विवाह कैसे कराएं जानें संपूर्ण जानकारी: विवाह के मौके कौन सी विधि में लगेगा सामान? जानें रस्मों के अनुसार

Vivah me kya sab kharide

(सनातन) हिंदू विवाह की सभी रस्में और पूजा सामग्री लिस्ट: काशी परंपरा अनुसार संपूर्ण विवाह विधि गाइड

भारतीय सनातन परंपरा में विवाह केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों, संस्कारों और कुल परंपराओं का पवित्र संगम माना जाता है। विवाह की प्रत्येक रस्म — जैसे तिलक, हल्दी, मंडप पूजन, वरमाला, कन्यादान, सप्तपदी और विदाई — अपने भीतर गहरा धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व समेटे होती है। काशी पंचांग और वैदिक परंपराओं के अनुसार हर विधि में उपयोग होने वाली पूजा सामग्री का विशेष महत्व बताया गया है। सही सामग्री और शुद्ध विधि से किया गया विवाह दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद देता है।
आज के समय में अधिकांश परिवार विवाह की तैयारियों में यह समझ नहीं पाते कि किस रस्म में कौन-कौन सी पूजा सामग्री आवश्यक होती है। इसी कारण अंतिम समय में भ्रम और परेशानी उत्पन्न हो जाती है। इस विशेष ब्लॉग में हम विवाह की प्रत्येक विधि के अनुसार आवश्यक पूजा सामग्रियों की विस्तृत सूची, उनका धार्मिक महत्व और काशी पंचांग के अनुसार उपयोग की जानकारी सरल भाषा में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह लेख विवाह की तैयारी कर रहे परिवारों के लिए एक संपूर्ण और उपयोगी मार्गदर्शिका साबित होगा। 

  • प्रत्येक विधियों में कौन-कौन से पूजा सामग्रियों की जरूरत पड़ती है। 

  • विस्तार से सूची देखें। काशी पंचांग के अनुसार विवाह करने वाले लोगों को प्रत्येक विधियों में कौन-कौन से पूजा सामग्री लगती है। 

  • एक-एक सामानों की जानकारी हम दे रहे हैं।

रिंग शिरोमणि (छेंका)

रिंग शिरोमणि के मौके पर फल और मिठाइयों की टोकरी, दो अंगुठी, वर वधु के वस्त्र, दोनों पक्षों की महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के वस्त्र।

अगर धार्मिक अनुष्ठान के अनुसार छेंका करना हैं, तो निम्नलिखित सामानों की जरूरत पड़ेगी।

पंडितजी, शंख, अरवा चावल का अक्षत, दूव, गाय का गोबर, गंगाजल, मधु, दूध, दही, फूल, आम पत्ते और लकड़ी, नारियल, सिंदूर, जल कलश, जनेऊ, पान पत्ता, इत्र, सुपारी, दीया, रूई, कपूर, घी, हवन सामग्री, पांच तरह के अनाज, पचमेवा और कलेवा।

तिलक उत्सव विधि 

तिलक उत्सव विवाह से पूर्व होने वाली महत्वपूर्ण वैदिक रस्म मानी जाती है। इस विधि में वधू पक्ष के लोग वर के घर जाकर उसका तिलक करते हैं और विवाह की औपचारिक स्वीकृति प्रदान करते हैं। वर के माथे पर रोली, चंदन और अक्षत से तिलक लगाया जाता है। इसके बाद नारियल, वस्त्र, मिठाई, फल एवं उपहार भेंट किए जाते हैं। कई परंपराओं में शंख ध्वनि और मंगल गीतों के साथ आरती भी उतारी जाती है। काशी परंपरा में तिलक उत्सव को सम्मान, संबंधों की मजबूती और शुभ वैवाहिक आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

तिलक में लगने वाले सामानों की सूची 

तिलक में इस्तेमाल होने वाले सामानों की सूची इस प्रकार है। 
चांदी और कांस्य के कटोरा, नारियल, गरूड़ा, पटमौरी, धान, गोटा हल्दी, लगन प्रत्रिका लिखने के लिए लाल स्याही का पेन, सफेद कागज, फल, मिठाई, केला के डंटी युक्त चार पत्ते, लाल कपड़ा।

 इसके अलावा गणेश पूजा की सारे सामग्री मसलन अक्षत, दूव, गाय का गोबर, गंगाजल, मधु, दूध, दही, फूल, आम पत्ते और लकड़ी, नारियल, सिंदूर, जल कलश, जनेऊ, पान पत्ता, इत्र, सुपारी, दीया, रूई, कपूर, घी जरूरी चीजें हैं।

हवन सामग्री, पांच तरह के अनाज, पचमेवा और कलेवा। अगर हवन कराने हो तो सुखा नारियल, घी, पंचमेवा, चन्दन की लकड़ी, हवन की लकड़ी, कपूर, आम का लकड़ी, जौ, तिल और लाल कपड़ा की जरूरत पड़ेगी।

गोदभराई विधि 

गोदभराई विवाह पूर्व होने वाली शुभ रस्म मानी जाती है, जिसमें वधू को सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद दिया जाता है। इस विधि में परिवार की महिलाएं वधू की गोद में फल, मिठाई, नारियल, मेवा और उपहार रखती हैं। वधू को श्रृंगार सामग्री एवं आशीर्वाद भी दिया जाता है। मंगल गीतों और शुभकामनाओं के बीच संपन्न होने वाली यह रस्म सुखी दांपत्य जीवन, समृद्धि और परिवार की खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है।

मटकोर

तिलक के बाद मटकोर आता है। मटकोर से ही विवाह की तैयारी और विधियां शुरू हो जाती है। इस दिन महिलाएं मट्टी लाने घर से बाहर जाती है। मटकोर के मौके पर पांच सुहागन या तीन या दो सुहागन महिलाएं जो एक ही कुल की हो। वह अपने आंचल में मिट्टी लेती है। नाउन माथे पर दौरा लेकर चलती है साथ में ढोल बजाने वाले भी चलते हैं। महिलाएं गीत गाते हुए मिट्टी लाने के लिए जाती है और गीत गाते हुए ही वापस आती है।

मटकोर में लगने वाले सामानों की सूची इस प्रकार से है। दऊरा, नया कपड़ा, कुदाल, पीतल या तांबे के लोटे में जल, महिलाओं के बीच बांटने के लिए फल और मिठाई, भूमि पूजन का सामना मतलब सिंदूर, अक्षत, धूप, फूल, फल आदि।

मेहंदी और संगीत 

मेहंदी और संगीत विवाह से पूर्व होने वाली आनंद और उत्साह से भरी पारंपरिक रस्म मानी जाती है। इस विधि में वधू के हाथों और पैरों पर सुंदर मेहंदी लगाई जाती है, जिसे प्रेम, सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है। परिवार की महिलाएं और रिश्तेदार भी मेहंदी लगाकर उत्सव में शामिल होते हैं। इसके बाद संगीत समारोह आयोजित होता है, जिसमें मंगल गीत, नृत्य और पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से खुशियां मनाई जाती हैं। काशी परंपरा में यह रस्म नवदंपति के जीवन में प्रेम, उत्साह और पारिवारिक एकता का शुभ संकेत मानी जाती 

हल्दी लेपन विधि

वर वधु की शरीर में हल्दी लगाने के लिए पीसा हुआ हल्दी, इत्र, सुगंधित तेल, बेसन, चंदन का पाउडर, आंखों में लगाने के लिए काजल। यह कार्यक्रम शादी के 05 दिन या 03 दिन पहले से शुरू हो जाता है। दूल्हे और दुल्हन को दिन भर में तीन बार इस विधि से गुजरना पड़ता है। घर की महिलाएं वर वधू के शरीर में हल्दी लेपन करने के साथ ही गीत गाती है।

मंड़प छाने का विधान

मंडप बनाने के लिए हर बांस पत्ता सहित, हल और जुआठ, बांस के छोटे-छोटे टुकड़े, पुआल, मड़वा में स्थापित करने के लिए हाथी, अखंड दीप जलाने के लिए चार मुंह वाला दीया, नौ ग्रह की पूजा करने के लिए मिट्टी से बनी वस्तु, मड़वा को बांधने के लिए रस्सी, खैर के पत्ते, मड़वा को सजाने के सामान, बांस में बांधने के लिए आम के पत्ते और दूभ।

सत्यनारायण भगवान पूजन

मड़वा छाने के बाद मड़वा के अंदर सत्यनारायण भगवान की पूजा होती है

गाय की गोबर, अरवा चावल का अक्षत, दूभ, गंगाजल, मधु, दूध, दही, फूल, आम पत्ता और लकड़ी, नारियल, सिंदूर, चंदन, अगरवत्ती, मिट्टी के बर्तन, लाल कपड़ा, केला पत्ता, नव ग्रह की लकड़ी पूजन के लिए, जल कलश, जनेऊ, पान पत्ता, इत्र, सुपारी, मिट्टी का दीपक, रूई, कपूर, घी, पांच तरह के अनाज और कलेवा।

पितर मरौनी विधि 

अरवा चावल को पीस कर गोल और लंबा पिंडी बनाया जाता है। पंडित जी इस मंत्र उच्चारण कर विधि विधान से पितर महरौनी के पूजा संपन्न करवाते हैं जिसमें वर और वधू के माता-पिता साथ में रहते हैं।

देवी पूजन

देवी पूजन करने के लिए महिलाएं गाजे-बाजे के साथ देवी मंदिर जाती है। जहां माता कि सातों बहनों की पूजा होती है।

 महिलाएं देवी मां से विवाह कुशलता पूर्वक संपन्न होने और वर-वधू के दीर्घायु की कामना करती है। पूजा सामग्री । मिट्टी के दीया, घी, दूध, दही, रूई, कपूर, माता की चुनरी, श्रृंगार के सामान, अक्षत, आम और पान के पत्ते, अगरबत्ती, फूल, फल मिठाइयां, दूल्हा दुल्हन के कपड़े, कपड़ा रखकर ले जाने के लिए टोकरी।

इमली घोटाने की विधि

इमली घटाने की विधि भाई और बहन की पवित्र रिश्ते को दर्शाता है। इसमें भाई अपने सामर्थ्य के अनुसार आभूषण, कपड़ा और पैसे बहन को देते हैं।

इस विधि को करने के लिए बड़ा सा दऊरा जिसमें बहन बैठती है। पीतल या तांबे के लोटे में जल, आम का पत्ता, अक्षत, हल्दी और सिंदूर की जरूरत पड़ती है।

लावा भुजने की विधि

लावा भुजने की विधि बहन और बहनोई करते हैं। इसमें एक मिट्टी के घड़े से बनी खपड़ी, बालु, धान, बहन और बहनोई को बैठने के लिए दो टोकरी और भुजने के सामान।

घी पूजन विधि

घी पूजन विधि को घृतदाडी भी कहते हैं। अर्थात घी से भगवान की पूजन करना। इसमें बहन, भाई, भौजाई सहित वर वधु भी शामिल रहते हैं। यह विधि दूल्हा दुल्हन की बुआ और मां-बाप द्वारा संपन्न कराया जाता है। पीतल या कंसे के थाली में रखे कटोरी में घी रखकर कुलदेवी और घर के द्वार पर आम के पत्ते घी के साथ मंत्र उच्चारण कर पंडित जी इस विधि को संपन्न करते हैं। इसके बाद 

 सभी मिलकर कुलदेवी, कोहबर में स्थापित भगवान गणेश, मड़वा में स्थापित भगवान गणेश की पूजा घी से करते हैं। घी रखने के लिए चांदी या पीतल की कटोरी, थाली, चम्मच, अक्षत, सिंदूर, कपूर, घी, जल रखने के लिए लोटा और आम का पल्लव की जरूरत पड़ती है।

बारात आगमन की बाद की विधि

नाऊ को पत्र लेकर जाना

बारात आगमन के समाचार मिलने के साथ ही नाऊ पत्र लेकर लड़की के पिता अर्थात समधी के पास जाता है। इस रस्म को पूरा करने के लिए कागज, कलम और तलवार की जरूरत पड़ती है।

द्वार पूजन

द्वार पूजन के लिए पीतल या कांस्य की थाली, अक्षत, रोली, फूल, चंदन, दीपक, कसैली, आम का पल्लव, जल भरा लोटा और कलेवा चाहिए।

जयमाल विधि 

द्वारा पूजन के बाद सुंदर सजे हुए स्टेज पर वर और वधू विभिन्न तरह के फूलों से बने वरमाला को एक दूसरे के गले में डालते हैं। और खुशहाल दाम्पत्य जीवन की कामना करते हैं। इस मौके पर दोनों पक्ष के परिजन और रिश्तेदार मंच पर आकर दोनों को आशीर्वाद देते हैं।

धूआ पानी और अज्ञा (अंगिया) मांगना

बरात आगमन के उपरांत द्वार पूजा होने के बाद जब बाराती जलमासा में लौट जाते हैं। इसके बाद वधू पक्ष वाले ढोल नगाड़े के साथ बाराती जहां ठहरे हैं वहां जाते हैं और धुआ पानी और अंगिया का विधि संपन्न करते हैं। इसमें लगने वाले सामानों में दो मिट्टी के घड़े, अक्षत, दूभ, रोली, फूल, आम का पल्लव, बारातियों के बीच बांटने के लिए ड्राई फूड, पान, एक पीतल के लोटा और रूमाल।

गुरहथी की विधि

गुरहथी की विधि के लिए अक्षत, आम और पान के पत्ते, दही, चन्दन, रोली, पीसा हल्दी, कलेवा, वधु को अर्पित करने के लिए आभूषण, वस्त्र, श्रृंगार के समान, सिन्होरा, फल, मिठाइयां, पांच पौनिया के कपड़े, मां, बहन, भाभी, भाई, दादी मां, दादाजी, चाचा, चाची सहित परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं। 

वर का आगमन और परीक्षण विधि 

हिंदू विवाह परंपरा में वर का आगमन अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। जब बारात विवाह स्थल पर पहुंचती है, तब वधू पक्ष द्वारा वर का स्वागत आरती, पुष्प वर्षा और मंगल गीतों के साथ किया जाता है। इसके बाद “परीक्षण विधि” संपन्न होती है, जिसमें वधू की माता या परिवार की वरिष्ठ महिलाएं वर की आरती उतारकर उसकी शुद्धता, सौभाग्य और शुभता का प्रतीकात्मक परीक्षण करती हैं।

 इस दौरान दही, अक्षत, दूब, दीपक और जल से भरी थाली का प्रयोग किया जाता है। कई स्थानों पर सरसों, नमक और लाल मिर्च घुमाकर नजर दोष भी दूर किया जाता है। वर के माथे पर तिलक लगाकर उसे आशीर्वाद दिया जाता है। काशी परंपरा में यह विधि इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि वर अब परिवार का सम्मानित सदस्य बनने जा रहा है और देवताओं की कृपा उसके साथ बनी रहे।

शंख पानी विधि

शंख पानी विधि विवाह संस्कार की एक पवित्र रस्म मानी जाती है। इस विधि में शंख में गंगाजल या पवित्र जल भरकर वर-वधू पर छिड़का जाता है। शंख को सनातन धर्म में भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है, इसलिए इसका प्रयोग शुभता और पवित्रता के लिए किया जाता है। पुरोहित वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए शंख से जल छिड़कते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध और मंगलमय माना जाता है।

 कई स्थानों पर वधू के माता-पिता शंख जल से दोनों को आशीर्वाद देते हैं। यह विधि दांपत्य जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना के लिए की जाती है। काशी पंचांग की परंपराओं में शंख जल को नकारात्मक ऊर्जा दूर करने वाला और वैवाहिक जीवन को सात्विक बनाने वाला माना गया है। इस दौरान शंख ध्वनि भी की जाती है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है।

वधू के भाई द्वारा लव छूटने की विधि 

विवाह संस्कार में “लव छूटने” की रस्म भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक मानी जाती है। सप्तपदी और मुख्य वैवाहिक विधियों के दौरान वधू का भाई विशेष भूमिका निभाता है। इस रस्म में वधू का भाई अपनी बहन के आंचल या लव में लावा, चावल या धान भरता है, जिसे बाद में अग्नि में समर्पित किया जाता है। इसे परिवार की समृद्धि, सुख और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है।

“लव छूटने” की विधि में भाई अपनी बहन को भावनात्मक आशीर्वाद देता है और उसके नए जीवन के लिए मंगल कामना करता है। कई स्थानों पर भाई बहन के हाथ में लावा रखता है, जिसे वधू वर के साथ मिलकर हवन में अर्पित करती है। काशी परंपरा में यह रस्म भाई के स्नेह, सुरक्षा और जीवनभर साथ निभाने की भावना का प्रतीक मानी जाती है। यह विधि परिवारिक प्रेम और रिश्तों की पवित्रता को दर्शाती है।

सिंदूरदान की विधि 

सिंदूरदान हिंदू विवाह की सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र रस्मों में से एक मानी जाती है। इस विधि में वर वैदिक मंत्रों के बीच वधू की मांग में सिंदूर भरता है। सिंदूर सुहाग, सौभाग्य और वैवाहिक जीवन की स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। पुरोहित मंत्रोच्चारण करते हुए वर को सिंदूरदान की प्रक्रिया पूर्ण कराते हैं। कई परंपराओं में वधू के सिर पर पान का पत्ता या चुनरी रखी जाती है, जिसके बाद वर मांग में सिंदूर भरता है।

काशी पंचांग के अनुसार यह विधि विवाह संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है, क्योंकि इसी के बाद कन्या विवाहित स्त्री के रूप में स्वीकार की जाती है। सिंदूरदान के समय शंख ध्वनि, मंगल गीत और आशीर्वाद का वातावरण अत्यंत भावुक और मंगलकारी होता है। इसके बाद वधू को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया जाता है।

कोहवर की विधि 

कोहवर की रस्म विवाह के बाद संपन्न होने वाली पारंपरिक और सांस्कृतिक विधि है। इसे नवविवाहित दंपति के शुभ दांपत्य जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। कोहवर कक्ष को फूलों, दीपकों और शुभ प्रतीकों से सजाया जाता है। कई स्थानों पर दीवारों पर पारंपरिक चित्रकारी और मंगल चिह्न बनाए जाते हैं। इस रस्म में परिवार की महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और नवदंपति को सुखी जीवन का आशीर्वाद देती हैं।

काशी परंपरा में कोहवर केवल हास्य और मनोरंजन की रस्म नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सामंजस्य बढ़ाने का सांस्कृतिक माध्यम माना जाता है। इस दौरान दूध, मिठाई और फल भी शुभ प्रतीक के रूप में रखे जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में वर-वधू से हल्के-फुल्के खेल भी कराए जाते हैं, जिससे दोनों के बीच अपनापन बढ़े। यह विधि नए जीवन की मधुर शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है।

विदाई की विधि 

विदाई विवाह की सबसे भावुक और संवेदनशील रस्म मानी जाती है। इस विधि में वधू अपने माता-पिता और परिवार से आशीर्वाद लेकर ससुराल के लिए प्रस्थान करती है। विदाई के समय वधू घर के आंगन में चावल या धान पीछे की ओर फेंकती है, जिसे समृद्धि और माता लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। परिवार के सदस्य वधू को सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद देते हैं।

काशी पंचांग परंपरा में विदाई केवल कन्या का प्रस्थान नहीं, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत मानी जाती है। इस दौरान आरती उतारी जाती है और गंगाजल छिड़ककर शुभकामनाएं दी जाती हैं। कई स्थानों पर भाई बहन को वाहन तक छोड़ने जाता है, जो उसके सुरक्षा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। विदाई की यह रस्म परिवारिक भावनाओं और संस्कारों की गहराई को दर्शाती है।

वर के घर वधू आने पर परीक्षण की विधि 

जब नववधू पहली बार वर के घर पहुंचती है, तब उसका स्वागत अत्यंत शुभ और मंगलमय वातावरण में किया जाता है। इस रस्म को “गृह प्रवेश परीक्षण विधि” कहा जाता है। घर की वरिष्ठ महिलाएं आरती उतारकर नववधू का स्वागत करती हैं। इसके बाद कलश, चावल, दीपक और रंगोली के माध्यम से गृह प्रवेश कराया जाता है। वधू अपने दाहिने पैर से चावल से भरे कलश को हल्का धक्का देकर घर में प्रवेश करती है, जो घर में समृद्धि आने का प्रतीक माना जाता है।

परीक्षण विधि में कई पारंपरिक रस्में भी की जाती हैं, जैसे दूध में अंगूठी ढूंढना, दीपक जलाना या मीठा खिलाना। इन रस्मों का उद्देश्य नवदंपति के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ाना माना जाता है। काशी परंपरा में नववधू को घर की लक्ष्मी माना जाता है, इसलिए उसके स्वागत में शंख ध्वनि, मंगल गीत और आशीर्वाद का विशेष महत्व होता है। यह विधि नए परिवार में वधू के सम्मानपूर्वक प्रवेश का प्रतीक मानी जाती है।

दही बड़ेडी लगाने की विधि 

दही बड़ेडी की रस्म कई पारंपरिक हिंदू विवाहों में शुभता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में निभाई जाती है। इस विधि में दही, हल्दी और कभी-कभी चावल या बेसन का मिश्रण तैयार किया जाता है। दही बड़ेडी का कार्य भैसुर द्वारा संपन्न किया जाता है। दुल्हन जब ससुराल पहुंचती है तब भैसुर दाल मथनी के ऊपर दही और पान का पत्ता रखकर उसे घर के छत से सटाता है। 

दूसरी विधि के अनुसार परिवार की महिलाएं इस मिश्रण को वर-वधू के हाथ, पैर या गाल पर शुभ संकेत के रूप में लगाती हैं। इसे नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और दांपत्य जीवन में मधुरता लाने वाला माना जाता है।

काशी परंपरा में दही को शुद्धता और शांति का प्रतीक माना गया है। दही बड़ेडी लगाने के दौरान मंगल गीत गाए जाते हैं और हंसी-खुशी का वातावरण रहता है। कई स्थानों पर यह रस्म विवाह के बाद घर में अपनापन बढ़ाने के उद्देश्य से की जाती है। इस विधि का धार्मिक महत्व यह माना जाता है कि दही की शीतलता नवदंपति के जीवन में प्रेम, धैर्य और सुख बनाए रखती है।

चौठारी की विधि 

चौठारी विवाह के कुछ दिनों बाद संपन्न होने वाली एक महत्वपूर्ण पारंपरिक रस्म है। सामान्यतः यह विवाह के चौथे दिन आयोजित की जाती है, इसलिए इसे “चौठारी” कहा जाता है। विवाह संपन्न होने के बाद वर और वधू के माता और पिता दोनों को मडवा में रखे हुए दोनों कलश के पानी से स्नान कराया जाता है। पुरुष को स्नान करने के लिए पांच विवाहिता पुरुषों की जरूरत पड़ती है जबकि महिला को स्नान करने के लिए वॉच विवाहिता महिलाओं की जरूरत पड़ती है। 

दूसरी विधि के अनुसार इस दिन नवदंपति को विशेष पूजा-विधि में बैठाया जाता है और कुलदेवता तथा पितरों का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। पुरोहित वैदिक मंत्रों के साथ गृह शांति एवं दांपत्य सुख के लिए पूजा कराते हैं।

इस रस्म में नववधू पहली बार परिवार के सभी सदस्यों के साथ औपचारिक रूप से घरेलू कार्यों और परंपराओं में सम्मिलित होती है। कई स्थानों पर इस दिन विशेष भोजन बनाया जाता है और रिश्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है। काशी पंचांग की परंपरा में चौठारी को वैवाहिक जीवन की स्थिरता और पारिवारिक समरसता का प्रतीक माना जाता है। इस दौरान वर-वधू को आशीर्वाद, उपहार और मंगलकामनाएं दी जाती हैं। चौठारी की रस्म नवदंपति के नए जीवन में सामाजिक और धार्मिक स्वीकार्यता का प्रतीक मानी जाती है।

विवाह में लगने वाली संपूर्ण पूजा सामग्री सूची

काशी पंचांग एवं वैदिक परंपरा अनुसार विवाह की प्रत्येक विधि में उपयोग होने वाली सामग्री

(सनातन) हिंदू विवाह संस्कार में अनेक प्रकार की धार्मिक विधियां संपन्न कराई जाती हैं। प्रत्येक विधि में अलग-अलग पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है। नीचे विवाह की प्रमुख रस्मों और उनमें उपयोग होने वाली सामग्रियों की विस्तृत सूची दी जा रही है, जिससे विवाह की तैयारी व्यवस्थित रूप से की जा सके।

1. गणेश पूजन सामग्री

विवाह की शुरुआत भगवान श्रीगणेश के पूजन से होती है।

आवश्यक सामग्री:

भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र

चौकी एवं लाल कपड़ा

रोली, हल्दी, कुमकुम

अक्षत (चावल)

दूर्वा घास

जनेऊ

सुपारी

लौंग, इलायची

पान के पत्ते

नारियल

पंचमेवा

धूप, दीप, अगरबत्ती

घी एवं रुई

फूल एवं फूलमाला

मोदक या लड्डू

गंगाजल

कलश एवं आम के पत्ते

2. मातृका पूजन एवं कुलदेवी पूजन सामग्री

आवश्यक सामग्री:

मिट्टी या पीतल का कलश

लाल एवं पीला वस्त्र

हल्दी, रोली, चंदन

अक्षत

सुपारी

नारियल

आम या अशोक के पत्ते

पंचफल

पुष्प एवं माला

धूप-दीप

मिठाई

कलावा (मौली)

गंगाजल

3. हल्दी रस्म सामग्री

आवश्यक सामग्री

हल्दी पाउडर एवं साबुत हल्दी

सरसों का तेल

दही

चंदन

पीतल या मिट्टी का पात्र

आम के पत्ते

पीला वस्त्र

पुष्प

दूब घास

कलावा

दीपक

4. मेहंदी रस्म सामग्री

आवश्यक सामग्री

मेहंदी कोन

कपूर

नींबू एवं चीनी

सुगंधित तेल

पूजा थाली

फूलमाला

दीपक

मिठाई

5. मंडप पूजन सामग्री

आवश्यक सामग्री

मंडप के लिए बांस

आम एवं अशोक के पत्ते

केले का पेड़

कलश

नारियल

लाल कपड़ा

गंगाजल

रोली, हल्दी, चंदन

अक्षत

धूप, दीप

पंचरत्न (कुछ परंपराओं में)

पंचगव्य

शहद

घी

जौ

तिल

6. वर पूजा सामग्री

आवश्यक सामग्री

आरती थाल

कुमकुम

चावल

फूलमाला

इत्र

नारियल

मिठाई

दीपक

पान-सुपारी

वस्त्र एवं अंगवस्त्र

7. जयमाला (वरमाला) सामग्री

आवश्यक सामग्री

फूलों की माला

गुलाब की पंखुड़ियां

इत्र

आरती थाल

दीपक

अक्षत

8. कन्यादान सामग्री

आवश्यक सामग्री

पवित्र जल

कलश

नारियल

अक्षत

पुष्प

पान-सुपारी

दक्षिणा

वस्त्र

सोना या चांदी (परंपरा अनुसार)

गायत्री मंत्र पुस्तक

जनेऊ

9. हवन सामग्री

आवश्यक सामग्री

हवन कुंड

आम की लकड़ी

कपूर

घी

हवन सामग्री मिश्रण

जौ

तिल

नवग्रह समिधा

गुग्गुल

लौंग

इलायची

शक्कर

सूखा नारियल

कमलगट्टा

10. सप्तपदी सामग्री

आवश्यक सामग्री:

सात सुपारी

सात हल्दी गांठ

चावल

पान

घी दीपक

पुष्प

सप्तधान्य

सिंदूर

मंगलसूत्र

11. सिंदूरदान सामग्री

आवश्यक सामग्री:

सिंदूर

चांदी या पीतल की डिब्बी

दर्पण

पुष्प

अक्षत

12. विदाई सामग्री

आवश्यक सामग्री:

चावल

सिक्के

नारियल

मिठाई

कलश

गंगाजल

आरती थाल

दीपक

13. गृह प्रवेश सामग्री

आवश्यक सामग्री:

कलश

चावल से भरा पात्र

हल्दी

कुमकुम

दीपक

आरती थाली

दूध एवं शहद

फूल

नारियल

विवाह में सामान्य रूप से लगने वाली अतिरिक्त सामग्री

पूजन सामग्री

कपूर

अगरबत्ती

धूपबत्ती

रुई

देसी घी

शंख

घंटी

आसन

चौकी

श्रृंगार सामग्री

चुनरी

चूड़ी

बिछिया

पायल

मंगलसूत्र

सिंदूर

फल एवं मिठाइयां

केला

नारियल

सेब

अनार

मिठाई

पंचमेवा

अनाज एवं पूजन द्रव्य

गेहूं

अरवा चावल

जौव 

तिल

मूंग

चना

काशी पंचांग अनुसार विशेष ध्यान रखने योग्य बातें

विवाह सामग्री शुद्ध एवं सात्विक होनी चाहिए।

पूजन में टूटे हुए चावल या खराब नारियल का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

पूजा में तांबे या पीतल के पात्र शुभ माने जाते हैं।

विवाह मंडप में गंगाजल का छिड़काव करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

हवन सामग्री में सुगंधित द्रव्यों का उपयोग वातावरण को पवित्र बनाता है।

विवाह सामग्री खरीदते समय शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना चाहि

विवाह के समय आजमाए जाने वाले पांच पारंपरिक टोटके 

1. हल्दी की गांठ का टोटका

विवाह के दिन दूल्हा-दुल्हन के पास पीली हल्दी की गांठ रखने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

2. काले तिल और सरसों का उपाय

बारात निकलने से पहले काले तिल और सरसों को सात बार घुमाकर बाहर फेंकने की परंपरा मानी जाती है। मान्यता है कि इससे बुरी नजर और बाधाएं दूर होती हैं।

3. नारियल का शुभ प्रयोग

मंडप में एक साबुत नारियल लाल कपड़े में बांधकर रखने से दांपत्य जीवन में आर्थिक स्थिरता और शुभ फल प्राप्त होते हैं।

4. लौंग और कपूर का उपाय

विवाह के समय कपूर और लौंग की आहुति देने से वातावरण शुद्ध होता है तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार माना जाता है।

5. चावल और सिक्के का टोटका

विदाई के समय दुल्हन द्वारा पीछे चावल और सिक्के फेंकना केवल परंपरा नहीं, बल्कि घर में लक्ष्मी और समृद्धि बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है।

नोट: इन सभी उपायों को धार्मिक आस्था और पारंपरिक मान्यताओं के आधार पर किया जाता है। इनका उद्देश्य विवाह समारोह में शुभता और सकारात्मकता बनाए रखना होता है।

डिस्क्लेमर

यह लेख धार्मिक मान्यताओं, काशी पंचांग, पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों और विभिन्न पुरोहित परंपराओं के आधार पर तैयार किया गया है। भारत के अलग-अलग राज्यों, जातियों, समुदायों और परिवारों में विवाह की विधियों एवं पूजा सामग्रियों में भिन्नता हो सकती है। इसलिए इस ब्लॉग में दी गई सामग्री को सामान्य धार्मिक जानकारी और मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।

विवाह संस्कार से जुड़ी किसी भी विशेष विधि, मुहूर्त, गोत्र, परंपरा अथवा पूजा सामग्री की अंतिम पुष्टि अपने कुल पुरोहित, आचार्य या योग्य ज्योतिषाचार्य से अवश्य करें। लेखक या प्रकाशक किसी भी धार्मिक, सामाजिक या पारिवारिक निर्णय के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं होगा। इस लेख का उद्देश्य सनातन विवाह परंपराओं की जानकारी को सरल और व्यवस्थित रूप में लोगों तक पहुंचाना है, ताकि विवाह की तैयारियों में सुविधा हो सके।

धार्मिक कार्य श्रद्धा, शुद्धता और सकारात्मक भावना से किए जाने चाहिए। किसी भी पूजा-विधि में स्थानीय परंपराओं और परिवार के वरिष्ठजनों की सलाह को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।




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