कब है नरक चतुर्दशी 2026: क्या है पौराणिक कहानी, जानें यम पूजा विधि, महत्व और नरकासुर वध | पूरी जानकारी

नरक चतुर्दशी का चित्रण जिसमें भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर वध, अभ्यंग स्नान की परंपरा और चौमुखी यम दीपक जलाते हुए परिवार को दिखाया गया है।

चित्र का सार: यह विशेष चित्रण नरक चतुर्दशी के आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों पक्षों को दर्शाता है। एक ओर जहां पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण और सत्यभामा की विजय गाथा है, वहीं अग्रभूमि में एक भारतीय परिवार को 'अपामार्ग' के पत्तों के साथ स्नान और यमराज के निमित्त दीपदान करते हुए दिखाया गया है।

 नरक चतुर्दशी की पूरी कहानी, यम दीपक की सही विधि, अभ्यंग स्नान का महत्व और नरकासुर वध का रहस्य जानें। जानिए छोटी दिवाली के सभी अनुष्ठानों का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य।

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*नरक चतुर्दशी के पीछे की कहानी क्या है? 

*नरक चतुर्दशी के दिन यमराज की पूजा क्यों की जाती है? 

* नरकासुर के वध के बाद भगवान कृष्ण ने क्या किया था- 

*नरक चतुर्दशी के दिन कौन-कौन से अनुष्ठान किए जाते हैं? 

 *नरक चतुर्दशी के दिन "अभ्यंग स्नान" का क्या महत्व है और इसे कैसे किया जाता है? 

*नरकासुर के वध के बाद भगवान कृष्ण ने 16,000 महिलाओं को मुक्त कराया था, लेकिन उन्होंने इन महिलाओं का क्या किया था? 

*नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए "यम दीपक" जलाने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व और विधि है? 

*दीपक जलाने के बाद हाथ धोना क्यों नहीं चाहिए? 

*नरक चतुर्दशी के दिन कितने दीए जलाने चाहिए? 

*इस ब्लॉग का वैज्ञानिक सामाजिक आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना ?

*ब्लॉग के अनसुलझे हे पहलुओं की जानकारी?  

*ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर?

*ब्लॉग का रोचक डिस्क्लेमर ?

नरक चतुर्दशी: अंधकार पर प्रकाश की विजय का पावन पर्व

दिवाली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक, नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह दिन आध्यात्मिक रूप से अहम है, क्योंकि इसे अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय के रूप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा अत्याचारी दैत्य नरकासुर के वध की स्मृति को समर्पित है, जिसने स्वर्गलोक और पृथ्वी को त्राहि-त्राहि कर दिया था। इस ब्लॉग में हम नरक चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कहानियों, महत्वपूर्ण अनुष्ठानों और गहन आध्यात्मिक महत्व को जानेंगे। आइए, इस पावन पर्व के पीछे छिपे ज्ञान और उसकी रोचक परंपराओं की गहराई में उतरते हैं।

नरक चतुर्दशी के पीछे की कहानी क्या है?

नरक चतुर्दशी की कहानी का केंद्र है, दैत्यराज नरकासुर। वह पृथ्वी की देवी भूमि और भगवान विष्णु के वरदान से उत्पन्न हुआ था, किंतु अहंकार और शक्ति के मद में वह एक अत्याचारी बन गया। उसने स्वर्ग के राजा इंद्र को हराकर देवलोक पर कब्जा कर लिया और माता अदिति के कुंडल छीन लिए। उसके अत्याचारों की सीमा तब पार हो गई जब उसने 16,000 राजकुमारियों और साध्वी स्त्रियों को बंदी बना लिया। पीड़ितों की प्रार्थना सुनकर भगवान कृष्ण ने उसे दंड देने का निश्चय किया।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन, भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर के राज्य प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। सत्यभामा के हाथों से उसका वध हुआ, क्योंकि नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु उसकी माता के हाथों होगी, और सत्यभामा को भूमि देवी का अवतार माना जाता है। नरकासुर के वध के बाद जनता ने खुशी में दीप जलाए और स्नान किया। तभी से इस दिन को नरक चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

नरक चतुर्दशी के दिन यमराज की पूजा क्यों की जाती है?

नरक चतुर्दशी को 'यम चतुर्दशी' भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन यमराज ने अपनी बहन यमुना से मिलने आए थे और उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि जो भी व्यक्ति इस दिन स्नान और दान करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। एक अन्य मान्यता यह है कि यमराज ने इस दिन मृत्यु लोक में प्रवेश किया था।

इसलिए, इस दिन यमराज की पूजा और तर्पण करने का विधान है, ताकि उनकी कृपा से व्यक्ति को यमलोक के कष्ट और अकाल मृत्यु का भय न रहे। शाम को यम दीपक जलाकर यमराज को समर्पित किया जाता है। यह पूजा मृत्यु के भय से मुक्ति और दीर्घायु जीवन की कामना के लिए की जाती है, जिससे यह त्योहार आध्यात्मिक शुद्धि के साथ-साथ दैहिक सुरक्षा का भी संदेश देता है।

नरकासुर के वध के बाद भगवान कृष्ण ने क्या किया था?

नरकासुर के वध के बाद भगवान कृष्ण ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए, जो उनकी दूरदर्शिता और करुणा को दर्शाते हैं। सबसे पहले, उन्होंने नरकासुर से छीने गए माता अदिति के कुंडल वापस लेकर इंद्र को सौंप दिए और स्वर्गलोक की शांति बहाल की। इसके बाद, उन्होंने नरकासुर की कैद से 16,000 राजकुमारियों और स्त्रियों को मुक्त कराया।

महत्वपूर्ण यह था कि इन सभी महिलाओं को समाज ने अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि उन्हें नरकासुर की संपत्ति माना जाता था। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान को बचाने के लिए, भगवान कृष्ण ने एक अद्भुत समाधान निकाला। उन्होंने सभी 16,000 महिलाओं से विवाह कर उन्हें सम्मान और समाज में वैध स्थान दिया। इस प्रकार, कृष्ण ने न केवल उन्हें शारीरिक बंधन से मुक्त किया, बल्कि सामाजिक कलंक से भी मुक्ति दिलाकर अपनी दिव्य लीलाओं की एक और अद्वितीय मिसाल कायम की।

नरक चतुर्दशी के दिन कौन-कौन से अनुष्ठान किए जाते हैं?

नरक चतुर्दशी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान गहरी आध्यात्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं। सबसे पहला और महत्वपूर्ण अनुष्ठान है 'अभ्यंग स्नान'। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले तिल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करके उबटन लगाया जाता है और फिर स्नान किया जाता है। मान्यता है कि इससे नरकासुर के रक्त के कणों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य लाभ होता है।

दिन भर व्रत रखा जाता है और शाम को यम दीपदान का विशेष महत्व है। घर के मुख्य द्वार पर या दक्षिण दिशा की ओर तेल का दीपक जलाया जाता है और यमराज को अर्पित किया जाता है। इस दीपक को 'यम दीया' कहते हैं, जो यमलोक के कष्टों से रक्षा करता है। दीपक जलाने के बाद हाथ नहीं धोए जाते, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इससे लक्ष्मी चली जाती हैं।

इसके अलावा, यमराज के निमित्त तर्पण दिया जाता है और पितरों को याद किया जाता है। शाम को घर की सफाई करके रंगोली बनाई जाती है और दीए जलाए जाते हैं, जो अगले दिन बड़ी दिवाली की तैयारी का संकेत देते हैं।

नरक चतुर्दशी के दिन "अभ्यंग स्नान" का क्या महत्व है और इसे कैसे किया जाता है?

अभ्यंग स्नान नरक चतुर्दशी का सबसे प्रमुख और अनूठा अनुष्ठान है। इसका महत्व दोहरा है – शारीरिक और आध्यात्मिक। पौराणिक मान्यता के अनुसार, नरकासुर के वध के बाद उसके रक्त के छींटे भगवान कृष्ण के शरीर पर पड़े थे। जब वे वापस लौटे तो उबटन लगाकर स्नान किया, जिससे शुद्धि हुई। इसीलिए इस दिन स्नान करने वाला व्यक्ति नरक (नर्क) के द्वार तक नहीं जाता।

आध्यात्मिक दृष्टि से, यह स्नान पापों और नकारात्मकता को धो देता है। शारीरिक दृष्टि से, सर्दियों की शुरुआत में तिल के तेल की मालिश त्वचा को पोषण देती, रक्त संचार बढ़ाती और शरीर को ऊर्जावान बनाती है।

विधि: प्रातः ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) में उठकर तिल के गुनगुने तेल से पूरे शरीर की अच्छी तरह मालिश करें। फिर बेसन या चने के आटे में हल्दी व दूध मिलाकर उबटन बनाएं और शरीर पर लगाएं। कुछ देर बाद गुनगुने पानी से स्नान कर लें। स्नान के जल में थोड़े तिल डालना शुभ माना जाता है।

नरकासुर के वध के बाद भगवान कृष्ण ने 16,000 महिलाओं को मुक्त कराया था, लेकिन उन्होंने इन महिलाओं का क्या किया था?

नरकासुर की कैद से मुक्त हुई 16,000 महिलाएं एक गहन सामाजिक दुविधा में थीं। उस समय की सामाजिक मान्यताओं के अनुसार, एक राक्षस की कैद में रह चुकी इन राजकुमारियों और स्त्रियों को समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता। वे न तो अपने पैतृक घर लौट सकती थीं और न ही कोई उनसे विवाह करने को तैयार था। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।

इस संकट को समझते हुए, भगवान कृष्ण ने एक दिव्य और करुणामय निर्णय लिया। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से एक साथ सभी 16,000 महिलाओं से विवाह किया। ऐसा करके उन्होंने न केवल उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिया, बल्कि उनकी रक्षा और पालन-पोषण का भी दायित्व स्वीकार किया। माना जाता है कि कृष्ण ने द्वारका में प्रत्येक के लिए अलग महल बनवाया और सभी के साथ समान व्यवहार किया। यह कृत्य समाज में स्त्रियों के सम्मान और उनके उद्धार की एक अनुपम मिसाल है।

नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए "यम दीपक" जलाने की प्रथा क्यों है और इसका क्या महत्व और विधि है?

यम दीपक जलाने की प्रथा नरक चतुर्दशी का एक अनिवार्य और विशेष अंग है। इसकी उत्पत्ति यमराज और उनकी बहन यमुना के मिलन की कथा से जुड़ी है। कहते हैं कि इस दिन यमुना ने यमराज का स्वागत दीप जलाकर किया था, जिससे प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि इस दिन जो यम के नाम पर दीपक जलाएगा, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होगी। इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य यमराज की कृपा पाकर मृत्यु के भय से मुक्ति पाना और दीर्घायु प्राप्त करना है।

महत्व: यह दीपक यमलोक के पथ को प्रकाशित करता है और यम के दूतों को घर से दूर रखता है। यह घर में सुख-शांति और सुरक्षा का प्रतीक भी माना जाता है।

विधि:

1. शाम के समय, कुछ स्थानों पर मध्य रात्रि घर के मुख्य द्वार के बाहर या दक्षिण दिशा की ओर एक चौकी रखें।

2. चावल के आटे या सीधे जमीन पर एक स्वस्तिक बनाएं।

3. उस पर सरसों के तेल या तिल के तेल से भरा एक मिट्टी का दीपक रखें।

4. दीपक में एक ही बाती रखकर उसे जलाएं।

5. दीपक को यमराज को समर्पित करते हुए प्रार्थना करें: "हे यमराज, इस दीपक को स्वीकार करें और हमें आपके भय से मुक्त रखें।"

6. दीपक जलाने के बाद हाथ न धोएं और न ही पीछे मुड़कर देखें उसे पूरी रात जलने दें।

दीपक जलाने के बाद हाथ धोना क्यों नहीं चाहिए?

नरक चतुर्दशी पर यम दीपक जलाने के बाद हाथ धोने की मनाही एक प्राचीन और व्यावहारिक मान्यता से जुड़ी है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि दीपक जलाने के बाद हाथों पर लगी तेल और घी की सुगंध यमराज को अर्पण का प्रतीक है। यदि हाथ धो दिए जाएं, तो यह अर्पण अपूर्ण माना जाता है और उसका पुण्य फल प्राप्त नहीं होता।

एक अन्य लोकमान्यता के अनुसार, दीपदान के बाद हाथ धोने से घर से लक्ष्मी (धन और समृद्धि) चली जाती हैं। क्योंकि तेल और घी को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, उसे बहाना अशुभ होता है। इसलिए, दीपक जलाने के बाद हाथों को सूखे आटे या रुई से पोंछकर साफ किया जाता है, पानी से नहीं।

नरक चतुर्दशी के दिन कितने दीए जलाने चाहिए?

नरक चतुर्दशी के दिन जलाए जाने वाले दीयों की संख्या के बारे में कोई कठोर नियम नहीं है, लेकिन कुछ परंपरागत मान्यताएं प्रचलित हैं। सबसे महत्वपूर्ण है 'यम दीया' – यमराज के निमित्त जलाया जाने वाला एक विशेष दीपक, जो अक्सर मुख्य द्वार के बाहर रखा जाता है।

इसके अलावा, अधिकांश परिवारों में 14 दीए जलाने की प्रथा है। यह संख्या 'चतुर्दशी' (चौदस) तिथि से जुड़ी है। इनमें से 13 दीए घर के अलग-अलग कोनों, मंदिर और मुख्य द्वार पर रखे जाते हैं, जो नरक चतुर्दशी के 13 प्रकार के दुःखों को दूर करने का प्रतीक हैं। चौदहवां दीया यम दीपक होता है। कुछ क्षेत्रों में दीवाली की तैयारी के तौर पर पूरे घर को रोशन करने के लिए अधिक संख्या में दीए भी जलाए जाते हैं। मूल भावना अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाना है।

ब्लॉग का वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना

यह ब्लॉग नरक चतुर्दशी के बहुआयामी महत्व को उजागर करता है। वैज्ञानिक पहलू से, प्रातःकाल के अभ्यंग स्नान और तिल के तेल की मालिश शरीर को सर्दी से बचाती है, रक्त संचार बढ़ाती है और त्वचा को पोषण देती है। दीपकों से घर के कीटाणु दूर होते हैं। सामाजिक पहलू अत्यंत प्रासंगिक है; भगवान कृष्ण द्वारा १६००० महिलाओं के उद्धार और सम्मानपूर्वक विवाह का प्रसंग स्त्री सम्मान और सामाजिक पुनर्वास का शाश्वत संदेश देता है। यह त्योहार परिवारों को एकत्रित कर समाज में एकजुटता को भी मजबूत करता है।

आध्यात्मिक पहलू इसका केंद्र है। नरकासुर के वध का प्रतीकवाद आंतरिक दुर्गुणों (काम, क्रोध, लोभ) पर विजय का संकेत देता है। यम दीपदान और स्नान से मृत्यु का भय दूर होकर जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। आर्थिक पहलू के अंतर्गत, यह त्योहार लघु उद्योगों को गति देता है। मिट्टी के दीए, तेल, बत्ती, पूजन सामग्री, उबटन के लिए बेसन-हल्दी और नए वस्त्रों की बिक्री बढ़ जाती है, जिससे कुम्हार, छोटे दुकानदार और कृषकों को आर्थिक लाभ मिलता है। इस प्रकार, यह एक त्योहार अनेक स्तरों पर व्यक्ति और समुदाय का कल्याण करता है।

ब्लॉग के अनसुलझे पहलुओं की जानकारी

हालांकि इस ब्लॉग में त्योहार के प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है, फिर भी कुछ ऐसे अनसुलझे या गहन विमर्श के बिंदु हैं जिन पर शोध या चर्चा की गुंजाइश बनी रहती है। प्रथम, नरकासुर की ऐतिहासिकता और प्रागज्योतिषपुर का सही स्थान आज भी शोध का विषय है। दूसरे, 16,000 महिलाओं से विवाह की कथा का प्रतीकात्मक अर्थ (जैसे कि (१६,०००) 16,000 मनोवृत्तियों का उद्धार) और उसका सामाजिक-व्यावहारिक अनुप्रयोग क्या हो सकता है, यह एक गहन आध्यात्मिक विषय है।

तीसरे, यम दीपक जलाने के बाद हाथ न धोने की मान्यता के पीछे ठोस धार्मिक शास्त्रीय सन्दर्भ क्या है, यह स्पष्ट नहीं है। अक्सर यह लोक परंपरा के रूप में ही चली आ रही है। चौथे, विभिन्न क्षेत्रों में इस त्योहार को मनाने की रीतियों (जैसे आंध्र प्रदेश में 'नरक चतुर्दशी' के स्थान पर 'दीपावली' का महत्व) में भिन्नता क्यों है, इसका सांस्कृतिक अध्ययन रोचक हो सकता है। ये अनसुलझे पहलू पाठकों को स्वयं गहराई में जाने के लिए प्रेरित करते हैं।

ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उत्तर

*01.प्रश्न: क्या नरक चतुर्दशी और दीवाली एक ही दिन मनाई जाती हैं? यदि नहीं, तो इनमें क्या अंतर है?

उत्तर: नहीं, नरक चतुर्दशी और दीवाली (लक्ष्मी पूजा) अलग-अलग दिन मनाई जाने वाली दो सन्निहित पर्व तिथियां हैं। नरक चतुर्दशी दीपावली उत्सव के पहले दिन, यानी कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (१४ वीं तिथि) को मनाई जाती है। यह दिन नरकासुर वध और यमराज की पूजा के लिए समर्पित है। इसके ठीक अगले दिन, अमावस्या को मुख्य दीपावली या लक्ष्मी पूजन मनाया जाता है, जिस दिन धन की देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस प्रकार, नरक चतुर्दशी दीपावली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है, जो अंधकार (बुराई) पर प्रकाश (अच्छाई) की विजय के पहले चरण को दर्शाती है, जबकि दीवाली समृद्धि और उल्लास के त्योहार का मुख्य दिवस है।

*02.प्रश्न: घर के बाहर यम का दीया नरक चतुर्दशी के दिन निकाला जाता है या धनतेरस के दिन? जानें सटीक जानकारी 

उत्तर: यह एक बहुत ही सामान्य भ्रम का विषय है। सटीक और प्रचलित मान्यता के अनुसार, यम दीया (यम दीपदान) नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) के दिन शाम या मध्य रात्रि को जलाया जाता है। इसका सीधा संबंध यमराज और नरक चतुर्दशी की कथा से है, जहां इस दिन यम दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है। दीपावली पर्व का क्रम इस प्रकार है: धनतेरस → नरक चतुर्दशी → दीवाली → गोवर्धन पूजाभैया दूज। चूंकि नरक चतुर्दशी धनतेरस के अगले दिन आती है, इसलिए दोनों तिथियां सन्निहित होने के कारण भ्रम पैदा होता है। अधिकांश सनातन शास्त्रीय परंपराओं और पंचांगों के अनुसार, यम दीपदान का दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी नरक चतुर्दशी ही है।

*03.प्रश्न: बहुत से जगह पर यम का दीया धनतेरस के दिन निकाला जाता है, ऐसा क्यों?

उत्तर: कुछ क्षेत्रों, विशेषकर महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में, यम दीपदान धनतेरस के दिन ही किया जाता है। इसके पीछे कारण स्थानीय परंपराओं और कथा की भिन्नता है।

मुख्य कारण यह है कि धनतेरस की एक प्रमुख कथा यमराज और यमुना (यमी) के भाई-बहन के प्रेम से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने उनके घर गए थे। उनके आगमन पर यमुना ने उनका स्वागत दीप जलाकर और भोजन कराकर किया। प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाएगा या जो बहन अपने भाई के लिए यम के नाम का दीपक जलाएगी, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। इसी कथा के कारण धनतेरस को 'यम दीपदान' या 'यम द्वितीया' भी कहा जाता है और इस दिन बहनें भाइयों के लिए यम का दीया जलाती हैं। इस प्रकार, नरक चतुर्दशी का यम दीपदान मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए है, जबकि धनतेरस का यम दीपदान भाई-बहन के बंधन और भाई की दीर्घायु की कामना से जुड़ा है।

निष्कर्ष: आप किस दिन यम दीपक जलाएं, यह आपकी पारिवारिक परंपरा और क्षेत्रीय रीति-रिवाज पर निर्भर करता है। दोनों ही दिन शुभ और फलदायी माने जाते हैं।

ब्लॉग का डिस्क्लेमर  

ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारी विभिन्न सनातन धर्मग्रंथों, पौराणिक कथाओं, लोक मान्यताओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से एकत्रित की गई है। यह सामग्री केवल सूचनात्मक और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए तैयार की गई है। लेख में वर्णित अनुष्ठानों, पूजन विधियों और मान्यताओं में अलग-अलग क्षेत्रों, सम्प्रदायों और परिवारों में भिन्नता हो सकती है।

पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या व्रत को पूर्ण रूप से मनाने से पहले किसी योग्य पंडित या अपनी पारिवारिक परंपरा से उचित मार्गदर्शन अवश्य लें। ब्लॉग लेखक या वेबसाइट किसी भी धार्मिक क्रिया के परिणामस्वरूप होने वाले किसी भी लाभ या हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। इस ब्लॉग में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं और किसी विशिष्ट धार्मिक संस्थान का प्रतिनिधित्व नहीं करते। सभी ट्रेडमार्क और नाम उनके संबंधित स्वामियों के हैं और केवल संदर्भ के लिए उपयोग किए गए हैं।



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