14 या 15 जनवरी 2028 को है मकर संक्रांति: जानें पूजा विधि, मंत्र, महत्व और वैज्ञानिक कारण

>मकर संक्रांति 2028: सूर्य उपासना, तिल-गुड़ दान और पतंगबाजी का उत्सव<

कैप्शन:"मकर संक्रांति 2028 के विशेष अवसर पर सूर्य देव को अर्घ्य, तिल-गुड़ के पारंपरिक व्यंजन, दान का महत्व और पतंगबाजी के सुंदर दृश्यों का संग्रह।"

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नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*उत्तरायण 2028

*मकर संक्रांति कब है

*संक्रांति पर स्नान का महत्व

*तिल के लड्डू बनाने की विधि

*मकर संक्रांति टोटके

*खिचड़ी पर्व 2028

मकर संक्रांति 2028: सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व, जानें पूजा विधि, महत्व और स्वादिष्ट व्यंजन

भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व न केवल फसल कटाई की खुशी का प्रतीक है, बल्कि यह सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश का भी प्रतीक है, जिसे उत्तरायण काल कहा जाता है। 14 या 15 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है। इस वर्ष मकर संक्रांति 15 जनवरी 2028 दिन शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और सूर्य देव की उपासना का विधान है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना और आपसी प्रेम व सौहार्द बढ़ाने की सीख देता है। आइए, मकर संक्रांति 2028 पर किए जाने वाले विशेष कार्यों, पारंपरिक व्यंजनों और पूजा विधियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

अब जानें क्यों मनाया जाएगा 15 जनवरी को मकर संक्रांति 

मकर संक्रांति उसे दिन मनाया जाता है जब सूर्य धनु राशि से निकालकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। 14 जनवरी देर रात 03:26 बजे पर भगवान सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे इसलिए मकर-संक्रांति 15 जनवरी 2028 दिन शनिवार को मनाया जाएगा। 

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स्नान, दान और पूजन करने का शुभ मुहूर्त

15 जनवरी को सुबह 04:45 बजे से लेकर 05:36 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त है। उसी प्रकार सुबह 07:50 बजे से लेकर 09:11 बजे तक शुभ मुहूर्त है और दिन के 11:33 बजे से लेकर 12:28 बजे तक अभिजीत मुहूर्त है। इस दौरान आप सभी धार्मिक कार्य संपन्न कर सकते हैं।

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर कौन से विशेष कार्य करने चाहिए?

मकर संक्रांति के पवित्र अवसर पर सूर्योदय से पूर्व उठना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, जो साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए सर्वोत्तम समय है।

सूर्योदय से पहले उठकर सबसे पहले स्नान करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस समय पवित्र नदियों में स्नान करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। यदि संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें, अन्यथा घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान के बाद साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 

इसके बाद घर के मंदिर में दीपक जलाकर भगवान सूर्य और पितरों का स्मरण करें। सूर्योदय होने पर अर्घ्य देने की तैयारी करें। साथ ही, इस दिन किए गए दान-पुण्य का विशेष महत्व है, इसलिए मन ही मन दान का संकल्प लें। सुबह के समय मीठे वचन बोलें और किसी से वाद-विवाद न करें, इससे दिन की शुरुआत सकारात्मक होती है।

मकर संक्रांति के अवसर पर घर में कौन से विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं और उनका महत्व क्या है?

मकर संक्रांति का पर्व स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजनों के लिए भी जाना जाता है। इन व्यंजनों में मुख्य रूप से तिल और गुड़ का प्रयोग किया जाता है, जो न केवल स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि सेहत के लिए भी लाभदायक हैं।

सबसे प्रमुख व्यंजन है तिल के लड्डू। ये गुड़ या चीनी के साथ तिल को मिलाकर बनाए जाते हैं। इसके अलावा, गजक भी बहु प्रचलित है, जो मूंगफली और तिल से बनता है। महाराष्ट्र में तिल-गुल यानी तिल के लड्डू खाने और बांटने की परंपरा है, जिसके साथ "गोड गोड बोला" (तिल-गुल खाओ और मीठा-मीठा बोलो) कहा जाता है। दक्षिण भारत में पोंगल नामक मीठा व्यंजन बनाया जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में खिचड़ी का विशेष महत्व है, जिसे दाल और चावल के साथ सब्जियां मिलाकर बनाया जाता है। इन व्यंजनों का महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सर्दियों में शरीर को गर्म रखने और नई फसल के आने की खुशी को साझा करने का भी प्रतीक हैं।

मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का महत्व क्या है और इसका उपयोग कैसे किया जाता है?

मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का अत्यधिक धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। इन दोनों का संयोग मधुरता, स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

तिल को पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। यह सर्दियों में शरीर को गर्माहट प्रदान करता है और कई बीमारियों से बचाता है। वहीं, गुड़ मिठास और सौहार्द का प्रतीक है। यह भी शरीर के लिए गर्म होता है और खून को साफ करने में सहायक है। इस दिन तिल और गुड़ का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है।

*01. भोजन में: तिल और गुड़ से लड्डू, तिलकुट, गजक, पंजीरी जैसे पकवान बनाकर खाए जाते हैं और आपस में बांटे जाते हैं।

*02. दान में: काले तिल और गुड़ का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

*03. स्नान में: ऐसा भी विधान है कि स्नान करते समय पानी में तिल मिलाए जाते हैं। स्नान के बाद शरीर पर तिल का लेप भी लगाया जाता है।

*04. मकर संक्रांति के अवसर पर घर में दीपक जलाने का क्या महत्व है और इसे कैसे किया जाता है?

मकर संक्रांति के दिन दीपक जलाने का विशेष महत्व है। यह अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सूर्य देव के उत्तरायण होने पर प्रकाश का पर्व मनाने की यह एक अनूठी परंपरा है।

इस दिन दीपक जलाने की विधि इस प्रकार है:

सुबह स्नान के बाद या शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर, मंदिर में और तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना चाहिए। दीपक के लिए शुद्ध घी या तिल के तेल का प्रयोग शुभ माना जाता है। तिल के तेल का दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है। दीपक जलाते समय सूर्य देव और अपने कुल देवता का स्मरण करें। माना जाता है कि इस दिन जलाया गया दीपक पितरों का आशीर्वाद भी दिलाता है। शाम को जलाया गया दीपक घर में लक्ष्मी जी का स्वागत करता है और समृद्धि लाता है। प्रयास करें कि दीपक पूर्व या उत्तर दिशा में जलाया जाए।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा कैसे की जाती है? (स्टेप बाय स्टेप)

मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है। उन्हें समर्पित यह दिन ऊर्जा, आरोग्य और समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है। आइए जानते हैं स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि:

स्टेप *01: तैयारी - सूर्योदय से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा की सामग्री में जल से भरा तांबे का लोटा, लाल फूल, अक्षत (चावल), रोली, तिल, गुड़, फल और एक दीपक शामिल करें।

स्टेप *02: अर्घ्य देना- सूर्योदय के समय किसी साफ स्थान पर खड़े होकर लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत और थोड़ा सा तिल डालें। सूर्य देव की ओर मुख करके उन्हें जल अर्पित करें।

स्टेप *03: मंत्र जाप- अर्घ्य देते समय निम्न मंत्रों का जाप करें:

    * मूल मंत्र:ॐ सूर्याय नमः।

    * प्रसिद्ध मंत्र:ॐ घृणि सूर्याय नमः।

    * गायत्री मंत्र:ॐ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात्॥

स्टेप *04: पूजा और प्रार्थना- सूर्य देव की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं। उन्हें फल, गुड़ और तिल का भोग लगाएं। अपनी मनोकामना और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। अंत में परिक्रमा करके क्षमा याचना करें।

मकर संक्रांति के दिन क्या करें और क्या न करें 

क्या करें: मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्य देव को जल अर्पित करें और तिल-गुड़ का दान करें। गंगा स्नान, जप-तप, पूजा और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन सकारात्मक सोच रखें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

न करें: क्रोध, झूठ, नकारात्मक विचार, विवाद और अपशब्दों से दूर रहें। नशीले पदार्थों का सेवन न करें और किसी का अपमान न करें। तामसिक भोजन और आलस्य से बचें। यह दिन पुण्य कर्म और आत्मशुद्धि के लिए होता है।

मकर संक्रांति के दिन क्या खाएं और क्या न खाएं 

क्या खाएं: इस दिन तिल और गुड़ से बने लड्डू, तिलकुट, खिचड़ी, चूड़ा-दही, गजक, रेवड़ी, मूंगफली और सत्तू का सेवन शुभ माना जाता है। ये शरीर को गर्म रखते हैं और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं।

न खाएं: मांसाहार, शराब, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन से बचें। बासी भोजन और अधिक तैलीय चीजों का सेवन न करें। इस दिन सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए, जिससे शरीर और मन दोनों शुद्ध रहें और धार्मिक महत्व भी बना रहे।

मकर संक्रांति के अवसर पर घर में पौधों की पूजा का क्या महत्व है और इसे कैसे किया जाता है?

मकर संक्रांति प्रकृति से जुड़ाव का पर्व है। यह फसलों के पकने और नए ऋतु चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन पौधों, विशेषकर तुलसी और पीपल की पूजा का विशेष महत्व है, जो प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता दर्शाता है। इसे पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी माना जाता है।

इस दिन पौधों की पूजा की विधि बहुत सरल है:

सबसे पहले सुबह स्नान के बाद घर के आंगन या गमले में लगे तुलसी के पौधे के पास जाएं। तुलसी के पौधे को साफ पानी से नहलाएं और उसकी मिट्टी को साफ करें। इसके बाद तुलसी के पौधे पर हल्दी, कुमकुम और अक्षत (चावल) लगाएं। उसे लाल या पीली चुनरी अर्पित करें। तुलसी के पास एक मिट्टी का दीपक जलाएं। पीपल के पेड़ की भी इसी तरह पूजा की जाती है और उसमें जल चढ़ाया जाता है। पूजा करते समय प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें। ऐसा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

मकर संक्रांति के दिन काले तिल और गुड़ का दान करने का क्या महत्व है और इसे कैसे किया जाता है?

मकर संक्रांति के दिन दान का अत्यधिक महत्व है, और इसमें भी काले तिल और गुड़ का दान सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान पुण्य फल प्रदान करता है और पितरों को तृप्त करता है।

महत्व:

काले तिल को पवित्रता और नकारात्मकता को दूर करने वाला माना गया है, जबकि गुड़ मिठास और सौभाग्य का प्रतीक है। इनके दान से ग्रह दोष, विशेषकर पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। साथ ही, यह जीवन में सुख, समृद्धि और मधुरता लाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी सर्दी के दिनों में तिल और गुड़ का दान गरीबों और जरूरतमंदों के लिए पोषण का स्रोत बनता है।

दान की विधि:

दान हमेशा स्नान-ध्यान करने के बाद शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। काले तिल और गुड़ को किसी कपड़े या बर्तन में रखकर, किसी ब्राह्मण, गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। दान करते समय यह संकल्प लें कि यह दान सूर्य देव और पितरों की प्रसन्नता के लिए किया जा रहा है। ऐसा कहा जाता है कि तिल और गुड़ के साथ किसी लाल या पीले वस्त्र का दान भी अति शुभ फलदायी होता है। दान के बाद व्यक्ति को मीठे वचन बोलने चाहिए।

ब्लॉग से संबंधित विभिन्न पहलुओं की विवेचना

मकर संक्रांति: एक बहुआयामी पर्व (वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य)

वैज्ञानिक पहलू: मकर संक्रांति के दिन से सूर्य का उत्तरायण होना खगोलीय परिवर्तन है, जिससे दिन बड़े और गर्म होने लगते हैं। तिल और गुड़ का सेवन वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है। सर्दियों में तिल शरीर को गर्माहट प्रदान करता है और गुड़ खून को साफ कर ऊर्जा देता है, जो इस मौसम में आवश्यक है।

सामाजिक पहलू: यह पर्व सामाजिक समरसता का प्रतीक है। लोग तिल-गुड़ बांटकर मधुर वचन बोलते हैं, पुरानी कटुताएं भुलाकर गले मिलते हैं। पतंगबाजी का आयोजन सामूहिक उत्साह और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनता है, जो समाज को जोड़ता है।

आध्यात्मिक एवं धार्मिक पहलू: सूर्य देव की उपासना आत्मा के प्रकाश का प्रतीक है। उत्तरायण काल को देवताओं का दिन माना गया है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य का विधान है, जो आत्मा को शुद्ध कर पुण्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

आर्थिक पहलू: यह नई फसल (रबी) के आगमन का पर्व है। किसान अपनी उपज से समृद्ध होते हैं और बाजार में तिल, गुड़, मूंगफली, नई दालों की मांग बढ़ती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।

ब्लॉग से संबंधित अनसुलझे पहलू

मकर संक्रांति का पर्व भले ही सदियों से मनाया जा रहा है, लेकिन इसके कुछ ऐसे पहलू हैं जो आज भी रहस्य या भिन्नता लिए हुए हैं:

1. तारीख का रहस्य: अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी को ही क्यों मनाई जाती है? जबकि अन्य त्योहार चंद्रमा पर निर्भर होकर प्रतिवर्ष बदलते हैं, यह सूर्य पर आधारित होने के कारण लगभग स्थिर है, लेकिन लीप ईयर के कारण कभी-कभी एक दिन का अंतर आ जाता है।

2. पतंगबाजी का अटूट संबंध: पतंगबाजी का इस पर्व से इतना गहरा संबंध कैसे बन गया? इसका कोई स्पष्ट धार्मिक प्रमाण नहीं है। माना जाता है कि सर्दियों की खुली धूप में सेहत के लिए यह एक अच्छी गतिविधि थी, जो धीरे-धीरे परंपरा का हिस्सा बन गई।

3. भिन्न-भिन्न नाम और रीति-रिवाज: इस एक पर्व को पूरे भारत में अलग-अलग नामों (पोंगल, उत्तरायण, लोहड़ी, भोगाली बिहू) से मनाने की परंपरा है। हर राज्य की विधि अलग है, लेकिन मूल भावना सूर्य और नई फसल को समर्पित है - यह विविधता में एकता का अनूठा उदाहरण है।

पांच यूनिक प्रश्न और उत्तर

प्रश्न 1: मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान का इतना महत्व क्यों है?

उत्तर:मकर संक्रांति पर स्नान का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक भी है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जिससे पानी में रासायनिक बदलाव आते हैं, जिससे वह शुद्ध और औषधीय गुणों से भर जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह आत्म-शुद्धि का प्रतीक है और नई ऊर्जा के साथ जीवन की शुरुआत करने का अवसर प्रदान करता है।

प्रश्न 2: महिलाएं मकर संक्रांति पर हल्दी-कुमकुम कार्यक्रम क्यों आयोजित करती हैं?

उत्तर:मकर संक्रांति पर हल्दी-कुमकुम का आयोजन सामाजिक समरसता और सुहाग की लंबी आयु का प्रतीक है। यह आयोजन विवाहित महिलाओं के लिए विशेष होता है, जिसमें वे एक-दूसरे को हल्दी-कुमकुम लगाकर, तिल-गुड़ और वस्त्र देकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। यह परंपरा आपसी प्रेम और भाईचारे को मजबूत बनाती है और महिलाओं को एक मंच प्रदान करती है।

प्रश्न 3: क्या मकर संक्रांति केवल सनातनियों का त्योहार है?

उत्तर:मकर संक्रांति मूल रूप से एक कृषि-आधारित त्योहार है, इसलिए इसका दायरा केवल सनातन धर्म तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति पूजा और फसल उत्सव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों और रीति-रिवाजों से मनाया जाता है। सिख समुदाय इसे माघी के रूप में मनाता है। यह त्योहार सभी को सूर्य की ऊर्जा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है।

प्रश्न 4: मकर संक्रांति पर काले तिल का दान करना अधिक शुभ क्यों माना जाता है?

उत्तर: सनातन धर्म में काले तिल को पितरों से जोड़कर देखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि काले तिल में पितरों को तृप्त करने की शक्ति होती है। मकर संक्रांति पर काले तिल का दान करने से पितृ दोष समाप्त होता है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही, काले तिल नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने वाले माने जाते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी सर्दियों में काले तिल का सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है।

प्रश्न 5: मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने का क्या महत्व है?

उत्तर:खिचड़ी को संतुलित और सुपाच्य भोजन माना जाता है। मकर संक्रांति के बाद से मौसम में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है, ऐसे में हल्का भोजन जैसे खिचड़ी पचने में आसान होता है और शरीर को नई ऋतु के लिए तैयार करता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन दाल-चावल के मिश्रण से बनी खिचड़ी का दान करना बहुत पुण्य दायी होता है। उत्तर भारत में तो इसे "खिचड़ी पर्व" भी कहा जाता है।

तीन रोचक टोटके

1. ग्रह शांति हेतु टोटका:

मकर संक्रांति के दिन सुबह स्नान के बाद काले तिल को लाल कपड़े में बांधकर मुख्य द्वार पर लटका दें। ऐसा माना जाता है कि इससे शनि और राहु-केतु के दोष समाप्त होते हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है।

2. धन प्राप्ति का सरल उपाय:

इस दिन गुड़ और चने की दाल को एक साथ मिलाकर किसी गरीब व्यक्ति को दान करें। इस टोटके से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और आर्थिक तंगी दूर होती है। दान करते समय मन ही मन सुख-समृद्धि की कामना करें।

3. वैवाहिक बाधा दूर करने का टोटका:

यदि कुंडली में विवाह में बाधा हो तो मकर संक्रांति के दिन 11 ब्राह्मणों या कुंवारी कन्याओं को तिल, गुड़ और पीले वस्त्र का दान करें। साथ ही, घर के मंदिर में सूर्य देव को तिल का लड्डू अर्पित करें। ऐसा करने से वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

यह ब्लॉग (मकर संक्रांति 2028) केवल सूचनात्मक और धार्मिक/सांस्कृतिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई सभी पूजा विधियां, मंत्र, टोटके, परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं विभिन्न ग्रंथों, मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित हैं। इस ब्लॉग का उद्देश्य किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति की भावनाओं को आहत पहुंचाना नहीं है। टोटके और उपाय वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं, ये लोक मान्यताओं पर आधारित हैं; कृपया इन्हें आस्था और विवेक से अपनाएं। किसी भी प्रकार की धार्मिक अनुष्ठान या व्रत-पूजा को करने से पहले अपने स्थानीय पंडित या जानकार व्यक्ति की सलाह अवश्य लें। हमारी वेबसाइट या लेखक द्वारा दी गई जानकारी के उपयोग से होने वाली किसी भी हानि या परिणाम के लिए हम उत्तरदायी नहीं हैं।


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