“आषाढ़ शुक्ल एकादशी 14 जुलाई 2027 को मनायी जाने वाली देवशयनी एकादशी – इस ब्लॉग में विस्तृत कथा, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि-स्टेप-बाय-स्टेप एवं अचूक टोटके हिन्दी में प्रस्तुत हैं”
*देवशयनी एकादशी 2027
*देवशयनी एकादशी व्रत कथा
*देवशयनी एकादशी पूजा विधि
*देवशयनी एकादशी क्या खाएं
*देवशयनी एकादशी क्या ना करें
*देवशयनी एकादशी शुभ मुहूर्त
*देवशयनी एकादशी चातुर्मास
*आषाढ़ शुक्ल एकादशी
*भगवान विष्णु योगनिद्रा एकादशी
*प्रस्तावना
"सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी का विशिष्ट स्थान है। यह वह एकादशी है जब विष्णु देव चार-महीने (चातुर्मास) के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी तिथि से सभी शुभ कर्मों पर विराम माना जाता है। इस वर्ष (2027) में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है"
नीचे इस पवित्र तिथि पर पौराणिक कथा, व्रत-विधि, खाने-पीने का नियम, करना-ना करना, अचूक टोटके, पूजा विधि-स्टेप-बाय-स्टेप, शुभ मुहूर्त एवं प्रश्न-उत्तर सहित समग्र ब्लॉग प्रस्तुत है।
"पौराणिक कथा"
पुराणों में वर्णित है कि एक समय जब पृथ्वी पर धर्म, वर्षा, सुख-संपत्ति विद्यमान थी तब भी कभी-कभी देवताओं की कृपा छूट जाती थी। ऐसी ही कथा है चक्रवर्ती सम्राट मान्धाता की। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा थे, जो अत्यंत धर्मशील, दयालु और संकल्पशील थे। उनका राज्य समृद्धि-शाली था, लोग सुखपूर्वक रहते थे।
किन्तु अचानक तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, अग्नि मंद पड़ गई, रोग व्याप्त हो गए, अकाल और दुर्भिक्ष ने राज्य को घेर लिया। राजा ने सभी यज्ञ-हवन किए, परंतु राहत नहीं मिली। तब उन्होंने जंगल में जाकर महर्षि अंगिरा ऋषि से मिलकर परामर्श किया।
महर्षि ने बताया कि यह दुर्भिक्ष इस कारण हुआ है कि आपने अपने राज्य में सही रीति-रिवाजों से व्रत-उपवास नहीं किए हैं। उन्होंने राजा सम्राट को कहा – “आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी का विधि-पूर्वक व्रत करो, तब वर्षा होगी और प्रजा सुखी होगी।”
राजा ने समस्त धर्म-कर्तव्यों सहित उस दिन व्रत रखा। उन्होंने विशुद्ध स्नान कर, प्रभात में उपवास प्रारंभ किया, भगवान विष्णु का पूजन किया, कथा सुनी, संकल्प किया। तत् परिणामस्वरूप वर्षा बहाल हुई और राज्य पुनः समृद्ध हो गया।
वैकल्पिक कथा अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु ने शंखा सुर राक्षस का वध किया था और उस पराजय के बाद वे क्षीरसागर में चार माह के लिए विश्राम करने चले गए। उसी समय से उनका शयन आरंभ हुआ जो माह-अधिकमास, वर्षा ऋतु, शांत-काल से मेल खाता है। इस जंत्री अवस्था में देवताओं के भी शुभ अनुष्ठानों पर विराम माना गया।
इस प्रकार, देवशयनी एकादशी से ही चार-महीने का चातुर्मास आरंभ होता है। इस अवधि में विवाह-विवाह, गृह-प्रवेश, यज्ञ-हवन, भूमि-पूजन जैसे शुभ कार्यों को टालने का विधान है।
कथाओं में यह भी कहा गया है कि इस व्रत को करने से भक्तों के सारे पाप धुल जाते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, और मोक्ष-मार्ग आसान होता है।
इस वर्ष जब 14 जुलाई 2027 को यह व्रत किया जाएगा, तब ध्यान रहे कि वह देवशयनी की महिमा और नियम-अनुसार उपवास-पूजन सही रूप से करना चाहिए क्योंकि यह व्रत साधना, श्रद्धा व संयम का प्रतिक है।
"क्या खाएं और क्या ना खाएं"
✅ खाएं:
*व्रत के दिन हल्का सात्विक भोजन यानी दही-चावल, उपवास भोजन जैसे फल, दूध-दही, खीर।
*पीले रंग के फूल-फल जैसे केले, आम, पपीता आदि भगवान विष्णु को चढ़ाने और स्वयं ग्रहण करने योग्य।
*ताजे तुलसी-पत्ते, हल्दी-कम स्वाद वाला हल्के भोजन।
❌ "ना खाएं":
*इस दिन लहसुन-प्याज का उपयोग वर्जित है।
*मांस-मदिरा-मद्यपान सेवन पूरी तरह से वर्जित समझा गया है।
*आलस्य उत्पन्न करने वाले भारी भोजन, तामसिक पदार्थ जैसे बैंगन, पत्तल जैसी सब्जियां, मूली इत्यादि से बचना चाहिए।
*उपवास के दौरान अनावश्यक व्यंजन-खरीद-उपयोग से मना किया गया है।
"क्या करें और क्या ना करें"
✅ *करें:
*सूर्योदय से पूर्व जागना, शुद्ध स्नान करना, घर-आलय की सफाई करना।
*भगवान विष्णु की प्रतिमा अथवा पूजा-स्थल पर विधि-पूर्वक षोडशोपचार पूजा करना।
*पीले-वर्ण के वस्त्र पहनना, काले-नीले रंग से बचना।
*उपवास के दौरान मन को शुद्ध, शांत एवं भक्तिमय बनाए रखना।
*व्रत कथा सुनना-सुनाना, विष्णु के १०८ नामों का जाप करना।
*उपवास समाप्ति पर पारणा (खाना ग्रहण) करते समय दान-दान करना।
❌ *ना करें:
*विवाह-गृह-भूमि-पूजन-यज्ञ-हवन आदि शुभ कार्य इस दिन से चातुर्मास तक न करें।
*झूठ बोलना, चोरी-व्यभिचार, क्रोध, द्वेष, मद्य-मांस-असभ्य व्यवहार से वर्जित।
*पलंग-खटिया पर सोना, पत्नी-पति के संग सोना उपयुक्त नहीं माना गया।
*तामसिक वस्त्र पहनना, अशुद्ध सामग्री से पूजा करना।
"देवशयनी एकादशी से संबंधित प्रश्न एवं उत्तर"
"प्रश्न उत्तर"
*01. देवशयनी एकादशी कब होती है? आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को।
*02. इस व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या है? भगवान विष्णु का चातुर्मास हेतु शयन आरंभ तथा भक्तों को पवित्रता-व्रत के माध्यम से पुण्य प्राप्त करना।
*03. इस दिन किस रूप में भगवान विष्णु की पूजा होती है? उन्हें पीताम्बर में, सर्प शेष-पर स्थित क्षीरसागर में योगनिद्रा लेते हुए रूप में पूजना।
*04. व्रत के दौरान किन कार्यों से बचना चाहिए? विवाह-भूमि-यज्ञ-पूजन आदि शुभ कार्यों से, साथ ही तामसिक भोजन, दुष्कर्म व असत्य से।
*05. पारणा (खाना ग्रहण) कब करें? जब एकादशी तिथि समाप्त हो जाए अर्थात अगले दिन सूर्योदय के बाद उपयुक्त मुहूर्त में।
*06. इस व्रत का फल क्या है? पाप-क्षय, मनोकामना-पूर्ति, मोक्ष-साधन तथा चातुर्मास हेतु शुभ-आरम्भ।
"देवशयनी एकादशी के अचूक टोटके"
*01. सुबह सूर्योदय से पहले ताजी तुलसी के वृक्ष के नीचे जल चढ़ाएं और “ॐ वासुदेवाय नमः” ११ बार मंत्र जप करें।
*02. पीले रंग के फल-फूल से भगवान विष्णु को भोग लगाएं — विशेषत: केले, आम।
*03. व्रतधारी अपने घर की उत्तर-पूर्व दिशा में केले का एक पौधा लगाएं, उसके ऊपर मोली बांधें, गाय घी का दीपक जलाएं।
*04. शाम को उसी पौधे के पास भगवान को स्मरण करते दीपक जलाएं और अपनी मनोकामना-व्रत का संकल्प करें।
*05. उपवास समाप्ति के उपरांत उस पौधे को स्थानीय विष्णु मंदिर या पुजारी को दान करें — ऐसा करने से गृह-सुख एवं समृद्धि बनी रहती है।
"पूजा विधि – स्टेप बाय स्टेप"
*01. एकादशी के पूर्व संध्या में स्नान करें, साफ-सुथरे कपड़े पहनें (पीला या हल्का रंग पसंद).
*02. पूजा-मंडप को स्वच्छ करें, भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
*03. तुलसी-माला लगाएं, पीताम्बर चढ़ाए, ध्यान लगाएं कि वे क्षीरसागर में शेषनाग सर्प पर योगनिद्रा ले रहे हों।
*05. कथा वाचन करें — जैसे राजा मान्धाता की कथा जिसमें वर्षा हुआ।
*06. विष्णु सहस्रनाम जाप करें या कम-से-कम १०८ नामों का उच्चारण करें।
*07. उपवास के समय शाम तक फल, दूध-दही, हल्की खीर आदि लें, अनावश्यक भोजन से बचें।
*08. एकादशी तिथि समाप्ति पर पारणा करें (सूर्योदय के बाद).
*09. व्रत की समाप्ति पर दान-दान करें — ब्राह्मण भोजन, वस्त्र, अनाज आदि।
*10. अगले दिन से चातुर्मास के नियमों का पालन प्रारंभ करें — तंबाकू-मदिरा-मांस से स्वयं को दूर रखें।
"शुभ मुहूर्त एवं एकादशी दिन का कैसा रहेगा"
*इस वर्ष 2027 में आषाढ़ शुक्ल एकादशी बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है।
*एकादशी तिथि का शुभारंभ 13 जुलाई दिन मंगलवार को दोपहर को और 12:08 बजे प्रारंभ होकर एकादशी तिथि की समाप्ति 14 जुलाई दिन बुधवार दोपहर 01:10 बजे पर होगा। नक्षत्र अनुराधा, सूर्योदय सुबह 05:09 बजे पर होगा। सूर्य मिथुन राशि में और चंद्रमा वृश्चिक राशि में गोचर करेंगे।
"देवशयनी एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और रवि योग का अदभुत संगम है", जो इस एकादशी व्रत को बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण बना रहा है।
*सुबह जल्दी उठें, स्नान एवं पूजा के लिए उचित समय लें।
*एकादशी तिथि प्रारंभ से पूर्व-संध्या में संकल्प बैठाना लाभदायक है।
*पारणा का समय सूर्योदय के बाद शुभ माना जाता है — पंडित या स्थानीय पञ्चांग अनुसार देखें।
*इस दिन ग्रह-गोचर एवं राशि-परिस्थितियां सामान्य रहने का संकेत देती हैं — अर्थात धार्मिक व्रत-पूजन एवं संयम का समय।
*पूरे दिन की ऊर्जा भक्तिमय रहेगी, नए शुभ कार्यों के लिए यह दिन आरंभ नहीं है बल्कि समर्पण-व्रत का आरंभ है।
"किस रूप की होती है पूजा – भगवान विष्णु का कौन-सा रूप"
*इस दिन मुख्यतः भगवान विष्णु को योग निद्रावत् रूप में पूजना जाता है — अर्थात वे सर्प-शेष पर क्षीरसागर में लेटे हुए हैं। उन्हें पीताम्बर धारण, तुलसी-माला व पुष्प-भोग सहित पूजा करनी चाहिए। इस कारण इस एकादशी को ‘शयनी’ अर्थात शयन की एकादशी कहा गया। देवशयनी से चातुर्मास आरंभ होता है।
"डिस्क्लेमर"
*यह ब्लॉग धार्मिक-श्रद्धा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। इसमें वर्णित जानकारी पुराण, वेद, धार्मिक ग्रंथों, तथा विभिन्न पौराणिक स्रोतों पर आधारित है। तथापि, उपरोक्त विवरण आपके निजी धार्मिक आस्था, जात-पात, पौराणिक परंपरा एवं पंचांग अनुसार भिन्न हो सकते हैं। इस ब्लॉग में प्रतिपादित नियम-विधि, टोटके, मुहूर्त एवं कथा धार्मिक निर्देश हैं और इन्हें पालन करना व्यक्तिगत विवेक एवं आस्था-पर आधारित है।
*इस ब्लॉग द्वारा किसी भी प्रकार का चिकित्सीय, कानूनी या आर्थिक सुझाव नहीं दिया गया है। यदि आप विशेष धार्मिक शुभ मुहूर्त, कर्मकांड या उपवास-नियम से जुड़े निर्णय लेने जा रहे हैं, तो कृपया अपने स्थानीय पुजारी, ज्योतिषाचार्य या पण्डित से समर्पित परामर्श लें। इस ब्लॉग की सामग्री केवल सामान्य धार्मिक-ज्ञान के उद्देश्य से प्रस्तुत की गयी है एवं इसे पूर्णता-वश अथवा किसी विशेष परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।