संतान की दीर्घायु और मंगल कामना का महापर्व: जितिया व्रत 2028
भारतीय संस्कृति में माता का हृदय त्याग और ममता का सागर होता है, और जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत इसी ममता की सबसे कठोर एवं पवित्र परीक्षा है। वर्ष 2028 में यह महापर्व मंगलवार, 12 सितंबर को मनाया जाएगा।
यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संतान के प्रति माँ के निःस्वार्थ प्रेम की चरम सीमा है, जिसमें माताएं अपनी संतानों की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सर्वांगीण मंगल कामना के लिए कठोर निर्जला उपवास रखती हैं। इस व्रत का शुभारंभ 11 सितंबर को 'नहाय-खाय' के साथ होता है, जो शुद्धिकरण और संकल्प का दिन है।
इसके बाद 12 सितंबर को अष्टमी तिथि पर मुख्य व्रत रखा जाता है, जहाँ माताएं अन्न-जल का एक कण भी ग्रहण किए बिना पूरे दिन कठोर साधना करती हैं। व्रत का समापन 13 सितंबर को पारण के साथ होता है।
इस वर्ष की विशेष बात यह है कि इस दिन आडल योग, विडाल योग और अष्टमी श्राद्ध का संयोग बन रहा है, जो इस व्रत के महत्व को और भी अधिक बढ़ा देता है, तथा पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का भी संदेश देता है।
2028 में जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत मंगलवार, 12 सितंबर 2028 को है
जितिया व्रत के मुख्य दिन
नहाय-खाय: सोमवार, 11 सितंबर 2028
मुख्य जितिया व्रत (अष्टमी): मंगलवार, 12 सितंबर 2028
पारण (व्रत खोलना): बुधवार, 13 सितंबर 2028
मुख्य बातें
व्रत का नियम: इस दिन महिलाएं निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखती है।
उद्देश्य: माताएं अपनी पुत्र-पुत्री की लंबी उम्र (दीर्घायु) और अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं।
जिउतिया में पूजा करने का शुभ मुहूर्त और नक्षत्र
क्या खाएं व्रती महिलाएं जानें विस्तार से। छठ की तरह जिउतिया व्रत पर नहाए खाए की परंपरा है। यह पर्व भी तीन दिवसीय है। पहला दिन सप्तमी तिथि को नहाए खाए, दूसरा दिन अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत और तीसरा दिन नवमी तिथि को पारण किया जाता है।
इस बार नहाए खाए 28 सितंबर दिन मंगलवार को पड़ रहा है। सुबह व्रती महिलाएं तालाब, नदी या घर में गंगाजल डालकर स्नान करें। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण की आराधना करते हुए जिउतियां पर्व करने का संकल्प लें। संकल्प लेने के उपरांत नोनी का साग, मडुआ आटा से बनी रोटी, कंदा और सत्पुतिया झिंगी से बनी सब्जियां व्रत धारी महिलाएं खाती है। इस बार रात 6:16 बजे तक ही भोजन और पानी व्रती महिलाएं खा और पी सकती है।
27 सितंबर शाम 6:00 बज कर 16 मिनट तक सप्तमी तिथि है। इसके बाद अष्टमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। अष्टमी तिथि प्रारंभ होने के साथ ही निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। इसलिए महिलाएं 6:30 बजे के पहले पानी भोजन इत्यादि ग्रहण कर लें।
व्रत करने की विधि
जिउतिया व्रत रखने वाली महिलाएं सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण की पूजा करें। इसके बाद चील और सियार की पूजा करनी चाहिए। मिट्टी के बने चील और सियार को पाकुड़ के डाल पर स्थापित कर पूजा करने का विधान है। नये वस्त्र पहनकर महिलाएं निर्जला व्रत रख शाम के समय पूजा करती है। पूजा के उपरांत व्रत की कथा सुननी चाहिए है। सुबह सूर्योदय के बाद महिलाएं पानी में फुलाए हुए बाजरे या जिंदा मछली को सबसे पहले निगलती है। इसके बाद भोजन करती है।
जिउतिया व्रत धारी महिलाएं 29 सितंबर की रात 8:30 बजे के बाद भोजन कर सकती है। रात 8:30 बजे के बाद नवमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी परंतु बहुत सी महिलाएं सूर्योदय के बाद ही पालन करती है। वैसे 30 सितंबर को सुबह 6:13 बजे सूर्योदय होगा। उसके बाद ही पारण करना उचित होगा।
जिउतिया पर्व पर महाभारत की कथा
जिउतिया को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहते हैं। इस कथा का प्रसंग महाभारत काल से जोड़ा गया है। महाभारत युद्ध के बाद अश्वत्थामा पांडवों पर काफी क्रोधित था, क्योंकि पांडवों के ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिर ने झूठ बोलकर उनके पिता द्रोणाचार्य की हत्या कर दी थी। उसी का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ताक में रहता था।
एक रात पांडव शिविर में घुस कर उसने देखा पांच व्यक्ति सोए हुए हैं। उसने पांच भाई पांडव समझ कर उनकी हत्या कर दी। सुबह पता चला कि यह पांचों पुत्र द्रोपदी की है। इसके बाद अश्वत्थामा ने निर्णय ले लिया कि जैसे द्रोपदी के पांचों पुत्रों की हत्या कर दी। उसी तरह उत्तरा के गर्भ में पलने वाले शिशु की भी हत्या कर देते हैं।
यही सोच कर उसने एक कठोर निर्णय लिया और अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चला दी। ब्रह्मास्त्र के सामने भगवान श्री कृष्ण की सुदर्शन चक्र भी काम नहीं आया। उत्तरा के गर्भ नष्ट होने के बाद श्री कृष्ण ने अपने तपोबल से एक शिशु का जन्म करा उत्तरा का गोद भर दिया। जिसका नाम पड़ा जीवित्पुत्रिका। इसीलिए इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहते हैं। श्री कृष्ण एक बच्चे का जान बचाई इसी परंपरा को निभाते हुए व्रती भगवान श्री कृष्ण की पूजा-अर्चना करती है।
जिउतिया पर पौराणिक व्रत कथा
नर्मदा नदी के पास एक नगर था जिसका नाम है कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालूहटा नाम की मरू भूमि थी। जिसमें एक विशाल पाकड़ का पेड़ था। पेड़ पर एक चील रहती थी। उसी पेड़ के नीचे एक बिल में सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेली थी। दोनों जो भी खाने का सामान लेकर आते थे, आपस में मिल बांट कर खाते थे।
एक दिन चील किसी गांव में गया और उसने जिउतिया व्रत और कथा सुनी। महिलाओं को पूजा करते हुए देखकर चील ने निश्चित किया कि वह भी जिउतिया व्रत करेेगी। उसने सियारिन से कहा कि हम दोनों को जिउतिया व्रत करनी चाहिए। व्रत करने से अगले जन्म में हम दोनों का कल्याण होगा। चील और सियारिन दोनों ने दिन भर निर्जला व्रत रखा, परंतु शाम को सियारिन को भूख बर्दाश्त नहीं हुई और उसने भोजन कर लिया।
उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई। उसका दाह संस्कार उसी स्थान पर कर दिया गया। सियारिन को जब भूख लगने लगी थी मुर्दा देखकर वह खुद को रोक ना सके और जमकर दावत उड़ाई। मांस खाने से उसकी व्रत टूट गयो। पर चील ने संयम रखा और नियम पूर्वक पूजा अर्चना कर अगले दिन व्रत का पारण किया।
मृत्यु के बाद अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने एक ज्ञानी ब्राह्मण परिवार में सूंदर पुत्रियों के रूप में जन्म लिया। दोनों बहनों के पिता का नाम भास्कर था। चील बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। शीलवती की शादी बुद्धिसेन से हुआ।
सियारिन छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उसी राज्य के राजा मलयकेतु के साथ हुई। अब कपूरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती को सात बेटे हुए।
परन्तु कपूरावती के बच्चें जन्म लेते ही मर जाते थे। कुछ समय बाद शीलवती के सातों बेटें बड़े हो गए। सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपूरावती के मन में शीलवती के पुत्रों को देखकर ईर्ष्या की भावना आ गई। उसने राजा से कहकर सभी बेटों की सर कटवा दी। उन कटे सिर को नये बर्तन में रख दिया और लाल कपड़े से ढककर अपनी बहन शीलवती के पास भिजवा दी।
यह दृश्य देखकर भगवान जीऊतवाहन ने सातों भाइयों के सिर मिट्टी से बनाकर धड़ से जोड़ दिया। साथ ही मृतक शरीर पर अमृत छिड़ककर जिंदा कर दिए।
दूसरी ओर रानी कपुरावती बुद्धी सेन अर्थात अपनी बहन के घर से सूचना पाने को काफी उत्साहित थी। जब काफी देर बाद भी सूचना नहीं आई तो स्वयं कपुरावती बड़ी बहन के घर गई। वहां सातों भाइयों को जिंदा देखकर वह दंग रह गई। जब उसे होश आया तो बड़ी बहन को उसने सारा सारी बात दी। अब उसे अपनी गलती पर शर्मिंदगी आ रही थी।
जीउतिया से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना
वैज्ञानिक पहलू: जीउतिया व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है। यह समय वर्षा ऋतु के बाद का होता है, जब शरीर में वात-पित्त का असंतुलन और पाचन शक्ति कमजोर होती है। निर्जला उपवास शरीर को एक प्रकार का डिटॉक्स या विश्राम देता है, जिससे पाचन तंत्र पुनः सक्रिय होता है। हालांकि, चिकित्सकीय दृष्टि से लंबे समय तक निर्जला रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है, विशेषकर बीमार महिलाओं के लिए।
सामाजिक पहलू: यह व्रत माताओं के त्याग को सामाजिक मान्यता देता है। इस दिन सास-बहू, ननद-भाभी सभी एक साथ व्रत कथा सुनती हैं, जिससे पारिवारिक एकता और सामूहिकता की भावना प्रबल होती है। यह नारी शक्ति और ममता का सामूहिक उत्सव है।
आध्यात्मिक पहलू: व्रत का मूल उद्देश्य संतान की दीर्घायु है। आध्यात्मिक रूप से यह माता की साधना है, जिसमें वह अपने अहंकार और शारीरिक सुखों का त्याग कर ईश्वर से संतान के कल्याण की प्रार्थना करती है। यह आत्म-अनुशासन और इच्छाशक्ति को जागृत करता है।
आर्थिक पहलू: व्रत के दौरान अन्न-जल का त्याग होता है, जिससे घर में एक दिन के भोजन की बचत होती है। साथ ही पूजन सामग्री, फल, वस्त्र आदि की खरीदारी से स्थानीय बाजारों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं, जिससे छोटे दुकानदारों को लाभ होता है।
2. जीउतिया के अनसुलझे पहलू
3. तीन प्रकार के टोटके
टोटका 1: संतान की दीर्घायु हेतु काली हल्दी का टोटका
जीउतिया व्रत के दिन प्रातः स्नान के बाद एक काली हल्दी की गांठ लें। उसे लाल धागे में पिरोकर अपनी संतान के गले या कमर में बांध दें। मान्यता है कि काली हल्दी नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है और संतान की आयु लंबी होती है। इस टोटके को करते समय 'जीमूतवाहन' का स्मरण करें और संतान के मस्तक पर तिलक लगाएं। यह टोटका तब तक प्रभावी माना जाता है जब तक धागा स्वयं न टूट जाए।
टोटका 2: संतान के स्वास्थ्य हेतु नींबू-काली मिर्च का टोटका
व्रत के दिन शाम को एक ताजा नींबू और 7 साबुत काली मिर्च लें। नींबू को बीच से काटकर उसमें काली मिर्च दबा दें। इसे संतान के सिर के ऊपर से सात बार उतारकर घर के बाहर किसी चौराहे पर रख आएं। पीछे मुड़कर न देखें। ऐसा करने से संतान की बुरी नज़र और बीमारियां दूर होती हैं। यह टोटका विशेष रूप से तब किया जाता है जब बच्चा बार-बार बीमार पड़ता हो
टोटका 3: संतान की बाधा दूर करने हेतु चावल और सरसों का टोटका
मुख्य व्रत के दिन मुट्ठी भर चावल और सरसों के दाने लें। संतान के ऊपर से 21 बार उतारकर उसे आग में डाल दें। यदि आग से धुआँ सीधा ऊपर जाए तो समझें बाधा दूर हो गई। यह टोटका संतान के जीवन में आने वाली बाधाओं, परेशानियों और ग्रह दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है। इसके बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करें।
4. जीउतिया से संबंधित पांच यूनिक प्रश्न और उत्तर
प्रश्न 1: जीउतिया व्रत में चना और भुना हुआ अन्न खाने का विशेष महत्व क्यों है?
उत्तर: जीउतिया व्रत के 'नहाय-खाय' के दिन चना, भुना हुआ अन्न और कद्दू की सब्जी खाने की परंपरा है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि चना प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, जो व्रत से पहले शरीर को ऊर्जा देता है। कद्दू में फाइबर और पानी अधिक होता है, जो पाचन को धीमा करता है और लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता। भुना हुआ अन्न हल्का होता है, जो पेट को साफ रखता है। आध्यात्मिक रूप से, सात्विक भोजन मन को शुद्ध कर व्रत के लिए तैयार करता है।
प्रश्न 2: क्या जीउतिया व्रत केवल माताएं ही रख सकती हैं, पिता नहीं?
उत्तर: परंपरागत रूप से यह व्रत माताओं द्वारा संतान के लिए रखा जाता है, क्योंकि माता को संतान की प्रथम पालक और पोषक माना गया है। किंतु शास्त्रों में कोई स्पष्ट निषेध नहीं है कि पिता यह व्रत नहीं रख सकते। आधुनिक समय में कई पिता भी अपनी संतान की दीर्घायु के लिए यह व्रत रखने लगे हैं। यह व्रत प्रेम और कर्तव्य का प्रतीक है, जो लिंग-भेद से परे है।
प्रश्न 3: जीउतिया व्रत और करवा चौथ में क्या मूल अंतर है?
उत्तर: जीउतिया व्रत माता द्वारा संतान की दीर्घायु के लिए रखा जाता है, जबकि करवा चौथ पत्नी द्वारा पति की दीर्घायु के लिए। जीउतिया निर्जला और कठोर होता है, जबकि करवा चौथ में कुछ महिलाएं फलाहार कर लेती हैं। जीउतिया आश्विन कृष्ण अष्टमी को, जबकि करवा चौथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को मनाया जाता है। दोनों का उद्देश्य प्रियजन की आयु की कामना है।
प्रश्न 4: जीउतिया व्रत में पारण से पहले चंद्रमा या सूर्य को अर्घ्य देने का क्या महत्व है?
उत्तर: पारण से पहले सूर्य या चंद्रमा को अर्घ्य देना कृतज्ञता का प्रतीक है। सूर्य ऊर्जा और आरोग्य के देवता हैं, जबकि चंद्रमा मन और शीतलता के प्रतीक हैं। जल अर्पित करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से सुबह की पहली किरणों में विटामिन डी प्राप्त होता है और मन शांत रहता है।
प्रश्न 5: यदि कोई महिला बीमारी के कारण निर्जला व्रत नहीं रख सकती, तो क्या विकल्प है?
उत्तर: शास्त्रों में स्पष्ट है कि 'शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम' अर्थात शरीर ही धर्म का पहला साधन है। यदि कोई महिला गंभीर बीमारी, गर्भावस्था या अन्य चिकित्सकीय कारणों से निर्जला व्रत नहीं रख सकती, तो वह फलाहार या जल ग्रहण करके व्रत का संकल्प पूरा कर सकती है। भावना और समर्पण सर्वोपरि है। किसी योग्य ब्राह्मण या पंडित से परामर्श कर व्रत का संक्षिप्त रूप अपनाया जा सकता है।
डिस्क्लेमर
यह लेख एवं इसमें दी गई समस्त जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए प्रस्तुत की गई है। इस लेख में वर्णित जीउतिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत से संबंधित तिथियां, मुहूर्त, पूजन विधियां, कथाएं, मान्यताएं, परंपराएं एवं अन्य विवरण विभिन्न पंचांगों, लोक मान्यताओं, धार्मिक ग्रंथों और सामाजिक परंपराओं पर आधारित हैं। क्षेत्र, जाति, परिवार और पंचांग के अनुसार इनमें भिन्नता संभव है। कृपया व्रत रखने से पहले अपने स्थानीय पंडित, धार्मिक गुरु या परिवार के बड़ों से अवश्य परामर्श कर लें।
इस लेख में दिए गए स्वास्थ्य संबंधी दावे, विशेषकर निर्जला व्रत के लाभ या हानि, किसी चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं हैं। निर्जला व्रत शारीरिक रूप से कठोर होता है। गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी, माइग्रेन, एनीमिया या किसी अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों, बुजुर्गों तथा बच्चों को निर्जला व्रत नहीं रखना चाहिए। व्रत रखने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें। यदि व्रत के दौरान चक्कर आना, बेहोशी, अत्यधिक कमजोरी, सिरदर्द या अन्य कोई असुविधा हो, तो तुरंत व्रत तोड़कर चिकित्सकीय सहायता लें।
टोटकों से संबंधित विशेष डिस्क्लेमर: इस लेख में वर्णित सभी टोटके, उपाय, अनुष्ठान एवं उनके प्रभाव पूर्णतः लोक मान्यताओं, परंपराओं और ज्योतिषीय धारणाओं पर आधारित हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण या गारंटी नहीं है। ये केवल आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं। हम किसी भी टोटके के फल, परिणाम या प्रभाव की कोई जिम्मेदारी नहीं लेते। पाठक इन्हें अपने विवेक, आस्था और इच्छा से करें।
