मकर संक्रांति (सत्तूआन) 2033: जानें लग्न व शुभ कार्य होगा शुरू f

मकर संक्रांति (सत्तूआन) 2033: जानें लग्न व शुभ कार्य होगा शुरू



मकर संक्रांति 2033: 14 जनवरी को सूर्य का मकर प्रवेश और शुभ योगों का विशेष संयोग

14 जनवरी 2033, शुक्रवार को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य की उत्तरायण यात्रा का आरंभ माना जाता है। मकर संक्रांति हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है, जिसे स्नान, दान, जप और पूजा-पाठ के लिए विशेष शुभ माना जाता है। 

इस अवसर पर श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं तथा तिल, गुड़, वस्त्र और अन्न का दान करते हैं। घरों में तिल-गुड़ से बने पकवान तैयार किए जाते हैं और कई क्षेत्रों में पतंग उड़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है। वर्ष 2033 की मकर संक्रांति इसलिए भी विशेष मानी जा रही है क्योंकि इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और आडल योग का संयोग बताया गया है। 

धार्मिक दृष्टि से ऐसे शुभ योगों में पूजा, दान, सूर्य आराधना और शुभ कार्यों का विशेष महत्व माना जाता है। मकर संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, कृषि और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा महत्वपूर्ण उत्सव भी है।

क्यों मनाएं 14 जनवरी को ही मकर सक्रांति

मकर संक्रांति 14 जनवरी 2033 दिन शुक्रवार को मनाई जाएगी, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इस दिन सूर्य धनु राशि से  सुबह 10:15 बजे मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य को मकर राशि में प्रवेश करने के बाद मकर संक्रांति पर्व मनाए जाते हैं।

आस्था, विश्वास, परंपरा, शुभ कार्य शुरू करने और नए फसलों के आगमन का महापर्व सत्तूआन 14 अप्रैल 2033 को धूमधाम से लोग मनायेंगे। यह पर्व स्नान, दान, और सूर्य देव की पूजा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। चना दाल से बनी सत्तू, नमक, नया गुड़ और आम की चटनी खाने की इस दिन विधान है।

पंचांग के अनुसार इसी दिन से एक माह से चल रहे खरमास की समाप्ति और शुभ कार्यों का शुभारंभ होता है। सत्तूआन के दिन भगवान सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करने के कारण, इस दिन को मेष संक्रांति भी कहते हैं। यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में विभिन्न नामों से जाना जाता है।

देश के अधिकांश क्षेत्रों में मनाया जाता है मेष संक्रांति

मेष संक्रांति अर्थात सत्तूआन को पंजाब में वैशाखी, केरल में विशु, बिहार में सत्तूआनी, उत्तराखंड में बिखोती, पश्चिम बंगाल में पोइला बैशाख, उड़ीसा में पन्ना पुथांदु और मणिपुर में चेइरोबा नाम से जाना जाता है।

 उत्तर बिहार के दरभंगा, सहरसा आदि क्षेत्रों में रहने वाले लोग एक दिन बाद अर्थात 15 अप्रैल से जुड़ शीतल पर्व का शुभारंभ करते हैं। वैशाख संक्रांति के दिन पितरों को सत्तू, गुड़, नमक और आम का भोग लगाने का विधान है।

 तथा ब्राह्मणों को मिट्टी का घड़ा जल से भरा हुआ, पंखा, छाता, सत्तू, गुड़, नमक, धन और आम आदि वस्तुएं दान करने की परंपरा है।

 पूजा-अर्चना करने का शुभ मुहूर्त 

पंचांग के अनुसार जानें शुभ समय

14 अप्रैल को दिन के 2:30 से लेकर 3:30 तक विजया मुहूर्त, शाम 6:34 से लेकर 6:57 तक गोधूलि मुहूर्त, सांध्य मुहूर्त 6:45 से लेकर 7:30 तक, निशिता मुहूर्त रात 11:49 से लेकर 12:43 तक, ब्रह्म मुहूर्त 4:26 से लेकर 5:11 तक और अंत में प्रातः मुहूर्त 4:49 से लेकर 5:56 तक रहेगा इस दौरान शुभ कार्य, पूजा-पाठ, दान दक्षिणा और सत्तू खाने का अद्भुभूत संयोग बन रहा है।

पंचांग के अनुसार जाने अशुभ काल

14 अप्रैल को किस समय पूजा-पाठ, दान दक्षिणा और सत्तू खाना वर्जित है। जानें पंचांग के अनुसार काल की गणना। यमगण्ड काल सुबह 7:33 से शुरू होकर 9:09 तक रहेगा। उसी प्रकार गुलिक काल 10:00 बज के 12:22 तक, दुर्मुहूर्त काल 11:56 से लेकर 12:47 तक, राहुकाल 12:00 बजे से लेकर दिन के 1:30 बजे तक रहेगा। सांध्य समय वज्र्य काल शाम 6:58 से लेकर रात 8:45 तक रहेगा।

अब जानें चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार शुभ समय

अब जाने चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार शुभ समय कब है। क्योंकि शुभ समय के अनुसार ही पूजा-पाठ और सत्तू का सेवन किया जाता है। 

14 अप्रैल सत्तूआन के दिन सुबह 6:00 बजे से लेकर 7:30 तक लाभ मुहूर्त, 7:30 से लेकर सुबह 9:00 बजे तक अमृत मुहूर्त, दिन के 10:30 बजे से लेकर 12:00 बजे तक शुभ मुहूर्त, 3:00 बजे से लेकर शाम 4:30 बजे तक चर मुहूर्त रहेगा। एक बार फिर से लाभ मुहूर्त का संयोग 4:30 से लेकर शाम 6:00 बजे तक रहेगा।

चौघड़िया के अनुसार अशुभ मुहूर्त

14 अप्रैल को सुबह 9:00 बजे से लेकर 10:30 बजे तक काल मुहूर्त, दिन के 12:00 बजे से लेकर 1:30 बजे तक रोग मुहूर और दोपहर 1:30 से लेकर 3:00 बजे तक उद्वेग मुहूर्त का संजोग रहेगा।

सत्तूआन के दिन क्यों खाया जाता है सत्तू

सत्तूआन के दिन सत्तू खाने का विशेष महत्व क्या है ? जानें वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुण।

सत्तू की तासीर ठंडी है। इसलिए गर्मी शुरू होने के साथ ही शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। 

सत्तू खाने से शरीर का तापमान नियंत्रण में रहता है। सत्तू एक अनाज है इसलिए इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। 

सत्तू में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन है। 

लिवर मजबूत बनाता ही है साथ में एसिडिटी की समस्या दूर रखता है। 

गर्मी की तपिश से रक्षा करता है। 

देर तक भूख नहीं लगने देता है। 

लू का खतरा कम करते हुए प्यास जगाए रखता है। 

यह डायबिटीज सहित लो और हाई ब्लड प्रेशर को काबू में रखता है। 

सत्तू कफ, पित्त, थकावट, भूख, प्यास, और आंखों की बीमारी को काबू में रखता है। 

इसीलिए गर्मी शुरू होते ही बिहार, झारखंड, यूपी समेत देश के अन्य राज्य के लोग सत्तू का सेवन करना शुरू कर देते हैं 14 अप्रैल सत्तूआन के दिन से।

आम के औषधीय गुण क्या है ?

आम औषधीय गुणों से भरपूर है। 

यह कैंसर रोधी भी है। 

हम जानेंगे कि सत्तूआन से इसका रिश्ता क्या है। 

आम भारत का राष्ट्रीय फल है। 

भारत में इसका एक सौ से ज्यादा प्रजाति मिलते हैं। 

आम से हमलोग अमावट, खटाई, चटनी, पन्ना, अचार, शर्बत, कैंडी सहित बहुत से आइटम बनते हैं। 

आम में भरपूर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट होने के कारण कैंसर से बचाव करता है। 

इसमें क्यूसेंटिन, एस्ट्रागालिन और फिसेटिन जैसे महत्वपूर्ण तत्व मौजूद रहते हैं। 

आम खाने से आंखों में चमक बढ़ जाती है। 

आम केलोस्ट्रोल को नियंत्रण में रखता है। 

रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

 स्मरण शक्ति को बढ़ता है

लू लग जाने पर इसे आग में पकाकर शरीर में लेप लगाने से बुखार से राहत मिलती है। 

आम अगर थोड़ा कच्चा है तो विटामिन सी से भरपूर है जबकि पक जाने पर विटामिन ए की मात्रा बढ़ जाती है। 
आम का वैज्ञानिक नाम मेंगीफेरा इंडिया है।

1. मकर संक्रांति 2033 के अनसुलझे पहलू — 

मकर संक्रांति से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर धार्मिक परंपरा, ज्योतिष और आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण अलग-अलग दिखाई देते हैं। पहला प्रश्न यह है कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और वास्तविक खगोलीय स्थिति को परंपरागत पंचांग किस प्रकार निर्धारित करता है। 

दूसरा पहलू उत्तरायण को लेकर है। धार्मिक ग्रंथों में उत्तरायण का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है, जबकि खगोल विज्ञान इसे पृथ्वी की धुरी और सूर्य की आभासी गति से जोड़कर समझाता है। तीसरा प्रश्न शुभ योगों की प्रकृति से संबंधित है। रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और आडल योग को ज्योतिष में शुभ माना जाता है, लेकिन इनके प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। 

इसके अलावा तिल-गुड़ खाने, दान करने, नदी स्नान और पतंग उड़ाने की परंपराओं के पीछे धार्मिक, सामाजिक तथा मौसमी कारणों का वास्तविक अनुपात भी शोध का विषय है। यही पहलू मकर संक्रांति को परंपरा और आधुनिक विचार के बीच रोचक विषय बनाते हैं।

2. मकर संक्रांति के तीन पारंपरिक टोटके 

1. तिल-गुड़ का दान:

मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में सुख-शांति आती है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल, गुड़ या उनसे बने खाद्य पदार्थ जरूरतमंदों को दे सकते हैं।

2. सूर्य को अर्घ्य:

सुबह स्नान के बाद तांबे के पात्र से सूर्य देव को जल अर्पित करने की परंपरा है। जल अर्पित करते समय सूर्य देव का स्मरण और अपनी मनोकामना की प्रार्थना की जाती है। इसे स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है।

3. जरूरतमंद को अन्न-वस्त्र दान:

इस दिन गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, कंबल, वस्त्र अथवा अपनी क्षमता के अनुसार उपयोगी सामग्री देने की परंपरा है। धार्मिक दृष्टि से इसे पुण्यकारी माना जाता है और सामाजिक दृष्टि से यह जरूरतमंदों की सहायता का माध्यम है।

3. पांच यूनिक प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न 1: 2033 की मकर संक्रांति को तीन शुभ योगों का संयोग क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

उत्तर: रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और आडल योग को ज्योतिषीय परंपरा में अलग-अलग महत्व दिया जाता है। इन योगों के संयोग को धार्मिक कार्यों और शुभ संकल्पों के लिए विशेष माना जा सकता है। हालांकि इनके प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

प्रश्न 2: मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का मेल धार्मिक परंपरा से आगे क्या संदेश देता है?

उत्तर: तिल और गुड़ भारतीय संस्कृति में सर्दी के मौसम से भी जुड़े खाद्य पदार्थ हैं। तिल ऊर्जा और वसा का स्रोत है, जबकि गुड़ मिठास प्रदान करता है। इसलिए इस परंपरा में धार्मिक भावना के साथ मौसमी और सामाजिक पक्ष भी दिखाई देता है।

प्रश्न 3: क्या उत्तरायण केवल धार्मिक अवधारणा है या इसका खगोलीय आधार भी है?

उत्तर: उत्तरायण का धार्मिक महत्व बहुत पुराना है, लेकिन इसके पीछे खगोलीय घटनाओं की समझ भी जुड़ी है। सूर्य की आभासी वार्षिक गति और पृथ्वी की गति के कारण ऋतु परिवर्तन होते हैं। धार्मिक परंपरा ने इस प्राकृतिक परिवर्तन को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान किया।

प्रश्न 4: मकर संक्रांति पर दान करने की परंपरा इतनी महत्वपूर्ण क्यों बनी?

उत्तर: दान को हिंदू परंपरा में पुण्य और सेवा का माध्यम माना गया है। सर्दियों में जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और गर्म कपड़े देना धार्मिक आस्था के साथ मानवीय सहायता का भी कार्य है।

प्रश्न 5: मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा का धार्मिक अर्थ क्या है?

उत्तर: पतंग उड़ाना मुख्यतः क्षेत्रीय और सांस्कृतिक परंपरा है। इसे उत्सव, आनंद और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके पीछे अलग लोक मान्यताएं मिलती हैं, इसलिए इसे पूरे भारत की एक समान धार्मिक परंपरा नहीं कहा जा सकता।

डिस्क्लेमर:

इस ब्लॉग में मकर संक्रांति 2033, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश, उत्तरायण, धार्मिक परंपराओं, शुभ योगों, दान-पुण्य तथा पारंपरिक मान्यताओं से संबंधित जानकारी सामान्य धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में प्रस्तुत की गई है। रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और आडल योग से संबंधित जानकारी ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। इन योगों के प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

ब्लॉग में बताए गए तिल-गुड़ दान, सूर्य को अर्घ्य देने, अन्न-वस्त्र दान तथा अन्य पारंपरिक उपाय या टोटके लोकमान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें किसी समस्या के निश्चित समाधान, भविष्यवाणी या चमत्कारिक परिणाम की गारंटी न समझें। इन उपायों को करने या न करने का निर्णय पाठक अपनी आस्था, विवेक और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं लें।

किसी भी स्वास्थ्य, आर्थिक, कानूनी या व्यक्तिगत समस्या के समाधान के लिए केवल धार्मिक उपायों पर निर्भर न रहें और आवश्यकता होने पर योग्य विशेषज्ञ की सलाह लें। अलग-अलग पंचांग, स्थान और गणना पद्धति के कारण तिथि, सूर्य प्रवेश तथा योगों के समय में अंतर संभव है। इसलिए पूजा या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्थानीय विद्वान या मान्य पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित है।

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