"भगवान विष्णु के चार धाम में एक धाम जगन्नाथ पुरी धाम से प्रति वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को रथ यात्रा निकाली जाती है। जानें रथ यात्रा के संबंध में संपूर्ण जानकारी"
जब भगवान भी लेते हैं विश्राम - जगन्नाथ की दिव्य अनवसर लीला से रथयात्रा तक
श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम का दिव्य रथयात्रा स्वरूप केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम है। हर साल आषाढ़ मास में पूरी दुनिया इस अलौकिक यात्रा की साक्षी बनती है, लेकिन इस यात्रा के पीछे छिपी है एक गहरी रहस्यमयी लीला। कहा जाता है कि ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा, यानी स्नान पूर्णिमा के दिन 108 घड़ों से महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा बीमार पड़ जाते हैं।
इसे 'अनवसर' या 'अनासार' काल कहा जाता है। 15 दिनों तक तीनों मूर्तियों को एकांत में रखा जाता है, मंदिर के कपाट भक्तों के लिए बंद हो जाते हैं और केवल कविराज के रूप में पुजारी ही उनकी सेवा और औषधीय उपचार कर पाते हैं। इस दौरान भक्तों को दर्शन नहीं, केवल चरणामृत के रूप में जल ही प्रसाद मिलता है। यही बीमारी और एकांतवास के बाद आषाढ़ अमावस्या को भगवान स्वस्थ होते हैं, प्रतिपदा को उनका नेत्रोत्सव श्रृंगार होता है और द्वितीया को वह प्रसिद्ध रथयात्रा निकलती है जो भक्तों को सीधे भगवान से जोड़ देती है।
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*✨ "श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलराम का दिव्य रथयात्रा स्वरूप – भक्ति, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम क्या है? ✨
*भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम और बहन सुभद्रा , पूर्णिमा तिथि से बीमार क्यों पड़ जाते हैं?
*जगन्नाथ मंदिर से निकल कर रथ यात्रा अपने मौसी बाड़ी में जाकर नौ दिनों तक विश्राम क्यों करते हैं?
*पूरे एक माह तक चलता है भगवान जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव?
*जगन्नाथ रथ यात्रा किसने शुरू की?
अब जानें तीनों रथों की खासिय
जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन ओडिशा स्थित पुरी में किया जाता है। प्रतिवर्ष उड़ीसा के पूर्वी तट पर स्थित पुरी में भगवान जगन्नाथ जी की रथ-यात्रा का भव्य उत्सव पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार बड़े ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है।
जगन्नाथ रथ उत्सव आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से आरंभ करके शुक्ल एकादशी तक मनाया जाता है। इस दौरान रथ को अपने हाथों से खिंचना बेहद शुभ माना जाता है। रथ यात्रा से संबंधित कुछ पौराणिक कहानियां मौजूद हैं। भगवान कृष्ण और बलराम को छल से मारने के लिए, उनके मामा कंस ने दोनों भाइयों को मथुरा में आमंत्रित किया था। उन्होंने अक्रूर जी को गोकुल रथ के साथ भेजा था।
बलराम के साथ भगवान कृष्ण, रथ पर बैठे और मथुरा के लिए चल दिए। विष्णु भक्त भगवान के इस दिन प्रस्थान को रथ यात्रा के रूप में मनाते हैं। भगवान कृष्ण मथुरा पहुंचने पर अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर नगर वासियों को दर्शन देने के लिए निकले। नगर वासियों ने अपने हाथों से रथ खींच कर उनका स्वागत किया।
उसी समय, ऋषि नारद पहुंचे और उन्होंने तीन भाई-बहनों को एक साथ देखा। इसलिए, उन्होंने उन तीनों के लिए प्रार्थना की कि वे अपना आशीर्वाद हमेशा के लिए इस तरह प्रदान करें। तब देवताओं ने नारद की इच्छा पूरी की। अब तीनों देवता पुरी के जगन्नाथ मंदिर में सदा निवास करने लगे।
जगन्नाथ यात्रा के बारे में एक और कहानी है । कई लोगों का कहना है कि द्वारका में रथ यात्रा उत्सव भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा से जुड़ा है।
द्वारका में, विष्णु भक्तों द्वारा उस दिन जश्न मनाया जब बलराम, भगवान कृष्ण, उनकी बहन सुभद्रा रथ पर सवार होकर विजया जुलूस के रूप में शहर की जनता के बीच गए थे।
जगन्नाथ रथ यात्रा भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए भारी उत्साह के साथ मनाई जाती है।
ऐसी मान्यता है कि जुलूस के दौरान अपने भगवान के रथों को खींचना भगवान की भक्ति में शामिल होने का एक तरीका है। यह उन पापों को भी नष्ट कर देता है जो मनुष्य से जाने या अनजाने में किए गए पाप हो।
जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास बहुत समृद्ध है। ऐसा माना जाता है कि मुगल काल में राजस्थान के जयपुर के राजा रामसिंह को 18वीं शताब्दी में रथ यात्रा आयोजित करने के रूप में वर्णित किया गया है। ओडिशा में, मयूरभंज और परलाखेमुंडी के राजाओं ने रथ यात्रा का आयोजन किया, हालांकि पैमाने और लोकप्रियता के मामले में सबसे भव्य त्योहार पुरी में होता है।
एक और कथा यह है कि त्योहार के चौथे दिन, भगवान जगन्नाथ की पत्नी देवी लक्ष्मी अपने पति को मिलने के लिए गुंडिचा मंदिर जाती हैं।
रथ यात्रा को प्रारंभिक रूप से गुंडिचा जात्रा, नवदीना जात्रा, घोसा जात्रा, दशावतार जात्रा और कई अन्य नामों से जाना जाता है।
सुभद्रा का रथ लाल रंग का होता है
ब्लॉग से संबंधित 05 यूनिट प्रश्न और उत्तर
*प्रश्न 01: अनवसर काल क्या है और 15 दिनों तक भगवान के बीमार पड़ने के पीछे क्या मान्यता है?
उत्तर: अनवसर काल जगन्नाथ परंपरा का सबसे गूढ़ रहस्य है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को स्नान पूर्णिमा महोत्सव होता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर 108 घड़ों के शीतल जल से स्नान कराया जाता है।
लोक मान्यता है कि इतने अधिक जल से स्नान के कारण भगवान को ज्वर आ जाता है। इसलिए उन्हें 'अनवसर गृह' नामक एकांत कक्ष में ले जाया जाता है। इन 15 दिनों तक भगवान को मनुष्य की तरह ही औषधि, काढ़ा, फलों का रस और हल्का भोजन दिया जाता है।
भक्तों के लिए दर्शन वर्जित होता है, क्योंकि इस समय भगवान अस्वस्थ अवस्था में होते हैं। दार्शनिक दृष्टि से यह लीला हमें सिखाती है कि ईश्वर भी भक्त के भाव में मनुष्य बन जाते हैं। वे हमें बताते हैं कि विश्राम और उपचार जीवन का हिस्सा है।
यह अवधि मंदिर की पवित्रता और मूर्तियों के अंगराग (पुनः रंगाई) के लिए भी होती है, ताकि रथयात्रा से पहले मूर्तियां नई आभा के साथ तैयार हो सकें। आषाढ़ कृष्ण अमावस्या को जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तो उसे 'अमावस्या' नहीं 'चतुर्दशी' की तरह मनाया जाता है।
*प्रश्न 02: जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों मनाई जाती है? इसका पौराणिक महत्व क्या है?
उत्तर: रथयात्रा के कई पौराणिक कारण बताए जाते हैं। सबसे प्रचलित कथा के अनुसार एक बार बहन सुभद्रा ने नगर भ्रमण की इच्छा प्रकट की। तब भाई जगन्नाथ और बलराम उन्हें रथ पर बैठाकर नगर दिखाने ले गए और अपनी मौसी के घर, गुंडिचा मंदिर में ले गए। दूसरी मान्यता द्वारका से जुड़ी है।
जब सुभद्रा को द्वारका में श्रीकृष्ण और बलराम की बाल लीलाओं की कथा सुनाई जा रही थी, तो तीनों इतने भाव-विभोर हो गए कि उनकी आंखें बड़ी और हाथ-पैर सिकुड़ गए, यही आज की जगन्नाथ मूर्ति का रूप है।
रथयात्रा इस भाव-यात्रा का प्रतीक है। तीसरी मान्यता यह है कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार अपने भक्तों के बीच स्वयं आते हैं, ताकि जो भक्त मंदिर के भीतर नहीं आ सकते, उन्हें भी दर्शन मिल सके। यह समानता और समावेश का पर्व है, जहां भगवान स्वयं राजा से रंक तक सबके पास जाते हैं। स्कंद पुराण में भी कहा गया है कि जो व्यक्ति रथयात्रा में रथ खींचता है, उसे सौ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है।
*प्रश्न 03: तीनों रथों की विशेषता क्या है और मौसी बाड़ी (गुंडिचा मंदिर) में 09 दिन क्या होता है?
उत्तर: रथयात्रा में तीन अलग-अलग भव्य रथ बनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ 'नंदीघोष' है, जो 45 फीट ऊंचा, 16 पहियों वाला और लाल-पीले कपड़े से सजा होता है। बलभद्र जी का रथ 'तालध्वज' है, जो 44 फीट ऊंचा, 14 पहियों वाला और लाल-हरे कपड़े से सजा होता है।
सुभद्रा जी का रथ 'दर्पदलन' या 'पद्मध्वज' कहलाता है, जो 43 फीट ऊंचा, 12 पहियों वाला और लाल-काले कपड़े से सजा होता है। ये रथ हर साल नई लकड़ी से बनाए जाते हैं। जगन्नाथ मंदिर से 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर को मौसी बाड़ी कहा जाता है।
यहां तीनों भाई-बहन 09 दिन विश्राम करते हैं। इस दौरान यहां विशेष पूजा, भजन और प्रसाद का आयोजन होता है। मान्यता है कि यहां मां गुंडिचा अपने भतीजे-भतीजियों के लिए विशेष पकवान बनाती हैं। 09 दिन बाद 'बहुड़ा यात्रा' में वापसी होती है और रास्ते में 'मौसी मां' के मंदिर में भगवान को उनका प्रिय 'पोडा पीठा' अर्पित किया जाता है।
*प्रश्न 04: अनवसर काल में भक्तों को दर्शन क्यों नहीं मिलते और इस दौरान पुरी में क्या परंपरा निभाई जाती है?
उत्तर: अनवसर काल में दर्शन बंद होने के पीछे भक्ति और व्यावहारिक दोनों कारण हैं। भक्ति भाव से देखा जाए तो जैसे घर में कोई बीमार हो तो उसे एकांत में रखा जाता है, वैसे ही भगवान भी एकांतवास में होते हैं।
इस समय उन्हें छूना या भीड़ में लाना उचित नहीं माना जाता। व्यावहारिक कारण यह है कि इस 15 दिन में दारू-ब्रह्म मूर्तियों का श्रृंगार और मरम्मत की जाती है। साल भर धूप, दीप और चंदन से मूर्तियों का रंग फीका पड़ जाता है, इसलिए इस समय 'दत्त' समाज के सेवक मूर्तियों को नया रंग और लेप लगाते हैं।
इस दौरान पुरी में एक और परंपरा है - भक्त 'अलारनाथ' मंदिर जाते हैं। कहा जाता है कि जब जगन्नाथ जी बीमार होते हैं, तो भक्तों को दर्शन देने के लिए वे अलारनाथ के रूप में प्रकट होते हैं, जो पुरी से 23 किमी दूर ब्रह्मगिरी में है। वहां भी भक्तों को खीर का प्रसाद मिलता है। पुरी के स्थानीय लोग इस दौरान भगवान के स्वस्थ होने के लिए व्रत और प्रार्थना करते हैं।
*प्रश्न 5: रथयात्रा एक महीने तक कैसे चलती है? इसका समापन कैसे होता है?
उत्तर: रथयात्रा केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, यह एक महीने का महापर्व है। इसकी शुरुआत स्नान पूर्णिमा से ही हो जाती है। उसके बाद 15 दिन अनवसर, फिर नेत्रोत्सव और फिर आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मुख्य रथयात्रा। गुंडिचा में 09 दिन विश्राम के बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी या हरिशयनी एकादशी को वापसी यात्रा 'बहुड़ा यात्रा' होती है।
वापसी में एक और रोमांचक परंपरा होती है - 'सोना बेशा'। बहुड़ा के अगले दिन भगवान रथ पर ही सोने के आभूषणों से सजते हैं, जिसे राजराजेश्वर बेशा भी कहते हैं। इसके बाद 'अधर पना' अनुष्ठान होता है, जिसमें रथ पर ही एक विशेष मीठा शर्बत भगवान को अर्पित किया जाता है, जो रथ के ऊपर स्थित पार्श्व देवताओं और अदृश्य आत्माओं के लिए होता है।
अंतिम दिन 'नीलाद्रि बिजे' होता है, जब भगवान को मंदिर में वापस लाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी जी जगन्नाथ जी से रूठ जाती हैं क्योंकि वे उन्हें बिना बताए मौसी के घर चले गए थे। तब भगवान उन्हें रसगुल्ला खिलाकर मनाते हैं। यह परंपरा आज भी 'रसगुल्ला दिवस' के रूप में मनाई जाती है और इसी के साथ रथयात्रा महोत्सव का समापन होता है।
ब्लॉग से संबंधित अनसुलझे पहलू
जगन्नाथ मंदिर की कई बातें आज भी रहस्य बनी हुई हैं। पहला, अनवसर काल में भगवान को दी जाने वाली औषधि का सटीक मिश्रण क्या है? यह केवल दइतापति सेवकों और कविराजों को ही पता है और इसे गुप्त रखा जाता है।
दूसरा, मूर्तियों में मौजूद 'ब्रह्म पदार्थ' क्या है? कहा जाता है कि हर 12-19 साल में जब 'नवकलेवर' होता है, तो पुरानी मूर्ति से इस पदार्थ को निकाल कर नई मूर्ति में रखा जाता है, लेकिन इसे आज तक किसी ने देखा नहीं है।
तीसरा, मंदिर के ऊपर का ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में क्यों लहराता है और मंदिर की परछाई क्यों नहीं बनती, इसका वैज्ञानिक उत्तर आज तक नहीं मिला।
चौथा, महाप्रसाद का रहस्य - लाखों लोगों के लिए एक ही रसोई में प्रसाद बनता है, न कभी कम पड़ता है न व्यर्थ जाता है।
पांचवां, रथों को खींचने के लिए उपयोग की जाने वाली लकड़ी के पेड़ों का चयन कैसे होता है और उन्हें काटने की अनुमति किस प्राचीन विधि से मिलती है, यह भी आम जनता के लिए अनसुलझा है।
डिस्क्लेमर
*अस्वीकरण: इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी धार्मिक ग्रंथों, लोक मान्यताओं, स्कंद पुराण, जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं और विभिन्न मीडिया स्रोतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल भक्तों को जानकारी और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। 'भगवान के बीमार पड़ने' जैसी घटनाओं को मानवीय लीला और भक्ति भाव से समझा जाना चाहिए, इसे चिकित्सीय या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में न देखा जाए।
रथयात्रा की तिथियां सनातन पंचांग के अनुसार हर वर्ष बदल सकती हैं, इसलिए यात्रा पर जाने से पहले जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट या स्थानीय पंचांग से पुष्टि अवश्य कर लें। मंदिर के अनवसर काल, दर्शन और प्रसाद से संबंधित नियम मंदिर प्रशासन द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और समय-समय पर बदल सकते हैं।
लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रकार की अनुष्ठानिक त्रुटि, तिथि में भिन्नता या दर्शन में असुविधा के लिए जिम्मेदार नहीं है। यह ब्लॉग किसी भी अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने का एक प्रयास है।

