कब है अक्षय तृतीया2026: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथाएं | पूरा मार्गदर्शन

"अक्षय तृतीया2026 (19 अप्रैल) की: जानें सटीक तिथि व शुभ मुहूर्त, स्टेप-बाय-स्टेप पूजा विधि, आंवले का महत्व, गुप्त दान, पौराणिक कथाएं, क्या करें-क्या न करें और राशि अनुसार खरीदारी टिप्स, अबूझ मुहूर्त में शुभ कार्य करें"

"A spiritual image of a man and woman in traditional Indian clothes performing Akshaya Tritiya 2026 Puja of Lord Vishnu and Goddess Lakshmi under an Amla tree with puja thali."

*नमस्कार पाठकों! सनातन पंचांग के सबसे पवित्र और शुभ दिनों में से एक है अक्षय तृतीया। यह दिन अपने नाम के अनुरूप ही 'अक्षय' यानी कभी न खत्म होने वाले पुण्य और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले इस त्योहार को 'आखा तीज' या 'अक्ती' के नाम से भी जाना जाता है। 2026 में यह अति शुभ दिन रविवार, 19 अप्रैल को पड़ रहा है।

*अक्षय तृतीया का दिन दो ऐसे शुभ योगों के मेल से और भी विशेष हो जाता है - सूर्य और चंद्रमा दोनों अपने-अपने उच्च बल में होते हैं। इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि पूरा दिन ही शुभ माना गया है। इसीलिए इस दिन नए व्यवसाय की शुरुआत, मकान खरीद, गृहप्रवेश, वाहन खरीद, विवाह और सोना-चांदी खरीदने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं।

*यह दिन केवल धार्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि इसी दिन से त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था, भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म हुआ था और महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान, जप, तप या कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देता है, यानी उसका पुण्य कभी खत्म नहीं होता।

*इस ब्लॉग के माध्यम से हम आपको 2026 में अक्षय तृतीया के शुभ मुहूर्त, इसके पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व, आंवले के वृक्ष की पूजा का रहस्य, गुप्त दान की विधि और इस दिन किए जाने वाले खास कार्यों के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे। साथ ही, हम यह भी जानेंगे कि क्या 2026 में यह दिन विवाह और गृहप्रवेश के लिए उपयुक्त रहेगा और राशि के अनुसार इस दिन क्या खरीदारी करनी चाहिए। तो आइए, इस 'अक्षय' पुण्य के दिन के सभी रहस्यों और महत्व को समझते हैं।

"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर" 

*01.2026 में अक्षय तृतीया रविवार, 19 अप्रैल को है। जानें पूरी जानकारी 

*02.अक्षय तृतीया 2026 – शुभ मुहूर्त की सटीक जानकारी पाएं 

*03.अक्षय तृतीया: इस दिन क्या-क्या घटनाएं घटी थी। जानें संपूर्ण जानकारी? 

*04.अक्षय तृतीया: आंवले के वृक्ष का महत्व क्यों है  

*05.अक्षय तृतीया: गुप्त दान का क्या है महत्व 

*06.क्या 2026 में अक्षय तृतीया के दिन शादी और गृहप्रवेश के लिए अच्छा रहेगा क्या? 

*07.अक्षय तृतीया का पौराणिक कथा क्या है 

*08.अक्षय तृतीया और खरीदारी: राशि अनुसार क्या खरीदें? 

*09.अक्षय तृतीय में पूजा की विधि स्टेप बाय स्टेप बना कर दे 

*10.अक्षय तृतीया से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की जानकारी दें 

*12.अक्षय तृतीया के दिन क्या खाएं और क्या न खाएं 

*13.अक्षय तृतीया के दिन क्या करें और क्या न करें 

*14.अक्षय तृतीया से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर   

*15.अक्षय तृतीया से संबंधित अनसुलझे पहलुओ की सटीक जानकारी 

अक्षय तृतीया 2026 – शुभ मुहूर्त की सटीक जानकारी 

*2026 में अक्षय तृतीया का पर्व रविवार, 19 अप्रैल को मनाया जाएगा। सनातन पंचांग के अनुसार, यह तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ती है। इस दिन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसे सर्वार्थ सिद्धि योग वाला दिन माना जाता है, जिसमें किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। पूरा दिन ही शुभकारी है।

*तृतीया तिथि प्रारंभ: 19 अप्रैल 2026, सुबह 09:01 बजे से

*तृतीया तिथि समाप्त: 20 अप्रैल 2026, सुबह 07:27 बजे तक

*चूंकि तृतीया तिथि 19 अप्रैल को सूर्योदय के बाद प्रारंभ हो रहा है, इसलिए उदयातिथि के मान्य नहीं होकर तिथि का महत्व होगा।

*नियमानुसार 19 अप्रैल, रविवार का पूरा दिन ही अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाएगा और पूजा-पाठ व शुभ कार्य इसी दिन किए जाएंगे।

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"पूजा एवं दान का शुभ समय" (मुहूर्त):

*अक्षय तृतीया पर पूजन, स्नान, दान आदि कार्य विशेष रूप से सुबह के समय किए जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले) और प्रातःकाल को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। आप सुबह 7:00 बजे से 02:00 बजे के बीच का कोई भी समय पूजन के लिए चुन सकते हैं।

*इस दौरान चर मुहूर्त, लाभ मुहूर्त, अमृत मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त और विजय मुहूर्त रहेगा। साथ ही अमृत काल, त्रिपुष्कर योग और रवि योग का अद्भुत मिलन भी देखने को मिल रहा है।

*विशेष नोट: इस दिन सूर्योदय के बाद भरणी नक्षत्र, कृतिका नक्षत्र और रोहिणी नक्षत्र सुखद संयोग रहेगा। जो इसे और भी शुभ बना देगा। रोहिणी नक्षत्र को चंद्रमा की प्रिय नक्षत्र माना जाता है, जिससे इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य दोगुना फलदायी हो जाता है। सोना खरीदने, नए कार्य की शुरुआत या दान का कार्य दिन के प्रकाश में करना अधिक शुभ माना जाता है।

"अक्षय तृतीया में पूजा की स्टेप बाय स्टेप विधि"

*अक्षय तृतीया की पूजा सुबह जल्दी उठकर प्रारंभ करें। निम्नलिखित चरणों का पालन करें:

*प्रारंभिक तैयारी: सबसे पहले स्नान करें और स्वच्छ, पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।

*देवता स्थापना: एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान गणेश, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमाएं या चित्र स्थापित करें। लक्ष्मी जी को विष्णु जी के बाईं ओर रखें।

*कलश स्थापना: एक कलश में जल भरकर उसमें हल्दी, कुमकुम और सिक्के डालें। कलश के मुख पर आम के पत्ते और नारियल रखकर उसे चौकी पर स्थापित करें।

*पूजन क्रम: सबसे पहले भगवान गणेश का आवाहन कर उन्हें जल, फूल, अक्षत आदि अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करें। उन्हें चंदन, तुलसी दल (विष्णु जी को), कमल का फूल (लक्ष्मी जी को), फल और मिठाई का भोग लगाएं।

*मंत्र जाप व आरती: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" और "ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः" जैसे मंत्रों का जाप करें। अंत में दीपक जलाकर आरती करें और सभी परिजनों को प्रसाद वितरित करें।

*अक्षय तृतीया: इस दिन क्या-क्या घटनाएं घटी थीं? 

*अक्षय तृतीया कोई साधारण तिथि नहीं, बल्कि सनातन धर्म और इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। इस दिन को 'युगादि' भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन से सतयुग का अंत और त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। आइए जानते हैं इस पावन दिन से जुड़ी कुछ प्रमुख ऐतिहासिक एवं पौराणिक घटनाएं:

*01. त्रेता युग का आरंभ: पुराणों के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में सतयुग के बाद त्रेता युग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन ही हुई थी। यह वह युग था जब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया और धर्म की स्थापना की।

*02. भगवान परशुराम का जन्म: विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्म भी इसी दिन हुआ था। उन्हें 'चिरंजीवी' माना जाता है, जो कल्प के अंत तक तपस्या करते रहेंगे। इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है।

*03. मां गंगा का धरती पर अवतरण: पृथ्वी पर पवित्र नदी गंगा का अवतरण भी अक्षय तृतीया के दिन ही हुआ था। राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा इस दिन स्वर्ग से धरती पर उतरी थीं।

*04. महाभारत युद्ध की समाप्ति: महाकाव्य महाभारत के युद्ध की समाप्ति भी इसी दिन हुई थी। अठारह दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद इसी दिन विजय का उत्सव मनाया गया था।

*05. द्रौपदी को अक्षय पात्र की प्राप्ति: वनवास के दौरान जब पांडव भोजन की कमी से जूझ रहे थे, तब भगवान कृष्ण की कृपा से द्रौपदी को इसी दिन अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी, जो कभी खाली नहीं होता था और सभी की भूख मिटाता था।

*06. सुदामा की कृष्ण से भेंट: भगवान कृष्ण के बचपन के मित्र सुदामा उनसे भेंट करने और थोड़े से चावल का भेंट स्वरूप देने द्वारिका इसी दिन पहुंचे थे। कृष्ण ने उनकी भक्ति और सादगी से प्रसन्न होकर उन्हें अक्षय धन-संपदा से समृद्ध कर दिया था।

*07. कुबेर को कोषाध्यक्ष पद की प्राप्ति: धन के देवता कुबेर को भगवान शिव से कोषाध्यक्ष का पद और अक्षय धन-संपदा इसी दिन प्राप्त हुई थी।

*08. वेदव्यास और भगवान गणेश ने महाभारत की रचना प्रारंभ की: ऋषि वेदव्यास ने महाभारत की रचना का कार्य अक्षय तृतीया के दिन ही प्रारंभ किया था और लेखक के रूप में भगवान गणेश ने उनकी सहायता की थी।

*09. इसी दिन भीष्म पितामह ने अपना प्राण त्यागे थे। 6 माह तक बान की सैय्या पर सोते हुए भीष्म पितामह ने इसी अक्षय तृतीया के दिन का इंतजार किया था।

*इन घटनाओं से स्पष्ट है कि अक्षय तृतीया का दिन नए प्रारंभ, दैवीय कृपा, अटूट भक्ति और अक्षय समृद्धि का प्रतीक रहा है। यही कारण है कि आज भी लोग इस दिन को शुभ मानकर नए कार्यों की शुरुआत करते हैं।

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*अक्षय तृतीया: आंवले के वृक्ष का महत्व क्यों है?

*अक्षय तृतीया के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। इसे 'धात्री' यानी माता के समान पालन-पोषण करने वाला कहा गया है। आंवला के वृक्ष में मां लक्ष्मी का वास माना जाता है और इस दिन इसकी पूजा करने से अक्षय धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

*महत्व के कारण:

*01. त्रिदेव का निवास: मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का निवास होता है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव विराजमान हैं। इसलिए इसकी पूजा समस्त देवताओं की पूजा के समान मानी जाती है।

*02. भगवान विष्णु का प्रिय: आंवला भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने तपस्या में लीन माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए आंवले के वृक्ष के नीचे ही तप किया था। तभी से इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करने की परंपरा है।

*03. अक्षय फलदायी: जैसे अक्षय तृतीया का पुण्य कभी खत्म नहीं होता, वैसे ही आंवले का वृक्ष भी फल, छाया, औषधीय गुणों से भरपूर और सदैव फल देने वाला (अक्षय) है। इसकी पूजा से स्वास्थ्य, धन और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।

*04.इस दिन आंवला वृक्ष के नीचे भोजन करने का विधान है। मान्यता है कि आंवला वृक्ष के नीचे भोजन अमृत के समान हो जाता है और आंवला वृक्ष के नीचे भोजन करने से त्रिदेव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

*05.इस दिन सुबह स्नान करके आंवले के वृक्ष पर जल चढ़ाएं, सिंदूर लगाएं, फल-फूल चढ़ाएं और दीपक जलाएं। वृक्ष के चारों ओर परिक्रमा करें और पूजा के बाद आंवले का फल प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

"आंवले वृक्ष के नीचे भोजन करना क्यों है जरूरी और उसका महत्व"

*अक्षय तृतीया पर आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना एक पुरानी और शुभ परंपरा है, जिसके पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी गहरा महत्व छिपा है।

*धार्मिक एवं आध्यात्मिक कारण:

*आंवले के वृक्ष को त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का निवास माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन इस वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करने से तीनों देवताओं की कृपा प्राप्त होती है और भोजन एक पवित्र प्रसाद का रूप ले लेता है। विशेष रूप से अक्षय तृतीया के दिन, जो कभी न खत्म होने वाले पुण्य का प्रतीक है, इस वृक्ष के नीचे भोजन करने से अक्षय अन्न व सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। यह भोजन एक प्रकार का प्रसाद बन जाता है जो शारीरिक पोषण के साथ-साथ आत्मिक तृप्ति भी देता है।

*वैज्ञानिक व स्वास्थ्य लाभ:

*आंवला अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध है। इसका वृक्ष शुद्ध ऑक्सीजन और एक सकारात्मक वातावरण बनाए रखता है। ऐसा माना जाता है कि इसकी छाया में बैठने से मानसिक शांति मिलती है और भोजन आसपास के स्वच्छ व शांत वातावरण से ऊर्जा (प्राण) ग्रहण करता है। पुराने समय में ऋषि-मुनि भी आंवले के नीचे बैठकर भोजन व तपस्या करते थे, क्योंकि यह ध्यान व पाचन दोनों के लिए अनुकूल माना जाता था।

*सामाजिक व प्राकृतिक संदेश:

*यह परंपरा प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश भी देती है। यह हमें पेड़-पौधों के महत्व, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना को बनाए रखने की प्रेरणा देती है। इस प्रकार, यह साधारण दिखने वाली प्रथा एक संपूर्ण स्वास्थ्य, आध्यात्मिक उन्नति और प्रकृति से जुड़ाव का मार्ग प्रशस्त करती है।

*अक्षय तृतीया: गुप्त दान का क्या है महत्व? 

*अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य का विशेष महत्व है, लेकिन इस दिन 'गुप्त दान' की परंपरा का अपना ही एक विशेष आध्यात्मिक महत्व है। गुप्त दान का अर्थ है ऐसा दान जो बिना किसी को दिखाए या बताए, गुप्त रूप से किया जाए। इसे सबसे श्रेष्ठ प्रकार का दान माना गया है।

*महत्व:

*01. निस्वार्थ भाव: गुप्त दान करने से व्यक्ति के अंदर का अहंकार समाप्त होता है। दान करने वाला न तो प्रशंसा की अपेक्षा रखता है और न ही दान लेने वाले से किसी प्रकार की कृतज्ञता। यह पूर्णतः निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य है।

*02. अक्षय पुण्य: शास्त्रों में कहा गया है कि अक्षय तृतीया पर किया गया गुप्त दान अक्षय पुण्य फल देता है। चूंकि यह दान छिपकर किया जाता है, इसलिए इसका पुण्य भी सीधा ईश्वर के खाते में जमा होता है और कभी कम नहीं होता।

*03. दान लेने वाले का सम्मान: गुप्त दान से दान लेने वाले व्यक्ति का आत्मसम्मान बना रहता है। उसे किसी के सामने हाथ फैलाने या लाचारी जाहिर करने की जरूरत नहीं पड़ती।

*गुप्त दान कैसे करें?

*रात के समय या ऐसे समय में दान करें जब कोई देख न रहा हो।

*दान लेने वाले को सीधे उसकी जरूरत की वस्तु (जैसे अनाज, वस्त्र, शिक्षा सामग्री, दवाइयां आदि) या धन दें।

*बिना अपना नाम बताए या किसी प्रचार के यह कार्य करें।

*गरीब, जरूरतमंद, विद्यार्थी या गौशाला में चुपचाप दान दिया जा सकता है।

*इस प्रकार, गुप्त दान सिर्फ भौतिक सहायता नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का एक मार्ग भी है। अक्षय तृतीया का यह पावन दिन इस उच्चतम दान को करने के लिए सबसे उत्तम अवसर प्रदान करता है।

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*क्या 2026 में अक्षय तृतीया के दिन शादी और गृहप्रवेश के लिए अच्छा रहेगा? 

*जी हां, 2026 में अक्षय तृतीया का दिन (19 अप्रैल, रविवार) शादी (विवाह) और गृहप्रवेश जैसे महत्वपूर्ण संस्कारों के लिए अत्यंत शुभ और उत्तम माना जा रहा है। इसके पीछे ज्योतिषीय और धार्मिक दोनों ही कारण प्रबल हैं।

*01. अमृत काल योग, : अक्षय तृतीया को अमृत काल, त्रिपुष्कर योग और रवि योग सामान्यतः सर्वार्थ सिद्धि  वाला दिन माना जाता है, जिसमें किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। पूरा दिन शुभकारी होता है।

*02. रविवार का संयोग: 2026 में यह दिन रविवार को पड़ रहा है। रविवार सूर्य देव का दिन है, जो तेज, ऊर्जा, सत्ता और समृद्धि के प्रतीक हैं। रविवार को किए गए शुभ कार्यों से कार्य में सफलता, प्रतिष्ठा और दीर्घकालीन सुख मिलता है।

*03. तिथि और नक्षत्र का शुभ मेल: इस दिन तृतीया तिथि के साथ-साथ रोहिणी नक्षत्र भी होगा। रोहिणी नक्षत्र चंद्रमा की प्रिय नक्षत्र है और इसे विवाह, गृहप्रवेश, भूमि पूजन आदि के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। यह संयोग वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।

*सावधानी:

*हालांकि दिन बेहद शुभ है, फिर भी किसी भी शुभ कार्य से पहले विवाह के लिए दोनों वर-वधू की और गृहप्रवेश के लिए गृह स्वामी की व्यक्तिगत कुंडली का मिलान अवश्य करा लेना चाहिए। किसी विशेष ग्रह दशा के कारण कोई बाधा तो नहीं है, यह जानना आवश्यक है। फिर भी, सामान्य तौर पर, 2026 की अक्षय तृतीया शादी और गृहप्रवेश के लिए एक आदर्श तिथि प्रतीत होती है।

*अक्षय तृतीया का पौराणिक कथा क्या है? 

*अक्षय तृतीया की महिमा से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा है महर्षि दुर्वासा और सुदामा की कथा, जो भगवान कृष्ण की दिव्य लीला और अक्षय पुण्य के महत्व को दर्शाती है।

*सुदामा और श्री कृष्ण की मित्रता:

*सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे, जो बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र और सहपाठी थे। दोनों गुरु सांदीपनि के आश्रम में एक साथ रहकर विद्याध्ययन करते थे। समय बीतने पर श्री कृष्ण द्वारिकापुरी के राजा बन गए और सुदामा गरीबी में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक झोपड़ी में रहते थे, अक्सर भूखे सोना पड़ता था, लेकिन फिर भी उनकी भगवान कृष्ण में अटूट श्रद्धा थी।

*पत्नी का सुझाव और सुदामा की द्वारिका यात्रा:

*एक दिन सुदामा की पत्नी ने उनसे कहा, "प्रभु, आप तो स्वयं श्री कृष्ण के परम मित्र हैं। यदि आप उनसे मिलने जाएं तो निश्चय ही वे आपकी दुरावस्था देखकर कुछ सहायता करेंगे।" सुदामा को यह बात अच्छी नहीं लगी। वे निस्वार्थ मित्रता के पक्षधर थे और दोस्ती का लाभ उठाना नहीं चाहते थे। लेकिन पत्नी के बार-बार आग्रह करने पर और स्वयं श्री कृष्ण से मिलने की इच्छा से वे तैयार हो गए।

*पत्नी ने पड़ोस से थोड़े से चावल (चिउड़ा) मांगकर सुदामा के लिए भेंट स्वरूप बांध दिए, क्योंकि घर में खाने तक के लिए अनाज नहीं था। सुदामा वही चावल की पोटली लेकर द्वारिका की ओर चल पड़े।

*द्वारिका में श्री कृष्ण का स्वागत:

*जब सुदामा द्वारिका पहुंचे और कृष्ण के महल के द्वार पर खड़े हुए, तो पहरेदारों ने उनके फटे वस्त्र देखकर अंदर जाने से रोक दिया। तभी दूर से ही श्री कृष्ण ने अपने बचपन के मित्र को पहचान लिया। वे तुरंत दौड़े आए और सुदामा को गले लगा लिया। उन्होंने सुदामा के धूल-धूसरित पैर धोए, उन्हें अपने सिंहासन पर बैठाया और प्रेम से उनकी खैरियत पूछी।

*सुदामा श्री कृष्ण के इस प्रेम से अभिभूत हो गए और अपनी गरीबी का जिक्र करने में संकोच करने लगे। तभी कृष्ण ने मुस्कुराते हुए पूछा, "सखा सुदामा, क्या तुम मेरे लिए कुछ मिठाई लाए हो? मुझे तो तुम्हारे हाथ का स्वाद याद आ रहा है।" सुदामा लज्जा से सिर झुकाए रहे। कृष्ण ने स्वयं ही उनकी पोटली में से थोड़े से चावल निकालकर प्रेम से खाए और कहा, "धन्य हो सखा, तुम्हारे इस प्रेम भेंट के आगे सारे संसार का धन तुच्छ है।"

*सुदामा की वापसी और अक्षय समृद्धि:

*सुदामा कुछ दिन द्वारिका में रहे और फिर विदा लेकर अपने गांव लौटने लगे। रास्ते में उन्हें अपनी गरीबी का ख्याल आया और वे सोचने लगे कि कृष्ण ने उन्हें कुछ दिया तक नहीं। लेकिन जब वे अपने गांव पहुंचे तो हैरान रह गए। उनकी झोपड़ी की जगह एक विशाल सुंदर महल खड़ा था। उनकी पत्नी और बच्चे सुंदर वस्त्रों में महल से बाहर आए। सुदामा समझ गए कि यह सब उनके प्रिय मित्र श्री कृष्ण की कृपा है। कहा जाता है कि यह घटना अक्षय तृतीया के दिन ही घटी थी।

*कथा का सार:

*इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति और निस्वार्थ मित्रता का फल अक्षय (कभी न खत्म होने वाला) होता है। सुदामा ने भगवान को मात्र मुट्ठी भर चावल चढ़ाए थे, लेकिन उनकी निष्काम भावना के कारण उन्हें अक्षय संपदा प्राप्त हुई। इसीलिए अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु की पूजा और दान-पुण्य का विशेष महत्व है। यह दिन हमें सिखाता है कि शुभ कर्मों में निस्वार्थ भाव सबसे बड़ा होता है और उसका फल कभी नष्ट नहीं होता।

*अक्षय तृतीया और खरीदारी: राशि अनुसार क्या खरीदें? 

*अक्षय तृतीया को सोना-चांदी, ज्वेलरी, वाहन, जमीन या बर्तन खरीदने का अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु घर में सदैव समृद्धि लाती है। ज्योतिष के अनुसार, यदि आप अपनी राशि के अनुकूल वस्तु खरीदें तो उसका शुभ प्रभाव और भी बढ़ जाता है। आइए जानते हैं राशि अनुसार क्या खरीदारी करनी चाहिए:

*01. मेष राशि: इस राशि के जातकों को सोना खरीदना अत्यंत शुभ रहेगा। सोने की चेन या सोने के बर्तन खरीद सकते हैं। इससे करियर में उन्नति और आत्मविश्वास बढ़ेगा।

*02. वृषभ राशि: वृष राशि के लोगों को चांदी या सफेद रंग की वस्तुएं खरीदनी चाहिए। चांदी के बर्तन, सिक्के या सफेद कपड़े खरीद सकते हैं। इससे मानसिक शांति और वैवाहिक जीवन में सुख मिलेगा।

*03. मिथुन राशि: इनके लिए इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे नया मोबाइल, लैपटॉप या वाहन खरीदना शुभ रहेगा। किताबें या शिक्षण संबंधी सामग्री भी खरीद सकते हैं। इससे बुद्धि और संचार कौशल में वृद्धि होगी।

*04. कर्क राशि: कर्क राशि वालों के लिए जल से संबंधित वस्तु जैसे एक्वेरियम, तांबे के बर्तन या समुद्री शंख खरीदना लाभदायक रहेगा। रियल एस्टेट में निवेश भी अच्छा रहेगा। इससे भावनात्मक स्थिरता आएगी।

*05. सिंह राशि: इस राशि के जातकों को सोने के आभूषण विशेष रूप से शुभ फल देंगे। सोने की अंगूठी, ब्रेसलेट या लॉकेट खरीद सकते हैं। लाल रंग के कपड़े भी खरीदें। इससे प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान में वृद्धि होगी।

*06. कन्या राशि: कन्या राशि वालों को हरे रंग की वस्तुएं या पौधे खरीदने चाहिए। पन्ना रत्न या हरे रंग के कपड़े भी शुभ रहेंगे। स्वास्थ्य संबंधी उपकरण भी खरीद सकते हैं। इससे स्वास्थ्य और सेवाभाव में वृद्धि होगी।

*07. तुला राशि: तुला राशि के लोग सोना-चांदी दोनों खरीद सकते हैं। सजावटी वस्तुएं, कला-वस्तु या नए वस्त्र भी खरीद सकते हैं। इससे सौंदर्यबोध और वैवाहिक सुख में वृद्धि होगी।

*08. वृश्चिक राशि: इस राशि के जातकों के लिए लोहे या स्टील के बर्तन, औजार या जमीन/प्रॉपर्टी में निवेश शुभ रहेगा। लाल रंग का मूंगा रत्न भी खरीद सकते हैं। इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और रुके हुए काम बनेंगे।

*09. धनु राशि: धनु राशि वालों को पीतल के बर्तन, पीले रंग के कपड़े या पुस्तकें खरीदनी चाहिए। घोड़े या सूर्य से संबंधित कोई सजावटी वस्तु भी शुभ रहेगी। इससे ज्ञान और धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी।

*10. मकर राशि: मकर राशि के लोगों के लिए जमीन या भवन खरीदना सबसे शुभ रहेगा। काले रंग की वस्तुएं या लोहे का सामान भी खरीद सकते हैं। इससे करियर में स्थायित्व और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलेगी।

*11. कुंभ राशि: इस राशि के जातक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, विदेशी वस्तुएं या नीले रंग के कपड़े खरीद सकते हैं। सामाजिक कार्यों में दान भी दें। इससे नए अवसर मिलेंगे और मित्रता बढ़ेगी।

*12. मीन राशि: मीन राशि वालों के लिए मोती रत्न, चांदी या जल से संबंधित वस्तुएं खरीदना शुभ रहेगा। धार्मिक वस्तुएं जैसे मूर्ति, पूजा सामग्री भी खरीद सकते हैं। इससे आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति मिलेगी।

*सामान्य सलाह:

*अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही खरीदारी करें।

 *खरीदारी करते समय सकारात्मक विचार रखें।

*नई वस्तु को घर लाकर सबसे पहले अपने इष्ट देवता को अर्पित करें।

*सोना-चांदी खरीदते समय शुभ मुहूर्त (दिन के समय) का ध्यान रखें।

*अपनी राशि के अनुसार खरीदारी करने से आप न केवल अक्षय तृतीया का पुण्य प्राप्त करेंगे, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी उस वस्तु का शुभ प्रभाव आपके जीवन पर पड़ेगा।

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("कहां है निरमंड परशुराम मंदिर: जानें मातृ-हत्या के पश्चाताप से लेकर क्षत्रिय संहार तक का रहस्य")

*निष्कर्ष:

*अक्षय तृतीया वह पावन अवसर है जो हमें शुभ कर्मों, दान-पुण्य और नए सकारात्मक प्रारंभ के लिए प्रेरित करता है। 2026 में यह दिन रविवार को पड़कर और भी विशेष बन गया है। इस दिन की गई पूजा, दान और खरीदारी अक्षय फल देने वाली मानी जाती है। आशा है कि इस ब्लॉग के माध्यम से आपको इस पर्व के सभी पहलुओं की जानकारी मिल गई होगी। आप सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं!

"वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलू"

*आध्यात्मिक पहलू: यह दिन 'अक्षय' (कभी नष्ट न होने वाले) पुण्य का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन किए गए जप, दान, तप या कोई भी शुभ कार्य अनंत फल देते हैं और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

*सामाजिक पहलू: यह दिन सामाजिक एकता और परोपकार को बढ़ावा देता है। लोग दान-पुण्य, गरीबों को भोजन कराने और सामूहिक पूजा में भाग लेते हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द बढ़ता है।

*आर्थिक पहलू: इस दिन सोना, जमीन या वाहन खरीदने की परंपरा है। यह एक आर्थिक संकेत भी है जो वित्तीय योजना, बचत और सोने जैसे स्थिर निवेश को प्रोत्साहित करती है।

*वैज्ञानिक दृष्टिकोण: यह पर्व वैशाख मास में आता है, जब वातावरण शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक होता है। पवित्र नदियों में स्नान और दान के रूप में शीतल पेय वितरित करने की प्रथा गर्मी से राहत और सामुदायिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी सार्थक है।

"अक्षय तृतीया के दिन क्या खाएं और क्या न खाएं"

*व्रत में क्या खाएं: कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं। व्रत में सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस दिन खाई जाने वाली कुछ पारंपरिक व्यंजन हैं:

 *फलाहार और ड्राई फ्रूट्स।

*साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू के आटे की पकवान।

*दूध, मिठाई और फलों से बने व्यंजन जैसे श्रीखंड, मालपुआ, मोदक।

*सेंधा नमक का प्रयोग किया जा सकता है।

*क्या न खाएं: व्रत न रखने वाले भी इस दिन तामसिक भोजन से परहेज करते हैं। इसमें शामिल हैं:

*प्याज, लहसुन और मांस-मछली।

*चावल और गेहूं से बने व्यंजन (यदि व्रत है तो)।

*बासी या अशुद्ध भोजन।

*अक्षय तृतीया के दिन क्या करें और क्या न करें

https://www.hindudarmaranjeet.in/2025/12/blog-post_13.html

*क्या करें:

 *सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजा-दान करें।

*पितरों का तर्पण करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

*गरीबों और जरूरतमंदों को जल, वस्त्र, अनाज या भोजन का दान अवश्य करें।

*नए व्यवसाय, गृहप्रवेश या विवाह जैसे शुभ कार्य प्रारंभ कर सकते हैं।

*क्या न करें:

 *किसी से झूठ बोलना, कलह करना या नकारात्मक व्यवहार करने से बचें।

*घर में किसी को भूखा न रहने दें। भोजन दान करें।

*क्रोध या लालच जैसे विकारों से दूर रहने का प्रयास करें।

*अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

*01. अक्षय तृतीया पर किस देवता की पूजा की जाती है?

मुख्य रूप से भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान परशुराम (विष्णु जी के अवतार) का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है।

*02. क्या इस दिन सोना खरीदना जरूरी है?

सोना खरीदना एक लोकप्रिय और शुभ परंपरा है, जो स्थायी समृद्धि का प्रतीक है। हालांकि, यह अनिवार्य नहीं है। आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार चांदी, पीतल के बर्तन, नई वस्तुएं या यहां तक कि एक नया पौधा भी खरीद सकते हैं। मूल भावना एक नई और सकारात्मक शुरुआत करने की है।

*03. क्या अक्षय तृतीया के दिन शादी कर सकते हैं?

हां,इस दिन को "अबूझ मुहूर्त" माना जाता है, यानी बिना किसी शुभ घड़ी की गणना के किसी भी समय शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इसलिए विवाह, मुंडन, नामकरण जैसे संस्कारों के लिए यह दिन अति शुभ माना जाता है।

*04. इस दिन दान में क्या देना चाहिए?

*जल (जल दान)।

*शीतल पेय व मिठाई।

*अनाज, वस्त्र।

*पान-सुपारी।

*गाय को हरा चारा।

*दान हमेशा श्रद्धा से और किसी जरूरतमंद को ही देना चाहिए।

"अनसुलझे या विविध पहलू"

*अक्षय तृतीया से जुड़े कुछ ऐसे पहलू हैं जिन पर अलग-अलग मान्यताएं या चर्चाएं हैं:

*तिथि निर्धारण में भिन्नता: कभी-कभी चंद्र कैलेंडर के आधार पर तिथि की गणना में अंतर हो सकता है, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में यह त्योहार एक दिन पहले या बाद में भी मनाया जा सकता है। सटीक तिथि स्थानीय पंचांग के अनुसार तय होती है।

*अबूझ मुहूर्त' की अवधारणा: यह विचार कि पूरा दिन शुभ है, कई लोगों को आकर्षित करता है। हालांकि, आज भी कई लोग पूजा या खरीदारी के लिए दिन के विशेष "शुभ मुहूर्त" का पालन करते हैं, जो कि एक पारंपरिक दृष्टिकोण है।

*व्यावसायीकरण बनाम आध्यात्मिकता: वर्तमान समय में सोने की खरीदारी और विज्ञापनों पर जोर बढ़ने से कुछ लोग यह चर्चा करते हैं कि त्योहार का मूल आध्यात्मिक और सामाजिक सार कहीं पीछे न रह जाए। यह एक आधुनिक चुनौती है।

"डिस्क्लेमर"

*यह ब्लॉग पोस्ट केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए तैयार की गई है। इसमें दी गई सभी सामग्री, जैसे कि पूजा विधि, मुहूर्त, मान्यताएं और सलाह, विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, लोक परंपराओं और सामान्य ज्ञान पर आधारित हैं।

*पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं: यह सामग्री किसी भी प्रकार की धार्मिक, कानूनी, वित्तीय या ज्योतिषीय पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय (जैसे विवाह, गृहप्रवेश, बड़े निवेश आदि) से पहले योग्य और प्रमाणित पंडित, ज्योतिषी या संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

*क्षेत्रीय भिन्नताएं: धार्मिक प्रथाएं और मान्यताएं परिवार, समुदाय और भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। यहां बताई गई विधियां सामान्यीकृत हैं। आपकी पारिवारिक परंपरा सर्वोपरि है।

*सटीकता की गारंटी नहीं: तिथियों और समय के संबंध में हमने यथासंभव सटीक जानकारी देने का प्रयास किया है, लेकिन विभिन्न पंचांगों के आधार पर इसमें मामूली अंतर संभव है। किसी भी पूजा-अनुष्ठान के लिए अंतिम रूप से स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय स्रोत से ही तिथि-समय की पुष्टि करें।

*व्यक्तिगत जिम्मेदारी: इस ब्लॉग में दी गई किसी भी जानकारी के उपयोग से उत्पन्न होने वाले किसी भी परिणाम की जिम्मेदारी पाठक की स्वयं की होगी। लेखक या प्रकाशक किसी भी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, आकस्मिक या परिणामी क्षति के लिए उत्तरदायी नहीं है।



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