अचला या अपरा एकादशी 2027: जानें संपूर्ण विधि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा व पूजा सामग्रियों की सूची f

अचला या अपरा एकादशी 2027: जानें संपूर्ण विधि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा व पूजा सामग्रियों की सूची

अचला या अपरा एकादशी 01 जून 2027 दिन मंगलवार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को है। 

एकादशी तिथि प्रारंभ: 31 मई 2027 को प्रातः 10:00 बजे से 

एकादशी तिथि समाप्त: 01 जून 2027 को प्रातः 09:39 बजे है।

अचला / अपरा एकादशी 2027: पापों का नाश और मोक्ष का द्वार

ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अचला या अपरा एकादशी हिंदू धर्म की अत्यंत फलदायी एकादशियों में से एक है। वर्ष 2027 में यह पावन व्रत 01 जून, दिन मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 31 मई 2027 को प्रातः 10:00 बजे से प्रारंभ होकर 01 जून 2027 को प्रातः 09:39 बजे तक रहेगी। 'अपरा' का अर्थ है असीमित, अर्थात् ऐसा पुण्य जो कभी समाप्त न हो। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अपार धन, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पद्म पुराण में इस व्रत का विशेष महात्म्य बताया गया है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना करता है, उपवास रखता है और रात्रि जागरण करता है, उसके ब्रह्म हत्या, गौ-हत्या, परनिंदा, परस्त्री गमन जैसे घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत भूत-प्रेत योनि से भी मुक्ति दिलाता है। इस दिन झूठी गवाही, छल-कपट और अधर्म के मार्ग को त्याग कर सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि का भी प्रतीक है।

अचला एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, गौहत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा करने से उपजे हर तरह के पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, न्यायालय या पंचायत में झूठी गवाही देना, किसी से भी झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या लिखना, झूठे ज्योतिषी बनना तथा झूठे वैद्य बनकर मरीजों को ठगना आदि सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं।

पंचांग के अनुसार जानें एकादशी के दिन कैसा रहेगा

01 जून 2027, दिन मंगलवार को ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि को अचला एकादशी है। सूर्य वृषभ राशि में और चंद्रमा मीन राशि में रात 12:49 बजे तक इसके बाद मेष राशि में प्रवेश कर जायेंगे। सूर्य का नक्षत्र रोहिणी है।

सूर्योदय 05:00 बजे पर और सूर्यास्त 06:26 बजे पर चंद्रोदय देर रात 02:28 बजे पर और चंद्रास्त दूसरे दिन के 02:58 बजे पर होगा। दिनमान 13 घंटे 26 मिनट का रहेगा और रात्रि मान 10 घंटे 30 मिनट का होगा।


अब जानें कौन मुहूर्त में करें पूजन

अचला एकादशी के दिन अभिजीत मुहूर्त दिन के 11:16 बजे से लेकर 12:10 बजे तक रहेगा

काशी पंचांग के अनुसार पूजा करने का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त दोपहर 01:58 बजे से लेकर 02:51 बजे तक विजया मुहूर्त के रूप में है। उसी प्रकार गोधूलि मुहूर्त शाम 06:25 बजे से लेकर 06:46 बजे तक, संध्या मुहूर्त 06:26 बजे से लेकर 07:30 बजे तक, मध्य रात्रि का निशिता मुहूर्त 11:22 बजे से लेकर 12:04 बजे तक, ब्रह्म मुहूर्त 03:35 बजे से लेकर 04:18 बजे तक और प्रातः मुहूर्त 03:57 बजे से लेकर 05: 00 बजे तक है। इस दौरान जातक पूजा अर्चना कर सकते हैं।

पंचांग के अनुसार अशुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार राहुकाल का आगमन दिन के 03:05 बजे से लेकर 04:46 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार यमगण्ड काल दोपहर 08:22 बजे से लेकर 10:02 बजे तक और गुलिकाल सुबह 11:43 बजे से लेकर 01:24 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार दुमुर्हत काल सुबह 07:41 बजे से लेकर 08:35 बजे तक और शाम 3:52 बजे से लेकर 4:26 बजे तक रहेगा। इस दौरान पूजा अर्चना करना वर्जित है।

चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार दिन शुभ समय

चौघड़िया पंचांग के अनुसार दिन का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है। सुबह 07:22 बजे से लेकर 10:02 बजे तक का चर मुहूर्त का संयोग रहेगा। लाभ मुहूर्त का आगमन 10:02 बजे से लेकर 11:43 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार अमृत मुहूर्त दोपहर 11:43 बजे से लेकर 01:24 बजे तक और शुभ मुहूर्त 03:05 बजे से लेकर दोपहर 04:46 बजे तक रहेगा। 

चौघड़िया मुहूर्त दिन का अशुभ मुहूर्त

चौघड़िया पंचांग के अनुसार दिन अशुभ मुहूर्त सुबह 05:00 बजे से लेकर 06:41 बजे तक रोग मुहूर्त रहेगा। उसी प्रकार सुबह 06:41 बजे से लेकर 08:22 बजे तक उद्धेग मुहूर्त रहेगा। उसी प्रकार दिन के 01:24 बजे से लेकर 03:05 बजे तक तक काल मुहूर्त का संयोग रहेगा। इस दौरान पूजा अर्चना करना वर्जित रहेगा।

रात्रि चौघड़िया शुभ मुहूर्त

रात्रि समय का चौघड़िया पंचांग के अनुसार लाभ मुहूर्त रात 07:46 बजे से लेकर 09:05 बजे तक रहेगा। 10:24 बजे से लेकर रात 11:43 बजे तक शुभ मुहूर्त और मध्य रात्रि 11:43 बजे से लेकर 01:02 बजे तक अमृत मुहूर्त है। देर रात 01:02 बजे से लेकर 02:21 बजे तक चर मुहूर्त का संयोग है। 

चौघड़िया अशुभ मुहूर्त रात का

चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार शाम 06:226 बजे से लेकर रात 07:44 बजे तक काल मुहूर्त, रात की 09:05 बजे से लेकर रात 10:24 बजे तक उद्वेग मुहूर्त और रात 02:21 बजे से लेकर 03:41 बजे तक रोग मुहूर्त का संयोग है। इस दौरान भी पूजा अर्चना करना वर्जित है।

अचला एकादशी व्रत करने का विधान

अचला एकादशी व्रत के दिन भगवान त्रिविक्रम पूजा करने का विधान है। जो व्यक्ति अचला एकादशी व्रत करना चाहता है उसे व्रत के एक दिन पहले यानी दशमी के दिन एक बार ही शुद्ध शाकाहारी भोजन दिनभर के बीच करना चाहिए।

एकादशी के दिन व्रत का संकल्प लेकर धूप, मौसमी फल, घी एवं पंचामृत आदि से भगवान त्रिविक्रम की पूजा करनी चाहिए।

अचला एकादशी की रात सोना नहीं चाहिए बल्कि रातभर भगवान का भजन कीर्तन एवं सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।

 रात्रि जागरण करना काफी शुभ और फलदाई होता है।

द्वादशी अर्थात पारण के दिन भगवान त्रिविक्रम का पूजन करने का विधान है। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर लोगों के बीच प्रसाद वितरण करना चाहिए। इसके बाद कुल क्षेष्ठ ब्राह्मणों को शुद्ध शाकाहारी भोजन कराकर अपने क्षमता के अनुसार दान देना चाहिए। अंत में प्रसाद वितरण करने के उपरांत स्वयं भोजन कर उपवास खोलना चाहिए।

पूजा सामग्रियों की सूची

तांबे या पीतल का लोटा, जल का कलश, दूध, भगवान श्रीहरि को पहनाने के लिए वस्त्र और आभूषण, चावल, कुमकुम, दीपक, जनेऊ, तिल, फूल, अष्टगंध, तुलसीदाल, प्रसादी के लिए गेहूं आटे की पंजीरी, फल, धूप, मिठाई नारियल, मधु, गंगा जल, सूखे मेवे, गुड़ और पान के पत्ते ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के लिए रुपए रख लें।

*1. अपरा / अचला एकादशी की पूजा विधि - स्टेप बाय स्टेप 

स्टेप *01 - संकल्प और स्नान: दशमी की रात सात्विक भोजन करें। एकादशी 01 जून 2027 को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और हाथ में जल, अक्षत, फूल लेकर "मैं अपरा एकादशी का व्रत कर रहा/रही हूं" ऐसा संकल्प लें।

स्टेप *02 - चौकी स्थापना: घर के मंदिर में एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ में एक कलश में जल भरकर रखें।

स्टेप *03 - अभिषेक: भगवान को पहले गंगाजल, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करते रहें।

स्टेप *04 - श्रृंगार और अर्पण: भगवान को पीले फूल, पीतांबर, चंदन, अक्षत, तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी के बिना विष्णु पूजा अधूरी है। धूप-दीप जलाएं।

स्टेप *05 - भोग और पाठ: मखाने की खीर, फल और तुलसी युक्त जल का भोग लगाएं। विष्णु सहस्रनाम, पद्म पुराण की अपरा एकादशी कथा और आरती करें।

स्टेप *06 - रात्रि जागरण और पारण: दिन भर उपवास रखें। रात में भजन-कीर्तन करें। अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देकर फलाहार से व्रत का पारण करें।

एकादशी पर क्या करें, क्या न करें, क्या खाएं, क्या न खाएं 

क्या करें:

*01. इस दिन सत्य बोलें, मौन रहें और मन में भगवान विष्णु का स्मरण करें।

*02. गौ-सेवा, तुलसी पूजन, दीपदान और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान करें।

*03. दिन भर "ॐ नमो नारायणाय" का जाप और रात्रि जागरण करें।

*04. पीपल के वृक्ष में जल अर्पित करें, क्योंकि महीध्वज की कथा पीपल से जुड़ी है।

क्या न करें:

*01. झूठ बोलना, चुगली करना, किसी की निंदा करना, क्रोध करना और झूठी गवाही देना बिल्कुल वर्जित है।

*02. बाल, नाखून, दाढ़ी काटना, और दिन में सोना नहीं चाहिए।

*03. परस्त्री/परपुरुष का चिंतन और किसी से छल-कपट न करें।

क्या खाएं (फलाहार):

सेंधा नमक से बने आलू, कुट्टू की पूरी, साबूदाना की खिचड़ी, मखाने, फल, दूध, दही, नारियल पानी, तुलसी जल ले सकते हैं।

क्या न खाएं:

चावल, गेहूं, दाल, लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा, बासी भोजन और सामान्य नमक। शास्त्रों में एकादशी पर चावल खाना वर्जित माना गया है क्योंकि इसमें जल तत्व और चंद्रमा का प्रभाव अधिक होता है जो मन को चंचल करता है। इस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

 इस दिन भगवान विष्णु के किस रूप की पूजा होती है 

अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार और त्रिविक्रम रूप की विशेष पूजा होती है। साथ ही श्री हरि विष्णु और माता लक्ष्मी के संयुक्त रूप की आराधना फलदायी मानी जाती है।

पद्म पुराण के अनुसार, वामन अवतार ने राजा बलि के अहंकार को नष्ट करके तीन लोकों को अधर्म से बचाया था। अपरा एकादशी का व्रत भी हमारे अहंकार, झूठ और पापों का नाश करता है, इसलिए वामन रूप की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान को पीले वस्त्र और तुलसी अति प्रिय है। वामन रूप में विष्णु जी को त्रिविक्रम कहा जाता है, जिन्होंने तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को असीमित पुण्य, धन और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

एकादशी व्रत कथा का पद्मपुराण में विस्तार से बताया गया है।

एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवन श्रीकृष्ण से पूछा हे श्रीहरि ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष एकादशी का क्या नाम है तथा इस एकादशी व्रत करने का क्या माहात्म्य है। कृपा करके हमें विस्तार से कहिए? अचला एकादशी करने की कथा मिलती है पद्मपुराण से।

अचला एकादशी करें होगी धन वर्षा

भगवान श्रीहरि ने कहा कि हे धर्मराज युधिष्ठिर! ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि को ‘अचला’ तथा’ अपरा दो नामों से जानी जाती है। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी व्रत कहा जाता है। अपार एकादशी को धन देने वाली एकादशी व्रत कहा जाता है। जो मनुष्य इस व्रत को पूरे निष्ठापूर्वक और विधि-विधान से करते हैं, वे विश्व भर में प्रसिद्ध हो जाते हैं।


अचला एकादशी के दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है। इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, गौहत्या, भू‍त योनि, दूसरे की निंदा करने से उपजे हर तरह के पाप दूर हो जाते हैं। इस व्रत के करने से परस्त्री गमन, न्यायालय या पंचायत में झूठी गवाही देना, किसी से भी झूठ बोलना, झूठे शास्त्र पढ़ना या लिखना, झूठे ज्योतिषी बनना तथा झूठे वैद्य बनकर मरीजों को ठगना आदि सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं।

अचला एकादशी करें मिलेगी विष्णु धाम

जो क्षत्रिय युद्ध क्षेत्र से भाग जाए वे नरक में जाते हैं, परंतु अपरा एकादशी का व्रत को निष्ठापूर्वक करने से वे भी विष्णु धाम को प्राप्त होते हैं। जो शिष्य गुरु से शिक्षा ग्रहण करते हैं फिर उनकी निंदा करते हैं वे जरुर नरक में जाते हैं। वैसे लोग अगर अपरा एकादशी का व्रत करते हैं, तो इस पाप से मुक्त हो जाते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

पिंडदान करने का मिलता है

अपरा एकादशी व्रत करने से जो फल की प्राप्ति होती है। वह तीनों पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा को स्नान करने पर, या गंगा एवं गया धाम के फल्गु नदी तट पर पितरों को पिंडदान करने से जो फल की प्राप्ति होती है, वही अपरा एकादशी का व्रत करने से हमें प्राप्त होता है। मकरसंक्रांति के दिन प्रयागराज के स्नान से, शिवरात्रि का व्रत करने से, सिंह राशि के बृहस्पति में गोचर करने पर गोमती नदी के स्नान से, कुंभ मेले के दौरान केदारनाथ के दर्शन या बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्यग्रहण के दौरान कुरुक्षेत्र के स्नान से, सोना दान करने से अथवा गर्भवती गौदान से जो फल मिलता है, वही फल अपरा एकादशी के व्रत से जातकों को मिलेगा।

पापों से मिलेगी छुटकारा करें व्रत

यह अपरा एकादशी व्रत मनुष्य के पापरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी का काम करता है। पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए ‍अग्नि, पापरूपी अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य के समान, मृगों को मारने के लिए सिंह के समान है। अत: मनुष्य को पापों से डरते हुए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए। अपरा एकादशी का व्रत तथा भगवान त्रिविक्रम का पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकार पा कर विष्णु लोक को जाता है।

पापी भाई को मिला महा पिचाश योनि

अपरा एकादशी की प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा हुआ करता था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी, अन्यायी और पापी था। वह अपने बड़े भाई से हमेशा द्वेष रखता और धृणा करता था। उस महा पापी छोटे भाई ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी पार्थिव शरीर को एक जंगली पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ (दफना) दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा प्रेतात्मा योनि में जन्म लेकर महा पिचाश के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक तरह के उत्पात करके लोगों को परेशान करने लगा।

धौम्य ऋषि ने किया उद्धार

एक दिन उसी रास्ते से अचानक धौम्य ॠषि उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से पिचाश के उत्पात का कारण समझा। ॠषि ने खूश होकर उस पिचाश को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया।

पिचाश योनि से मिली मुक्ति

दयालु और कृपालु धौम्य ॠषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए उन्होंने खुद ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत विधि विधान से किया और उसे प्रेत योनि से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को समर्पित कर दिया। अचला एकादशी व्रत करने से मिले पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से छुटकारा मिल गई। राजा ने ॠषि को आभार व्यक्त करते हुए दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर विष्णु धाम को चला गया।

डिस्क्लेमर

पौराणिक कथा सुनने और पढ़ने से मिलती है मुक्ति

श्रीकृष्ण ने कहा कि हे धर्मराज ! अपरा एकादशी व्रत की कथा मैंने जनहित के लिए कहा हूं। इसे पौराणिक कथा को पढ़ने अथवा सुनने से मनुष्यों के सभी पापों से मुक्ति मिल जाता है।

अचला / अपरा एकादशी से संबंधित 5 यूनिक प्रश्न-उत्तर

*प्रश्न 1: अचला एकादशी को 'अपरा एकादशी' क्यों कहा जाता है और इसका वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर: अचला एकादशी को अपरा एकादशी कहने के पीछे दो गहरे अर्थ छिपे हैं। संस्कृत में 'अ' का अर्थ है नहीं और 'परा' का अर्थ है सीमा, अर्थात जिसकी कोई सीमा न हो। इसलिए अपरा का अर्थ हुआ असीमित। 

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करने से मिलने वाला पुण्य असीमित होता है, वह कभी क्षय नहीं होता। दूसरा अर्थ है - 'अपरा' अर्थात जो दूसरों को तार दे, जो अधोगति में पड़े हुए लोगों का भी उद्धार कर दे। इस दिन भगवान वामन और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एकादशी हमें सिखाती है कि मनुष्य अपने जीवन में चाहे कितने भी पाप कर चुका हो, यदि वह सच्चे हृदय से पश्चाताप करके इस व्रत को करता है तो भगवान उसे क्षमा कर देते हैं। 

यह व्रत हमें 'अचल' अर्थात स्थिर बनाता है। हमारा मन जो चंचल है, जो झूठ, निंदा, लालच में भटकता है, वह स्थिर होकर परमात्मा में लग जाता है। इसलिए इसे अचला भी कहते हैं। यह व्रत भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आत्मा को अचल शांति प्रदान करता है।

प्रश्न 2: अपरा एकादशी के व्रत से किन-किन विशिष्ट पापों से मुक्ति मिलती है, जिनका उल्लेख अन्य एकादशियों में नहीं मिलता?*

पद्म पुराण में अपरा एकादशी के बारे में बहुत विशिष्ट पापों का उल्लेख है जो इसे अन्य एकादशियों से अलग बनाता है। इस व्रत के प्रभाव से ब्रह्म हत्या, गौ-हत्या जैसे महापाप तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही साथ ऐसे सामाजिक और नैतिक पाप भी नष्ट होते हैं जो आज के समाज में बहुत आम हैं। 

जैसे - न्यायालय या पंचायत में झूठी गवाही देना, किसी की निंदा करना, झूठे शास्त्रों को पढ़ना या लिखना, झूठा ज्योतिषी बनकर लोगों को ठगना, झूठा वैद्य बनकर मरीजों से धन ऐंठना, परस्त्री गमन और किसी के साथ छल करना। शास्त्र कहते हैं कि जो लोग इन कर्मों को अपना व्यवसाय बना लेते हैं, उन्हें घोर नरक भोगना पड़ता है और कई बार भूत-प्रेत योनि भी मिलती है। 

अपरा एकादशी का व्रत इन सभी प्रकार के छल-कपट वाले पापों को जड़ से नष्ट कर देता है। यह व्रत केवल उपवास नहीं है, बल्कि एक प्रायश्चित है। यह हमें सिखाता है कि झूठे ज्ञान और झूठे कर्म से कमाया गया धन और यश कभी टिकता नहीं है। इस व्रत को करने से व्यक्ति को सत्य बोलने की शक्ति और धर्म पर अचल रहने की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न 3: 2027 में अपरा एकादशी की पूजा विधि और व्रत के नियम क्या हैं, जिससे पूर्ण फल प्राप्त हो सके?*

उत्तर: 2027 में अपरा एकादशी 01 जून मंगलवार को है। इसका पूर्ण फल पाने के लिए विधिपूर्वक व्रत करना आवश्यक है। व्रत से एक दिन पहले यानी 31 मई को दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करें और मन में व्रत का संकल्प लें। 

एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते हुए व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं, पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप और पंचामृत अर्पित करें। 

विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए, केवल फल, दूध और जल ले सकते हैं। जो पूर्ण उपवास नहीं कर सकते वे एक समय फलाहार कर सकते हैं। दिन भर झूठ, निंदा, क्रोध और वाद-विवाद से बचें। शाम को फिर से पूजा करें और रात्रि में जागरण करके भजन-कीर्तन करें। 

अगले दिन यानी 02 जून द्वादशी को सुबह किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें। पारण का समय द्वादशी तिथि में ही करना शुभ होता है। इस विधि से व्रत करने से अक्षय पुण्य मिलता है।

प्रश्न 4: अपरा एकादशी की कथा क्या है और इसे सुनने मात्र से क्या लाभ होता है?*

उत्तर: प्राचीन काल में महीध्वज नाम का एक धर्मात्मा राजा था, जिसका छोटा भाई वज्रध्वज बहुत अधर्मी और क्रूर था। वज्रध्वज ने ईर्ष्यावश अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी और उसके शव को जंगल में एक पीपल के पेड़ के नीचे दबा दिया। 

अकाल मृत्यु के कारण महीध्वज की आत्मा प्रेत बन गई और उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगी। वह रोज लोगों को परेशान करती थी। एक दिन महर्षि धौम्य उधर से गुजरे तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से सब जान लिया। 

उन्होंने प्रेत को अपने तपोबल से पीपल से नीचे उतारा और उसे प्रेत योनि से मुक्ति का उपाय बताया। ऋषि ने कहा कि ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी आने वाली है, तुम इस व्रत को करो। ऋषि के कहने पर प्रेत रूपी महीध्वज ने अपरा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य विमान पर बैठकर विष्णुलोक चला गया। 

जब वज्रध्वज को यह बात पता चली तो उसे भी पश्चाताप हुआ और उसने भी इस व्रत को किया। इस कथा को सुनने मात्र से मनुष्य को भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है और अनजाने में किए गए पापों का प्रायश्चित होता है। यह कथा सिखाती है कि मृत्यु के बाद भी व्रत का पुण्य आत्मा का उद्धार कर सकता है।

प्रश्न 5: आधुनिक जीवन में अपरा एकादशी की प्रासंगिकता क्या है? क्या यह व्रत केवल धार्मिक है या वैज्ञानिक भी?

उत्तर: आधुनिक युग में जहां झूठ, दिखावा, सोशल मीडिया पर दूसरों की निंदा, फेक न्यूज, झूठे ज्ञान और ठगी बढ़ गई है, वहां अपरा एकादशी की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। शास्त्रों में जिन पापों का वर्णन है जैसे झूठा ज्योतिषी बनना, झूठा वैद्य बनना, झूठे शास्त्र लिखना, आज के संदर्भ में यह फर्जी डिग्री, फर्जी खबरें फैलाना, लोगों को गुमराह करना ही है। 

यह व्रत हमें डिजिटल युग में भी सत्य और ईमानदारी पर टिके रहने की सीख देता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी एकादशी का व्रत बहुत लाभदायक है। महीने में दो बार अन्न का त्याग करने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है, शरीर डिटॉक्स होता है और मन शांत होता है। उपवास के दौरान जब हम अन्न नहीं खाते तो हमारी ऊर्जा भौतिक पाचन से हटकर मानसिक एकाग्रता में लगती है। 

रात्रि जागरण और मंत्र जाप से तनाव कम होता है। इसलिए यह व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह एक लाइफस्टाइल सुधार है। यह हमें सिखाता है कि महीने में एक दिन अपने शरीर, मन और कर्मों की शुद्धि के लिए निकालना चाहिए, जिससे हम अचल और स्थिर जीवन जी सकें।

डिस्क्लेमर 

यह लेख केवल सामान्य जानकारी, धार्मिक मान्यता और जन-श्रुति पर आधारित है। इसमें दी गई अचला या अपरा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, व्रत विधि, महात्म्य, कथा और पाप-नाश से संबंधित जानकारी विभिन्न पंचांगों, पद्म पुराण तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों से संकलित की गई है। 01 जून 2027 की तिथि और समय की गणना स्थानीय पंचांग और सूर्योदय के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है, इसलिए पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने स्थानीय विद्वान पंडित या पंचांग से एक बार पुष्टि अवश्य कर लें।

हम किसी भी प्रकार के अंधविश्वास, चमत्कार या पाप से मुक्ति की 100% गारंटी का दावा नहीं करते हैं। व्रत और पूजा आस्था और श्रद्धा का विषय है, इसका फल व्यक्ति के कर्म, नीयत और ईश्वर के प्रति समर्पण पर निर्भर करता है। इस लेख में बताए गए पापों से मुक्ति जैसे विषयों को केवल आध्यात्मिक और नैतिक प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए, इसे किसी कानूनी या सामाजिक अपराध से बचने का उपाय न समझा जाए।

इस लेख का उद्देश्य किसी भी धर्म, जाति, समुदाय या व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। यदि किसी शब्द या व्याख्या से किसी को आपत्ति है तो वह केवल अनुवाद और संकलन की त्रुटि हो सकती है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या, जैसे उपवास करने में असमर्थता, गर्भावस्था, बीमारी या दवा लेने की स्थिति में व्रत करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। लेखक और प्रकाशक इस लेख के उपयोग से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान, हानि या परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। पाठक अपने विवेक और आस्था के अनुसार निर्णय लें।


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