कब है वट सावित्री व्रत 2026: जानें पूजा विधि, कथा, शुभ मुहूर्त, व्रत नियम पूर्ण गाइड

"16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत। जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, व्रत में क्या खाएं, संपूर्ण पौराणिक कथा, वैज्ञानिक महत्व और सभी जरूरी नियम। विवाहित महिलाओं के लिए पूरा मार्गदर्शन"

"Women worshipping the Banyan tree during the Vat Savitri fast, a scene from the mythological story of Savitri, Satyavan and Yamaraja"

"वट सावित्री व्रत: एक पावन संकल्प जो मनाता है अटूट विवाह बंधन का उत्सव"

*वट सावित्री व्रत सनातन धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत वट वृक्ष (बरगद) और सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जो पत्नी के त्याग, तप और अपने पति के प्राणों को यमराज से वापस लाने की अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक है। 16 मई 2026, शनिवार के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत में महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करके सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं और अपने पति के स्वास्थ्य व दीर्घ जीवन की कामना करती हैं।

 "नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर" 

*01.वट सावित्री पूजा का मुहूर्त एवं महत्व

*02.वट सावित्री व्रत 2026: शुभ मुहूर्त

*03.वट सावित्री पूजा विधि: स्टेप बाई स्टेप

*04.वट सावित्री की पौराणिक कथा

*05.पूजा के दिन क्या खाएं, क्या न खाएं

 *06.पूजा के दौरान क्या करें और क्या न करें

*07.वट सावित्री व्रत: वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व आर्थिक विवेचना

*08.वट सावित्री व्रत से जुड़े प्रश्नोत्तर

*09.वट सावित्री व्रत के कुछ अनसुलझे एवं चर्चित पहलू

"वट सावित्री व्रत 2026: पूर्ण मार्गदर्शिका, पूजा विधि, कथा एवं महत्व"

*वट सावित्री व्रत प्रति वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है, जिसे "ज्येष्ठ अमावस्या" या "वट सावित्री अमावस्या" कहा जाता है। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भी मनाया जाता है। 2026 में यह पूर्णिमा व्रत 31 मई 2026, दिन रविवार के दिन पड़ रहा है।
*इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि यह वट वृक्ष की पूजा का दिन है। वट वृक्ष को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। इसकी जटाएं (हवाई जड़ें) और विशाल फैलाव इसे दीर्घायु, स्थिरता और अनंत जीवन का प्रतीक बनाते हैं। सावित्री ने भी इसी वृक्ष के नीचे ही अपने पति सत्यवान के प्राणों को यमराज से वापस पाया था। इसलिए इस दिन वट वृक्ष की पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।

*पूजा का मूल उद्देश्य सावित्री के समान पतिव्रत धर्म का पालन करना और अपने पति की रक्षा के लिए देवी सावित्री से आशीर्वाद प्राप्त करना है। यह व्रत केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है जो पत्नी के हृदय में निहित प्रेम, समर्पण और संकल्प शक्ति को प्रकट करती है। यह दिन स्त्री शक्ति के उस स्वरूप का स्मरण कराता है, जो अपने तप, बुद्धि और निष्ठा से असंभव को भी संभव कर सकती है।

"वट सावित्री व्रत 2026: शुभ मुहूर्त" 

*वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा।
*अमावस्या तिथि प्रारंभ: 15 मई 2026, शुक्रवार, रात 08 बजकर 25 मिनट से।
*अमावस्या तिथि समाप्त: 16 मई 2026, शनिवार, शाम 04 बजकर 44 मिनट तक।

शुभ मूहूर्त पंचांग और चौघड़िया पंचांग के अनुसार इस प्रकार है 

अभिजीत मुहूर्त 11:15 बजे से लेकर 12:08 बजे तक और विजय मुहूर्त दोपहर 01:54 बजे से लेकर 02:47 बजे तक रहेगा।
चर मुहूर्त 11:42 बजे से लेकर 01:21 बजे तक लाभ मुहूर्त 01:21 बजे से लेकर शाम 03:00  बजे तक अमृत मुहूर्त 03:00 बजे बजे से लेकर 04:40 बजे तक रहेगा। इस दौरान आप पूजा अर्चना कर सकते हैं।
*चूंकि अमावस्या तिथि का प्रभाव 16 मई को दिन के समय अधिक है, इसलिए इस दिन व्रत व पूजा करना अधिक शुभ माना जाएगा। पूजन का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल या दोपहर के समय का माना जाता है। सूर्योदय के बाद से लेकर दोपहर 12 बजे के पहले का समय पूजा के लिए विशेष रूप से फलदायी होता है। वट वृक्ष की परिक्रमा और धागा बांधने का कार्य पूजा के अंत में किया जाता है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार मुहूर्त में थोड़े बहुत अंतर हो सकते हैं, अतः किसी स्थानीय पंडित या पंचांग से सटीक समय की पुष्टि कर लेना उचित रहता है।

"वट सावित्री पूजा विधि: स्टेप बाई स्टेप" 

*वट सावित्री व्रत की पूजा विधि बहुत ही सरल किंतु भावपूर्ण है। यहां स्टेप बाई स्टेप विधि दी जा रही है:

*01. पूर्व तैयारी:

*व्रत के एक दिन पहले से ही घर की साफ-सफाई कर लें। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे - पूजा का थाल, रोली, मौली, चावल, फूल, फल, मिठाई, जल से भरा कलश, दीपक, धूप, कुमकुम, हल्दी, सिंदूर, साड़ी/चुनरी (वट वृक्ष के लिए चढ़ाने हेतु), धागा (सूत), पीपल के पत्ते आदि तैयार कर लें।

*02. व्रत का प्रारंभ:

*व्रत वाली सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। साफ वस्त्र धारण करें। संकल्प लें कि आज आप पूरी श्रद्धा और निष्ठा से वट सावित्री व्रत का पालन करेंगी और अपने पति की दीर्घायु की कामना करेंगी।

*03. वट वृक्ष की खोज एवं पूजा स्थल तैयारी:

यदि संभव हो तो किसी पवित्र वट वृक्ष के पास जाएं। अगर वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो पीपल के वृक्ष या घर में ही किसी गमले में लगे वट/पीपल के पौधे की पूजा भी की जा सकती है। वृक्ष के चारों ओर साफ-सफाई करके रंगोली बनाएं। वृक्ष के समीप एक चौकी या पाटे पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर सावित्री-सत्यवान की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

*04. पूजन विधि:

*सबसे पहले वट वृक्ष को जल अर्पित करें।

*वृक्ष की जड़ में दूध और जल का मिश्रण चढ़ाएं।

*वृक्ष पर रोली, चावल, हल्दी, कुमकुम लगाएं और फूल चढ़ाएं।

*वृक्ष पर साड़ी या चुनरी चढ़ाएं और सूत के धागे को वृक्ष के तने के चारों ओर लपेटें।

*अब सावित्री-सत्यवान की मूर्ति/चित्र पर फूल, अक्षत चढ़ाएं और दीपक जलाएं।
"Women in traditional attire worshipping under a huge Banyan tree and a scene from the mythological tale of Savitri-Satyavan, along with a greeting message for Vat Savitri Vrat."

*05. परिक्रमा एवं धागा बांधना:

वट वृक्ष की 07, 11 या 108 परिक्रमा करते हुए सूत लपेटें। प्रत्येक परिक्रमा के साथ वृक्ष को जल अर्पित करें। यह परिक्रमा सावित्री के तप और संकल्प का प्रतीक है।

*06. कथा श्रवण:

पूजा के बाद वट वृक्ष के नीचे ही बैठकर सावित्री-सत्यवान की कथा को ध्यानपूर्वक सुनें या पढ़ें। यह कथा इस व्रत का मुख्य आधार है।

*07. आरती एवं प्रसाद वितरण:

कथा के पश्चात सावित्री-सत्यवान और वट वृक्ष की आरती करें। फिर प्रसाद (फल, मिठाई) सभी उपस्थित स्त्रियों और परिवारजनों में वितरित करें।

*08. व्रत का समापन:

पूरे दिन निराहार या फलाहार रहने के बाद शाम को पूजा के प्रसाद को ग्रहण करके या सांयकाल के समय पति के हाथों भोजन ग्रहण करके व्रत का समापन करें।

"वट सावित्री की पौराणिक कथा" 

*वट सावित्री की कथा एक ऐसी गाथा है जो नारी के तप, बुद्धि और पतिव्रत धर्म की अद्भुत शक्ति को दर्शाती है। यह कथा महाभारत के वन पर्व में मार्कंडेय ऋषि द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई है।

*पृष्ठभूमि:

*मद्र देश के एक न्यायप्रिय और धर्मात्मा राजा अश्वपति थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर देवी सावित्री प्रकट हुईं और उन्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान दिया। राजा की पत्नी ने उस कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम उन्होंने देवी के नाम पर ही "सावित्री" रखा।

*सावित्री अत्यंत रूपवती, गुणवती और तेजस्वी थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो उसके रूप और गुणों के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए। किंतु सावित्री को कोई भी वर पसंद नहीं आया। अंततः पिता ने उसे स्वयं वर ढूंढने के लिए कहा। सावित्री तीर्थ यात्रा पर निकली और एक वन में उसकी भेंट सत्यवान नामक एक युवक से हुई। सत्यवान श्रवण नामक एक वनवासी राजा का पुत्र था, जो अपने राज्य को खोकर अंधे हो गए थे और पत्नी के साथ वन में रहते थे। सत्यवान अत्यंत गुणवान, सुंदर और माता-पिता की सेवा में तत्पर था।

*सावित्री ने उसे देखते ही अपने हृदय में उसके प्रति अनुराग अनुभव किया और पिता के पास लौटकर उसी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। उस समय महर्षि नारद वहां उपस्थित थे। उन्होंने सत्यवान के बारे में एक भयानक भविष्यवाणी की। उन्होंने कहा कि सत्यवान निस्संदेह गुणवान है, किंतु उसकी आयु केवल एक वर्ष शेष है। वह आज से ठीक एक वर्ष बाद मृत्यु को प्राप्त होगा।

*यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को दूसरा वर चुनने को कहा। किंतु सावित्री अटल रही। उसने कहा, "हे पिताजी, मैंने एक बार जिसे मन से अपना वर चुन लिया है, उसे छोड़ नहीं सकती। चाहे उसकी आयु एक दिन की ही क्यों न हो, मैं उसी के साथ जीवन बिताना चाहती हूं।" सावित्री की दृढ़ इच्छाशक्ति देखकर राजा ने विवाह की स्वीकृति दे दी और सावित्री का विवाह सत्यवान से हो गया। सावित्री राजमहल का वैभव छोड़कर सादा जीवन व्यतीत करने वन चली गई और सास-ससुर एवं पति की सेवा में लग गई।

*समय की सीमा:

*जैसे-जैसे दिन बीतते गए, सत्यवान की मृत्यु का दिन निकट आता गया। नारद मुनि द्वारा बताए गए दिन से तीन दिन पहले से ही सावित्री ने उपवास रखना शुरू कर दिया। ससुर-सास ने उपवास छोड़ने को कहा, किंतु सावित्री अपने संकल्प पर अडिग रही।

*नियति का दिन:

*अंततः वह दिन आ गया जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी। सत्यवान जैसा ही वन में लकड़ी काटने के लिए निकला, सावित्री भी उसके साथ चल पड़ी। सत्यवान ने उसे मना किया, किंतु सावित्री नहीं मानी। वन में एक वट वृक्ष के नीचे सत्यवान ने लकड़ी काटनी शुरू की। तभी अचानक उसे तेज सिरदर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ ही क्षणों में उसके प्राण निकल गए।

*यमराज से संवाद:

*तभी सावित्री ने देखा कि एक भयानक दिखने वाला पुरुष, जिसके हाथ में पाश था, सत्यवान के शरीर से उसके प्राणों को निकालकर ले जा रहा है। वह कोई और नहीं, स्वयं यमराज थे। सावित्री घबराई नहीं। वह सत्यवान के शरीर को वट वृक्ष के नीचे रखकर स्वयं यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ी।

*यमराज ने उसे वापस लौट जाने को कहा, किंतु सावित्री ने कहा, "जहां मेरे पति जाएंगे, मैं भी वहीं जाऊंगी। यही सनातन धर्म है।" सावित्री के इस निष्ठापूर्ण और तर्कसंगत उत्तर से यमराज प्रभावित हुए। उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटाने से तो इनकार कर दिया, किंतु सावित्री को वरदान मांगने को कहा, सिवाय सत्यवान के प्राणों के।

*सावित्री ने पहला वरदान मांगा कि उसके अंधे सास-ससुर की दृष्टि वापस आ जाए। यमराज ने "तथास्तु" कहा। फिर भी सावित्री उनके पीछे चलती रही। यमराज ने दूसरा वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने वरदान मांगा कि उसके ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मिल जाए। यमराज ने वह भी दे दिया। किंतु सावित्री अब भी पीछे ही चलती रही।

*इस प्रकार सावित्री ने बुद्धिमानी से एक-एक करके तीन और वरदान मांगे। तीसरा वरदान था कि उसके पिता को सौ पुत्रों की प्राप्ति हो। चौथा वरदान में उसने स्वयं सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा। यमराज बिना सोचे-समझे "तथास्तु" कह बैठे।

*अब सावित्री ने चतुराई से यमराज को घेर लिया। उसने कहा, "हे धर्मराज! आपने मुझे सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान दिया है। किंतु मेरे पति के बिना यह कैसे संभव है? अतः आपको सत्यवान के प्राण वापस करने होंगे, तभी आपका वरदान सत्य हो सकता है।"

*सावित्री की बुद्धिमत्ता, निष्ठा और तर्क से यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, "हे पतिव्रते! तुम्हारे समान नारी इस संसार में दुर्लभ है। तुम्हारी निष्ठा और बुद्धि ने मुझे पराजित कर दिया है।" यमराज ने सत्यवान के प्राणों को मुक्त कर दिया और आशीर्वाद देकर अपने लोक चले गए।

*सावित्री वापस वट वृक्ष के पास आई, जहां सत्यवान के प्राण वापस आ चुके थे और वह जीवित हो उठा था। दोनों घर लौटे। जब वे घर पहुंचे तो सावित्री के सास-ससुर की दृष्टि वापस आ चुकी थी और उन्हें सूचना मिली कि उनका राज्य वापस मिल गया है। इस प्रकार सावित्री ने न केवल अपने पति के प्राणों को वापस पाया, बल्कि सभी के दुखों को दूर करके परिवार को पूर्ण सुख प्रदान किया।

*यही कारण है कि सावित्री का नाम आज भी पतिव्रता नारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और वट वृक्ष के नीचे ही इस व्रत का महत्व और नाम "वट सावित्री व्रत" पड़ा।

"पूजा के दिन क्या खाएं, क्या न खाएं" 

*वट सावित्री व्रत एक कठिन निर्जला या फलाहार व्रत होता है। इस दिन आहार संबंधी नियमों का पालन करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

*क्या खाएं (सात्विक आहार):

*फलाहार: व्रत के दौरान फलों का सेवन सर्वोत्तम माना जाता है। केला, सेब, अनार, आम, नारियल आदि फल ग्रहण किए जा सकते हैं।

 *मेवे: बादाम, काजू, अखरोट, किशमिश, मुनक्का आदि सूखे मेवे ऊर्जा प्रदान करते हैं।

*दुग्ध उत्पाद: दूध, दही, छाछ, मठ्ठा, घी, पनीर (बिना नमक का) लिया जा सकता है। खीर या दूध-चावल बनाकर भी ग्रहण किया जा सकता है।

*कंदमूल एवं अन्य: आलू, शकरकंद, सिंघाड़े का आटा, समाचावल (सामा के चावल), राजगिरा का आटा, कुट्टू का आटा, साबुदाना आदि से बने पकवान बिना नमक के बनाए जा सकते हैं।
*मिठाई: बिना अनाज और नमक वाली मिठाइयां जैसे फल की खीर, दूध की खीर, सिंघाड़े के आटे की पूरी/पकौड़ी (बिना नमक)।
*पेय पदार्थ: पानी, नींबू पानी (बिना नमक), फलों का रस, नारियल पानी, दूध, छाछ।

*क्या न खाएं (वर्जित आहार):

*अनाज: इस दिन गेहूं, चावल, चना, दाल, मक्का, बाजरा आदि किसी भी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित है।

*नमक: व्रत के दिन नमक का सेवन पूर्णतः त्याग दिया जाता है। नमक रहित भोजन ही किया जाता है।
*प्याज-लहसुन: ये तामसिक आहार माने जाते हैं, अतः इनका सेवन नहीं करना चाहिए।मांसाहार एवं अंडा: सभी प्रकार के मांसाहार और अंडे का सेवन वर्जित है।

*शराब एवं धूम्रपान: नशीले पदार्थों का सेवन पूर्णतः वर्जित है।

*तेल-मसालेदार भोजन: भारी तला-भुना या अधिक मसालेदार भोजन नहीं खाना चाहिए।

*ध्यान रहे, कई परिवारों में परंपरा के अनुसार यह निर्जला व्रत (बिना पानी पिए) भी रखा जाता है। कुछ स्त्रियां एक समय फलाहार करती हैं। यह व्यक्तिगत श्रद्धा और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है।

"पूजा के दौरान क्या करें और क्या न करें" 

*वट सावित्री व्रत की पवित्रता और फलदायित्व को बनाए रखने के लिए कुछ आचरणों का पालन करना चाहिए और कुछ बातों से बचना चाहिए।

*क्या करें (दोषमुक्त पूजा हेतु):

*पूजा से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीले या लाल रंग के वस्त्र शुभ माने जाते हैं।

*पूजा में उपयोग होने वाले सभी सामान (फल, फूल, जल आदि) शुद्ध और ताजे हों।

*पूजा के समय मन को एकाग्र रखें और पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ सावित्री-सत्यवान और वट वृक्ष का ध्यान करें।

*कथा को बहुत ध्यान से सुनें या पढ़ें। यह व्रत का मुख्य अंग है।

*वट वृक्ष की परिक्रमा पूरी निष्ठा और सावधानी से करें। प्रत्येक परिक्रमा में वृक्ष के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।

*पूजा के बाद कम से कम एक बार वट वृक्ष को जल अवश्य दें।

*यदि संभव हो तो इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा अवश्य दें।

*पूरे दिन सात्विक विचार रखें और अपने पति के प्रति प्रेम व समर्पण का भाव बनाए रखें।
*पति के प्रति मधुर व्यवहार रखें और उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें।

*क्या न करें (वर्जित कार्य):

*पूजा के दिन किसी से झगड़ा, बहस या कटु वचन न बोलें।

*पूजा करते समय मन में नकारात्मक विचार या किसी के प्रति द्वेष की भावना न लाएं।

*वट वृक्ष की पूजा करते समय उसकी शाखाओं को न तोड़ें या नुकसान न पहुंचाएं।

*पूजा की सामग्री में किसी प्रकार की कंजूसी या बचत न करें। जो भी सामग्री चढ़ाएं, पूरे मन से चढ़ाएं।

*व्रत के दिन आलस्य न करें। दिन भर साधारण कार्य कर सकते हैं, किंतु पूजा के समय पूर्ण रूप से समर्पित रहें।

*पूजा के बाद प्रसाद का अपमान न करें। इसे पवित्र भाव से ग्रहण करें।

*इस दिन झूठ बोलने या किसी प्रकार का छल-कपट करने से बचें।

*यदि व्रत रखा है तो दिन भर में किसी भी समय पूर्ण आहार ग्रहण न करें (जब तक कि व्रत का समापन न हो जाए)

*इन नियमों का पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और आध्यात्मिक अनुभूति गहरी होती है।

"वट सावित्री व्रत: वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व आर्थिक विवेचना" 

*वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि एक बहुआयामी सांस्कृतिक प्रथा है जिसके विभिन्न पहलू हैं।

*01. वैज्ञानिक पहलू:

*वट वृक्ष का महत्व: वट (बरगद) वृक्ष पर्यावरण संरक्षण में अग्रणी है। यह अधिक मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ता है, वायु प्रदूषण को कम करता है और जैव विविधता को आश्रय देता है। इसकी पूजा प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना जगाती है।

*निर्जला/उपवास का लाभ: आयुर्वेद के अनुसार, नियमित अंतराल पर उपवास रखना शरीर के लिए डिटॉक्सिफिकेशन (विषैले तत्वों को निकालना) का कार्य करता है। पाचन तंत्र को आराम मिलता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

*सामूहिक पूजा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: सामूहिक रूप से की जाने वाली यह पूजा स्त्रियों में सामूहिक चेतना, एकजुटता और सामाजिक समर्थन की भावना को मजबूत करती है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

*02. सामाजिक पहलू:

*स्त्री सशक्तिकरण का प्रतीक: सावित्री की कथा दरअसल एक स्त्री की असाधारण बुद्धि, दृढ़ संकल्प और तार्किक क्षमता की गाथा है। यह व्रत स्त्रियों को यह संदेश देता है कि वे केवल पराधीन नहीं, बल्कि अपने विवेक और तप से किसी भी संकट का सामना कर सकती हैं।

*पारिवारिक बंधनों का सुदृढ़ीकरण: यह व्रत पति-पत्नी के बीच के प्रेम, समर्पण और जिम्मेदारी के बंधन को मजबूत करता है। यह पारिवारिक एकता और सद्भाव को बढ़ावा देता है।
*सामुदायिकता: अक्सर यह पूजा सामूहिक रूप से की जाती है, जिससे पड़ोस और समुदाय में स्त्रियों के बीच आपसी संवाद, सहयोग और रिश्तों में मजबूती आती है।

*03. आध्यात्मिक पहलू:

*तप एवं संकल्प का प्रशिक्षण: यह व्रत व्यक्ति को आत्म-अनुशासन, संकल्प की दृढ़ता और इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास कराता है।

*नारी शक्ति की उपासना: देवी सावित्री की कथा के माध्यम से यह व्रत नारी में निहित दिव्य शक्ति (शक्ति स्वरूपा) के प्रति आस्था जगाता है।

*मृत्यु पर विजय का दार्शनिक संदेश: यह कथा मृत्यु के भय से ऊपर उठकर धर्म, सत्य और निष्ठा के पथ पर चलने का संदेश देती है। यह जीवन के नश्वरता के भाव को दर्शाते हुए भी आशावाद का पाठ पढ़ाती है।

*04. आर्थिक पहलू:

*स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: इस व्रत के समय पूजा सामग्री (फल, फूल, साड़ी, धागा, मेवे आदि) की मांग बढ़ जाती है, जिससे फल-फूल विक्रेताओं, कपड़ा दुकानदारों और छोटे व्यापारियों को आर्थिक लाभ होता है।

*हस्तशिल्प को प्रोत्साहन: पूजा में उपयोग होने वाली विशेष तालियां, पंखा, कलश, मूर्तियां आदि हस्तशिल्प उद्योग से जुड़े कारीगरों के लिए आय का स्रोत बनते हैं।

*पर्यावरणीय अर्थव्यवस्था: वट वृक्ष की पूजा और उसके संरक्षण का संदेश अप्रत्यक्ष रूप से दीर्घकालिक पर्यावरणीय लाभ देता है, जो आर्थिक स्थिरता के लिए आधार है।

*निष्कर्षतः, वट सावित्री व्रत एक ऐसा सांस्कृतिक उत्सव है जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध स्थापित करने में सहायक है।

"वट सावित्री व्रत से जुड़े प्रश्नोत्तर" 

प्रश्न *01: क्या कुंवारी लड़कियां वट सावित्री व्रत रख सकती हैं?

*उत्तर:पारंपरिक रूप से यह व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है। हालांकि, कुछ परंपराओं में कुंवारी कन्याएं भी अपने भावी वर की अच्छी सेहत और सुखी दाम्पत्य जीवन की कामना के लिए यह व्रत रख सकती हैं। साथ ही, कुछ स्थानों पर अविवाहित लड़कियां अपनी इच्छानुसार व्रत रखकर देवी सावित्री से अच्छे पति के लिए प्रार्थना करती हैं। यह मुख्यतः क्षेत्रीय मान्यताओं और परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।

प्रश्न *02: अगर घर के पास वट वृक्ष नहीं है तो क्या करें?

*उत्तर:यदि वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो पीपल के वृक्ष की पूजा की जा सकती है, क्योंकि इसे भी पवित्र माना गया है और यह वट वृक्ष के समान ही दीर्घजीवी होता है। यदि पीपल का वृक्ष भी न मिले तो घर में ही किसी गमले में लगे वट या पीपल के छोटे पौधे की पूजा की जा सकती है। आपात स्थिति में, घर में ही एक मिट्टी के बर्तन में वट या पीपल का पौधा लगाकर या उसकी एक टहनी को स्थापित करके उसकी पूजा कर सकते हैं। भावना और श्रद्धा सर्वोपरि है।

प्रश्न *03: क्या इस व्रत में सुहागन स्त्रियों को करी बनानी चाहिए?

*उत्तर:करी या सिंदूर लगाना सनातन सुहागन स्त्रियों का एक शुभ चिन्ह है। वट सावित्री व्रत के दिन स्त्रियां अपना श्रृंगार करती हैं, नए वस्त्र एवं आभूषण पहनती हैं और पूरे श्रद्धाभाव से पूजा करती हैं। करी या सिंदूर लगाना इस उत्सव और अपने सुहाग की खुशहाली का प्रतीक है। अतः हां, इस दिन करी लगानी चाहिए। पूजा में कई बार वट वृक्ष पर भी सिंदूर चढ़ाया जाता है।

प्रश्न *04: व्रत का समापन कब और कैसे करना चाहिए?

*उत्तर:व्रत का समापन प्रायः शाम के समय कथा पूजन के बाद किया जाता है। सबसे पहले पूजा का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद पति के हाथों भोजन या जल ग्रहण करके व्रत तोड़ा जाता है। कई परिवारों में पति के हाथ से पहला ग्रास खाकर ही व्रत का समापन होता है। यदि पति दूर हों तो उनकी फोटो के सामने प्रसाद रखकर या मानसिक रूप से उनका स्मरण करके व्रत तोड़ सकती हैं।

प्रश्न *05: क्या गर्भवती स्त्रियां यह व्रत रख सकती हैं?

*उत्तर:हां, गर्भवती स्त्रियां यह व्रत रख सकती हैं, किंतु उन्हें अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उन्हें कठोर निर्जला व्रत की बजाय फलाहार या दुग्धाहार व्रत रखना चाहिए। शारीरिक रूप से अधिक कमजोरी महसूस हो तो थोड़ा जल या फलों का रस ले सकती हैं। पूजा करते समय लंबे समय तक खड़े न रहें और आराम से बैठकर पूजा करें। सुरक्षा की दृष्टि से, गर्भवती स्त्री को व्रत रखने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

प्रश्न *06: अगर व्रत की तिथि भूल जाएं तो क्या करें?

*उत्तर:यदि मुख्य तिथि पर व्रत रखना भूल जाएं या किसी कारणवश न रख पाएं, तो अगले दिन या फिर अगले शनिवार को व्रत रखकर पूजा कर सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि शनिवार का दिन वट वृक्ष की पूजा के लिए विशेष फलदायी होता है। भगवान और देवी की कृपा प्राप्त करने के लिए मन की शुद्धि और पश्चाताप का भाव सबसे महत्वपूर्ण है।

प्रश्न *07: वट सावित्री और करवा चौथ व्रत में क्या अंतर है?

*उत्तर:दोनों ही व्रत विवाहित स्त्रियों द्वारा पति की लंबी उम्र के लिए रखे जाते हैं, किंतु इनमें कई अंतर हैं। करवा चौथ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है और यह निर्जला व्रत होता है जो चंद्रमा को अर्घ्य देकर तोड़ा जाता है। वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाता है और इसमें वट वृक्ष की पूजा व सावित्री-सत्यवान की कथा का विशेष महत्व है। करवा चौथ में करवे (मिट्टी के बर्तन) की पूजा होती है, जबकि वट सावित्री में वट वृक्ष की।

"वट सावित्री व्रत के कुछ अनसुलझे एवं चर्चित पहलू" 

*हर धार्मिक परंपरा की तरह वट सावित्री व्रत से जुड़े भी कुछ ऐसे पहलू हैं जो चर्चा या विवाद का विषय बने रहते हैं या जिनके बारे में एकराय नहीं है।

*01. केवल स्त्रियों द्वारा ही व्रत रखना: यह व्रत मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा ही रखा जाता है। एक पक्ष यह मानता है कि यह पारिवारिक जिम्मेदारियों के बंटवारे में लैंगिक असमानता को दर्शाता है, जहां पति के लंबे जीवन की जिम्मेदारी केवल स्त्री पर है। दूसरा पक्ष इसे स्त्री के प्रेम, त्याग और शक्ति के उत्सव के रूप में देखता है, न कि बोझ के रूप में। आधुनिक समय में कुछ पति भी अपनी पत्नियों के साथ इस व्रत में भागीदारी करते हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है।

*02. अंधविश्वास या आस्था का प्रश्न: कुछ लोग इसे अंधविश्वास मानते हैं कि एक व्रत रखने या एक वृक्ष की पूजा करने से पति की आयु बढ़ सकती है। वहीं, आस्थावान लोग इसे भावना, संकल्प और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़कर देखते हैं। यह मानसिक शांति और सकारात्मक विचारों के प्रसार का माध्यम है, जो अप्रत्यक्ष रूप से पारिवारिक वातावरण को अनुकूल बनाकर स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव डाल सकता है।

*03. सावित्री की कथा का आधुनिक संदर्भ में व्याख्या: कथा में सावित्री द्वारा यमराज का पीछा करना और बुद्धि से उन्हें पराजित करना, कई आधुनिक विचारकों के लिए चर्चा का विषय है। क्या यह स्त्री की जिद है या उसके अधिकारों के लिए संघर्ष? क्या यमराज से वरदान मांगने का तरीका चालाकी थी या बुद्धिमत्ता? इस कथा को स्त्री की सूझ-बूझ, तार्किक क्षमता और अडिग निष्ठा के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है, जो हर युग में प्रासंगिक है।

*04. पर्यावरणीय चिंता: बड़े पैमाने पर वट वृक्ष की पूजा के दौरान कई बार वृक्षों को नुकसान पहुंचता है (जैसे शाखाओं पर भारी सामान लटकाना, कील ठोकना आदि)। यह एक विरोधाभास है कि जिस वृक्ष की पूजा उसके संरक्षण के लिए की जाती है, उसी को पूजन के अज्ञानतावश नुकसान पहुंच जाता है। इसके लिए जागरूकता की आवश्यकता है कि पूजा प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जताने का तरीका है, न कि उसे हानि पहुंचाने का।

*05. कथा की ऐतिहासिकता: जैसे अधिकांश पौराणिक कथाओं के साथ होता है, वट सावित्री की कथा की ऐतिहासिक सत्यता को लेकर भी प्रश्न उठते रहते हैं। इसे ऐतिहासिक घटना के बजाय एक दार्शनिक एवं नैतिक आख्यान

*कथा की ऐतिहासिकता: जैसे अधिकांश पौराणिक कथाओं के साथ होता है, वट सावित्री की कथा की ऐतिहासिक सत्यता को लेकर भी प्रश्न उठते रहते हैं। इसे ऐतिहासिक घटना के बजाय एक दार्शनिक एवं नैतिक आख्यान के रूप में स्वीकार करना अधिक उचित होगा, जिसका उद्देश्य मानवीय मूल्यों को स्थापित करना है।
*ये अनसुलझे पहलू इस व्रत की बहुलवादी प्रकृति को दर्शाते हैं, जिस पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया जा सकता है।

"डिस्क्लेमर" 

*यह ब्लॉग पोस्ट "वट सावित्री व्रत" के बारे में सामान्य जानकारी, लोकप्रिय मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और सामान्य पूजा पद्धतियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को इस पावन पर्व के बारे में शैक्षणिक और ज्ञानवर्धक सामग्री प्रदान करना है।

*01. धार्मिक विविधता: हिंदू धर्म में विभिन्न सम्प्रदायों, क्षेत्रों और परिवारों की अपनी-अपनी पूजन पद्धतियां और मान्यताएं हो सकती हैं। यहां दी गई जानकारी सर्वसम्मत या सार्वभौमिक नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि वे अपने परिवार की परंपराओं, कुलदेवी/देवता की मान्यताओं और स्थानीय विद्वान पंडितों/गुरुओं के मार्गदर्शन को प्राथमिकता दें।

*02. ज्योतिषीय गणना: व्रत की तिथि और मुहूर्त की जानकारी सामान्य पंचांग के आधार पर दी गई है। स्थानीय सूर्योदय, सूर्यास्त और प्रचलित पंचांग के अनुसार इसमें थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है। सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त के लिए किसी विश्वसनीय ज्योतिषाचार्य या अपने क्षेत्र के प्रामाणिक पंचांग से सत्यापन कर लेना उचित रहेगा।

*03. स्वास्थ्य संबंधी सलाह: व्रत-उपवास से जुड़ी जानकारी सामान्य प्रकृति की है। गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, बुजुर्ग, बच्चे या किसी गंभीर बीमारी (जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग आदि) से पीड़ित व्यक्ति को बिना डॉक्टर की सलाह के कठोर उपवास नहीं रखना चाहिए। स्वास्थ्य सर्वोपरि है। आप फलाहार या दुग्धाहार का विकल्प चुन सकते हैं।

*04. वैज्ञानिक दावे: पर्यावरणीय या स्वास्थ्य संबंधी जो भी वैज्ञानिक तर्क दिए गए हैं, वे सामान्य अध्ययनों और मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें किसी चिकित्सकीय या वैज्ञानिक शोध का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए

*05. लेखकीय दायित्व: लेखक या वेबसाइट इस जानकारी के उपयोग या दुरुपयोग, अथवा इसमें दिए गए किसी भी सुझाव को अपनाने से होने वाली किसी भी प्रकार की हानि (शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या किसी अन्य) के लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होंगे।

"इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद। आप सभी को वट सावित्री व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं!"



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