क्या है जगन्नाथ की आंखों का रहस्य: बड़ी आंखें, अधूरा रूप और पौराणिक कथा
byRanjeet Singh-
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"भगवान जगन्नाथ की विशाल आंखें और अधूरा रूप क्या रहस्य छिपाते हैं? जानें वैज्ञानिक, आध्यात्मिक कारण, पौराणिक कथा और अनसुलझे रहस्य। पुरी मंदिर से जुड़े रोचक तथ्य"
"भगवान जगन्नाथ की आंखों का रहस्य: एक अलौकिक दर्शन"
*सनातन धर्म के सबसे पवित्र और रहस्यमय देवताओं में से एक, भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अपने विशिष्ट और अद्वितीय स्वरूप के लिए जानी जाती है। उनकी विशाल, गोल आंखें, हाथ-पैरों का अभाव और लकड़ी से निर्मित स्वरूप हर भक्त और शोधकर्ता के मन में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। यह ब्लॉग आपको भगवान जगन्नाथ के इन्हीं रहस्यमय पहलुओं की यात्रा पर ले चलता है।
*क्या आपने कभी सोचा है कि उनकी आंखें इतनी बड़ी और विशाल क्यों हैं? क्या उनमें पुतलियां क्यों नहीं दिखतीं? उनका रूप अन्य देवताओं से इतना भिन्न क्यों है? हम इन प्रश्नों के गहराई में जाएंगे और पुरी के पवित्र मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाओं, दार्शनिक अर्थों एवं ऐतिहासिक तथ्यों को जानेंगे। आइए, भगवान जगन्नाथ के दिव्य और रहस्यमय स्वरूप के पीछे छिपे आध्यात्मिक संदेश को समझने का प्रयास करें।
"नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर"
*01.भगवान जगन्नाथ की आंखें इतनी बड़ी क्यों?
*02.जगन्नाथ की आंखों की कहानी क्या है?
*03.भगवान जगन्नाथ की आंखों का रंग कौन सा है?
*04.भगवान जगन्नाथ की आंखों में पुतलियां क्यों नहीं है?
*05.जगन्नाथ भगवान के हाथ-पैर क्यों नहीं हैं?
*06.क्या कोई और भगवान की आंखें बड़ी है क्या?
*07.भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा लकड़ी की बनी क्यों है?
*08.पुरी के जगन्नाथ मंदिर मैं स्थापित भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के मुख किस दिशा की ओर है?
*09.प्रतिमा निर्माण की पौराणिक कथा क्या है?
*10.ब्लॉग का वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना करें?
*11.ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उसका उत्तर की जानकारी दें?
*12.अनसूलझे पहलुओं की जानकारी दे?
*भगवान जगन्नाथ की आंखें इतनी बड़ी क्यों?
*भगवान जगन्नाथ की विशाल, गोलाकार आंखें उनकी प्रतिमा की सबसे आकर्षक और विशिष्ट विशेषता हैं। इस विशेष रूप के पीछे गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा है। मान्यता है कि ये विशाल नेत्र सर्वदर्शी हैं, जो ब्रह्मांड के हर कण को देख रहे हैं। वे सदैव अपने भक्तों पर दृष्टि बनाए रखते हैं, उनकी हर पुकार सुनते हैं और हर दुःख-सुख के साक्षी हैं। ये आंखें इस बात का प्रतीक हैं कि ईश्वर की दृष्टि सदैव सब पर है; वह कभी झपकती नहीं, कभी सोती नहीं।
*एक लोककथा के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का निर्माण हो रहा था, तो दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा ने एक शर्त रखी कि कोई भी उनके कार्य में विघ्न न डाले। लेकिन राजा इंद्रद्युम्न अधीर होकर कक्ष के अंदर झांकने लगे। इससे क्रोधित विश्वकर्मा कार्य अधूरा छोड़कर चले गए। तब स्वयं ब्रह्मा जी ने इन अधूरी मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा कर दी और उन्हें विशाल नेत्र प्रदान किए, जो इस संसार के सभी जीवों को देखने के लिए सदैव खुले रहते हैं।
*जगन्नाथ भगवान की आंखों की कहानी उनके अधूरे निर्माण और दिव्य हस्तक्षेप से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में नील माधव (भगवान विष्णु का एक स्वरूप) के दर्शन हुए। उन्होंने भगवान की एक मूर्ति बनवाने का निश्चय किया और दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा को इस कार्य के लिए आमंत्रित किया। विश्वकर्मा ने शर्त रखी कि वे एकांत में काम करेंगे और जब तक मूर्ति पूरी न हो, कोई दरवाजा न खोले।
*21 दिन बीतने पर जब कक्ष से कोई आवाज नहीं आई, तो चिंतित राजा ने दरवाजा तुड़वा दिया। अंदर उन्होंने अधूरी मूर्तियां (जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) देखीं, और विश्वकर्मा अदृश्य हो चुके थे। राजा निराश हो गए। तभी एक दिव्य वाणी हुई कि इन अधूरी मूर्तियों को ही भगवान का स्वरूप मानकर स्थापित किया जाए। कहा जाता है कि तब स्वयं भगवान ने प्रकट होकर इन मूर्तियों को अपनी विशाल, दिव्य दृष्टि प्रदान की, जो अब तक अपने भक्तों को निहार रही हैं।
*भगवान जगन्नाथ की आंखों का रंग कौन सा है?
*भगवान जगन्नाथ की आंखों को सामान्यतः काजल रंग या गहरे काले रंग का चित्रित किया जाता है। ये आंखें बिल्कुल गोल, विशाल और एक समान काले रंग की होती हैं, जिनमें पुतली का भेद नहीं दिखता। यह काला रंग अनंतता, रहस्य और समस्त ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार अंधेरी रात आकाश सभी रंगों और प्रकाश को समेटे रहता है, उसी प्रकार ये काली आंखें समस्त सृष्टि का ज्ञान और दर्शन समेटे हुए हैं।
*कुछ विद्वान इसे 'ब्रह्म' के निराकार, अनंत और अगाध स्वरूप का प्रतीक भी मानते हैं। यह रंग भगवान विष्णु के श्यामवर्ण का ही एक रूप है, जो सुख-दुःख, अच्छे-बुरे सभी का समान रूप से साक्षी है। रथयात्रा के समय जब मूर्तियों का श्रृंगार किया जाता है, तब इन आंखों पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि उनकी दिव्य दृष्टि और तेज बना रहे।
*भगवान जगन्नाथ की आंखों में पुतलियां क्यों नहीं है?
*जगन्नाथ भगवान की आंखों में पुतलियों का अभाव उनके सर्वव्यापी और निरंजन (बिना किसी विशेषता वाले) स्वरूप को दर्शाता है। सामान्य मनुष्य या अन्य देवमूर्तियों की आंखों में पुतली होती है, जो किसी एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करती है। लेकिन भगवान जगन्नाथ की आंखें बिना पुतली की हैं, जिसका अर्थ है कि उनकी दृष्टि किसी एक बिंदु या दिशा तक सीमित नहीं है। वह सर्वदर्शी हैं, एक साथ सभी दिशाओं में देख रहे हैं।
*यह रूप इस दार्शनिक सत्य का प्रतीक है कि ईश्वर न तो किसी रूप में सीमित है और न ही उसकी दृष्टि। वह सब कुछ एक साथ, समग्र रूप से देखता है। उनकी यह विशेष आंखें भक्त को यह संदेश देती हैं कि भगवान की दया और नजर हमेशा उस पर है, चाहे वह किसी भी दिशा में हो। यह अद्वैत (अद्वितीय) भाव की अभिव्यक्ति है।
*जगन्नाथ भगवान के हाथ-पैर क्यों नहीं हैं?
*जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं में हाथ-पैरों का स्पष्ट अभाव दिखता है। यह उनकी मूर्ति की एक मुख्य विशेषता है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो आध्यात्मिक व्याख्याएं प्रचलित हैं।
*पहली व्याख्या यह है कि यह रूप निर्गुण निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। भगवान सभी सीमाओं से परे हैं। हाथ-पैर सांसारिक कर्मों और गतिविधियों के साधन हैं, लेकिन भगवान इन सीमाओं से मुक्त हैं। दूसरी व्याख्या भक्ति भाव से जुड़ी है। माना जाता है कि जब भक्त इतने अधिक प्रेम और भावुकता में डूब जाता है कि वह भगवान को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाता है, तो भगवान भी उस आलिंगन में इतने विभोर हो जाते हैं कि उनके हाथ-पैर सिमट कर यूं ही हो जाते हैं। यह भक्त और भगवान के बीच के अत्यंत आत्मीय संबंध को दर्शाता है। एक लोक विश्वास यह भी है कि यह अधूरा रूप इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर को मनुष्य की सीमित दृष्टि से पूर्णतः नहीं समझा जा सकता।
*क्या कोई और भगवान की आंखें बड़ी है क्या?
*सनातन देवी-देवताओं के मूर्तिशिल्प में आंखों को विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन भगवान जगन्नाथ जितनी विशाल, गोल और प्रमुख आंखें शायद ही किसी अन्य देवता की मूर्ति में देखने को मिलती हैं। यह उनकी एक अद्वितीय और अत्यंत विशिष्ट पहचान है। हालांकि, कुछ अन्य देवताओं के भी विशेष नेत्र हैं, जैसे भगवान शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान और विनाश का प्रतीक है। देवी दुर्गा या काली की आंखों में तेज और रौद्र रूप दिखाया जाता है।
*बौद्ध धर्म में, बुद्ध की कुछ मूर्तियों में खुली हुई, बड़ी आंखें (जिन्हें 'विशाल नेत्र' कहा जाता है) दर्शाई जाती हैं, जो सर्वज्ञता का प्रतीक हैं। लेकिन डिजाइन और प्रतीकात्मकता के मामले में जगन्नाथ की आंखें अपना एक विशिष्ट स्थान रखती हैं, जो सीधे भक्त के हृदय से संवाद स्थापित करती प्रतीत होती हैं
*भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा लकड़ी की बनी क्यों है?
*अधिकांश सनातन मंदिरों में देव प्रतिमाएं पत्थर या धातु की होती हैं, लेकिन पुरी स्थित जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां नीम की लकड़ी से निर्मित हैं। इसके पीछे कई कारण हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न को भगवान की मूर्ति बनाने के लिए समुद्र तट पर एक दिव्य लकड़ी का बुना हुआ टुकड़ा प्राप्त हुआ था, जिससे मूर्तियां बनीं। प्रतीकात्मक रूप से, लकड़ी प्रकृति (पंचतत्व में से एक) का प्रतिनिधित्व करती है और यह इस बात का द्योतक है कि भगवान प्रकृति में व्याप्त हैं।
*एक महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि हर 12 या 19 वर्ष के अंतराल पर नई मूर्तियां बनाकर पुरानी मूर्तियों में समाहित दिव्य शक्ति (ब्रह्म पदार्थ) को नई मूर्तियों में स्थानांतरित कर दिया जाता है। यह 'नव कलेवर' या नया शरीर धारण करने की प्रक्रिया जीवन के नश्वर चक्र (जन्म-मृत्यु) का प्रतीक है, जहां आत्मा अमर है और शरीर बदलता रहता है। लकड़ी इस प्रक्रिया के लिए सर्वाधिक उपयुक्त पदार्थ है।
*पुरी के जगन्नाथ मंदिर में स्थापित भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के मुख किस दिशा की ओर है?
*पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में स्थापित मुख्य त्रिमूर्ति (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा) के मुख पूर्व दिशा की ओर हैं। मंदिर का मुख्य द्वार भी पूर्व में है, जिसे 'सिंहद्वार' कहते हैं। सनातनी परंपरा में पूर्व दिशा का बहुत महत्व है। सूर्योदय इसी दिशा में होता है, जो ज्ञान, नई शुरुआत और आशा का प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ का मुख पूर्व की ओर होने का अर्थ है कि वे सदैव अपने भक्तों को जीवन के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाना चाहते हैं।
*ऐसी मान्यता है कि भगवान सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ ही भक्तों पर अपनी कृपा बरसाना शुरू कर देते हैं। मंदिर के शिखर पर स्थित 'नील चक्र' (विष्णु का प्रतीक) भी इसी तरह सभी दिशाओं में दृष्टि रखता है, लेकिन मुख्य देवता का मुख पूर्व दिशा में ही रहता है।
*प्रतिमा निर्माण की पौराणिक कथा क्या है?
*भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के निर्माण की कथा अत्यंत रोचक और दिव्य है, जो मुख्य रूप से स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' और अन्य ग्रंथों में वर्णित है।
*कथा के अनुसार, सतयुग में मालव देश के राजा इंद्रद्युम्न एक परम विष्णु भक्त थे। एक बार उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उड़ीसा के नीलांचल पर्वत पर भगवान विष्णु 'नील माधव' के रूप में नीलमणि से बनी एक स्वयंभू मूर्ति में निवास करते हैं, जिनकी सेवा एक आदिवासी प्रमुख विश्ववसु करते हैं। राजा ने नील माधव के दर्शन की तीव्र इच्छा से नीलांचल की यात्रा की, लेकिन भगवान ने स्वप्न में उनसे कहा कि अब वे अंतर्ध्यान हो चुके हैं।
*निराश राजा को एक दिव्य वाणी हुई कि समुद्र तट पर एक दिव्य दारु (लकड़ी) प्राप्त होगी, उससे भगवान की मूर्ति का निर्माण करवाएं। तभी एक रहस्यमय वृद्ध ब्राह्मण (जो स्वयं विश्वकर्मा थे) आए और मूर्ति निर्माण का दायित्व लिया, पर शर्त रखी कि वे बंद कक्ष में काम करेंगे और जब तक मूर्ति पूर्ण न हो, कोई द्वार न खोले।
*राजा ने स्वीकार किया। कई दिन बीत गए, कक्ष से कोई आवाज नहीं आई। रानी गुंडिचा बहुत चिंतित हुईं और राजा से आग्रह किया कि देखें शिल्पी सुरक्षित तो है। अधीर होकर राजा ने दरवाजा तुड़वा दिया। अंदर शिल्पी अदृश्य हो चुके थे और केवल अधूरी मूर्तियां (बिना हाथ-पैर के) थीं। राजा अत्यंत दुखी हुए।
*तभी फिर से दिव्य वाणी हुई कि इन्हीं अधूरी मूर्तियों को भगवान का स्वीकृत स्वरूप मानकर विधि-विधान से स्थापित किया जाए। नारद मुनि ने प्रकट होकर राजा को समझाया कि यह रूप भगवान का 'कल्याणकारी स्वरूप' है। तब राजा ने ब्रह्मा जी को आमंत्रित किया, जिन्होंने मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा की। इसी दौरान एक और चमत्कार हुआ। एक श्रद्धालु बृहद्बल नामक भक्त इतनी श्रद्धा से भगवान को निहार रहा था कि उसकी आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई। तब से यह मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से जगन्नाथ की विशाल आंखों में देखता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
*इस प्रकार, अधूरी दिखने वाली ये मूर्तियां वास्तव में भगवान के अलौकिक, सर्वव्यापी और भक्तवत्सल स्वरूप का प्रतीक बन गईं। हर 12 या 19 वर्ष में होने वाला 'नव कलेवर' (नया शरीर धारण) इसी कथा और दिव्य प्रक्रिया को जीवंत रखता है, जहां नई लकड़ी से मूर्तियां बनाकर पुरानी मूर्तियों से दिव्य शक्ति को स्थानांतरित किया जाता है। यह कथा भक्ति, आस्था और दिव्य इच्छा की विजय का प्रतीक है।
"ब्लॉग का वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना"
*भगवान जगन्नाथ का स्वरूप और उनसे जुड़ी परंपराएं केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि एक बहुआयामी अध्ययन का केंद्र हैं।
*वैज्ञानिक पहलू: लकड़ी की मूर्तियों का नव कलेवर (पुनर्निर्माण) एक उल्लेखनीय प्रक्रिया है। नीम की लकड़ी का चयन वैज्ञानिक दृष्टि से समझदारी भरा है, क्योंकि यह प्रतिरोधी और टिकाऊ होती है। मूर्ति के आकार और बड़ी आंखों को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जा सकता है – यह रूप मानव मन पर एक गहरी छाप छोड़ता है, जो भक्ति को बढ़ाता है। इसके अलावा, मूर्ति निर्माण में प्रयुक्त रंगों और सामग्रियों का भी वैज्ञानिक आधार हो सकता है।
*सामाजिक पहलू: जगन्नाथ संस्कृति समावेशिता का प्रतीक है। यहाँ जाति, वर्ग या धर्म का भेद नहीं रहता। प्रसाद (महाप्रसाद) सभी को समान रूप से वितरित किया जाता है, जो सामाजिक समरसता को मजबूत करता है। रथयात्रा जैसे उत्सव सामूहिक सहयोग और सामाजिक सद्भाव का अद्भुत उदाहरण हैं।
*आध्यात्मिक पहलू: यहां का अपूर्ण रूप गहन दार्शनिक संदेश देता है – ईश्वर सभी सीमाओं और रूपों से परे है। बड़ी आंखें सर्वव्यापकता और सतत देखरेख का प्रतीक हैं। 'नव कलेवर' की परंपरा आत्मा के अमर और शरीर के नश्वर होने के सिद्धांत को दृश्य रूप देती है।
*आर्थिक पहलू: पुरी का जगन्नाथ मंदिर और इससे जुड़े उत्सव ओडिशा की अर्थव्यवस्था का मेरुदंड हैं। लाखों श्रद्धालुओं के आगमन से पर्यटन, होटल, परिवहन, हस्तशिल्प और प्रसाद निर्माण जैसे असंख्य व्यवसायों को गति मिलती है। इससे सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है, जो क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देता है
"ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उत्तर" (FAQ)
प्रश्न *01: क्या जगन्नाथ की मूर्ति हमेशा लकड़ी की ही होती है?
उत्तर: हां, पुरी के मुख्य मंदिर में स्थापित देवताओं (जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा) की मूर्तियां हमेशा विशेष नीम की लकड़ी (दारु) से ही बनाई जाती हैं। यह एक स्थापित धार्मिक परंपरा है। हर 12 या 19 साल में नई मूर्तियां बनाकर पुरानी मूर्तियों में निहित दिव्य शक्ति को उनमें स्थानांतरित किया जाता है।
प्रश्न *02: क्या जगन्नाथ भगवान केवल सनातनियों के देवता हैं?
उत्तर:जगन्नाथ संस्कृति सर्व समावेशक है। इतिहास में कई संत और भक्त (जैसे कबीर, रविदास) विभिन्न पृष्ठभूमि से आए थे। मंदिर का महाप्रसाद सभी जाति और धर्म के लोग ग्रहण करते हैं। इस तरह, जगन्नाथ एक सार्वभौमिक एकता के प्रतीक बन गए हैं।
प्रश्न *03: रथयात्रा का क्या महत्व है?
उत्तर:रथयात्रा (वार्षिक रथ उत्सव) जगन्नाथ संस्कृति का सबसे प्रमुख आयोजन है। यह भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) की यात्रा को दर्शाता है। यह उत्सव इस विश्वास का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों के बीच आते हैं और सभी के लिए आनंद व समानता का संदेश देते हैं।
प्रश्न *04: 'ब्रह्म पदार्थ' क्या है?
उत्तर:'ब्रह्म पदार्थ' एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमय तत्व है जो पुरानी मूर्तियों के हृदय भाग में रहता है। नव कलेवर के समय, इसे गुप्त रीति से पुरानी मूर्ति से निकालकर नई मूर्ति में स्थापित किया जाता है। मान्यता है कि यही भगवान की दिव्य चेतना या आत्मा है।
"अनसुलझे पहलू"
*भगवान जगन्नाथ से जुड़ी कई बातें आज भी रहस्य और शोध का विषय बनी हुई हैं:
*01. ब्रह्म पदार्थ का रहस्य: नव कलेवर की प्रक्रिया में स्थानांतरित होने वाला 'ब्रह्म पदार्थ' वास्तव में क्या है? इसकी प्रकृति, संरचना और इसके स्थानांतरण की सटीक विधि परम गोपनीय है। केवल चुनिंदा पुजारी ही इस प्रक्रिया के गवाह होते हैं, जिससे इसके बारे में अटकलें ही लगाई जा सकती हैं।
*02. मूर्ति के मूल डिजाइन का स्रोत: वर्तमान अद्वितीय रूप (बड़ी आंखें, अर्ध-निर्मित अंग) की प्रेरणा कहां से आई? क्या यह स्थानीय आदिवासी कला से प्रभावित है, या फिर यह दिव्य स्वप्न में प्राप्त हुआ एक पूर्णतः मौलिक रूप है? इस बारे में ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव है।
*03. मंदिर की वास्तुकला का रहस्य: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला में कई चमत्कारी तथ्य हैं, जैसे मंदिर की ऊंची गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय दिखाई नहीं देती, मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी या विमान नहीं गुजरता (स्थानीय मान्यता), और समुद्र की लहरों की आवाज मंदिर के अंदर सुनाई नहीं देती। इन घटनाओं के पीछे के वैज्ञानिक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।
*04. प्राचीन मूल मूर्ति का इतिहास: पौराणिक कथाओं में वर्णित मूल 'नील माधव' मूर्ति कहां गई? क्या वह कोई ऐतिहासिक वस्तु थी जो गायब हो गई, या यह पूरी तरह से एक प्रतीकात्मक कथा है? इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है।
"डिस्क्लेमर"
*इस ब्लॉग में प्रस्तुत की गई सभी जानकारियां विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं, लोक मान्यताओं, ऐतिहासिक शोधों और सामान्य ज्ञान पर आधारित हैं। लेखक का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार और विषय के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
*यह ब्लॉग किसी भी प्रकार की धार्मिक हठधर्मिता या कट्टरपंथ को बढ़ावा नहीं देता।
*कुछ तथ्यों की व्याख्या अलग-अलग स्रोतों में भिन्न-भिन्न मिल सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि गहन जानकारी के लिए मूल ग्रंथों और प्रामाणिक स्रोतों का अध्ययन करें।
*ब्लॉग में उल्लेखित कुछ चमत्कारिक घटनाएं या रहस्य आस्था और वैज्ञानिक तर्क के अलग-अलग क्षेत्रों से संबंधित हैं। पाठक अपने विवेक से उन पर विश्वास करने का निर्णय लें।
*ब्लॉग लेखक या प्रकाशक किसी भी धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत मतभेद के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।
*यह सामग्री मुख्यतः शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्य से तैयार की गई है।