष्मी अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले गई। उस दिन श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि थी। उसी दिन से रक्षाबंधन का त्यौहार मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
श्रीकृष्ण और द्रौपदी से संबंधित कथा
महाभारत में ही रक्षाबंधन से संबंधित और द्रोपती संबंधित एक और वृतांत सुनने को मिलता है। जब कृष्ण सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था तब, उनकी तर्जनी में चोट लग गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़ कर उनकी उंगली पर पट्टी बांधी थी।
उस दिन सावन मास का पूर्णिमा तिथि था। श्री कृष्ण बाद में द्रोपती के चीरहरण के समय उनकी लाज बचाकर भाई का धर्म निभाया था।
रक्षाबंधन का संबंध राजा पुरू और विश्व विजेता सिकंदर से जुड़ा है
युद्ध के समय सिकंदर को ना मारने का वचन ले ली थी। राजा पुरू ने युद्ध के दौरान अपने हाथ में राखी बांध राखें थे और अपनी बहन को दिए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दे दिया था।
इतिहास में सिकंदर व पोरस ने युद्ध के पूर्व रक्ष सूत्र की अदला-बदली की थी। युुद्ध के दौरान राजा पोरस ने जब घातक हथियार से प्रहार करने के लिए हाथ उठाया तो उसके हाथ में रक्षासूत्र बंधी देख कर अपना हथियार रख दिया। सिकंदर ने राजा पोरस को बंदी बना लिया। सिकंदर ने पोरस के हाथ में रक्षा सूत्र बंधा देख बंदी से मुक्त कर दिया। रक्षा सूत्र का मान रखते हुए भारत से वापस लौट गया।
हिमांयु और कर्मावती की कथा
वीर सैनिक और राजपूत राजा जब दुश्मन से लड़ाई लड़ने जाते थे तब घर की महिलाएं उनके माथे पर महावीरी का तिलक लगाने के साथ ही साथ हाथों में रक्षा सूत्र अर्थात राखी भी बांध देती थी।
क्षत्रानियों को विश्वास था कि हाथ में बंधे धागा उन्हें विजय प्राप्ति के साथ वापस ले आएगा। राखी के साथ एक और ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ है।
मुगल शासन काल के दौरान जब मुग़ल बादशाह हिमायु चित्तौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा पत्नी कर्मावती ने हिमायू को राखी भेज कर रक्षा करने का वचन ले लिया।
हिमायुं ने इसे स्वीकार करके चित्तौड़ पर आक्रमण का ख्याल दिल से निकाल दिया। कालांतर में मुस्लिम होते हुए भी रक्षा सूत्र की लाज रखने के लिए चित्तौड़ की रक्षा हेतु मुग़ल बादशाह हिमायु ने बहादुर शाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ाई की। इसके बाद कर्मावती और मेवाड़ राज्य दोनों की रक्षा कर राखी की लाज रख दी।
कवित्री महादेवी वर्मा से जुड़ी कथा
महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। एक बार साक्षात्कार के दौरान उन से पूछा गया था कि आप इस पुरुस्कार में मिले एक लाख रुपए की क्या करोगी।
कहने लगी ना तो मैं अब कोई कीमती साड़ी पहनती हूं ना कोई श्रृंगार पटा कर सकती हूं। 1,00000 रुपए पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में मरने नहीं देती। कहते-कहते उनका दिल भर आया।
कौन था उनका वह भाई ? हिंदी के युग प्रदर्शक, घूमक्कड़ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला महादेवी के अपने भाई से कम नहीं थे।
एक बार वे रक्षाबंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर। रिक्शा रूकवाकर द्वार से चिल्लाते हुए बोले दीदी जरा 12 रुपए लेकर आना।
महादेवी रुपए लेकर आयी और पूछा। भाई बताओ तो सुबह सुबह 12 रुपए की क्यों जरूरत पड़ गई। जबकि आज तो रक्षाबंधन है। आज क्यों पैसे की जरूरत हैं।
निराला जी सरलता से बोले रिक्शे वाले को 02 रुपए देना है। राखी बांधने के बाद 10 रुपए तुम्हें देना है। आज राखी है ना ? राखी बंधन पर तुम्हें भी तो पैसे देने होंगे। ऐसे घूमक्कड़ सूर्य कांत त्रिपाठी निराला जी और उनकी मुंह बोली बहन महादेवी वर्मा थी।
महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद से जुड़ी कथा
अंग्रेजों से बचने के लिए चन्द्रशेखर आजाद ने भारी बारिश की एक रात अपरिचित गांव में विधवा के घर शरण लेने पहुंच गए।
जहां विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। पहलवान जैसे आजाद को देखकर डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने अपने घर में शरण देने से इनकार कर दिया। लेकिन जब चंद्रशेखर आजाद ने अपना परिचय एक क्रांतिकारी के रूप में दिया तो उन्हें सम्मान पूर्वक विधवा ने अपने घर में शरण दे दी।
बातचीत से आजाद को पता चला कि अत्यंत गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी में दिक्कत आ रही है।
आजाद ने महिला से कहा कि मेरे सिर पर 05,000 रुपए का इनाम रखा है फिरंगियों ने ? अंग्रेज सरकार को मेरी आने की सूचना देकर पांच हजार रुपए का इनाम पा सकती हो।
इससे आप अपनी बेटी का विवाह संपन्न करवा सकती हैं। यह सुन कर विधवा रो पड़ी और बोली भैया तुम भारत देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर दर-दर घूमते हो और ना जानें देश के कितने बहू बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है।
मैं ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती या कहते उसने एक रक्षा सूत्र आजाद के हाथों में बांधकर देश सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आंखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे पांच हजार रुपए पड़े थे। इसके साथ एक चिट्ठी में लिखा था, छोटी सी भेंट चंद्रशेखर आजाद की ओर से।
अब जानें राखी या रक्षासूत्र कैसी होनी चाहिए
अपने भाईयों के कलाईयों में राखी बांधने के लिए कैसी होनी चाहिए रक्षा सूत्र और राखी जानें विस्तार से ?
रक्षा सूत्र तीन धागों का होना चाहिए। लाल, पीला और सफेद। अगर नहीं हो तो लाल और पीला धागा भी चल सकता हैै। काले धागे से बने राखी बांधना वर्जित है।
रक्षा सूत्र पर चंदन के लेप लगाना बेहद शुभ होता हैै। अगर आपके पास राखी या रक्षा सूत्र नहीं है तो कलावा अर्थात कच्चे धागे भी श्रद्धा पूर्वक अपने भाई के कलाई में बांध सकती हैं बहनें।
जानें कैसे बांधे राखी
रक्षाबंधन के दिन बहनें स्नान कर नए कपड़े पहनकर, पीतल या तांबे के थाली में रोली, चंदन, अक्षत, दही, रक्षा सूत्र, मिठाइयां और दीपक रख लें। रक्षा सूत्र और पूजा की थाली सबसे पहले भगवान को समर्पित कर विधि विधान से पूजा कर लें। इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर की दिशा में मुंह करके बैठने को कहें।
पहले भाई को तिलक लगाएं, फिर रक्षा सूत्र बांधें। इसके बाद आरती करने के उपरांत मिठाई खिलाकर भाई की मंगल कामना करें। रक्षाबंधन की विधि करते समय भाई और बहन का सर खुला नहीं होना चाहिए। रक्षा बांधने के बाद माता, पिता और गुरु का आशीर्वाद लेने के तत्पश्चात बहन को समर्थ अनुसार उपहार देना चाहिए।
उपहार में ऐसी सामग्री दें जो दोनों के लिए हितकर और शुभकारी हो। काला कपड़ा, तीखा सामान और नमकीन खाद्य पदार्थ उपहार में देने से बचें।
रक्षा बंधन पर किए जाने वाले 03 सिद्ध और अचूक टोटके
*रिश्तों में मिठास और कलह निवारण: रक्षाबंधन के दिन सबसे पहले भगवान गणेश को लाल रंग की राखी अर्पित करें और मोदक का भोग लगाएं। इसके बाद भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधते समय मंत्रों का जाप करें। इससे भाई-बहन के रिश्ते में कभी कड़वाहट नहीं आती।
*आर्थिक समृद्धि हेतु उपाय: रक्षाबंधन की शाम को एक लाल रेशमी कपड़े में अक्षत (अखंडित चावल), 11 कौड़ियां और एक नारियल बांधकर मां लक्ष्मी के चरणों में रखें। पूजा के बाद इसे अपनी तिजोरी या धन स्थान पर रख दें। इससे वर्ष भर धन का प्रवाह बना रहता है।
*नज़र दोष व नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति: मंगलवार का दिन होने के कारण, रक्षाबंधन पर हनुमान जी के चरणों का सिंदूर लेकर भाई के माथे पर तिलक लगाएं। इसके बाद सरसों के तेल का एक दीपक मुख्य द्वार पर जलाएं। इससे सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और नजर दोष दूर होते हैं।
रक्षा बंधन 2030 से जुड़े *5 अनूठे प्रश्न और सटीक उत्तर
प्रश्न *01: 13 अगस्त 2030 को रक्षाबंधन पर कौन-कौन से मुख्य योग और पर्व बन रहे हैं?
उत्तर: इस दिन श्रावण पूर्णिमा के साथ-साथ आडल योग का शुभ संयोग बन रहा है। इसके अतिरिक्त गायत्री जयंती, पंचम मंगला गौरी व्रत, ऋग्वेद व यजुर्वेद उपकर्म, हयग्रीव जयंती और विश्व संस्कृत दिवस भी इसी दिन मनाए जाएंगे।
प्रश्न *02: रक्षाबंधन पर मंगला गौरी व्रत और मंगलवार का दिन होने का क्या विशेष महत्व है?
उत्तर: मंगलवार का दिन हनुमान जी और मंगल ग्रह से संबंधित है। इसके साथ ही पंचम मंगला गौरी व्रत का होना बहनों के लिए अखंड सौभाग्य, साहस और संपत्ति में वृद्धि लाने वाला माना जाता है। इस दिन की गई पूजा का अक्षय फल मिलता है।
प्रश्न *03: ऋग्वेद और यजुर्वेद उपकर्म का इस दिन क्या धार्मिक महत्व है?
उत्तर: श्रावण पूर्णिमा पर सनातन धर्मावलंबियों द्वारा उपकर्म (उपाकर्म) संस्कार किया जाता है। इसमें जनेऊ (यज्ञोपवीत) बदला जाता है और वेदों के अध्ययन-अध्यापन का संकल्प लिया जाता है, जिससे आत्म-शुद्धि और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
प्रश्न *04: हयग्रीव जयंती और संस्कृत दिवस का रक्षाबंधन से क्या संबंध है?
उत्तर: भगवान हयग्रीव को बुद्धि और वेदों के उद्धारक के रूप में पूजा जाता है। श्रावणी पूर्णिमा को ही संस्कृत दिवस भी मनाया जाता है। इस दिन पठन-पाठन और धार्मिक अनुष्ठान करने से विद्या और बुद्धि में अपार वृद्धि होती है।
प्रश्न *05: क्या 2030 में रक्षाबंधन पर आडल योग का कोई विशेष फल मिलेगा?
उत्तर: आडल योग को ज्योतिषशास्त्र में कार्यों की सफलता और रक्षा कवच देने वाला योग माना गया है। इस योग में बांधी गई राखी भाई को हर प्रकार के भय, शत्रु बाधा और कष्टों से सुरक्षित रखती है।
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