(पितृपक्ष 2026, 26 सितंबर से लेकर 10 अक्तटूबर की संपूर्ण जानकारी। जानें श्राद्ध कैसे करें, क्या करें और क्या न करें, पितृपक्ष का वैज्ञानिक, सामाजिक व आध्यात्मिक महत्व। पितृ दोष शांति के उपाय। पूर्वजों को प्रसन्न करने का मार्ग।)
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*पितृपक्ष: वो अदृश्य डोर जो पीढ़ियों को जोड़ती है
क्या आपने कभी महसूस किया है कि पेड़ की जड़ें ज़मीन के अंदर कितनी दूर तक, कितनी गहराई तक फैली होती हैं? हमारा अस्तित्व भी कुछ ऐसा ही है। हम जो आज हैं, वो केवल हमारी अपनी मेहनत नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के संस्कारों, त्याग और आशीर्वाद की वह गहरी जड़ें हैं, जो समय की मिट्टी में दबी पड़ी हैं। पितृपक्ष वही विशेष समय है जब हम इन जड़ों को पानी देते हैं, उन्हें याद करते हैं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
यह सिर्फ 16 दिनों का अनुष्ठान नहीं, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों और आध्यात्मिक संबंधों का एक पावन उत्सव है। यह वह पखवाड़ा है जब हवा में पूर्वजों का स्पर्श, उनकी सुनहरी यादों की खुशबू और आशीर्वाद की एक अलौकिक शीतलता होती है। इस ब्लॉग में, हम आपको पितृपक्ष के इसी रहस्यमय और मार्मिक सफर पर ले चलेंगे – इसकी प्राचीन विधियों से लेकर आधुनिक प्रासंगिकता तक, और गूढ़ आध्यात्मिकता से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण तक। आइए, जानते हैं कि कैसे यह परंपरा हमें हमारी विरासत से जोड़ते हुए, जीवन का एक गहरा अर्थ सिखाती है।
"पितृ पक्ष 2026: एक पूर्ण मार्गदर्शक – श्राद्ध, महत्व, विधि और नियम"
पितृ पक्ष क्या है? – पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पवित्र समय
सनातन धर्म में पितृपक्ष एक ऐसा विशेष 16-दिवसीय काल है जब हम अपने पूर्वजों (पितरों) को याद करते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण एवं दान करते हैं। इसे "श्राद्ध पक्ष" या "महालय पक्ष" के नाम से भी जाना जाता है। यह परंपरा मूल रूप से "ऋण" के सिद्धांत पर आधारित है – मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण माने गए हैं: देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृपक्ष पितृ ऋण चुकाने का एक साधन है।
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मान्यता है कि इस अवधि में पितृलोक से हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और हमारे द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण व तिल-जल ग्रहण करके तृप्त होते हैं। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच आध्यात्मिक एवं भावनात्मक संबंध को मजबूत करने का सूत्र है। यह हमें हमारे मूल, हमारी जड़ों से जोड़ता है और यह स्मरण दिलाता है कि हम जो कुछ भी हैं, उसमें हमारे पूर्वजों का अमूल्य योगदान है।
पितृ पक्ष 2026 कब है? – तिथि और समय
पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है। 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026, शनिवार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि से होगी और समापन 10 अक्टूबर 2026, शनिवार आश्विन मास कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
महत्वपूर्ण तिथियां:
*पितृ पक्ष प्रारंभ: 26 सितंबर 2026 (पूर्णिमा तिथि)
*मातृ श्राद्ध (औरतों के लिए): 10 अक्टूबर 2026 (अमावस्या तिथि)
*अभिजित मुहूर्त: मध्याह्न काल का विशेष समय
*सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026 (समापन दिवस)
*सर्वपितृ अमावस्या सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, जब उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी तिथि याद न हो या जिनका श्राद्ध विशेष तिथि पर न किया गया हो।
पितृ पक्ष में क्या होता है? – संपूर्ण क्रिया-कलाप
इस 16 दिन की अवधि में मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:
*01. श्राद्ध कर्म: पितरों के निमित्त विधि-विधान से भोजन (पिंडदान) तैयार करना और ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराना।
*02. तर्पण: जल, काले तिल, कुशा और फूल लेकर विशिष्ट मंत्रों के साथ पितरों को जल अर्पित करना।
*03. दान-पुण्य: गाय, वस्त्र, अनाज, छाता, जूते आदि का दान करना।
*04. ब्राह्मण भोज: ब्राह्मणों या विद्वानों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देना।
*05. पिंडदान: गाय के गोबर, जौ, तिल और चावल के आटे से बने पिंडों का दान करना।
*06. गयाजी श्राद्ध: बिहार के गयाजी जैसे पवित्र स्थानों पर जाकर श्राद्ध करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
श्राद्ध कैसे किया जाता है? – विस्तृत चरणबद्ध विधि
श्राद्ध एक संस्कार है, जिसे सही विधि से करने पर ही पितरों को तृप्ति मिलती है।
पूर्व तैयारी:
*स्नानादि से शुद्ध होकर साफ वस्त्र (अधिमानतः सूती) धारण करें।
*श्राद्ध का संकल्प लें।
*आसन के लिए कुशा (एक पवित्र घास) का प्रयोग करें।
मुख्य क्रियाएं:
*01. तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, दाएं हाथ से जल, काले तिल और कुशा मिलाकर पितरों के नाम का उच्चारण करते हुए जल अर्पित करें।
*02. पिंडदान: चावल या जौ के आटे को दूध, घी, शहद व गुड़ में मिलाकर गूंथ लें। फिर उससे छोटे-छोटे पिंड (गोले) बनाएं। इन पिंडों को कुशा के ऊपर रखकर, पितरों को अर्पित करें। प्रत्येक पिंड को पिता, दादा, परदादा के लिए अलग-अलग अर्पित किया जाता है।
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*03. ब्राह्मण भोज: एक या दो ब्राह्मणों को घर बुलाकर, उन्हें पितरों का प्रतिनिधि मानते हुए, भोजन कराएं। भोजन में शुद्ध शाकाहारी व्यंजन (जैसे पूरी, चावल, दाल, सब्जी, खीर) शामिल होने चाहिए।
*04. दक्षिणा एवं दान: भोजन के बाद ब्राह्मणों को वस्त्र, फल और दक्षिणा (धन) देकर विदा करें। गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भी भोजन निकालना चाहिए।
मंत्र (उदाहरणार्थ):
"ॐ अस्य श्री विष्णोः कर्मणः श्राद्धस्य अमुकगोत्रः श्री अमुकदेवशर्मा अहं करिष्ये।" (संकल्प मंत्र)
पितृ पक्ष का महत्व क्या है? – आध्यात्मिक और सामाजिक पहलूख
*01. पितृ ऋण से मुक्ति: हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, मनुष्य को जन्म लेने के बाद तीन ऋण चुकाने होते हैं। पितृपक्ष पितृ ऋण चुकाने का प्रमुख अवसर है।
*02. पूर्वजों की आत्मा की शांति: मान्यता है कि श्राद्ध कर्म से पितरों की आत्मा को तृप्ति और शांति मिलती है, जिससे वे हमें आशीर्वाद देते हैं।
*03. परिवार की सुख-समृद्धि: पितरों का आशीर्वाद परिवार में सुख, शांति, स्वास्थ्य और धन-धान्य लाता है। ऐसा माना जाता है कि अतृप्त पितर कुंडली में पितृ दोष का कारण बनते हैं, जिसका निवारण श्राद्ध से होता है।
-04. पारिवारिक एकता और स्मरण: यह अवधि परिवार के सदस्यों को एक साथ लाती है और नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के बारे में बताने, उनके मूल्यों को आगे बढ़ाने का अवसर देती है।
*05. दान और परोपकार की भावना: इस दौरान दान-पुण्य पर विशेष बल दिया जाता है, जो समाज में परोपकार और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।
पितृ पक्ष में क्या खाना चाहिए? – श्राद्ध भोजन के नियम
श्राद्ध कर्म में भोजन पवित्र और सात्विक होना चाहिए। इसमें शामिल करें:
*मुख्य अनाज: जौ, चावल और गेहूं को प्राथमिकता।
*दालें: मूंग दाल (छिलके वाली) शुभ मानी जाती है।
*सब्जियां: लौकी, पालक, आलू, कद्दू, केला (कच्चा), बैंगन (विशेष प्रकार)।
*दूध उत्पाद: दूध, दही, घी, मक्खन। खीर (चावल या दलिया की) बनाना अति शुभ है।
*मसाले: काली मिर्च, अदरक, हल्दी, सेंधा नमक। प्याज-लहसुन का प्रयोग वर्जित है।
*तेल: सरसों का तेल या घी।
*फल: केला, आम, अनार, सेब।
विशेष भोजन: कुटू का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा (रामदाना) का प्रयोग भी किया जा सकता है। भोजन को केले के पत्ते पर परोसना पारंपरिक रूप से श्रेष्ठ माना जाता है।
पितृ पक्ष में क्या नहीं करना चाहिए? – प्रमुख वर्जनाएं और सावधानियां
*01. नए कार्य का शुभारंभ: कोई नया व्यवसाय, घर-प्रवेश, वाहन खरीदी, विवाह, मुंडन आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते।
*02. मांस-मदिरा सेवन: पूरे पक्ष में बिल्कुल भी मांस, मछली, अंडा और मदिरा का सेवन वर्जित है।
*03. क्रोध और झगड़ा: मन को शांत रखें, किसी से झगड़ा या अपशब्द न बोलें।
*04. दाढ़ी-बाल न कटवाएं: कुछ परंपराओं में इसे अशुभ माना गया है।
*05. लहसुन-प्याज का प्रयोग: भोजन बनाते व खाते समय इनसे परहेज करें।
*06. दिन में सोना: इससे श्राद्ध कर्म का फल कम हो सकता है, ऐसी मान्यता है।
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*07. तामसिक भोजन: भोजन ताजा और सात्विक बनाएं, बासी या फ्रिज का रखा भोजन न खाएं।
*08. अनावश्यक यात्रा: जब तक गया आदि तीर्थों की यात्रा न हो, अन्य मनोरंजन यात्राओं से बचें।
पितृ पक्ष की तिथि कैसे निर्धारित की जाती है? – ज्योतिषीय आधार
पितृपक्ष की तिथि निर्धारण चंद्र कैलेंडर (पंचांग) पर आधारित है।
*यह आश्विन माह (सितंबर-अक्टूबर) के कृष्ण पक्ष (अमावस्या से पूर्व के 15 दिन) में आता है।
*प्रत्येक व्यक्ति अपने पिता/पूर्वज की पुण्य तिथि (मृत्यु तिथि के सनातनी चंद्र दिन) पर श्राद्ध करता है।
*यदि पुण्य तिथि ज्ञात न हो, तो अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) को श्राद्ध किया जाता है।
*कुछ विशेष तिथियां हैं, जैसे माता का श्राद्ध सप्तमी को, आत्महत्या या अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है।
*"अपराह्न काल" (दोपहर बाद का समय) को श्राद्ध कर्म के लिए सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि मान्यता है कि इस समय पितर धरती पर भ्रमण करते हैं।
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पितृ पक्ष में क्या दान करना चाहिए? – दान के प्रकार और महत्व
दान इस पक्ष का एक अभिन्न अंग है, जिससे पितरों को अक्षय लोक की प्राप्ति होती है।
*01. वस्त्र दान: नए सूती वस्त्र (धोती, गमछा, साड़ी) ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करें।
*02. अन्न दान: चावल, गेहूं, दाल, नमक, गुड़ आदि का दान।
*03. घी दान: दीपदान के साथ-साथ घी का दान विशेष फलदायी है।
*04. तिल दान: काले तिल का दान पितृदोष शांति के लिए उत्तम है।
*05. गाय दान: "गोदान" को सर्वश्रेष्ठ दान माना गया है। यदि संभव न हो तो गाय के चारे या गोसेवा के लिए दान करें।
*06. छाता-जूते दान: बारिश और धूप से बचाव की वस्तुएं दान करना शुभ है।
*07. बर्तन दान: पीतल या तांबे के बर्तन दान करने चाहिए।
*08. विशेष: "कम्बल दान" अक्टूबर के आसपास ठंड की शुरुआत में विशेष महत्व रखता है।
पितृ पक्ष में कैसे पूजा करनी चाहिए? – दैनिक पूजा विधि
दैनिक पूजा में इन बातों का ध्यान रखें:
*01. प्रातःकाल: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। सूर्यदेव को अर्घ्य दें।
*02. तर्पण: प्रतिदिन स्नान के बाद पितरों का नाम लेकर जल-तिल से तर्पण करें।
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*03. पितृ स्तोत्र पाठ: गरुड़ पुराण या भागवत में वर्णित पितृ स्तोत्र का पाठ करें।
*04. दीपक: घर के मंदिर में और पीपल के वृक्ष के नीचे शाम को दीपक जलाएं।
*05. भोग: प्रतिदिन बनने वाले भोजन का एक हिस्सा पितरों को अर्पित करने के बाद ही ग्रहण करें।
*06. गीता पाठ: नियमित रूप से श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) का पाठ करना लाभकारी है।
*07. ब्राह्मण आह्वान: यदि संभव हो तो प्रतिदिन या कम से कम अपनी श्राद्ध तिथि पर ब्राह्मण को भोजन कराएं।
्पितृ पक्ष में कौन से विशेष भोजन बनाए जाते हैं?
*01. खीर: चावल या दलिया की खीर सबसे प्रमुख व्यंजन है, इसे घी और केसर से सजाया जाता है।
*02. पूड़ी-आलू: श्राद्ध भोजन का एक लोकप्रिय और सादा संयोजन।
*03. लौकी की सब्जी: इसे शुभ और हल्का माना जाता है।
*04. वड़ा/पकोड़े: उड़द दाल या कुटू के आटे के बने।
*05. हलवा: सूजी या आटे का हलवा बनाया जाता है।
*06. मिष्ठान्न: गुड़ और तिल के लड्डू, या मखाने की खीर।
*07. कढ़ी-चावल: दही से बनी कढ़ी चावल के साथ परोसी जाती है।
*08. सत्तू: जौ के सत्तू का शर्बत भी पितरों को अर्पित किया जाता है।
ध्यान रहे: सभी व्यंजन सेंधा नमक में ही बनाए जाते हैं। सामान्य नमक का प्रयोग नहीं किया जाता।
पितृ पक्ष में क्या नहीं खाना चाहिए? – आहार संबंधी निषेध
*01. लहसुन और प्याज: इन्हें तामसिक माना गया है, अतः इनका सेवन वर्जित है।
*02. मांसाहार: सभी प्रकार के मांस, मछली और अंडे वर्जित हैं।
*03. कुछ सब्जियां: टमाटर, गोभी, गाजर, शिमला मिर्च (कुछ परंपराओं में) का प्रयोग नहीं किया जाता।
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*04. चना और राजमा: इन दालों को भी श्राद्ध कर्म में अशुभ माना जाता है।
*05. सामान्य नमक: केवल सेंधा नमक या काले नमक का ही प्रयोग करें।
*06. बासी भोजन: रात का बचा हुआ भोजन अगले दिन न खाएं। ताजा बनाएं।
*07. रात्रि भोजन: कोशिश करें कि सूर्यास्त से पहले भोजन कर लें। रात में हल्का या फलाहार लें।
पितृ पक्ष के दौरान क्या पहनना चाहिए? – वस्त्र विधान
*रंग: सफेद रंग सर्वोत्तम माना गया है, क्योंकि यह शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इसके अलावा हल्के पीले या हल्के केसरी रंग के वस्त्र भी पहने जा सकते हैं।
*लाल, काले या गहरे रंग के वस्त्र पहनने से बचें।
*सामग्री: सूती या रेशमी वस्त्र पहनें। सिंथेटिक कपड़े न पहनें।
*सादगी: वस्त्र साफ-सुथरे और सादे होने चाहिए। भड़कीले डिजाइन या जरी-जड़त से दूर रहें।
*ध्यान रखें: श्राद्ध कर्म करते समय उपवीत (जनेऊ) धारण करना आवश्यक है।
पितृ पक्ष के दौरान क्या नहीं करना चाहिए? – संपूर्ण सूची
*01. शुभ कार्य वर्जित: विवाह, गृहप्रवेश, नामकरण, कार्यालय का उद्घाटन आदि न करें।
*02. नए कपड़े/गहने न पहनें: इन दिनों नई खरीदारी और धूमधाम से परहेज करें।
*03. किसी को श्राप न दें: मन, वचन और कर्म से शांत रहें।
*04. झूठ न बोलें: सत्य का पालन करें।
*05. पशु-पक्षियों को न सताएं: विशेषकर गाय, कुत्ते और कौवे का सम्मान करें, उन्हें भोजन दें।
*06. पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं, उसे न काटें: मान्यता है कि पितर पीपल के वृक्ष पर निवास करते हैं।
*07. अनजान व्यक्ति को भोजन न कराएं: श्राद्ध का भोजन केवल ज्ञात ब्राह्मण या विश्वस्त व्यक्ति को ही कराएं।
*08. अनावश्यक हंसी-मजाक या मनोरंजन: गंभीर और श्रद्धापूर्ण वातावरण बनाए रखें।
*09. क्रोध न करें: पितृपक्ष में क्रोध करने से पितर नाराज हो सकते हैं, ऐसी मान्यता है।
*10. अन्य लोगों के श्राद्ध में दोष न निकालें: दूसरों के तरीकों की आलोचना न करें।
निष्कर्ष
पितृपक्ष हमारी सनातन संस्कृति का एक अद्भुत और गहन विज्ञान है, जो हमें मृत्यु के बाद के जीवन, आत्मा की अमरता और पीढ़ियों के बीच अटूट संबंध का बोध कराता है। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि कृतज्ञता, स्मरण और परोपकार का एक सुंदर सामूहिक उत्सव है। पितृपक्ष 2026 में इन नियमों और भावनाओं के साथ श्राद्ध करने से निश्चित ही पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होगा और पारिवारिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का वास होगा।
श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।
(श्रद्धा के साथ जो दिया जाता है, वही श्राद्ध है।)
पितृपक्ष: बहुआयामी विश्लेषण – वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक पहलू
पाठकों के सवालों के जवाब:
प्रश्न: क्या पितृपक्ष सिर्फ एक पुरानी रूढ़िवाद है या इसका कोई तर्क है?
उत्तर:यह केवल रूढ़िवाद नहीं है। सामाजिक दृष्टि से यह पारिवारिक एकता व सांस्कृतिक धरोहर को बचाता है। मनोवैज्ञानिक रूप से, यह शोक प्रबंधन व कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। आध्यात्मिक स्तर पर यह पुनर्जन्म व आत्मा की निरंतरता के सिद्धांत से जुड़ा है।
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प्रश्न: क्या महिलाएं श्राद्ध कर सकती हैं?
उत्तर:पारंपरिक रूप से पुरुषों को ही श्राद्ध करते देखा गया है, परंतु आधुनिक समय में कई परिवारों में पुत्री या महिलाएं भी श्राद्ध कर्म में भाग लेती हैं। गरुड़ पुराण में पुत्र के अभाव में पत्नी या पुत्री द्वारा श्राद्ध का उल्लेख है।
प्रश्न: पितृ दोष क्या है और कैसे दूर होता है?
उत्तर:ज्योतिष में माना जाता है कि यदि पितर अतृप्त हों या श्राद्ध न किया गया हो, तो जीवन में बाधाएं आती हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध, गया में पिंडदान, पीपल की सेवा और दान से इसका निवारण संभव है।्
अनसुलझे पहलू एवं आधुनिक प्रश्न:
*01. वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी: पितृपक्ष पर शोध वैज्ञानिक अध्ययन सीमित हैं। क्या वास्तव में ऐसी कोई ऊर्जा तंत्र है जो पूर्वजों से जोड़ता है?
*02. विविधता में एकरूपता का अभाव: भारत की विविध संस्कृतियों में श्राद्ध की अलग-अलग मान्यताएं हैं, कोई एक सार्वभौमिक नियम नहीं।
*03. पर्यावरणीय प्रभाव: तर्पण में नदियों में डाले जाने वाले तिल, फूल आदि का जल जीवों पर प्रभाव अध्ययन का विषय है।
*04. वंशजहीन परिवार: एकल परिवार, कुंवारे या संतानहीन लोगों के लिए श्राद्ध परंपरा का भविष्य क्या है?
*05. ब्राह्मणवादी संरचना पर प्रश्न: क्या केवल ब्राह्मणों को ही भोजन देना आवश्यक है? क्या ज्ञानी गैर-ब्राह्मण को दान नहीं दिया जा सकता?
वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व आर्थिक पहलू
वैज्ञानिक पहलू:
· मनोवैज्ञानिक लाभ: शोक प्रबंधन (Grief Processing) का प्राकृतिक तरीका है।
*जैविक संबंध: डीएनए के माध्यम से हमारे शरीर में पूर्वजों का अंश वास्तव में विद्यमान है।
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*पर्यावरणीय ज्ञान: तिल, कुशा, पीपल में औषधीय गुण हैं; कौवे को भोजन देने से पारिस्थितिकी संतुलन में सहायता मिलती है।
सामाजिक पहलू:
*पारिवारिक बंधन मजबूत करना: पीढ़ियों को जोड़ता है।
*सामाजिक समरसता: दान-भोज से समाज के कमजोर वर्ग को सहारा।
*सांस्कृतिक निरंतरता: परंपराओं व मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना।
आध्यात्मिक पहलू:
*कर्म सिद्धांत: पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग।
*आत्मिक शांति: मृत्यु के भय से ऊपर उठकर जीवन-मृत्यु चक्र को समझना।
*भूत, वर्तमान, भविष्य का संबंध: तीनों पीढ़ियों के बीच एक अदृश्य धागा।
आर्थिक पहलू:
*दान अर्थव्यवस्था: इस दौरान लाखों रुपये का दान, भोज, वस्त्र वितरण होता है।
*तीर्थ पर्यटन: गया, हरिद्वार, पुष्कर आदि में पर्यटन व स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।
*पंडा-पुरोहित व्यवस्था: रोजगार का एक पारंपरिक स्रोत।
डिस्क्लेमर (सामान्य अधिसूचना)
इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी प्राचीन ग्रंथों, मान्यताओं, लोक परंपराओं और आधुनिक विश्लेषण पर आधारित है। यह केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार की गई है। किसी भी धार्मिक कर्मकांड या श्राद्ध विधि को अमल में लाने से पहले, अपने कुल परंपरा, पारिवारिक रीति-रिवाजों और किसी योग्य पुरोहित या धर्मज्ञ व्यक्ति से परामर्श अवश्य लें। लेखक या प्रकाशक किसी भी तरह की धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत प्रथाओं के अनुसरण से होने वाले किसी भी परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं है। आधुनिक विज्ञान और परंपरागत मान्यताओं के बीच समन्वय व्यक्ति के स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता होने पर योग्य चिकित्सक से सलाह लें।
