आस्था का महापर्व चैती छठ 29 मार्च 2031 से जानें संपूर्ण जानकारी f

आस्था का महापर्व चैती छठ 29 मार्च 2031 से जानें संपूर्ण जानकारी

चैती छठ पर दौरा ले जाते हैं घर के पुरुष सदस्यों की तस्वीर

चैती छठ 29 मार्च 2031 दिन शनिवार को चैत्र मास शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को मनाया जायेगा।

27 मार्च (गुरुवार): चतुर्थी - नहाय-खाय

28 मार्च (शुक्रवार): पंचमी तिथि - खड़ना 

29 मार्च (शनिवार): षष्ठी तिथि - संध्या अर्घ्य - मुख्य चैती छठ

30 मार्च (रविवार): सप्तमी तिथि उषा अर्घ्य और पारण 

29 मार्च 2031 को चैती छठ पर बन रहा है महा-संयोग - द्विपुष्कर, सर्वार्थ सिद्धि, रवि और आडल योग में होगा सूर्य देव का अभिषेक

आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व चैती छठ इस बार बेहद शुभ संयोग लेकर आ रहा है। 29 मार्च 2031, शनिवार को जब बिहार, झारखंड और यूपी के घाटों पर व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे, तब आकाश में एक साथ चार महायोग बन रहे हैं। पंचांग के अनुसार इस दिन द्विपुष्कर योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और दुर्लभ आडल योग का अद्भुत संगम हो रहा है।

ज्योतिष शास्त्र में इन चारों योगों को बेहद फलदायी माना गया है। मान्यता है कि द्विपुष्कर योग में किया गया दान और अभिषेक दोगुना फल देता है, जबकि सर्वार्थ सिद्धि योग हर मनोकामना को सिद्ध करता है। रवि योग सूर्य देव की कृपा का प्रतीक है और आडल योग सभी बाधाओं को हरने वाला माना जाता है।

ऐसे में इस दिन किया गया छठी मैया और भगवान भास्कर का अभिषेक, साधारण दिन से कई गुना अधिक फलदायी होगा। जो व्रती इस महासंयोग में विधि-विधान से सूर्य को जल, दूध और गंगाजल से अभिषेक करेंगे, उन्हें संतान सुख, आरोग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होगा। यही कारण है कि 2031 की चैती छठ को पिछले कई दशकों की सबसे शुभ चैती छठ माना जा रहा है।

चार दिवसीय महापर्व छठ की शुभारंभ 29 मार्च से 

चार दिवसीय पवित्रता का महापर्व छठ इस बार 27 से शुरू होकर 29 मार्च तक चलेगा। 36 घंटे निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना करना तथा संतान के दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा इस चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि अर्थात 29 मार्च से शुरू होगी। 

षष्ठी तिथि 27 मार्च दिन गुरुवार को है। छठ पूजा का प्रारंभ दो दिन पूर्व चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है, फिर पंचमी को खड़ना या रसियाव होता है। उसके बाद षष्ठी तिथि को छठ पूजा और सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है। 

इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान हैं।अर्घ्य देने के उपरांत व्रतधारी 36 घंटे से निर्जला व्रत का पारण करके व्रत को पूरा करते हैं। छठ पर्व पवित्रता की महता को दर्शाता है।

नहाय-खाय से शुरू करें आस्था का महापर्व छठ

आस्था का महापर्व छठ पर्व का शुभारंभ चैत्र शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पर्व का पहला दिन होता है, इस दिन को नहाय खाय कहते हैं। इस वर्ष नहाय-खाय 27 मार्च दिन गुरुवार को है। 

इस दिन सुबह उठकर नदी, तालाब, कुंआ या घर में स्थित नल से स्नान कर शरीर पर गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद आस्था का महापर्व छठ व्रत करने का संकल्प लें। भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद घर में बड़े बुजुर्गों का चरण स्पर्श करें। पूजा के उपरांत अरवा चावल का भात और लौकी से बने सब्जी का सेवन करें।

चंद्रमा के अस्त होते ही निर्जला व्रत शुरू

महा आस्था का पर्व छठ के दूसरे दिन खड़ना करने का विधान है। इस दिन छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खड़ना पर्व मनाते हैं । इस वर्ष खड़ना  मार्च दिन शनिवार को है। खड़ना के दिन सुबह से ही व्रतधारी निर्जला रहकर छठी मैया का दिन भर श्रवन करती है।

शाम को स्नान कर नया वस्त्र पहन कर मिट्टी के बने चूल्हे से आम की लकड़ी जलाकर पीतल के बर्तन में गुड़ के खीर और रोटी बनाई जाती हैं। गोधूलि बेला में भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद छठी मैया को पूजा अर्चना करने के उपरांत खीर और रोटी व्रतधारी खाती है। 

व्रतधारियोंं को भोजन करने के उपरांत प्रसाद के रूप में खीर और रोटी लोगों के बीच वितरण किया जाता है। मान्यता है इस दिन खड़ना के प्रसाद मांग कर खाने से छठी मैया खुश होती है। आकाश में जब तक चंद्र उदय रहता है व्रत धारी पानी पी सकते हैं। 

चंद्रमा अस्त हो जाने के बाद 24 घंटेे का निर्जला व्रत शुरू हो जाताा है।

तीसरा दिन सूर्य को सन्ध्या अर्घ्य देते हैं व्रतधारी

आस्था के महापर्व के तीसरे दिन शनिवार को छठ पूजा का प्रमुख दिन होता है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। 

छठ की पूजा सामग्री दउरा और सूप में सजा कर व्रतधारी छठी मईय की गीत गाते हुए घाट की ओर प्रस्थान करती है। इसके बाद घाट पर पहुंचकर छठी मैया और सूर्य देव का पिंड बनाकर पवित्र जल में स्नान कर, पूजा अर्चना करने के उपरांत भगवान भास्कर को अर्ध देती हैैं। 

अर्घ्य देने के दौरान घरवाले जो घाट पर स्नान कर चुके हैं वह भी भगवान भास्कर को जल में दूध मिलाकर अर्घ्य देते हैं। अंत में घाट पर से छठ गीत गाते हुए व्रतधारी घर के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य देकर महापर्व समाप्त

आस्था का महापर्व छठ के चौथे दिन उगते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर व्रतधारी पारण करते हैं। बहुत से समाज सेवी संस्थाएं घाट पर शिविर लगाकर व्रतधारियों के बीच दूध, चाय, बिस्कुट, आम के दातुन और लकड़ी सहित फलों का वितरण करते हैं। उसी दौरान व्रतधारी भी लोगों के बीच प्रसाद का वितरण करते हैं।

जाने अर्घ्य देने का समय

चार दिवसीय महापर्व छठ के दूसरे दिन खड़ना है। 28 मार्च, दिन शनिवार, चैत्र माह, शुक्ल पक्ष, पंचमी तिथि के दिन सूर्य मीन राशि में और चंद्रमा वृषभ राशि में रहते हुए नक्षत्र कृतिका के बाद रोहिणी नक्षत्र रहेगा। इस दिन चंद्र अस्त का विशेष महत्व होता है व्रत धारी चंद्र अस्त के पहले पानी पी लेते हैं। इसके बाद 24 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। चंद्रास्त रात 10:45 बजे पर होगा।

छठ व्रत के तीसरे दिन अर्थात 29 मार्च दिन शनिवार, चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, षष्ठी तिथि को नक्षत्र रोहिणी के बाद मृगशिरा रहेगा। इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में और सूर्य मीन राशि में रहेंगे। 

इस दिन सूर्यास्त का विशेष महत्व है। सूर्य अस्त के पूर्व छठ व्रतधारी अर्घ्य दे देते हैं। सूर्यास्त शाम 05:59 बजे पर होगा ।जाएगा। व्रतधारियों को गोधूलि मुहूर्त अर्थात शाम 05:58 बजे से लेकर 06:22 बजे तक रहेगा। इस दौरान अर्घ्य देना शुभ रहेगा।

छठ महापर्व के अंतिम दिन अर्थात 30 मार्च दिन रविवार को पड़ रहा है। कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि को सूर्य वृश्चिक राशि में और चंद्रमा मकर राशि में रहेंगे। नक्षत्र श्रावण रहेगा। इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य छठ व्रतधारी देते हैं। सूर्योदय सुबह 05:40 बज पर होगा इस दौरान शुभ मुहूर्त रहेगा।

छठ पर्व में लगने वाली पूजा सामग्री

आस्था के महापर्व छठ में अनेक तरह के पूजा सामग्री लगती है। कच्चे बांस की दो टोकरी, बांस या पीतल के सूप, जल अर्पण करने के लिए पीतल या तांबा का लोटा, पान पत्ता, गोटा सुपारी, अरवा चावल, सिंदूर, मिट्टी का दीया, शहद, गुड, दूध, धूप अगरबत्ती, शकरकंद, सुथनी, पत्ते सहित पांच गन्ने के पौधे, मूली, अदरक और हल्दी का हरा पौधा, केला, सेवन, संतरा, नाशपाती, शरीफा, पानी फल, आवला, पानी वाला नारियल, ठेकुआ, नया वस्त्र, गाजर, बड़ा नींबू, कपूर, आम का सूखा लकड़ी और दातुन प्रमुख हैं।

 चैती छठ से संबंधित वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना 

वैज्ञानिक पहलू: चैती छठ सूर्य की उपासना का पर्व है। चैत्र मास में सूर्य उत्तरायण में तेज होता है। सुबह-शाम घाट पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर को विटामिन-D मिलता है और आंखों की रोशनी व त्वचा रोग में लाभ माना जाता है। 36 घंटे का निर्जला व्रत शरीर के Detoxification की प्राचीन विधि है।

आध्यात्मिक पहलू:यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते और उगते दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है - जो जीवन के उतार-चढ़ाव में भी समान श्रद्धा का संदेश देता है। यह आत्म-संयम और प्रकृति से जुड़ाव का साधन है।

सामाजिक पहलू: जात-पात से ऊपर उठकर सभी एक ही घाट पर, एक ही तरह के बांस के सूप में ठेकुआ और फल लेकर एकत्र होते हैं। इससे सामाजिक समरसता बढ़ती है और प्रवासी बिहारी अपने गांव-घर से जुड़ते हैं।

आर्थिक पहलू: चैती छठ बिहार-झारखंड के लिए लोकल इकोनॉमी का बड़ा आधार है। बांस के सूप-टोकरी बनाने वाले, मिट्टी के चूल्हे, आम की लकड़ी, गन्ना, सूप, फल और फूल बेचने वाले कारीगरों और किसानों को इस 4 दिन में साल भर की अच्छी आय हो जाती है।

चैती छठ से संबंधित अनसुलझे पहलू 

चैती छठ के कुछ सवाल आज भी वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए अनसुलझे हैं। पहला, इस पर्व का उल्लेख किसी मुख्य पुराण में विस्तार से नहीं मिलता, फिर भी यह वैदिक काल से भी पुरानी सूर्य पूजा की परंपरा कैसे जीवित है? दूसरा, कार्तिक छठ में और चैती छठ में नियम एक जैसे हैं, लेकिन कार्तिक छठ ज्यादा प्रसिद्ध क्यों है जबकि चैत्र में फसल कटने के बाद किसान के पास ज्यादा समय होता है?

तीसरा, छठ में मूर्ति पूजा नहीं होती, सिर्फ प्रत्यक्ष दिखने वाले सूर्य और जल की पूजा होती है - यह भारत के अन्य व्रतों से बिल्कुल अलग है। चौथा, 36 घंटे बिना पानी के रहने पर भी व्रती ऊर्जावान कैसे बने रहते हैं? मेडिकल साइंस के पास इसका स्पष्ट जवाब नहीं है, इसे आस्था और मानसिक शक्ति से जोड़ा जाता है। पांचवां, चैती छठ का मुख्य प्रसाद ठेकुआ बिना प्याज-लहसुन के, सिर्फ गुड़ और गेहूं से बनता है और 2-3 दिन तक खराब नहीं होता, इसका संरक्षण गुण भी शोध का विषय है।

चैती छठ से संबंधित तीन तरह के टोटके (लोक मान्यता पर आधारित -

नोट: ये केवल लोक मान्यताएं हैं।

*1. समृद्धि के लिए टोटका:* खड़ना के दिन गुड़ की खीर बनाते समय चूल्हे पर एक सिक्का रखकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि उसी सिक्के को तिजोरी में रखने से वर्ष भर धन की कमी नहीं होती।

*2. संतान सुख के लिए टोटका:* संध्या अर्घ्य के समय व्रती अपने आंचल में एक छोटा नारियल और 5 गेहूं के दाने बांध लेती हैं। अर्घ्य के बाद उसी को पीपल के नीचे रख दिया जाता है। बुजुर्ग मानते हैं इससे वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

*3. मनोकामना पूर्ति के लिए टोटका:* उषा अर्घ्य के बाद सूप में बचे हुए एक ठेकुआ और केले को किसी सुहागिन को दान कर दिया जाता है। लोक मान्यता है कि इससे रुके हुए कार्य पूरे होते हैं और घर में शांति आती है।

चैती छठ 2031 से संबंधित 5 यूनिक प्रश्न और उत्तर 

प्रश्न *01: चैती छठ 2031 में नहाय-खाय कब है?

उत्तर: 27 मार्च 2031, गुरुवार को नहाय-खाय है। इसी दिन से व्रती सात्विक भोजन शुरू करेंगी।

प्रश्न *02: क्या 2031 की चैती छठ पर महायोग बन रहा है?

उत्तर: हां, 29 मार्च 2031 को द्विपुष्कर, सर्वार्थ सिद्धि, रवि और आडल योग एक साथ बन रहे हैं। ज्योतिष के अनुसार इस योग में दिया गया अर्घ्य दोगुना फलदायी होता है।

प्रश्न *03: चैती छठ 2031 का उगते सूर्य का अर्घ्य समय क्या है?*

उत्तर: उषा अर्घ्य 30 मार्च 2031, रविवार सुबह लगभग 5:55 से 6:20 बजे के बीच होगा। यह समय पटना/जमशेदपुर पंचांग के अनुसार है, स्थानीय सूर्योदय के अनुसार 10-15 मिनट का अंतर हो सकता है।

प्रश्न *04: कार्तिक छठ और चैती छठ में क्या अंतर है?*

उत्तर: विधि-विधान एक समान है। मुख्य अंतर ऋतु का है - कार्तिक छठ शरद ऋतु में और चैती छठ वसंत ऋतु में होती है। चैती छठ को छोटी छठ और यमुना छठ भी कहा जाता है।

प्रश्न *05: क्या 2031 में चैती छठ पर घाट पर भीड़ ज्यादा रहेगी?*

उत्तर: हां, 29 मार्च शनिवार और 30 मार्च रविवार होने से वीकेंड पड़ रहा है, इसलिए 2026 की तुलना में घाटों पर भीड़ और प्रवासियों की वापसी अधिक रहने की उम्मीद है।

डिस्क्लेमर - (टोटके सहित)

इस लेख में दी गई चैती छठ 2031 की तिथि, योग, मुहूर्त और पूजा विधि की जानकारी पंचांग, पंचांग और स्थानीय ज्योतिषियों के हवाले से दी गई है। यह जानकारी केवल सामान्य सूचना और धार्मिक जिज्ञासा के लिए है। हम 100% सटीकता का दावा नहीं करते। तिथि और सूर्योदय/सूर्यास्त का समय आपके शहर (जमशेदपुर, पटना, दिल्ली,) के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए अंतिम निर्णय के लिए अपने स्थानीय पंडित या पंचांग से पुष्टि अवश्य करें।

इस लेख में बताए गए टोटके, उपाय और लोक मान्यताएं सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपराओं और बुजुर्गों के अनुभवों पर आधारित हैं। इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। हम अंधविश्वास, जादू-टोना या किसी भी प्रकार की हानिकारक क्रिया को बढ़ावा नहीं देते। किसी भी टोटके को करने से पहले अपनी विवेक बुद्धि का प्रयोग करें।

 हमारा उद्देश्य केवल लोक संस्कृति की जानकारी देना है, न कि किसी चमत्कार की गारंटी देना। यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो निर्जला व्रत रखने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें। इस लेख में दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी लाभ-हानि के लिए लेखक या वेबसाइट जिम्मेदार नहीं होगी।




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