धनतेरस क्यों मनाते हैं? जानें धन्वंतरि पूजा की सही विधि, यम दीपदान का महत्व, सोना-बर्तन खरीदने का शुभ समय और धनिया-झाड़ू का रहस्य। धनतेरस की संपूर्ण जानकारी पढ़ें हिंदी में।
नीचे दिए गए विषयों विस्तृत जानकारी रंजीत के ब्लॉग पर पढ़ें
*धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन सोना, चांदी और बर्तन खरीदने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन यमराज के लिए दीपक जलाने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन कौन-कौन से अनुष्ठान किए जाते हैं और उनका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन खरीदारी करने के लिए सबसे शुभ समय कब है और क्यों?
*धनतेरस के दिन घर में कौन-कौन सी चीजें नहीं लानी चाहिए और क्यों?
*धनतेरस के दिन भगवान कुबेर की पूजा क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन धनिया और नमक खरीदने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन झाड़ू खरीदने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व है?
*धनतेरस के दिन इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व है?
*ब्लॉग से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं को जानें?
*ब्लॉग से संबंधित अनसुलझे पहलुओ क्या है ?
*ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उसका उतर जाने?
धनतेरस: दीपावली की पहली पूजा का पूरा ज्ञान, महत्व और विधि
धनतेरस: क्यों मनाई जाती है यह त्यौहार की पहली शाम?
धनतेरस, दीपावली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक, केवल खरीदारी का दिन नहीं बल्कि आरोग्य और समृद्धि का आधार है। यह दिन कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है, जो "धन" (संपत्ति) और "तेरस" (तेरहवें दिन) का मेल है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस दिन सोना खरीदने के साथ-साथ भगवान धन्वंतरि और यमराज की पूजा क्यों की जाती है? यह त्योहार स्वास्थ्य, धन और दीर्घायु के त्रिविणी संगम का प्रतीक है। इस ब्लॉग में, हम आपको धनतेरस की प्राचीन पौराणिक कथाओं, हर प्रथा के पीछे छिपे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व, सही पूजन विधि और शुभ समय के बारे में विस्तार से बताएंगे। जानिए क्यों इस दिन धनिया-झाड़ू खरीदना भी उतना ही जरूरी माना जाता है जितना सोना।
*01. धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा क्यों की जाती है? पौराणिक कथा सहित
धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा का सीधा संबंध आरोग्य और दीर्घायु की कामना से है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के प्रवर्तक और देवताओं के वैद्य हैं। समुद्र मंथन की प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन ही भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए। उनके हाथों में शंख, चक्र, जलूका (जोंक) और औषधि से भरा कलश था। इसलिए, इस दिन को "धन्वंतरि जयंती" के रूप में मनाया जाता है।
इनकी पूजा का महत्व अतुल्य है। यह माना जाता है कि धनतेरस पर धन्वंतरि की आराधना करने से घर-परिवार में बीमारियों का नाश होता है, स्वास्थ्य लाभ मिलता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। असली "धन" यानी स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए इनकी पूजा की जाती है, क्योंकि बिना स्वास्थ्य के सभी सांसारिक संपत्ति निरर्थक है। इसीलिए इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र की पूजा करने का विधान है।
*02. धनतेरस पर सोना, चांदी और बर्तन खरीदने की प्रथा क्यों है?
धनतेरस पर सोना, चांदी या नए बर्तन खरीदना केवल एक रीति नहीं, बल्कि शुभता, समृद्धि और नए प्रारंभ का प्रतीक है। यह प्रथा अत्यंत प्राचीन है और इसके पीछे कई मान्यताएं हैं। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी भी प्रकट हुई थीं, इसलिए धातु (विशेषकर चांदी) खरीदने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं और घर में स्थिर रहती हैं। दूसरी कथा के अनुसार, राजा हिमा के 16 वर्षीय पुत्र की पत्नी ने इसी दिन अपने द्वार पर धन और सोने-चांदी के आभूषण रखकर दीप जलाए थे, जिससे यमदूतों की आंखें चौंधिया गईं और वे प्रवेश नहीं कर पाए। इससे पति की जान बच गई। इस घटना के बाद से धन और धातु खरीदने की परंपरा शुरू हुई।
व्यावहारिक दृष्टि से, यह प्रथा अर्थव्यवस्था को गति देती है और घर में कीमती संपत्ति के संचय को बढ़ावा देती है। नए बर्तन खरीदने का अर्थ है पुरानी बुराइयों और नकारात्मकता को दूर कर नएपन का स्वागत करना।
*03. धनतेरस पर यमराज के लिए दीपक क्यों जलाते हैं?
धनतेरस की शाम को "यम दीपदान" की प्रथा का सीधा संबंध अकाल मृत्यु से रक्षा और दीर्घायु की कामना से है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिमा के पुत्र की कुंडली में उसके विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। इससे बचने के लिए उसकी विवेकशील पत्नी ने विवाह के बाद पहली धनतेरस की रात्रि को घर के मुख्य द्वार पर सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण बिछा दिए और पूरी रात दीप जलाकर गाथाएं गाती रही। जब यमदूत सर्प का रूप धारण करके आए, तो दीपक के तेज प्रकाश और चमकती धातुओं से उनकी आंखें चौंधिया गईं। वे कुछ देर वहीं बैठकर गाथा सुनते रहे और फिर बिना कुछ किए लौट गए। तभी से इस दिन यमराज के निमित्त दक्षिण दिशा की ओर मुख करके घर के बाहर दीप जलाने की परंपरा चली आ रही है, ताकि परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु से बचाया जा सके।
*04. धनतेरस के दिन कौन-से अनुष्ठान किए जाते हैं? महत्व और विधि
धनतेरस के दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठानों में शामिल हैं:
*01. धन्वंतरि पूजा: सुबह स्नान के बाद घर के मंदिर में या पूजा स्थल पर भगवान धन्वंतरि की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। उन्हें जल, फूल, अक्षत, धूप-दीप अर्पित करें। स्वास्थ्य की कामना करते हुए आरती करें।
*02. लक्ष्मी-गणेश पूजा: संध्या समय लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। इन्हें सिंदूर, फूल चढ़ाएं और मिठाई का भोग लगाएं। इससे घर में धन-वर्षा का आशीर्वाद मिलता है।
*03. यम दीपदान: रात्रि में एक दीपक घी या तेल से भरकर तिल या सरसों के तेल से जलाएं। इसे एक पूजा थाली में रखकर घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर रखें। इस दीपक को रात भर जलने दें।
*04. खरीदारी: नए बर्तन, सोना-चांदी या कोई भी शुभ वस्तु खरीदना इस दिन का महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है।
*05. धनतेरस पर खरीदारी का सबसे शुभ समय कब है?
धनतेरस पर खरीदारी के लिए सबसे शुभ समय "प्रदोष काल" माना जाता है। यह समय सूर्यास्त के बाद लगभग 1 घंटा 36 मिनट (दो मुहूर्त) तक रहता है। इसी दौरान "अमृत सिद्धि योग" और "रवि योग" जैसे शुभ योग भी बनते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस काल में की गई खरीदारी घर में स्थिर लक्ष्मी को आमंत्रित करती है और खरीदी गई वस्तुएं लंबे समय तक टिकती हैं। यदि प्रदोष काल संभव न हो, तो दिन के "अभिजित मुहूर्त" (लगभग दोपहर 11:40 से 12:30 बजे तक) में भी खरीदारी की जा सकती है।
*06. धनतेरस के दिन कौन-सी चीजें नहीं लानी चाहिए?
धनतेरस के दिन कुछ चीजें घर लाना अशुभ माना जाता है, क्योंकि इन्हें नकारात्मकता, दरिद्रता या अशांति का प्रतीक माना गया है:
*लोहा (Iron): लोहा या स्टील के बर्तन/सामान इस दिन खरीदने से बचना चाहिए, क्योंकि इसे युद्ध और कलह का प्रतीक माना जाता है।
*प्लास्टिक के बर्तन: प्लास्टिक को अस्थायी और निम्न गुणवत्ता का माना जाता है, इसलिए इस दिन शुभता के लिए धातु के बर्तन ही खरीदें।
*कांच के टूटे हुए या दरार वाले बर्तन: यह टूटन और अशुभता का संकेत देते हैं।
*रुखी-सूखी या कांटेदार वस्तुएं: जैसे सूखे फूल, कांटेदार पौधे (बिना पत्तों वाला कैक्टस) आदि। इन्हें नकारात्मक ऊर्जा का वाहक माना जाता है।
*काला या नीला रंग का सामान: इन रंगों को शोक और दुःख से जोड़ा जाता है, इसलिए इनसे बचना चाहिए।
· उपयोग में लिया हुआ पुराना सामान: इस दिन हमेशा नई और चमकदार चीजें ही खरीदनी चाहिए।
*07. धनतेरस के दिन भगवान कुबेर की पूजा क्यों की जाती है? महत्व और विधि
भगवान कुबेर को धन का कोषाध्यक्ष और उत्तर दिशा का स्वामी माना जाता है। धनतेरस पर इनकी पूजा का उद्देश्य है कि घर में आया धन सुरक्षित रहे, बचत हो और धन का सदुपयोग हो। कुबेर और लक्ष्मी जी की संयुक्त पूजा से धन की प्राप्ति और संचय दोनों सुनिश्चित होते हैं।
संपूर्ण पूजन विधि:
*01. सबसे पहले पूजा स्थल को स्वच्छ कर लें।
*02. लाल कपड़ा बिछाकर उस पर कुबेर जी की मूर्ति या यंत्र स्थापित करें। इनके साथ लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्ति भी रख सकते हैं।
*03. सबसे पहले गणेश जी, फिर लक्ष्मी जी और अंत में कुबेर जी की पूजा करें।
*04. कुबेर जी को हल्दी, चंदन, केसर, सफेद फूल, अक्षत अर्पित करें।
*05. इन्हें खील-बताशे (मीठी चीजें) का भोग लगाएं।
*06. धूप-दीप दिखाकर "ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्य अधिपतये धनधान्य समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा" मंत्र का जाप करें।
*07. अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें।
*08. धनतेरस पर धनिया, झाड़ू और नमक खरीदने की प्रथा क्यों है?
धनतेरस पर धनिया के बीज, नई झाड़ू और नमक खरीदने की प्रथा बहुत ही रोचक और व्यावहारिक है। यह प्रथा मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित है और इसके पीछे गहरी सांस्कृतिक मान्यताएं हैं।
*धनिया (धन्य): धनिया को "धन्य" कहा जाता है, जिसका अर्थ है शुभ और धनवान। इसे खरीदना घर में समृद्धि (धन) को आमंत्रित करने का प्रतीक है। इसके बीजों को लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है। कुछ लोग इसे पूजा में भी प्रयोग करते हैं।
*झाड़ू: नई झाड़ू खरीदने का अर्थ है घर से गरीबी और नकारात्मक ऊर्जा को बाहर सफाई से निकाल फेंकना। प्राचीन काल में झाड़ू को लक्ष्मी जी का वाहन भी माना जाता था, इसलिए इसे सम्मानपूर्वक रखा जाता था।
*नमक: नमक हमारे भोजन का एक अनिवार्य अंग है और इसे स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। धनतेरस पर नमक खरीदने का मतलब है कि घर में आया धन और सुख-समृद्धि स्थिर रहे, उसमें कमी न आए।
मान्यता है कि ये वस्तुएं सस्ती और सर्वसुलभ होने के बावजूद बहुत शुभ होती हैं और इन्हें खरीदने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।
*09. धनतेरस पर इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने की प्रथा क्यों है?
धनतेरस पर इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे मोबाइल, फ्रिज, टीवी, वाहन आदि खरीदने की प्रथा एक आधुनिक व्याख्या है जो पारंपरिक "धन" की अवधारणा को आज के युग के अनुरूप ढालती है। पहले धन का अर्थ था सोना-चांदी, जमीन और पशुधन। आज के समय में टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं और तकनीक भी धन और सुविधा का ही एक रूप हैं। इन्हें खरीदने से न केवल जीवन स्तर में सुधार होता है, बल्कि ये लंबे समय तक उपयोग में आने वाली संपत्ति भी होती हैं। दिवाली से पहले की यह खरीदारी बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए, यह प्रथा पारंपरिक मान्यताओं को आधुनिक जरूरतों से जोड़कर चलने का एक बेहतरीन उदाहरण है
ब्लॉग से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलू
धनतेरस की परंपराएं केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक समझ का सुंदर समन्वय हैं।
*वैज्ञानिक पहलू: प्रदोष काल में खरीदारी का समय शाम के ठंडे तापमान और मन की शांति से जुड़ा है। यम दीपदान से कीटों का प्रकाश की ओर आकर्षण होता था, जिससे वे घर में प्रवेश नहीं कर पाते। नए बर्तन खरीदने से पुराने, जीर्ण-शीर्ण बर्तनों का स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से बचाव होता है।
*सामाजिक पहलू: यह त्योहार सामाजिक समरसता लाता है। सभी वर्ग धनिया, झाड़ू जैसी सामान्य वस्तुओं से लेकर सोने तक की खरीदारी में भाग लेते हैं। यह समाज में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर एकता को मजबूत करता है।
*आर्थिक पहलू: धनतेरस दिवाली से पहले बाजारों में उत्सवी माहौल और खरीदारी का सिलसिला शुरू करता है। यह सोने-चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य क्षेत्रों में व्यापार को गति देकर देश की अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुंचाता है, जिससे रोजगार सृजन भी होता है।
*आध्यात्मिक पहलू: आध्यात्मिक दृष्टि से, यह दिन बाहरी धन के साथ-साथ आंतरिक धन (सद्गुण, स्वास्थ्य, ज्ञान) को संचित करने का संदेश देता है। धन्वंतरि पूजा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और यम दीपदान अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
ब्लॉग से संबंधित अनसुलझे पहलू
धनतेरस से जुड़ी कई मान्यताओं के सटीक ऐतिहासिक स्रोत अभी भी शोध के विषय हैं। जैसे:
*01. प्रथाओं का कालक्रम: सोना खरीदने की प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक दस्तावेजी प्रमाण स्पष्ट नहीं है। यह कथा आधारित है या फिर किसी प्राचीन आर्थिक नीति का हिस्सा, यह अनसुलझा है।
*02. क्षेत्रीय विविधताओं का कारण: अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग वस्तुएं (जैसे स्टील के बर्तन कहीं शुभ, कहीं अशुभ) क्यों मानी जाती हैं, इसके पीछे के स्थानीय इतिहास या घटनाओं का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
*03. विशिष्ट संख्याओं का रहस्य: कुछ परिवारों में 13 की संख्या से जुड़े विशेष नियम (जैसे 13 सिक्के, 13 दीपक) होते हैं। इन विशिष्ट संख्याओं के पीछे के गूढ़ गणित या तर्क को स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है।
*04. मनोवैज्ञानिक प्रभाव का अध्ययन: इन रीति-रिवाजों का मानव मनोविज्ञान और सामूहिक व्यवहार पर पड़ने वाले गहरे प्रभाव का व्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययन एक खुला क्षेत्र है।
ब्लॉग से संबंधित प्रश्नोत्तर
*01.प्रश्न: क्या धनतेरस पर केवल सोना-चांदी ही खरीदना जरूरी है? अगर हमारे पास इतना बजट नहीं है तो क्या करें?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। धनतेरस का संदेश यह नहीं है कि महंगी वस्तुएं ही खरीदें। इसका मूल भाव है "नए और उपयोगी की शुरुआत"। यदि बजट सीमित है, तो निम्नलिखित शुभ और सार्थक विकल्प चुन सकते हैं:
*01. पारंपरिक और सस्ते विकल्प: पौराणिक दृष्टि से, इस दिन चांदी के सिक्के या स्टील के बर्तन खरीदना भी अत्यंत शुभ माना गया है, जो सोने से कम खर्चीले होते हैं। नई झाड़ू, धनिया के बीज, नमक जैसी वस्तुएं तो सभी के लिए सुलभ हैं और इनका अपना महत्व है।
*02. उपयोगिता पर ध्यान दें: आप अपनी जरूरत के अनुसार कोई भी नया और टिकाऊ सामान जैसे एक अच्छा खाना पकाने का बर्तन, कपड़े, किताबें या यहां तक कि एक नया पौधा भी खरीद सकते हैं। लक्ष्मी सिर्फ सोने में नहीं, बल्कि ज्ञान, स्वास्थ्य और सुव्यवस्था में भी निवास करती हैं।
*03. प्रतीकात्मक खरीदारी: एक छोटा सा दीपक, मोमबत्ती स्टैंड या पूजा की थाली भी इस दिन खरीदी जा सकती है। यह आपके घर में उजाले और पवित्रता का प्रतीक होगा।
*04. सबसे महत्वपूर्ण: धनतेरस का सबसे बड़ा "धन" है भगवान धन्वंतरि की कृपा यानी अच्छा स्वास्थ्य। इस दिन अपने और परिवार के स्वास्थ्य का वादा करें, किसी जरूरतमंद की मदद करें। यह सबसे बड़ी खरीदारी होगी।
याद रखें, श्रद्धा और सकारात्मक भाव हर चीज से बढ़कर हैं। अपने साधनों के अनुसार शुभ की शुरुआत करना ही वास्तविक पूजा है।
*02. प्रश्न .धन्वंतरि, लक्ष्मीजी और कुबेर भगवान में क्या संबंध है?
उत्तर: धनतेरस पर पूजे जाने वाले ये तीनों देवता समृद्धि के त्रिस्तंभ माने जाते हैं, जिनका एक दूसरे के साथ सुंदर तार्किक संबंध है:
*भगवान धन्वंतरि: ये आरोग्य के देवता हैं। इनका आशीर्वाद सर्वप्रथम "स्वास्थ्य रूपी धन" प्रदान करता है। मान्यता है कि बिना स्वस्थ शरीर और मन के कोई भी सांसारिक धन सार्थक नहीं है। इसलिए, धनतेरस की शुरुआत इनकी पूजा से होती है।
*माता लक्ष्मी: वे धन, समृद्धि, वैभव और सौभाग्य की देवी हैं। स्वास्थ्य के बाद, सुखी जीवन के लिए भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि आवश्यक है। लक्ष्मी जी का आशीर्वाद घर में धन, अन्न और सुख-सामग्री की निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करता है।
*भगवान कुबेर: उन्हें धन के कोषाध्यक्ष या खजांची के रूप में जाना जाता है। केवल धन की प्राप्ति ही काफी नहीं है, उसे सुरक्षित रखना, संचय करना और सदुपयोग करना भी उतना ही जरूरी है। कुबेर की पूजा का भाव यही है कि प्राप्त धन नष्ट न हो, बल्कि सुरक्षित बढ़ता रहे।
*संबंध: इस प्रकार, यह त्रयी हमें "पहला धन स्वास्थ्य, दूसरा धन समृद्धि और तीसरा धन उसकी सुरक्षा" का संदेश देती है। इनकी संयुक्त पूजा से व्यक्ति को पूर्ण समृद्धि (स्वास्थ्य + धन + संचय) का आशीर्वाद मिलता है।
*03.प्रश्न धनतेरस की रात कहां-कहां दिया जलाना चाहिए?
उत्तर: धनतेरस की रात्रि में दीप जलाना अत्यंत शुभ माना गया है। निम्नलिखित स्थानों पर दीपक जलाने की परंपरा है:
*01. यम दीप (सबसे महत्वपूर्ण): घर के मुख्य द्वार के बाहर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक दीपक जलाना चाहिए। इसे तिल या सरसों के तेल से जलाएं और रात भर जलने दें। इसका उद्देश्य यमदूतों को भ्रमित करके परिवार को अकाल मृत्यु से बचाना है।
*02. पूजा स्थल/मंदि8र: घर के मंदिर में भगवान धन्वंतरि, लक्ष्मी-गणेश और कुबेर की पूजा के लिए दीपक जलाएं।
*03. तुलसी का चौरा: तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनी रहती है।
*04. घर का मुख्य प्रवेश द्वार: द्वार के दोनों ओर दीप जलाने से नकारात्मक शक्तियों का प्रवेश रुकता है और लक्ष्मी का आगमन होता है।
*05. खिड़कियां (वैकल्पिक): कुछ परंपराओं में घर की मुख्य खिड़कियों पर भी दीपक रखा जाता है।
*04. प्रश्न:. क्या पीरियड के दौरान धनतेरस की पूजा कर सकती हैं महिलाएं?
उत्तर: यह एक संवेदनशील प्रश्न है, जिसका उत्तर व्यक्तिगत आस्था और परंपरा पर निर्भर करता है। दोनों पक्षों की मान्यताएं इस प्रकार हैं:
*पारंपरिक दृष्टिकोण: शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, मासिक धर्म को एक प्राकृतिक शुद्धिकरण प्रक्रिया माना गया है, जिस दौरान महिलाएं विश्राम की अवस्था में होती हैं। इसीलिए कुछ परंपराओं में इस अवधि में मूर्ति स्पर्श और सामूहिक पूजा में सीधा भाग लेने से मना किया जाता है। इसे अशुद्धता नहीं, बल्कि एक विशेष संवेदनशील अवस्था माना जाता है।
*आधुनिक/वैकल्पिक दृष्टिकोण:
· कई आधुनिक विद्वान और परिवार इस बंदिश को नहीं मानते। उनका मत है कि भगवान की कृपा सभी पर समान है।
*यदि कोई महिला पूजा में शामिल होना चाहती है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से भाग ले सकती है। जैसे कि दूर बैठकर मंत्र सुनना, आरती देखना, घर की सजावट या प्रसाद बनाने में सहयोग करना।
*सबसे महत्वपूर्ण है भावना की शुद्धता। मान्यता है कि भगवान बाहरी कर्मकांड से अधिक भक्त के शुद्ध भाव को महत्व देते हैं।
*निष्कर्ष: यह व्यक्तिगत और पारिवारिक मान्यताओं पर निर्भर करता है। सबसे अच्छा यह है कि परिवार की बुजुर्ग महिलाओं या अपने धर्मगुरु से मार्गदर्शन लें और जो भी निर्णय लें, उसमें पूरी श्रद्धा रखें।
*05.प्रश्न: धनतेरस की पूजा हिंदी भाषी और गैर-हिंदी भाषी राज्यों में कैसे की जाती है?
उत्तर; धनतेरस की पूजा में क्षेत्रीय विविधता भारतीय संस्कृति की सुंदरता को दर्शाती है:
*हिंदी भाषी क्षेत्र (उत्तर, मध्य भारत): यहां धन्वंतरि पूजा, लक्ष्मी-गणेश पूजा और यम दीपदान प्रमुख हैं। सोना-चांदी, बर्तन खरीदने और धनिया-झाड़ू लाने की प्रथा जोरों पर होती है। इसे 'धन तेरस' या 'धन त्रयोदशी' कहा जाता है।
*गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र:
*गुजरात और महाराष्ट्र: इसे 'धनतेरस' या 'धन त्रयोदशी' ही कहते हैं। यहां लक्ष्मी पूजन प्रमुख है। महाराष्ट्र में 'दिवा लाडू' (दीपक के आकार का मीठा लडडू) बनाने और भेंट करने की विशेष परंपरा है।
*दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश): यहां इसे 'धन त्रयोदशी' कहते हैं, लेकिन भगवान कृष्ण या विष्णु की पूजा पर जोर दिया जाता है। केरल में इसे 'धन्वंतरी जयंती' के रूप में मनाते हुए आयुर्वेदिक डॉक्टर विशेष पूजा करते हैं। कुछ क्षेत्रों में बाली (दानव राजा) की पूजा भी की जाती है, जिसने भगवान विष्णु से वरदान पाया था कि उसकी तरह हर कोई दान दे।
*पश्चिम बंगाल और ओडिशा: यहां दिवाली से कुछ दिन पहले 'काली पूजा' प्रमुख होती है, लेकिन धनतेरस का दिन भी व्यापारी समुदाय द्वारा नए बही-खाते शुरू करने और लक्ष्मी पूजन के लिए माना जाता है।
*पंजाब: यहां सिख समुदाय द्वारा 'दीपावली' को बंदी छोड़ दिवस (गुरु हरगोबिंद साहिब जी की रिहाई) के रूप में मनाया जाता है, लेकिन हिंदू परिवार धनतेरस की परंपराओं का पालन करते हैं।
इस प्रकार, मूल भावना (समृद्धि, स्वास्थ्य और प्रकाश) एक जैसी रहते हुए भी पूजन शैली और कुछ प्रथाओं में स्थानीय रंग दिखाई देता है।
ब्लॉग से संबंधित डिस्क्लेमर
इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं, लोक मान्यताओं, सामान्य ज्ञान और ऑनलाइन/ऑफलाइन उपलब्ध स्रोतों से एकत्रित की गई है। यह जानकारी केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए प्रस्तुत की जा रही है।
*01. कोई धार्मिक दावा नहीं: लेख में उल्लिखित पौराणिक कथाएं, मान्यताएं और पूजन विधियां विभिन्न परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें किसी भी धर्म या संप्रदाय का अंतिम या एकमात्र अधिकारिक दृष्टिकोण नहीं माना जाना चाहिए। पाठकों से अनुरोध है कि विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अपने परिवार के पारंपरिक तरीकों या किसी योग्य पंडित/धर्मगुरु की सलाह को प्राथमिकता दें।
*02. व्यक्तिगत विवेक आवश्यक: खरीदारी, पूजा-अनुष्ठान या किसी भी प्रथा से जुड़े निर्णय पाठक के अपने व्यक्तिगत विवेक और परिस्थितियों पर आधारित होने चाहिए। लेख में दिए गए समय (मुहूर्त) या सुझाव सामान्य जानकारी हैं, जिनकी पुष्टि व्यक्तिगत रूप से नहीं की गई है।
*03. वित्तीय सलाह नहीं: सोना-चांदी या किसी भी संपत्ति की खरीदारी से संबंधित कोई भी निर्णय लेते समय, पाठकों को अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लेना चाहिए। ब्लॉग लेखक इस संबंध में कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं लेता।
*04. स्रोतों में भिन्नता संभव: भारतीय संस्कृति में क्षेत्रीय विविधता के कारण मान्यताओं और प्रथाओं में अंतर हो सकता है। हमारा प्रयास एक संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
इस ब्लॉग को पढ़ने और जानकारी प्राप्त करने के लिए आपका धन्यवाद। साथ ही 🪔 धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं!
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