योगिनी एकादशी 2028: समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाला व्रत, इस दिन विष्णु पूजा से चमक जाएगी किस्मत; यहां पढ़े पूरी जानकारी।


"योगिनी एकादशी 18 जून 2028 दिन रविवार को है। रंजीत के ब्लॉग पर पढ़ें स्वर्ग लोक से जुड़ी है पौराणिक कथा। स्वयं कृष्ण ने बताएं योगिनी एकादशी की महात्म्य। योगिनी एकादशी पर बन रहा है सर्वार्थ सिद्धि योग, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितृ दिवस का खास संयोग!"

योगिनी एकादशी पर जानें संपूर्ण जनकारी

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को 'योगिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2028 में यह तिथि बेहद खास है क्योंकि 18 जून को रविवार होने के साथ-साथ इस दिन 'सर्वार्थ सिद्धि योग' का निर्माण हो रहा है। इतना ही नहीं, इस वर्ष योगिनी एकादशी के दिन ही 'पितृ दिवस' (Father's Day) भी मनाया जाएगा, जो इस दिन के महत्व को आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से दोगुना कर देता है।

शास्त्रों के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को समस्त शारीरिक रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। भगवान कृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को बताया था कि इस व्रत का फल 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान है। यदि आप भी चर्म रोग या अनजाने में किए गए पापों के पश्चाताप से मुक्ति चाहते हैं, तो यह व्रत आपके लिए रामबाण है। इस ब्लॉग में हम इस शुभ दिन के मुहूर्त, पूजा विधि और वैज्ञानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

शुभ मुहूर्त और सटीक जानकारी

वर्ष 2028 में योगिनी एकादशी 18 जून, रविवार को मनाई जाएगी। 

रविवार का दिन भगवान विष्णु के अंशावतार सूर्य देव का भी होता है, जिससे इस व्रत का तेज बढ़ जाता है।

एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 जून 2028 को रात्रि 02:27 बजे तक से।

एकादशी तिथि समाप्त: 18 जून 2028 को रात्रि 03:14 बजे तक रहेगा।

सर्वार्थ सिद्धि योग: इस दिन पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा, जिसमें किया गया कोई भी कार्य सिद्ध होता है।

पारण का समय: 19 जून को सुबह ( 05:01 बजे से लेकर 06:24 बजे के बीच अमृत मुहुर्त के दौरान पारण करें। 

इस दिन पितृ दिवस होने के कारण, यदि आप व्रत के साथ अपने पूर्वजों और पिता के निमित्त दान करते हैं, तो आपको विशेष आशीर्वाद प्राप्त होगा।

पूजा विधि: स्टेप बाय स्टेप

संकल्प: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

सफाई: पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल छिड़कें और भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

कलश स्थापना: एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर कलश स्थापित करें।

अभिषेक: भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं।

श्रृंगार: प्रभु को पीले वस्त्र, पीले फूल, और तुलसी दल अर्पित करें। याद रखें, बिना तुलसी के विष्णु पूजा अधूरी है।

धूप-दीप: शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं और चंदन की अगरबत्ती दिखाएं।

कथा: योगिनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।

आरती: ॐ जय जगदीश हरे की आरती गाएं।

दान: शाम को दीपदान करें और जरूरतमंदों को फल या अन्न दान दें।

पारण: अगले दिन द्वादशी को सात्विक भोजन के साथ व्रत खोलें।

भगवान विष्णु का स्वरूप

योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के 'नारायण' स्वरूप की पूजा की जाती है। नारायण का अर्थ है जो जल में निवास करते हैं और संपूर्ण सृष्टि के आधार हैं। 

इस दिन उन्हें लक्ष्मी पति के रूप में पूजना विशेष फलदायी होता है। साधक को भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान करना चाहिए, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं। नारायण स्वरूप की शांति और करुणा भक्त के मन के विकारों को दूर कर उसे निरोगी काया प्रदान करती है।

क्या करें और क्या ना करें

क्या करें:

तुलसी के पौधे में घी का दीपक जलाएं और परिक्रमा करें।

पूरे दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का मानसिक जाप करें।

बड़ों और माता-पिता (विशेषकर पिता) का सम्मान करें।

क्या ना करें:

चावल का सेवन भूलकर भी न करें (धार्मिक मान्यतानुसार चावल खाना जीव हत्या के समान है)।

क्रोध, लोभ और किसी की निंदा करने से बचें।

ब्रह्मचर्य का पालन करें और बाल या नाखून न काटें।

पेड़-पौधों की पत्तियां न तोड़ें।

क्या खाएं और क्या ना खाएं

क्या खाएं:

फलाहार में केला, आम, अंगूर और सूखे मेवे ले सकते हैं।

दूध, दही और साबूदाने की खिचड़ी (बिना साधारण नमक के) खा सकते हैं।

सेंधा नमक का प्रयोग ही करें।

क्या ना करें:

चावल, गेहूं, दालें और जौ का पूरी तरह त्याग करें।
लहसुन, प्याज और मांसाहार जैसे तामसिक भोजन से दूर रहें।
बाहर का जंक फूड या अधिक तेल-मसाले वाला भोजन न करें।

शहद का सेवन भी एकादशी में वर्जित माना जाता है।

लोग क्यों करते हैं यह व्रत?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत मुख्य रूप से पापों के प्रायश्चित और शारीरिक कष्टों (जैसे कुष्ठ रोग या चर्म रोग) के निवारण के लिए किया जाता है। 

पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि कुबेर के माली हेम ने कामवासना के वशीभूत होकर भगवान की सेवा में चूक की थी, जिससे उसे कोढ़ हो गया। 

मार्कंडेय ऋषि के सुझाव पर उसने यह व्रत किया और पुनः दिव्य स्वरूप प्राप्त किया। अतः लोग मोक्ष और स्वास्थ्य लाभ के लिए यह व्रत रखते हैं।

योगिनी एकादशी का पौराणिक कथा

बात महाभारत काल की बात है। एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा मैंने जेष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी की महात्म्य सुना। अब कृपा करके आषाढ़ कृष्ण पक्ष एकादशी की कथा सुनाइए। इसका नाम क्या है ? महात्म्य क्या गया है ? हमें विस्तार से अभी बताइए।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे ! राजन आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष एकादशी की नाम योगिनी है। इस व्रत को करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यह इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति देने वाली है। यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है मैं तुमसे पुराण में वर्णित वर्णन की हुई कथा सुनाता हूं ध्यानपूर्वक और श्रद्धापूर्वक और श्रद्धा पूर्वक सुनों।

स्वर्ग धाम की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का एक राजा रहता था। वह शिवभक्त था। और प्रतिदिन शिव की पूजा किया करता था। हेम नाम का एक माली पूजन के लिए उसके यहां फूल लाया करता था। हेम की बिशालक्षी नाम की सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया। लेकिन काम कामायक्त होने के कारण वह अपनी स्त्री से हास्य विनोद तथा रमन करने लगा।

इधर राजा दोपहर तक माली को आने की राह देखता रहा। अंत में राजा कुबेर ने सेवकों को आज्ञा दी कि तुम लोग जाकर माली को नहीं आने का कारण पता करो, क्योंकि वह अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया। सेवकों ने कहा कि महाराज व पापी अति कामी  है। अपनी स्त्री के साथ हास्य विनोद और रमन कर रहा होगा। यह सुनकर कुबेर ने क्रोधित होकर उसे बुलवाया।

हेमा माली राजा के भय से कांपते हुए उपस्थित हुआ। राजा कुबेर ने क्रोध में आकर कहा अरे पापी ! नीच ! कामी ! तुम मेरे परम पूजनीय ईश्वर शिव जी महाराज का अनादर किया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्यु लोक में जाकर कोढ़ी होगा।

कुबेर के श्राप से हेमा मालिनी का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर जा गिरा। पृथ्वी लोक पर आते हैं उसके शरीर में श्वेत कोढ़ हो गया। उसकी स्त्री भी उसी समय अंतर्ध्यान हो गई। मृत्युलोक में आकर माली ने महान दुःख भोगे। भयानक जंगल में जाकर बिना अन्न और जल के भटकता रहा।

रात्रि को निद्रा भी नहीं आती थी। परंतु शिवजी  की पूजा के प्रभाव से उसको पिछले जन्म की स्मृति का ज्ञान अवश्य हो रहा था। घूमते-घूमते एक दिन वह मार्कंडेय ऋषि का आश्रम में पहुंच गया। जो ब्रह्मा से भी अधिक वृद्ध थे और उनका आश्रम ब्रह्मा की सभा के समान ही विशाल था। हेमा माली वहां जाकर ऋषि के पैरों में पड़ गया।

उसे देखकर मार्कंडेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन सा पाप किया है जिसके प्रभाव से यह हाल हो गई है। हेमा माली ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। सुनकर ऋषि बोले निश्चय ही तूने मेरे सम्मुख सत्य वचन कहा है इसलिए तेरे उद्धार के लिए मैं एक बात बताता हूं। यदि तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की योगिनी नामक एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करेगा तो तेरे सारे पाप नष्ट हो जाएंगे।

यह सुनकर हेमा माली ने अत्यंत प्रसन्न होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया। मुनि ने उसे स्नेह पूर्वक  उठाया। हेमा माली ने मुनि के कथा अनुसार विधि पूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया है। इस व्रत के प्रभाव से अपने पुराने स्वरूप में आकर वह अपनी स्त्री के साथ सुख पूर्वक रहने लगा।

भगवान कृष्ण ने कहा हे ! राजन योगिनी एकादशी का व्रत करने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल मिलता है। इस व्रत को करने से समस्त पाप दूर हो जाते हैं और अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य व्रत करता हूं या इस महात्म्य को पड़ता है। उसे भी अनंत फल के साथ ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक पहलू

वैज्ञानिक: एकादशी व्रत शरीर के डिटॉक्सिफिकेशन (विषहरण) में मदद करता है। आषाढ़ के महीने में नमी अधिक होती है, कम खाने से पाचन तंत्र को आराम मिलता है।

सामाजिक: इस दिन दान-पुण्य की परंपरा समाज में समानता और सेवा भाव को बढ़ावा देती है।

आर्थिक: व्रत के माध्यम से सादगी अपनाने से अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण होता है और अन्न की बचत होती है।

आध्यात्मिक: यह मन को नियंत्रित करने और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की कला सिखाता है, जिससे आत्मिक शांति मिलती है।

अनसुलझे पहलू (Unsolved Aspects)

योगिनी एकादशी केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि ऊर्जा के संतुलन का विज्ञान भी है। एक अनसुलझा पहलू यह है कि इस दिन ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर सर्वाधिक होता है। चंद्रमा की स्थिति जल तत्वों को प्रभावित करती है, और चूंकि मानव शरीर 70% जल है, इसलिए उपवास मन को स्थिर रखने में मदद करता है।

एक अन्य रहस्य यह है कि क्या वास्तव में यह व्रत डीएनए (DNA) स्तर पर रोगों को ठीक कर सकता है? प्राचीन ग्रंथों में 'हेम माली' की कथा प्रतीकात्मक हो सकती है, जो यह दर्शाती है कि अनुशासन और सही खान-पान से लाइलाज बीमारियां भी ठीक हो सकती हैं। साथ ही, पितृ दिवस के साथ इसका संयोग इस बार पितृ दोषों की शांति के लिए भी एक अनकहा द्वार खोलता है।

तीन विशेष टोटके (उपाय)

कर्ज मुक्ति के लिए: एकादशी की शाम को पीपल के पेड़ के नीचे 11 घी के दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें।

सुख-समृद्धि के लिए: भगवान विष्णु को केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करें और दक्षिणावर्ती शंख का प्रयोग करें।

बीमारी से मुक्ति के लिए: पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर "अच्युताय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करते हुए वह जल रोगी को पिलाएं।

प्रश्न और उत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: क्या योगिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

उत्तर: नहीं, एकादशी पर चावल खाना निषेध है। माना जाता है कि इस दिन चावल में कीड़ों का वास होता है।

प्रश्न 2: 2028 में योगिनी एकादशी कब है?

उत्तर: 2028 में योगिनी एकादशी 18 जून, रविवार को है।

प्रश्न 3: क्या इस दिन यात्रा कर सकते हैं?

उत्तर: यदि संभव हो तो लंबी यात्रा से बचें ताकि पूजा और व्रत के नियमों का पालन ठीक से हो सके।

प्रश्न 4: सर्वार्थ सिद्धि योग का क्या लाभ है?

उत्तर: इस योग में शुरू किए गए कार्य सफल होते हैं और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।

प्रश्न 5: क्या महिलाएं यह व्रत रख सकती हैं?

उत्तर: हां, विवाहित और अविवाहित सभी महिलाएं सुख और आरोग्य के लिए यह व्रत रख सकती हैं।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)

इस ब्लॉग में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय गणनाओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है। 'योगिनी एकादशी' के फल और प्रभाव व्यक्ति की श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करते हैं। हम किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते हैं। 

वैज्ञानिक लाभों के संदर्भ में, किसी भी प्रकार का कठोर उपवास शुरू करने से पहले, विशेषकर यदि आप किसी बीमारी से ग्रसित हैं या गर्भवती हैं, तो कृपया अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें। 

यह लेख केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्य के लिए है। हम पूजा विधियों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार होने वाले बदलावों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।





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