सप्तमी तिथि 2026: के मध्य रात्रि में होगी निशा सह सन्धि पूजा f

सप्तमी तिथि 2026: के मध्य रात्रि में होगी निशा सह सन्धि पूजा


शारदीय नवरात्रि 2026 में मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी और प्रस्थान करेगी डोली पर। सप्तमी तिथि की रात कालरात्रि कि पूजा होगी।

*शारदीय नवरात्र 2006: 17 अक्टूबर, शनिवार को महासप्तमी पर आडल, विडाल, रवि योग और तुला संक्रांति का महासंयोग*

सन 2006 की शारदीय दुर्गा पूजा अपने आप में कई ज्योतिषीय संयोगों को समेटे हुए थी। 17 अक्टूबर 2006, दिन शनिवार को जब माँ दुर्गा के महासप्तमी पूजन का विधान था, उसी दिन पंचांग में एक साथ कई विशेष योगों का निर्माण हो रहा था।

इस दिन आडल योग, विडाल योग और अत्यंत शुभ माना जाने वाला रवि योग एक साथ बन रहे थे। आमतौर पर आडल और विडाल योग को अशुभ श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन महासप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की उपासना और नव पत्रिका प्रवेश के कारण इन योगों का प्रभाव शून्य माना गया था। वहीं दूसरी ओर रवि योग ने इस दिन को सभी शुभ कार्यों के लिए सिद्ध बना दिया था।

इसी दिन सूर्य का तुला राशि में प्रवेश यानी तुला संक्रांति भी थी। शास्त्रों में तुला संक्रांति को दान-पुण्य और पितृ कार्यों के लिए विशेष माना जाता है। महासप्तमी और संक्रांति का यह अद्भुत मिलन 2006 की दुर्गा पूजा को और भी अधिक ऐतिहासिक बनाता है। आइए, इस पुराने पंचांग की इस दुर्लभ जानकारी को विस्तार से जानते हैं।

महासप्तमी पर मां दुर्गा के *सातवें स्वरूप मां कालरात्रि* की पूजा होती है, लेकिन मुख्य आयोजन *नव पत्रिका पूजा* का होता है।

महासप्तमी को ही मां दुर्गा की प्राण-प्रतिष्ठा का प्रथम दिन माना जाता है। इसी दिन से पंडालों में मां की आंखें खुलती हैं और विधिवत पूजन शुरू होता है।

*पूजा का विधान:*

1. *नव पत्रिका प्रवेश और स्नान:* सुबह ब्रह्म मुहूर्त में केले के पत्ते सहित 9 पौधों - केला, कच्वी, हल्दी, जयन्ती, बेल, दाड़िम, अशोक, मानक और धान को एक साथ बांधकर नवपत्रिका बनाई जाती है। इसे नदी या सरोवर में स्नान करवाकर, लाल साड़ी पहनाकर गणेश जी के दाहिनी ओर स्थापित किया जाता है। इसे ही कोलाबौ के नाम से भी जाना जाता है और इसे माँ दुर्गा के रूप में ही पूजा जाता है।

2. *प्राण प्रतिष्ठा और महास्नान:* इसके बाद मां दुर्गा की मूर्ति का महास्नान होता है। दर्पण में माँ के प्रतिबिंब को दिखाकर स्नान कराने की परंपरा है, जिसे आत्म स्नान कहते हैं।

3. *षोडशोपचार पूजा:* प्राण प्रतिष्ठा के बाद 16 प्रकार से - आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, पुष्प, सिंदूर खेला और आरती के साथ माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है।

*पूजा का समय:*

महासप्तमी की पूजा हमेशा सुबह में ही होती है। नव पत्रिका स्नान का शुभ मुहूर्त सूर्योदय के साथ ही शुरू हो जाता है, जो लगभग *सुबह 07:10 बजे से 08:36 बजे* के बीच संपन्न किया जाता है। मुख्य षोडशोपचार पूजा और पुष्पांजलि *सुबह 11:30 बजे से दोपहर 02:51 बजे* तक होती है। इस दौरान चर मुहूर्त, लाभ मुहूर्त, अमृत मुहूर्त और अभिजीत मुहूर्त 11:07 बजे से लेकर 11:57 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार सप्तमी तिथि पर दोपहर तक पूजा समाप्त करना उत्तम माना जाता है।

महासप्तमी की पुष्पांजलि अमृत योग में करें

शारदीय दुर्गा पूजा के दौरान महासप्तमी, महाअष्टमी और महा नवमी को मां को पुष्पांजलि दी जाती है। पुष्पांजलि शुभ मुहूर्त में हो इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है। महासप्तमी तिथि को मां कालरात्रि की पुष्पांजलि शुभ मुहूर्त में, जो सुबह 07:10 से लेकर 08:36 तक रहेगा। इस दौरान पुष्पांजलि करना काफी शुभ रहेगा और फलदाई होगा। 

भूलकर भी ना करें इस समय पुष्पांजलि

महा सप्तम के दिन भूल कर भी राहुकाल, यम घंट काल और गुलिक काल में पुष्पांजलि नहीं करनी चाहिए। महासप्तमी के दिन सुबह 05:43 से लेकर 07:18 तक गुलिक काल रहेगा। उसी प्रकार सुबह 08:36 से लेकर 10:03 तक राहुकाल और यमघंट काल दोपहर 12:57 से लेकर 02:24 तक रहेगा। इस दौरान पुष्पांजलि करना वर्जित है। लोगों को उचित समय पर ही मां को पुष्पांजलि करनी चाहिए।


*शारदीय दुर्गा पूजा 2006: 17 अक्टूबर के योगों का शास्त्रीय महत्व*

शास्त्रों में पंचांग के 05 अंगों में योग का विशेष स्थान है। 17 अक्टूबर 2006, शनिवार को महासप्तमी पर बने 3 योगों का फल इस प्रकार है -

*01. आडल योग:* ज्योतिष शास्त्र में यह अशुभ योगों की श्रेणी में आता है। जब किसी वार और नक्षत्र की युति अशुभ होती है तब आडल योग बनता है। इसमें किया गया नया कार्य, यात्रा या मांगलिक कार्य में बाधा आती है। लेकिन देवी पूजन के दिन माँ की आराधना से इसका अशुभ प्रभाव नष्ट हो जाता है।

*02. विडाल योग:* विडाल का अर्थ है बिल्ली। इस योग में भी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। कहा जाता है इस योग में किया गया कार्य अस्थिर रहता है, जैसे बिल्ली कभी स्थिर नहीं बैठती। शास्त्रों में इसे भी त्याज्य योग कहा गया है।

*03. रवि योग:* यह तीनों में सबसे शुभ और शक्तिशाली योग है। शास्त्रों में कहा गया है - _रवि योगे शुभं सर्वम्_ अर्थात रवि योग में किया गया हर कार्य शुभ होता है। सूर्य के प्रभाव से बना यह योग सभी अशुभ योगों, कुयोगों और दोषों को नष्ट कर देता है। इसलिए महासप्तमी पर आडल और विडाल योग होने के बाद भी रवि योग के कारण पूरा दिन सिद्ध माना गया था।

*तुला संक्रांति:* इस दिन सूर्य कन्या से तुला राशि में प्रवेश करते हैं। इसे विषुव संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन दिन-रात बराबर होते हैं। तुला संक्रांति पर दान, स्नान और पितृ तर्पण का विशेष महत्व है। महासप्तमी के साथ इसका संयोग इस दिन को दान और साधना के लिए और भी पुण्य दायी बना रहा था।

*अस्वीकरण / Disclaimer:*

इस ब्लॉग/लेख में दी गई समस्त जानकारी वर्ष 2006 के शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा से संबंधित पुराने पंचांगों, ज्योतिषीय ग्रंथों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कैलेंडर डेटा पर आधारित है। यहां उल्लिखित 17 अक्टूबर 2006, शनिवार को महासप्तमी, आडल योग, विडाल योग, रवि योग और तुला संक्रांति की गणना का उद्देश्य केवल जानकारी, स्मृति और शैक्षणिक अभिलेख के लिए है।

हम यह दावा नहीं करते कि यहां दी गई तिथि, योग, नक्षत्र या मुहूर्त की जानकारी शत-प्रतिशत त्रुटिहीन है। पंचांगों में स्थान, अयनांश और गणना पद्धति के भेद से कुछ मिनटों या घंटों का अंतर संभव है। इसलिए इस जानकारी को किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, व्रत या नए शुभ कार्य का आधार न बनाएं।

यह लेख किसी भी प्रकार की ज्योतिषीय सलाह, भविष्यवाणी या अंधविश्वास को बढ़ावा देने के लिए नहीं है। किसी भी पूजा-पद्धति, मुहूर्त या संक्रांति संबंधी निर्णय के लिए कृपया अपने स्थानीय विद्वान पंडित, पुरोहित या विश्वसनीय पंचांग से पुष्टि अवश्य कर लें।

इस लेख के उपयोग से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष निर्णय के लिए लेखक या वेबसाइट की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक ऐतिहासिक ज्योतिषीय दस्तावेज के रूप में देखें।

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