रथ यात्रा क्या है, जानें रथ के घोड़े: रंग: लंबाई: चौड़ाई की संपूर्ण जानकारी f

रथ यात्रा क्या है, जानें रथ के घोड़े: रंग: लंबाई: चौड़ाई की संपूर्ण जानकारी

"भगवान विष्णु के चार धाम में एक धाम जगन्नाथ पुरी धाम से प्रति वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा निकाली जाती है। जानें रथ यात्रा के संबंध में संपूर्ण जानकारी"

दिव्या रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की तस्वीर

जब भगवान भी लेते हैं विश्राम - जगन्नाथ की दिव्य अनवसर लीला से रथयात्रा तक

श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम का दिव्य रथयात्रा स्वरूप केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम है। हर साल आषाढ़ मास में पूरी दुनिया इस अलौकिक यात्रा की साक्षी बनती है, लेकिन इस यात्रा के पीछे छिपी है एक गहरी रहस्यमयी लीला। कहा जाता है कि ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा, यानी स्नान पूर्णिमा के दिन 108 घड़ों से महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा बीमार पड़ जाते हैं।

इसे 'अनवसर' या 'अनासार' काल कहा जाता है। 15 दिनों तक तीनों मूर्तियों को एकांत में रखा जाता है, मंदिर के कपाट भक्तों के लिए बंद हो जाते हैं और केवल कविराज के रूप में पुजारी ही उनकी सेवा और औषधीय उपचार कर पाते हैं। इस दौरान भक्तों को दर्शन नहीं, केवल चरणामृत के रूप में जल ही प्रसाद मिलता है। यही बीमारी और एकांतवास के बाद आषाढ़ अमावस्या को भगवान स्वस्थ होते हैं, प्रतिपदा को उनका नेत्रोत्सव श्रृंगार होता है और द्वितीया को वह प्रसिद्ध रथयात्रा निकलती है जो भक्तों को सीधे भगवान से जोड़ देती है।

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*✨ "श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम का दिव्य रथयात्रा स्वरूप – भक्ति, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम क्या है? ✨

*भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम और बहन सुभद्रा , पूर्णिमा तिथि से बीमार क्यों पड़ जाते हैं?


*15 दिनों तक बीमार रहेंगे इसलिए एकांतवास करेंगे भाई-बहन और भगवान जाने संपूर्ण विधि?

*15 दिनों तक भक्तों को भगवान के दर्शन और मंदिर में प्रवेश निषेध क्यों रहते हैं? 

*15 दिनों तक मंदिर का कपाट बंद रहेगा। सिर्फ पुजारी जो कविराज के रूप में भगवान और उनके भाई बहनों को इलाज के लिए मंदिर में प्रवेश कर सकेंगे ऐसा क्यों होता है?

*15 दिनों तक भक्तों को प्रसाद के रूप में सिर्फ जल ही क्यों मिलता है?

*रोमांच से भरा है जगन्नाथ मंदिर की कहानी?

*जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है?

*आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को भगवान बीमारी से कैसे ठीक होते हैं?

*आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि को भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र का भव्य श्रृंगार किया जाएगा और विशेष पूजा अर्चना होती है ज्यादा संपूर्ण जानकारी?

*आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को रथ यात्रा निकाली जाएगी?

*अलग-अलग रथों पर भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा भाई बलभद्र सवार होकर अपने भक्तों के दर्शन के लिए मंदिर से क्यों निकालते हैं? 

*जगन्नाथ मंदिर से निकल कर रथ यात्रा अपने मौसी बाड़ी में जाकर नौ दिनों तक विश्राम क्यों करते हैं?

*पूरे एक माह तक चलता है भगवान जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव?

*जगन्नाथ रथ यात्रा किसने शुरू की?

अब जानें तीनों रथों की खासिय 

जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन ओडिशा स्थित पुरी में किया जाता है। प्रतिवर्ष उड़ीसा के पूर्वी तट पर स्थित पुरी में भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा का भव्य उत्सव पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार बड़े ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है।

जगन्नाथ रथ उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरंभ करके शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है। इस दौरान रथ को अपने हाथों से खिंचना बेहद शुभ माना जाता है। रथ यात्रा से संबंधित कुछ पौराणिक कहानियां मौजूद हैं। भगवान कृष्ण और बलराम को छल से मारने के लिए, उनके मामा कंस ने दोनों भाइयों को मथुरा में आमंत्रित किया था। उन्होंने अक्रूर जी को गोकुल रथ के साथ भेजा था।

बलराम के साथ भगवान कृष्ण, रथ पर बैठे और मथुरा के लिए चल दिए। विष्णु भक्त भगवान के इस दिन प्रस्थान को रथ यात्रा के रूप में मनाते हैं। भगवान कृष्ण मथुरा पहुंचने पर अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर वासियों को दर्शन देने के लिए निकले। नगर वासियों ने अपने हाथों से रथ खींच कर उनका स्वागत किया।

दूसरी कथा

एक बार की बात है, भगवान कृष्ण की आठ पत्नियां कृष्ण और गोपी की मां रोहिणी से जुड़ी कुछ दिव्य कथाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहती थीं।

शुरू में मां कहानी नहीं बताना चाहती थी। अंत में, एक लंबे अनुरोध के बाद, वह मान गई लेकिन इस शर्त पर कि सुभद्रा दरवाजे की रखवाली करेगी ताकि कोई भी न सुन ले।

सुभद्रा इतनी मोहित हो गईं कि भगवान कृष्ण और बलराम को द्वार मिल गया और सुभद्रा ने उनके बीच में अपने हाथों को चौड़ा करके खड़े होकर उन्हें रोक दिया।

उसी समय, ऋषि नारद पहुंचे और उन्होंने तीन भाई-बहनों को एक साथ देखा। इसलिए, उन्होंने उन तीनों के लिए प्रार्थना की कि वे अपना आशीर्वाद हमेशा के लिए इस तरह प्रदान करें। तब देवताओं ने नारद की इच्छा पूरी की। अब तीनों देवता पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सदा निवास करने लगे।

पुरी में निकला भव्य रथयात्रा की तस्वीर

जगन्नाथ यात्रा के बारे में एक और कहानी है । कई लोगों का कहना है कि द्वारका में रथ यात्रा उत्सव भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा से जुड़ा है।

द्वारका में, विष्णु भक्तों द्वारा उस दिन जश्न मनाया जब बलराम, भगवान कृष्ण, उनकी बहन सुभद्रा रथ पर सवार होकर विजया जुलूस के रूप में शहर की जनता के बीच गए थे।

रोमांचक है जगन्नाथ मंदिर की कहानी

महाभारत के 18 वें दिन की लड़ाई के दौरान, अर्जुन के रथ की प्रेरक शक्ति बनकर भगवान कृष्ण सारथी बने थे।

जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है?

भगवान जगन्नाथ यात्रा से जुड़ी कई कहानियां हैं, इसलिए हर कहानी के साथ इसे मनाने का तरीका अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, यदि हम सबसे चर्चित कहानी के साथ जाते हैं, तो भगवान कृष्ण हर साल एक बार अपने घर लौटना चाहते हैं। इस प्रकार, सभी भक्त रथ खींचते हैं, जगन्नाथ मंदिर जाते हैं और सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु से आशीर्वाद लेते हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए भारी उत्साह के साथ मनाई जाती है।

जगन्नाथ रथ यात्रा का क्या महत्व है?

जगन्नाथ दो शब्दों से बना है। जग से बना है जो ब्रह्मांड का स्वरूप है और नाथ का अर्थ है भगवान, यानी 'ब्रह्मांड का भगवान। इसलिए भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु के अवतारों के अवतार के रूप में जाना जाता है।

जगन्नाथ मंदिर से रथ निकल गुडिचा मंदिर जाता है

प्रतिवर्ष रथ यात्रा को भक्तों द्वारा व्यापक रूप से जाना जाता है। मूर्तियों को एक रथ पर ले जाया जाता है, और इसलिए, तीन रथ भक्तों द्वारा पुरी की सड़कों के माध्यम से कुछ किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक खींचे जाते हैं।

रथ खींचने से सारे पाप हो जाते हैं नष्ट

ऐसी मान्यता है कि जुलूस के दौरान अपने भगवान के रथों को खींचना भगवान की भक्ति में शामिल होने का एक तरीका है। यह उन पापों को भी नष्ट कर देता है जो मनुष्य से जाने या अनजाने में किए गए पाप हो।

कई भक्त भगवान का आशीर्वाद लेने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए दुनिया भर में जगन्नाथ रथ यात्रा को व्यापक रूप से मनाने आते हैं। रथ यात्रा के समय वातावरण कितना शुद्ध और आनंदमय होता है। जगन्नाथ रथ यात्रा गुंडिचा यात्रा, रथ महोत्सव, दशावतार और नवदीना यात्रा के रूप में जगत में प्रसिद्ध है।

जगन्नाथ रथ यात्रा किसने शुरू की?

जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास बहुत समृद्ध है। ऐसा माना जाता है कि मुगल काल में राजस्थान के जयपुर के राजा रामसिंह को 18वीं शताब्दी में रथ यात्रा आयोजित करने के रूप में वर्णित किया गया है। ओडिशा में, मयूरभंज और परलाखेमुंडी के राजाओं ने रथ यात्रा का आयोजन किया, हालांकि पैमाने और लोकप्रियता के मामले में सबसे भव्य त्योहार पुरी में होता है।

रथ यात्रा के दौरान रथों द्वारा कितनी दूरी तय की जाती है?

रथ यात्रा, या रथ उत्सव 10-12 दिनों का चलने वाला वार्षिक उत्सव है, जिसके दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथों में ले जाया जाता है, जो नौ दिनों के लिए जगन्नाथ मंदिर से 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर के भीतर रहता है।
देवताओं को गुडिंचा क्यों ले जाया जाता है, इस पर हिंदू पौराणिक कथाओं में अलग-अलग मत हैं। एक कथा यह है कि देवराज इंद्रयुम्ना की रानी गुडिंच से मिलते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने मंदिर का निर्माण किया था।

एक और कथा यह है कि त्योहार के चौथे दिन, भगवान जगन्नाथ की पत्नी देवी लक्ष्मी अपने पति को मिलने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं।

नौ दिनों तक मौसी बाड़ी में रहने के बाद भगवान कृष्ण, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को वापस जगन्नाथ मंदिर में लाया जाता है। यात्रा का नाम बहुदा जात्रा या जगन्नाथ यात्रा कहा जाता है। इसलिए भक्तों द्वारा रथ खींचे जाते हैं।

जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक तीन रथों के जुलूस का नाम पहंडी है।

रथ यात्रा को गुंडिचा यात्रा क्यों कहा जाता है?

रथ यात्रा को प्रारंभिक रूप से गुंडिचा जात्रा, नवदीना जात्रा, घोसा जात्रा, दशावतार जात्रा और कई अन्य नामों से जाना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि भगवान रानी की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें वर्ष में एक बार दो दिनों के प्रवास के लिए अपने महल में जाने का वादा करते हुए वरदान दिया। रानी गुंडिचा का निवास बाद में एक मंदिर बन गया।

एक और कहानी है कि गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की मौसी हैं, जो अपने बहिन बेटों को सालाना स्वागत करना पसंद करती हैं ताकि उन्हें प्यार और और दुलार दिया जा सके।

अब जानें तीनों रथों की खासिय

जगरनाथ रथ यात्रा में लगने वाले रथों का नाम गरुड़ध्वज, कपिध्वज या नंदीघोष है। इन रथों में 16 पहिए लगे होते हैं और उनकी ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। रथ को ढांकने के लिए लाल और पीले रंग के 1100 मीटर कपड़ों का उपयोग किया जाता है। इस रथ को बनाने में 832 तरह की लकड़ियों के टुकड़ों का उपयोग में लाया जाता है।

श्री कृष्ण रथ के झंडे नाम त्रिलोक्य मोहिनी है

इन रथों के सारथी का नाम दारुक है। इस रथ का रक्षा भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ और नृसिंह हैं। रथ पर लगे झंडें का नाम त्रिलोक्य मोहिनी है। रथ पर जय और विजय नाम के दो द्वारपाल विरजवान रहते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के घोड़ों का रंग सफेद है

इस रथ में जोते जाने वाले घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है। घोड़े का रंग सफेद होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ की रक्षा के लिए शंख और सुदर्शन स्तंभ भी लगा रहता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, उसका नाम शंखचूड़ है।

जगन्नाथ के रथ के साथ आठ ऋषियों चलते हैं

इस रथ पर भगवान जगन्नाथ के अलावा अन्य सहायक देवता के रूप में वराह, गोवर्धन, कृष्ण, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रूद्र भी उपस्थित रहते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ के साथ आठ ऋषि भी चलते हैं। जिनके नाम नारद, पाराशर, विशिष्ठ, विश्वामित्र, देवल, व्यास, शुक, और रूद्र हैं।

श्रीकृष्ण के रथ का नाम तालध्वज है

भगवान श्रीकृष्ण के रथ का नाम तालध्वज है। इस रथ की ऊंचाई 13.2 मीटर है। रथ में 14 पहियों लगे रहते हैं। जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बनता है। इस रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली हैं। इस रथ में झंडा का नाम उनानी हैं।

बलराम जी के रथ के घोड़े काले होते हैं

बलराम जी के रथ को काले रंग के 4 घोड़े खींचते हैं। इन घोड़ों का नाम त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनवा है। इस रथ पर नंद और सुनंद नाम के 2 द्वारपाल सवार रहते हैं। रथ की रक्षा के लिए हल और मुसल भी होते हैं। इनके रथ की शक्तियों के नाम ब्रह्म और शिवा है। इनके रथ को खिंचने के लिए नागों के देवता वासुकी नाग के रुप में रस्सी इस्तेमाल किया जाता है।

रथ के साथ सात ऋषियों का दल चलता है

इस रथ में बलराम जी के अलावा उनके अन्य सहायक देवता के रूप में गणेश, कार्तिकेय, प्रलंबरी, हलायुध, मृत्युंजय, नटवर, सर्वमंगल, मुक्तेश्वर और शेषदेव होते हैं। बलराम जी के रथ के साथ पुलह, असस्ति, मुद्गल, अंगिरा, पौलस्त्य, अत्रेय और कश्यप ऋषि भी चलते हैं।

सुभद्रा के रथ का नाम जो देवदलन है

बहन सुभद्रा देवदलन रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण को निकती है। रथ अन्य नामों में दर्पदलन और पद्मध्वज भी है। रथ की ऊंचाई 12.9 मीटर है। रथ में 12 पहिए लगे रहते हैं। रथ को लाल और रंग के काले कपड़ों से ढका रहता है। र लकड़ी के 593 टुकड़ों का उपयोग किया जाता है।

सुभद्रा का रथ लाल रंग का होता है

इस रथ के रक्षक मां दुर्गा और सारथी अर्जुन होते हैं। इस रथ की द्वारपाल यमुना और मां गंगा हैं। इनके रथ की झंड़े का नाम नदंबिका है। इनके रथ की रक्षा के लिए कल्हर और पद्म शस्त्र होते हैं।
इस रथ की शक्तियों के नाम भुवनेश्वरी और चक्र है। बहन सुभद्रा के रथ में लाल रंग होता है। रथ में चार घोड़े जोते जाते हैं। जिनके नाम अपराजिता, रोचिक, मोचिक और जिता है। इस रथ को खींचने वाली रस्सी का नाम स्वर्णचुड़ा हैं।

सुभद्रा जी के इनके अलावा रथ में सहायक देवियों के रुप में चंडी, चामुंडा, उग्रतारा, वनदुर्गा, वराही, श्यामा, काली, मंगला और विमला नाम की देवियां होती हैं। इनके रथ के साथ भृगु, व्रज, श्रृंगी, सुपर्व, ध्रुव और उलूक ऋषि चलते हैं।

ब्लॉग से संबंधित 05 यूनिट प्रश्न और उत्तर 

*प्रश्न 01: अनवसर काल क्या है और 15 दिनों तक भगवान के बीमार पड़ने के पीछे क्या मान्यता है?

उत्तर: अनवसर काल जगन्नाथ परंपरा का सबसे गूढ़ रहस्य है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को स्नान पूर्णिमा महोत्सव होता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर 108 घड़ों के शीतल जल से स्नान कराया जाता है। 

लोक मान्यता है कि इतने अधिक जल से स्नान के कारण भगवान को ज्वर आ जाता है। इसलिए उन्हें 'अनवसर गृह' नामक एकांत कक्ष में ले जाया जाता है। इन 15 दिनों तक भगवान को मनुष्य की तरह ही औषधि, काढ़ा, फलों का रस और हल्का भोजन दिया जाता है। 

भक्तों के लिए दर्शन वर्जित होता है, क्योंकि इस समय भगवान अस्वस्थ अवस्था में होते हैं। दार्शनिक दृष्टि से यह लीला हमें सिखाती है कि ईश्वर भी भक्त के भाव में मनुष्य बन जाते हैं। वे हमें बताते हैं कि विश्राम और उपचार जीवन का हिस्सा है। 

यह अवधि मंदिर की पवित्रता और मूर्तियों के अंगराग (पुनः रंगाई) के लिए भी होती है, ताकि रथयात्रा से पहले मूर्तियां नई आभा के साथ तैयार हो सकें। आषाढ़ कृष्ण अमावस्या को जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तो उसे 'अमावस्या' नहीं 'चतुर्दशी' की तरह मनाया जाता है।

*प्रश्न 02: जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है? इसका पौराणिक महत्व क्या है?

उत्तर: रथयात्रा के कई पौराणिक कारण बताए जाते हैं। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार एक बार बहन सुभद्रा ने नगर भ्रमण की इच्छा प्रकट की। तब भाई जगन्नाथ और बलराम उन्हें रथ पर बैठाकर नगर दिखाने ले गए और अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर में ले गए। दूसरी मान्यता द्वारका से जुड़ी है। 

जब सुभद्रा को द्वारका में श्रीकृष्ण और बलराम की बाल लीलाओं की कथा सुनाई जा रही थी, तो तीनों इतने भाव-विभोर हो गए कि उनकी आंखें बड़ी और हाथ-पैर सिकुड़ गए, यही आज की जगन्नाथ मूर्ति का रूप है। 

रथयात्रा इस भाव-यात्रा का प्रतीक है। तीसरी मान्यता यह है कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपने भक्तों के बीच स्वयं आते हैं, ताकि जो भक्त मंदिर के भीतर नहीं आ सकते, उन्हें भी दर्शन मिल सके। यह समानता और समावेश का पर्व है, जहां भगवान स्वयं राजा से रंक तक सबके पास जाते हैं। स्कंद पुराण में भी कहा गया है कि जो व्यक्ति रथयात्रा में रथ खींचता है, उसे सौ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है।

*प्रश्न 03: तीनों रथों की विशेषता क्या है और मौसी बाड़ी (गुंडिचा मंदिर) में 09 दिन क्या होता है?

उत्तर: रथयात्रा में तीन अलग-अलग भव्य रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष' है, जो 45 फीट ऊंचा, 16 पहियों वाला और लाल-पीले कपड़े से सजा होता है। बलभद्र जी का रथ 'तालध्वज' है, जो 44 फीट ऊंचा, 14 पहियों वाला और लाल-हरे कपड़े से सजा होता है। 

सुभद्रा जी का रथ 'दर्पदलन' या 'पद्मध्वज' कहलाता है, जो 43 फीट ऊंचा, 12 पहियों वाला और लाल-काले कपड़े से सजा होता है। ये रथ हर साल नई लकड़ी से बनाए जाते हैं। जगन्नाथ मंदिर से 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर को मौसी बाड़ी कहा जाता है। 

यहां तीनों भाई-बहन 09 दिन विश्राम करते हैं। इस दौरान यहां विशेष पूजा, भजन और प्रसाद का आयोजन होता है। मान्यता है कि यहां मां गुंडिचा अपने भतीजे-भतीजियों के लिए विशेष पकवान बनाती हैं। 09 दिन बाद 'बहुड़ा यात्रा' में वापसी होती है और रास्ते में 'मौसी मां' के मंदिर में भगवान को उनका प्रिय 'पोडा पीठा' अर्पित किया जाता है।

*प्रश्न 04: अनवसर काल में भक्तों को दर्शन क्यों नहीं मिलते और इस दौरान पुरी में क्या परंपरा निभाई जाती है?

उत्तर: अनवसर काल में दर्शन बंद होने के पीछे भक्ति और व्यावहारिक दोनों कारण हैं। भक्ति भाव से देखा जाए तो जैसे घर में कोई बीमार हो तो उसे एकांत में रखा जाता है, वैसे ही भगवान भी एकांतवास में होते हैं। 

इस समय उन्हें छूना या भीड़ में लाना उचित नहीं माना जाता। व्यावहारिक कारण यह है कि इस 15 दिन में दारू-ब्रह्म मूर्तियों का श्रृंगार और मरम्मत की जाती है। साल भर धूप, दीप और चंदन से मूर्तियों का रंग फीका पड़ जाता है, इसलिए इस समय 'दत्त' समाज के सेवक मूर्तियों को नया रंग और लेप लगाते हैं। 

इस दौरान पुरी में एक और परंपरा है - भक्त 'अलारनाथ' मंदिर जाते हैं। कहा जाता है कि जब जगन्नाथ जी बीमार होते हैं, तो भक्तों को दर्शन देने के लिए वे अलारनाथ के रूप में प्रकट होते हैं, जो पुरी से 23 किमी दूर ब्रह्मगिरी में है। वहां भी भक्तों को खीर का प्रसाद मिलता है। पुरी के स्थानीय लोग इस दौरान भगवान के स्वस्थ होने के लिए व्रत और प्रार्थना करते हैं।

*प्रश्न 5: रथयात्रा एक महीने तक कैसे चलती है? इसका समापन कैसे होता है?

उत्तर: रथयात्रा केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, यह एक महीने का महापर्व है। इसकी शुरुआत स्नान पूर्णिमा से ही हो जाती है। उसके बाद 15 दिन अनवसर, फिर नेत्रोत्सव और फिर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मुख्य रथयात्रा। गुंडिचा में 09 दिन विश्राम के बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी या हरिशयनी एकादशी को वापसी यात्रा 'बहुड़ा यात्रा' होती है। 

वापसी में एक और रोमांचक परंपरा होती है - 'सोना बेशा'। बहुड़ा के अगले दिन भगवान रथ पर ही सोने के आभूषणों से सजते हैं, जिसे राजराजेश्वर बेशा भी कहते हैं। इसके बाद 'अधर पना' अनुष्ठान होता है, जिसमें रथ पर ही एक विशेष मीठा शर्बत भगवान को अर्पित किया जाता है, जो रथ के ऊपर स्थित पार्श्व देवताओं और अदृश्य आत्माओं के लिए होता है। 

अंतिम दिन 'नीलाद्रि बिजे' होता है, जब भगवान को मंदिर में वापस लाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी जगन्नाथ जी से रूठ जाती हैं क्योंकि वे उन्हें बिना बताए मौसी के घर चले गए थे। तब भगवान उन्हें रसगुल्ला खिलाकर मनाते हैं। यह परंपरा आज भी 'रसगुल्ला दिवस' के रूप में मनाई जाती है और इसी के साथ रथयात्रा महोत्सव का समापन होता है।

ब्लॉग से संबंधित अनसुलझे पहलू 

जगन्नाथ मंदिर की कई बातें आज भी रहस्य बनी हुई हैं। पहला, अनवसर काल में भगवान को दी जाने वाली औषधि का सटीक मिश्रण क्या है? यह केवल दइतापति सेवकों और कविराजों को ही पता है और इसे गुप्त रखा जाता है। 

दूसरा, मूर्तियों में मौजूद 'ब्रह्म पदार्थ' क्या है? कहा जाता है कि हर 12-19 साल में जब 'नवकलेवर' होता है, तो पुरानी मूर्ति से इस पदार्थ को निकाल कर नई मूर्ति में रखा जाता है, लेकिन इसे आज तक किसी ने देखा नहीं है। 

तीसरा, मंदिर के ऊपर का ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में क्यों लहराता है और मंदिर की परछाई क्यों नहीं बनती, इसका वैज्ञानिक उत्तर आज तक नहीं मिला। 

चौथा, महाप्रसाद का रहस्य - लाखों लोगों के लिए एक ही रसोई में प्रसाद बनता है, न कभी कम पड़ता है न व्यर्थ जाता है। 

पांचवां, रथों को खींचने के लिए उपयोग की जाने वाली लकड़ी के पेड़ों का चयन कैसे होता है और उन्हें काटने की अनुमति किस प्राचीन विधि से मिलती है, यह भी आम जनता के लिए अनसुलझा है।

डिस्क्लेमर 

*अस्वीकरण: इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं, स्कंद पुराण, जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और विभिन्न मीडिया स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल भक्तों को जानकारी और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। 'भगवान के बीमार पड़ने' जैसी घटनाओं को मानवीय लीला और भक्ति भाव से समझा जाना चाहिए, इसे चिकित्सीय या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में न देखा जाए। 

रथयात्रा की तिथियां सनातन पंचांग के अनुसार हर वर्ष बदल सकती हैं, इसलिए यात्रा पर जाने से पहले जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट या स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य कर लें। मंदिर के अनवसर काल, दर्शन और प्रसाद से संबंधित नियम मंदिर प्रशासन द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और समय-समय पर बदल सकते हैं। 

लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रकार की अनुष्ठानिक त्रुटि, तिथि में भिन्नता या दर्शन में असुविधा के लिए जिम्मेदार नहीं है। यह ब्लॉग किसी भी अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने का एक प्रयास है।



एक टिप्पणी भेजें (0)
और नया पुराने