पितृ ऋण से मुक्ति का सरल मार्ग: श्राद्ध के 03 आसान विकल्प जब गयाजी जाना संभव न हो*
सनातन धर्म में चार ऋण बताए गए हैं - देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण और समाज ऋण। इनमें पितृ ऋण चुकाना प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य माना गया है। मान्यता है कि पितृपक्ष में हमारे पूर्वज पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं और अन्न-जल की अपेक्षा रखते हैं। उनके निमित्त श्रद्धा से किया गया श्राद्ध कर्म न केवल उन्हें तृप्त करता है, बल्कि पितृदोष का निवारण कर जीवन की बाधाएं भी दूर करता है।
परन्तु कई बार आर्थिक तंगी, समय अभाव या गयाजी धाम न जा पाने की स्थिति में पूर्ण विधि से श्राद्ध करना कठिन हो जाता है। क्या इसका मतलब यह है कि हम पितृ ऋण नहीं चुका सकते? शास्त्रों में इसका समाधान भी है। ऋषि कात्यायन के अनुसार संकटकाल में आम श्राद्ध, हिरण्य श्राद्ध और गोग्रास श्राद्ध जैसे सरल विकल्प अपनाए जा सकते हैं। ये विधियां कम खर्च में भी उतनी ही श्रद्धा से की जा सकती हैं और पूर्वजों को शांति प्रदान करती हैं। आइए जानें इन तीन सरल विधियों को।
सनातन धर्म में उल्लेखित ईश्वर प्राप्ति के मूलभूत सिद्धांतों में से एक सिद्धांत ‘देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण एवं समाज ऋण होता है। इन चार ऋणों को चुकाना है। इनमें से पितृ ऋण चुकाने के लिए ‘श्राद्ध’ करना आवश्यक है।
माता-पिता तथा अन्य निकटवर्ती संबंधियों की मृत्योपरांत, उनकी आगे की यात्रा सुखमय एवं क्लेशरहित हो तथा उन्हें सद् गति प्राप्त हो, इस उद्देश्य से किया जानेवाला संस्कार को ‘श्राद्ध’ कर्म कहते हैं।
पितृपक्ष के काल में कुल के सभी पूर्वज अन्न एवं जल (पानी) की अपेक्षा लेकर अपने वंशजों के द्वार पर आते हैं। पितृपक्ष के दिनों में पूर्वज पितृलोक से पृथ्वीलोक के सबसे निकट आपके द्वार पर आ जाते है। आपके द्वारा पूर्वजों को दिए जाने वाले अन्न, जल, तिल और पिंडदान उन तक जल्दी पहुंचते हैं ।
पिंडदान से संतुष्ट होकर हमारे पूर्वज आशीर्वाद और स्नेह देते हैं। श्रद्धा पूर्वक पिंडदान करने से पितृदोष का निवारण होता है। जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होकर, पूर्वजों से हर तरह की सहायता मिलती है।
अगर कोई व्यक्ति गया धाम जाकर श्राद्ध करने में असमर्थ है और निर्धन है। तो उसके लिए भी तीन तरह का श्राद्ध हमारे विधान में लिखा है। कम खर्च में अपने पितरों को मुक्ति प्रदान किया जा सकता है।
कम खर्च में श्राद्ध कैसे करें
संकटकाल में, पत्नी के अभाव में, तीर्थस्थान पर और संक्रांति के दिन आम श्राद्ध करना चाहिए। यह ऋषि कात्यायन का वचन है । कुछ कारण वश पूरा श्राद्ध विधि करना संभव न हो, तो संकल्प पूर्वक ‘आम (साधारण) श्राद्ध’ करना चाहिए। अपनी क्षमता के अनुसार अनाज, चावल, तेल, घी, चीनी, अदरक, नारियल, एक सुपारी, दो बीडे के पत्ते, एक सिक्का आदि सामग्री बरतन में रखें । ‘
आमान्नस्थित श्री महाविष्णवे नमः नाम मंत्र बोलते हुए उस पर गंध, अक्षत, फूल और तुलसी का पत्ता एक साथ समर्पित करें। यह सामग्री किसी पुरोहित को दें। पुरोहित उपलब्ध न हो, तो धर्मशाला, गोशाला अथवा मंदिर में दान दें।
‘हिरण्य श्राद्ध’ करना
उक्त प्रकार से करना भी संभव नहीं हुआ, तो संकल्पूर्वक ‘हिरण्य श्राद्ध’ करना चाहिए अर्थात अपनी क्षमता के अनुसार एक बरतन में व्यावहारिक द्रव्य (पैसे) रखें । ‘हिरण्य स्थित श्री महाविष्णवे नमः अथवा ‘द्रव्यस्थित श्री महाविष्णवे नमः बोलकर उस पर एकत्रित गंध, अक्षत, फूल और तुलसी का पत्ता समर्पित करें और उसके पश्चात उस धन को पुरोहित को अर्पण करें । पुरोहित उपलब्ध न हो, तो धर्मशाला, गौवंश पालक अथवा मंदिर को दान दें ।
गोग्रास श्राद्ध करना
जिनके लिए आम श्राद्ध और हिरण्य श्राद्ध करना संभव नहीं है, वे गोग्रास दें । जहां गोग्रास देना संभव न हो, वे निकट की गोशाला से संपर्क कर गोशाला में गोग्रास हेतु कुछ पैसे अर्पण करें ।
उक्त में से आम श्राद्ध, हिरण्य श्राद्ध अथवा गोग्रास समर्पित करने के उपरांत तिल अर्पित करें। पंचपात्र (तांबे का लोटा) में पानी लें। उसमें थोडे से काले तिल मिश्रित कर दें। इससे तिल और जल का मिश्रण बनता है। मिश्रण बनने पर मृत पूर्वजों के नाम लेकर दाहिने हाथ का अंगूठा और तर्जनी के मध्य से उन्हें तिल और जल का मिश्रण समर्पित करें ।
तीसरे प्रकार का श्राद्ध है *‘आम श्राद्ध’*। जब समय, धन या पुरोहित की अनुपलब्धता के कारण पूर्ण विधि से श्राद्ध करना संभव न हो, तब ऋषि कात्यायन ने संकटकाल के लिए यह सरल विकल्प बताया है।
आम श्राद्ध की विधि:
संकल्प लेकर एक साफ बरतन में अपनी क्षमता के अनुसार कच्चा अनाज रखें। इसमें चावल, गेहूं या जौ, तेल, घी, चीनी, अदरक, नारियल, एक सुपारी, दो पान के पत्ते और एक सिक्का शामिल करें। इस सामग्री को ‘आमान्न’ कहा जाता है। अब ‘आमान्नस्थित श्री महाविष्णवे नमः’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए बरतन पर गंध, अक्षत, फूल और तुलसी पत्र एक साथ समर्पित करें। भाव यह रखें कि यह सारा अन्न-धन श्री विष्णु स्वरूप में आपके पितरों को प्राप्त हो रहा है।
इसके बाद यह सामग्री किसी योग्य पुरोहित को दान कर दें। यदि पुरोहित न मिलें तो किसी धर्मशाला, गोशाला या मंदिर में दान कर दें। अंत में तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें काले तिल मिलाएं और दाहिने हाथ के अंगूठे व तर्जनी के बीच से पितरों का नाम या स्मरण करते हुए दक्षिण दिशा में तिलांजलि दें।
आम श्राद्ध में मुख्य तत्व श्रद्धा और संकल्प है। बिना आडंबर के भी यह विधि पितरों को तृप्त करती है और पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
