कब है जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: अनसारा रहस्य, पूरी जानकारी, महत्व और रोचक तथ्य

"जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की संपूर्ण गाइड। जानें 15 दिन के अनसारा काल का रहस्य, रथ निर्माण, गुंडिचा यात्रा, मंदिर के चमत्कार, और सामाजिक-आर्थिक महत्व। पुरी यात्रा के टिप्स और FAQs भी पढ़ें"

*हर साल ग्रीष्म ऋतु में, भारत के पूर्वी तट पर स्थित पवित्र नगरी पुरी एक अद्भुत और अलौकिक उत्साह से सराबोर हो उठती है। यह वह समय होता है जब लाखों श्रद्धालु, भक्त और जिज्ञासु यात्री भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की विश्वप्रसिद्ध रथ यात्रा में शामिल होने के लिए यहां एकत्रित होते हैं। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि ओडिशा की संस्कृति, आस्था और परंपरा का जीवंत प्रदर्शन है, जो सदियों से लोगों के हृदय पर राज कर रहा है।

*जगन्नाथ रथ यात्रा, जिसे 'गुंडिचा यात्रा' भी कहा जाता है, सनातन धर्म के सबसे बड़े और सबसे प्रतीक्षित त्योहारों में से एक है। इस दिन, तीनों देवता अपने भव्य और रंग-बिरंगे रथों पर सवार होकर, अपने मुख्य मंदिर (श्री मंदिर) से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर (मौसी घर) की यात्रा पर निकलते हैं। 

*यह नौ दिवसीय उत्सव आस्था, भक्ति और सामुदायिक सद्भाव का अनोखा संगम है। इस ब्लॉग में, हम आपको इस दिव्य यात्रा के हर पहलू – इसके इतिहास, रहस्य, महत्व और 2026 में इसकी संपूर्ण जानकारी के साथ-साथ पुरी से जुड़े रोचक तथ्यों से रूबरू कराएंगे। आइए, इस पवित्र सफर में शामिल हों।

"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर" 

*01.जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की संपूर्ण जानकारी?  

*02.रथ यात्रा के पीछे का रहस्य और कथा क्या है ?

*03.जगन्नाथ मंदिर की 22 सीढ़ियों का रहस्य क्या है? 

*04.जगन्नाथ जी की मौसी कौन थी? 

*05.जगन्नाथ पुरी में मौसी का घर कहां है? 

*06.जगन्नाथ मंदिर में चमत्कार क्या है? 

*07.जगन्नाथ मंदिर के बारे में 10 रोचक तथ्य क्या हैं? 

*08.पुरी में हर 12 साल में क्या होता है? 

*09.पुरी में क्या खरीदना चाहिए? 

*10.रथ यात्रा के पूर्व 15 दिन तक भगवान बीमार रहते हैं इन 15 दिन में क्या-क्या होता है प्रतिदिन का जानकारी स्टेप बाय स्टेप? 

*11.ब्लॉग से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना?  

*12.ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उसकी उत्तर की जानकारी?  

*13.अनसूलझे पहलुओं की जानकारी?  

"जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की संपूर्ण जानकारी"

*जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 में एक बार फिर दुनिया भर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगी। सनातन पंचांग के अनुसार, यह यात्रा हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित की जाती है। 2026 में, सनातनी पंचांग के अनुसार रथ यात्रा का मुख्य दिन 16 जुलाई 2026 दिन गुरुवार को है। आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को मनाया जाएगा।

*रथ यात्रा एक नौ दिवसीय (नौ दिवसीय) उत्सव है, जिसमें कई महत्वपूर्ण अनुष्ठान और कार्यक्रम शामिल होते हैं:

*01. स्नान यात्रा (02 जुलाई दिन गुरुवार, आषाढ़ मास कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि): यह उत्सव की शुरुआत होती है, जिसमें देवताओं को विशेष स्नान कराया जाता है। इसके बाद देवता लगभग 15 दिनों के लिए 'आनंद बाजार' नामक अस्वस्थता (औषधोपचार) में रहते हैं।

*02. नेत्रोत्सव: इस दिन देवताओं की नई आंखें चित्रित की जाती हैं, जिसके बाद वे दर्शन के लिए उपलब्ध होते हैं।

*03. रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया): यह मुख्य दिन है। शाही छतरी की परंपरा के बाद, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को उनके विशाल रथों पर विराजमान किया जाता है। लाखों भक्त 'जय जगन्नाथ' के जयघोष के साथ इन रथों को खींचते हैं। पहले बलभद्र का रथ 'तालध्वज', फिर सुभद्रा का रथ 'देवदलन' और अंत में जगन्नाथ जी का रथ 'नंदीघोष' बड़ी धूमधाम से निकलते हैं।

*04. गुंडिचा मंदिर प्रवास: देवता गुंडिचा मंदिर (मौसी घर) पहुंचते हैं और अगले सात दिन वहां विश्राम करते हैं।

*05. बहुदा यात्रा (वापसी यात्रा): आषाढ़ शुक्ल दशमी, 24 जुलाई 2026 दिन शुक्रवार के दिन, देवता वापसी यात्रा शुरू करते हैं और श्री मंदिर लौट आते हैं। इसके एक दिन बाद, उन्हें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया जाता है।

2026 की यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं को पहले से ही आवास और यात्रा की व्यवस्था कर लेनी चाहिए, क्योंकि इस दौरान पुरी में भारी भीड़ होती है। श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट से नवीनतम जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

(नृसिंह अवतार: प्रह्लाद कथा, मंदिर और अनसुलझे रहस्य | सम्पूर्ण गाइड)

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*रथ यात्रा के पीछे का रहस्य और कथा क्या है?

*जगन्नाथ रथ यात्रा के पीछे कई पौराणिक कथाएं और रहस्यमयी मान्यताएं जुड़ी हैं, जो इसकी महत्ता को और बढ़ाती हैं।

*सबसे प्रचलित कथा भगवान कृष्ण और उनके भक्त राजा इंद्रद्युम्न से जुड़ी है। कहानी है कि राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान जगन्नाथ के दर्शन हुए और उन्हें नीलांचल पर्वत (पुरी) पर एक दिव्य मूर्ति स्थापित करने का आदेश मिला। मूर्ति निर्माण का दायित्व विश्वकर्मा जी को मिला, जो एक वृद्ध बढ़ई (विश्वकर्मा के अवतार) के रूप में आए और शर्त रखी कि जब तक वह काम कर रहे हों, कोई उनके कक्ष में न आए। 

*कई दिनों तक दरवाजा बंद रहने पर चिंतित राजा ने दरवाजा खोल दिया। उस समय मूर्तियां अधूरी थीं और बढ़ई गायब हो गया। एक दिव्य आवाज ने राजा को इन्हीं अधूरी मूर्तियों (दारु ब्रह्म) की पूजा करने का आदेश दिया। यही मूर्तियां आज जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में पूजित हैं।

*एक अन्य कथा के अनुसार, यह यात्रा भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के द्वारिका से गोकुल की यात्रा का प्रतीक है। गुंडिचा मंदिर को सुभद्रा का 'मौसी घर' (मामा का घर) माना जाता है, इसलिए देवता हर साल वहां विश्राम करने जाते हैं।

*इस यात्रा का दार्शनिक रहस्य यह है कि यह जीवन की यात्रा का प्रतीक है। रथ शरीर है, रथ को खींचने वाले भक्त इंद्रियां हैं, रस्सियां वासनाएं हैं और रथ का पथ जीवन का मार्ग है। देवता स्वयं परमात्मा हैं, जो इस शरीर रूपी रथ में विराजमान हैं और उन तक पहुंचने के लिए संयम और भक्ति का मार्ग अपनाना होता है। इस प्रकार, रथ यात्रा केवल एक बाहरी आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा का भी एक शक्तिशाली प्रतीक है।

*जगन्नाथ मंदिर की 22 सीढ़ियों का रहस्य क्या है?

*श्री जगन्नाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे 'सिंहद्वार' कहते हैं, से लेकर मंदिर के मुख्य भाग तक जाने वाली 22 सीढ़ियां (जिन्हें 'बाइसी झांप' या 'बाईस पाद पीठ' भी कहा जाता है) न केवल एक वास्तुशिल्प तत्व हैं, बल्कि गहन सांकेतिक और आध्यात्मिक अर्थ रखती हैं। इन सीढ़ियों को मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के 22 चरणों का प्रतीक माना जाता है।

*इन 22 सीढ़ियों को विभिन्न दार्शनिक और तांत्रिक संदर्भों में देखा जाता है:

*01. मन के 16 विकार और 5 तत्व: एक मान्यता के अनुसार, इनमें से 16 सीढ़ियां मानव मन के 16 प्रमुख विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि) को दर्शाती हैं। अगली 5 सीढ़ियां पंच महा भूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक हैं। अंतिम और 22 वीं सीढ़ी 'साक्षात्कार' या परमात्मा के साथ एकत्व की अवस्था को दर्शाती है। भक्त इन विकारों और भौतिक तत्वों को पार करते हुए अंततः दिव्य दर्शन प्राप्त करता है।

*02. 22 ज्ञानेंद्रियां एवं कर्मेंद्रियां: कुछ विद्वान इन्हें मानव शरीर की 10 ज्ञानेंद्रियां (पांच कर्मेंद्रियां और पांच ज्ञानेंद्रियां), 5 प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त – कुल 22 तत्वों का प्रतिनिधित्व मानते हैं। इन सभी पर विजय पाकर ही भक्त भगवान के चरणों में पहुंच पाता है।

*03. तांत्रिक महत्व: तंत्र साधना में 22 सीढ़ियों को शरीर के भीतर स्थित 22 चक्रों या ऊर्जा केंद्रों से जोड़ा जाता है, जिन्हें पार करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।

*इन सीढ़ियों पर चढ़ने की प्रक्रिया को एक आध्यात्मिक साधना माना जाता है। प्रत्येक कदम के साथ भक्त अपने अंदर के अहंकार और विकारों को त्यागते हुए, शुद्ध भक्ति की ओर बढ़ता है। जब भक्त अंतिम सीढ़ी पर पहुंचकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता है, तो यह उसकी आत्मा का परमात्मा से मिलन माना जाता है। इस प्रकार, ये सीढ़ियां केवल पत्थर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा के पड़ाव हैं।

("वामन अवतार की पूर्ण कथा": तीन पग में त्रिलोक, राजा बलि और ओणम का रहस्य)

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*जगन्नाथ जी की मौसी कौन थी?

*जगन्नाथ जी की मौसी (मामी) का संबंध पौराणिक कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपनी मौसी के घर जाकर विश्राम करते हैं। इस संदर्भ में 'मौसी' का तात्पर्य रानी गुंडिचा से है, जो पुरी के पौराणिक राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थीं। एक अन्य कथा के अनुसार, वह भगवान कृष्ण की माता देवकी की सखी थीं, जिन्हें सुभद्रा ने 'मौसी' कहकर बुलाया था। गुंडिचा मंदिर, जहां देवता रथ यात्रा के दौरान सात दिन विश्राम करते हैं, उन्हीं का निवास स्थान माना जाता है। इसलिए, यह स्थान 'मौसी का घर' या 'गुंडिचा मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।

*जगन्नाथ पुरी में मौसी का घर कहां है?

*जगन्नाथ जी की मौसी का घर, जिसे गुंडिचा मंदिर कहा जाता है, पुरी के मुख्य श्री जगन्नाथ मंदिर से लगभग 03 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर ग्रैंड रोड के पास स्थित है और रथ यात्रा के दौरान इसका विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि यह वह स्थान था जहां रानी गुंडिचा (मौसी) निवास करती थीं। नौ दिवसीय रथ यात्रा उत्सव के दौरान, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने रथों पर सवार होकर यहां आते हैं और अगले सात दिनों तक यहीं विश्राम करते हैं। इस दौरान यह मंदिर उत्सव का केंद्र बन जाता है और लाखों भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। सातवें दिन 'बहुदा यात्रा' के बाद ही देवता वापस श्री मंदिर लौटते हैं।

*जगन्नाथ मंदिर में चमत्कार क्या है?

*जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कई अद्भुत और वैज्ञानिक रूप से अकाट्य चमत्कारों का वर्णन सदियों से किया जाता रहा है। सबसे प्रसिद्ध चमत्कार है मंदिर के ऊपर लहराता ध्वज (पताका) हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यह एक ऐसी घटना है जिसका स्पष्ट वैज्ञानिक कारण अब तक नहीं बताया जा सका है।

*एक अन्य आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मंदिर के शिखर (सुदर्शन चक्र) को किसी भी स्थान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि वह आपके सामने ही है। इस चक्र को 'नील चक्र' भी कहते हैं।

*इसके अलावा, मंदिर परिसर में स्थापित विशाल रसोई में प्रसाद बनाने की प्रक्रिया भी चमत्कारी मानी जाती है। यहां प्रसाद की मात्रा चाहे कितनी भी हो, कभी भी व्यर्थ नहीं जाती और न ही कम पड़ता है। साथ ही, मंदिर के शिखर के ठीक ऊपर से उड़ते हुए कोई पक्षी नहीं देखा जाता, जो एक रहस्य बना हुआ है। ये सभी घटनाएं भक्तों के लिए दिव्य शक्ति के प्रतीक हैं।

पूरी जगन्नाथ रथ यात्रा का कोलाज: भव्य रथ, 22 सीढ़ियाँ, लहराता ध्वज और मौसी का घर (गुंडिचा मंदिर)।

*जगन्नाथ मंदिर के बारे में 10 रोचक तथ्य क्या हैं?

*01. अधूरी मूर्तियां: जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां लकड़ी (दारु ब्रह्म) से बनी हैं और इन्हें विशेष रूप से अधूरा रखा गया है। ये मूर्तियां हर 12 या 19 वर्ष में बदली जाती हैं, जिसे 'नव कलेबर' कहते हैं।

*02. विश्व की सबसे बड़ी रसोई: मंदिर की रसोई (भोग मंडप) विश्व की सबसे बड़ी रसोई मानी जाती है। यहां 500 रसोइए और 300 सहयोगी 07 मिट्टी के बर्तनों को एक-दूसरे पर रखकर लकड़ी की आग पर प्रसाद (महाप्रसाद) बनाते हैं।

*03. महाप्रसाद की विशेषता: यहां का प्रसाद 'महाप्रसाद' कहलाता है और इसे जाति-धर्म से ऊपर माना जाता है। इसे 'अभक्ष्य भक्ष्य' माना जाता है, यानी इसे ग्रहण करने से पहले किसी भी प्रकार की शुद्धता की आवश्यकता नहीं होती।

*04. रहस्यमयी ध्वज: मंदिर के शिखर पर लगा लाल रंग का ध्वज (पताका) हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। इसे रोज शाम एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला ऊंचे शिखर पर चढ़कर बदलता है।

*05. हवा के विपरीत दिशा में धुआं: मंदिर के ऊपर महाप्रसाद बनाते समय निकलने वाला धुआं भी हवा की दिशा के विपरीत जाता दिखाई देता है।

*06. नील चक्र का रहस्य: शिखर पर लगा सुदर्शन चक्र (नील चक्र) इतनी कुशलता से लगाया गया है कि पुरी शहर के किसी भी कोने से देखने पर वह सामने की ओर दिखाई देता है।

*07. ध्वनि का अदृश्य होना: मंदिर के अंदर मुख्य गर्भगृह के ठीक सामने खड़े होकर कोई भी समुद्र की लहरों का शोर नहीं सुन सकता, लेकिन जैसे ही एक कदम बाहर रखते हैं, शोर सुनाई देने लगता है।

*08. रथों का निर्माण: रथ यात्रा में प्रयुक्त होने वाले तीनों रथ हर साल नए सिरे से बनाए जाते हैं। इन्हें बनाने के लिए विशेष प्रकार की लकड़ी का उपयोग किया जाता है और इस कार्य में कोई कील या लोहे का प्रयोग नहीं होता।

*09. श्री चेतन्य महाप्रभु का संबंध: 16 वीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन के प्रणेता श्री चेतन्य महाप्रभु ने पुरी में अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए और जगन्नाथ भक्ति को नया आयाम दिया।

*10. वास्तुशिल्प का चमत्कार: मंदिर का मुख्य शिखर इतना विशाल है कि दिन के किसी भी समय मंदिर की छाया जमीन पर दिखाई नहीं देती।

*पुरी में हर 12 साल में क्या होता है?

*पुरी में हर 12 से 19 वर्ष के अंतराल पर (ज्यादातर 12 या 19 वर्ष में) एक अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है, जिसे 'नव कलेबर' या 'नव यौवन' कहते हैं। 'कलेबर' का अर्थ है 'शरीर'। इस रहस्यमयी परंपरा के अनुसार, मंदिर में स्थापित जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वर्तमान लकड़ी की मूर्तियों को बदलकर नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।

*यह प्रक्रिया बेहद ही गोपनीय और विधि-विधान से पूर्ण होती है। इसके लिए मंदिर के दैत्य पुजारी (दैतापति) एक विशेष प्रकार की नीम की लकड़ी (दारु) की खोज करते हैं, जो श्री क्षेत्र में ही कहीं मिलनी चाहिए। इस लकड़ी पर दैवीय चिह्न (जैसे शंख, चक्र, गदा, पद्म) होने चाहिए। जब यह लकड़ी मिल जाती है, तो एक पवित्र समारोह में नई मूर्तियों का निर्माण 21 दिनों तक एक गुप्त स्थान पर किया जाता है। इस दौरान मुख्य मूर्तिकार एकांतवास में रहते हैं।

*अंत में, एक रात्रि में गुप्त रूप से पुरानी मूर्तियों से 'ब्रह्म पदार्थ' (जीवन सार) नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है। इसके बाद पुरानी मूर्तियों को कोपी तीर्थ के पास दफना दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र, तथा शाश्वत आत्मा के सिद्धांत का प्रतीक है। अंतिम बार नव कलेबर 2015 में हुआ था और अगला 2034 के आसपास होने की संभावना है।

("विष्णु-लक्ष्मी की वह रहस्यमयी यात्रा: जब धन की देवी बनीं एक माली की नौकरानी")

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*पुरी में क्या खरीदना चाहिए?

*पुरी की यात्रा स्थानीय हस्तशिल्प और स्मृति चिह्न खरीदने के बिना अधूरी है। यहां से आप जगन्नाथ-बलभद्र-सुभद्रा की पारंपरिक लकड़ी या पत्थर की मूर्तियां अवश्य ले सकते हैं, जो बेहद सुंदर और आकर्षक होती हैं। पिपली के Appliqué Work से बने कपड़े, थैले, छतरियां और दीवार के पर्दे खरीदने लायक हैं, जो रंग-बिरंगे कपड़ों पर कढ़ाई का अनूठा काम होता है। ताड़ के पत्तों पर हस्त निर्मित पेंटिंग (पट्टचित्र) भी प्रसिद्ध है, जिसमें पौराणिक कथाएं चित्रित होती हैं। इसके अलावा, प्रसाद के रूप में खाजा (पारंपरिक मीठा पकवान) और स्थानीय मिठाइयां ली जा सकती हैं। समुद्री सीपियों और शंख से बने आभूषण व सजावटी सामान भी खासे पसंद किए जाते हैं।

"जगन्नाथ रथ यात्रा का अनसारा (अनासरा) काल: भगवान के 15 दिन के विश्राम व औषधोपचार की प्रतिदिन की व्याख्या"

*पुरी की रथ यात्रा से पहले का 15 दिन का काल, जिसे 'अनसारा' या 'अनासरा' (शाब्दिक अर्थ: संगरोध/एकांत) कहते हैं, एक गहन धार्मिक एवं सांस्कृतिक अध्याय है। मान्यता है कि रथ यात्रा के 15 दिन पूर्व स्नान यात्रा के अवसर पर विशाल स्नान वेदी पर स्नान कराने के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा जी ज्वर (बुखार) से पीड़ित हो जाते हैं और उन्हें औषधि (दवा) व विश्राम की आवश्यकता होती है। इसलिए, उन्हें मंदिर के गर्भगृह से हटाकर 'अनसारा घर' (रत्न सिंहासन) नामक एक विशेष कक्ष में ले जाया जाता है, जहां वे अगले 15 दिन तक रहते हैं। इस अवधि में दर्शन बंद रहते हैं और केवल विशेष पुजारी ही उनकी सेवा में उपस्थित हो सकते हैं। यहां प्रतिदिन की प्रमुख गतिविधियां इस प्रकार हैं:

*प्रथम सप्ताह (प्रारंभिक उपचार एवं विश्राम):

*दिन 1-3 (आरंभिक देखभाल): स्नान के बाद देवताओं को नए, सूती वस्त्र पहनाए जाते हैं। पारंपरिक 'जड़ी-बूटियों वाली पंचामृत' (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) का सेवन कराया जाता है। मुख्य ध्यान शरीर के तापमान को सामान्य करने और ऊर्जा बहाल करने पर रहता है।

*दिन 4-7 (विशिष्ट आहार): इस चरण में देवताओं को विशेष रूप से तैयार फलों का रस, ठंडाई और हल्के, सुपाच्य भोग अर्पित किए जाते हैं। कथा है कि भगवान जगन्नाथ को उनका प्रिय 'पोडा पिठा' (एक प्रकार का मीठा पकवान) भी चखाया जाता है।

*द्वितीय सप्ताह (स्वास्थ्य लाभ एवं पुनरुद्धार):

*दिन 8-12 (शक्ति संचय): जैसे-जैसे देवताओं का स्वास्थ्य सुधरता है, भोग में विविधता लाई जाती है। पारंपरिक ओडिशी मिठाइयां, नारियल का मेवा और सुगंधित पान भी अर्पित किया जाता है। पुजारी वैदिक मंत्रों का पाठ करते रहते हैं।

*दिन 13-14 (पूर्व-यात्रा तैयारी): ये तैयारी के दिन होते हैं। देवताओं का 'नेत्रोत्सव' संपन्न होता है, यानी उनकी नई आंखें चित्रित की जाती हैं, जिससे वे दर्शन के लिए पुनः सज्ज हो जाते हैं। अंतिम स्वास्थ्य जांच की प्रक्रिया होती है।

*दिन 15 (यात्रा के लिए प्रस्थान): अनसारा काल की समाप्ति पर, देवताओं को विधि-विधान से रत्न सिंहासन से उतारकर शुद्धिकरण स्नान कराया जाता है और उन्हें रथयात्रा के लिए सज्ज किया जाता है। इसके पश्चात ही वे रथा रोहण के लिए तैयार होते हैं।

*इस पूरे 15 दिन के काल का दार्शनिक अर्थ यह है कि यह मानवीय संवेदनाओं, कमजोरियों और प्रकृति के चक्र से भगवान के जुड़ाव को दर्शाता है। यह इस सिद्धांत का प्रतीक है कि ईश्वर भक्त के सुख-दुःख में पूरी तरह सहभागी है।

"रथ यात्रा के बहुआयामी पहलू: वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण"

*जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक बहुआयामी सामाजिक-सांस्कृतिक घटना है।

*आध्यात्मिक पहलू: यह यात्रा ईश्वर की सुलभता और भक्ति मार्ग का प्रतीक है। माना जाता है कि इस यात्रा में शामिल होने या रथ खींचने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और पापों से मुक्ति मिलती है। यह जीवन रूपी रथ में परमात्मा रूपी सारथी के साथ यात्रा का द्योतक है।

*सामाजिक पहलू: यह उत्सव सामाजिक समरसता और समानता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। रथ खींचने का अधिकार सभी जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के लोगों के लिए समान है। यह भाईचारे और सामूहिक पहचान का संदेश देता है।

*आर्थिक पहलू: रथ यात्रा ओडिशा पर्यटन की रीढ़ है। लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से होटल, परिवहन, रेस्तरां, हस्तशिल्प बाजार और स्थानीय विक्रेताओं को अत्यधिक लाभ होता है। यह रोजगार सृजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाला एक बड़ा आयोजन है।

*वैज्ञानिक/तार्किक पहलू: कई परंपराओं के पीछे व्यावहारिक कारण दिखते हैं। अनसारा काल मूर्तियों के जल-स्नान के बाद प्राकृतिक रूप से सूखने और संरक्षण का समय हो सकता है। नए रथों का प्रतिवर्ष निर्माण लकड़ी के क्षरण से बचाव की तकनीक है। सोने की झाड़ू से सफाई (छेरा पहरा) प्रतीकात्मक शुद्धता के साथ-साथ धूल कणों के प्रसार को कम करने का एक पारंपरिक तरीका भी प्रतीत होता है।

"पाठकों के प्रश्न एवं उत्तर (FAQ)"

*प्रश्न: क्या रथ यात्रा में कोई भी रथ खींच सकता है?

उत्तर: हां, यह इस उत्सव की सबसे विशेष बात है। भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए कोई भेदभाव नहीं है। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, देश या पृष्ठभूमि का हो, रथ खींच सकता है और इसे अत्यधिक पुण्यप्रद माना जाता है।

*प्रश्न: यदि किसी कारणवश रथ यात्रा बीच में छोड़नी पड़े तो क्या होता है? क्या कोई दोष लगता है?

उत्तर:धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी अप्रत्याशित मजबूरी या आपात स्थिति के कारण यात्रा बीच में छोड़नी पड़ती है, तो इसे सीधे तौर पर कोई दोष नहीं माना जाता। माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ अत्यंत कृपालु हैं और भक्त की सच्ची भावना एवं परिस्थिति को समझते हैं। हां, पूर्ण यात्रा का जो पुण्य फल मिलता है, उसमें कमी आ सकती है, लेकिन कोई गंभीर दोष नहीं लगता।

*प्रश्न: रथ यात्रा के रथ किससे बनते हैं और इनकी क्या विशेषताएं हैं?

उत्तर:रथों का निर्माण विशेष नीम की लकड़ी (दारु) से किया जाता है। रोचक बात यह है कि इन्हें बनाने में किसी कील या कांटे का प्रयोग नहीं होता, सभी जोड़ बिना-बलौँ के होते हैं। तीनों रथ अलग-अलग होते हैं:

जगन्नाथ जी का रथ - नंदीघोष: 45.6 फीट ऊंचा, 16 पहिए, लाल-पीला रंग।

बलभद्र जी का रथ - तालध्वज: 45 फीट ऊँचा, 14 पहिए, लाल-हरा रंग।

सुभद्रा जी का रथ - दर्पदलन: 44.6 फीट ऊँचा, 12 पहिए, काला/नीला-लाल रंग।

"अनसुलझे रहस्य एवं चमत्कारिक तथ्य"

*पुरी का जगन्नाथ मंदिर और उससे जुड़ी रथ यात्रा कई ऐसे अनसुलझे रहस्यों से घिरी है, जो विज्ञान के लिए आज भी पहेली बने हुए हैं:

 *01. विपरीत दिशा में ध्वज और धुआं: मंदिर के शिखर पर लगा झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता दिखाई देता है। इसी प्रकार, मंदिर की रसोई से निकलने वाला धुआं भी हवा के रुख के विपरीत दिशा में बहता प्रतीत होता है। इन घटनाओं का स्पष्ट वैज्ञानिक कारण अब तक सामने नहीं आया है।

*02. महाप्रसाद का अद्भुत नियम: मंदिर की विश्व की सबसे बड़ी रसोई में बनने वाला महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता, चाहे श्रद्धालुओं की संख्या कितनी भी हो। साथ ही, इस प्रसाद को किसी भी समय व किसी भी स्थिति में बाँटा जा सकता है, यह कभी व्यर्थ नहीं जाता।

*03. समुद्री लहरों की ध्वनि का अंत: मुख्य मंदिर के सिंहद्वार (मुख्य द्वार) के अंदर खड़े होकर समुद्र की लहरों का शोर सुनाई देना बंद हो जाता है, जबकि एक कदम बाहर रखते ही शोर साफ सुनाई देने लगता है। यह ध्वनि विज्ञान के नियमों को चुनौती देती प्रतीत होती है।

*04. नियमित बारिश: कहा जाता है कि रथ यात्रा के दिन कभी भी बारिश न हुई हो, ऐसा कोई अवसर नहीं आया। यह मौसम विज्ञान के लिए एक रोचक तथ्य है।

"डिस्क्लेमर"

*यह ब्लॉग जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा से संबंधित सामान्य जानकारी, लोक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। इसमें दी गई किसी भी जानकारी को कानूनी, वित्तीय या धार्मिक दृष्टि से पूर्णतः सटीक निर्देश नहीं माना जाना चाहिए। विशेष रूप से अनसारा काल की प्रतिदिन की गतिविधियां पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जो स्रोतों के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

*रथ यात्रा में भाग लेने संबंधी किसी भी निर्णय या धार्मिक अनुष्ठान से पहले संबंधित मंदिर प्रशासन या एक योग्य धार्मिक विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें। लेखक या प्रकाशक किसी भी त्रुटि, चूक या पाठक द्वारा इस जानकारी के उपयोग से उत्पन्न किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। यह ब्लॉग केवल शैक्षिक एवं जानकारी पूर्ण उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है।





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