"काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की सम्पूर्ण जानकारी पढ़ें। जानें भगवान शिव के काशी आगमन की पौराणिक कथा, मंदिर का इतिहास, सभी प्रमुख घाटों के बारे में, मां अन्नपूर्णा की महिमा और काशी को मोक्षदायिनी क्यों कहा जाता है।"
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"भूमिका: अविनाशी नगरी और भोलेनाथ का सर्वोच्च धाम"
सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथंश्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥
*अर्थात, "जो स्वयं आनंद के मूल हैं और आनंदपूर्वक आनंदवन (काशी) में निवास करते हैं, जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं, उन अनाथों के नाथ, काशी के स्वामी श्री विश्वनाथ की शरण में मैं जाता हूं।" यह श्लोक काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की महिमा का वर्णन करने के लिए पर्याप्त है।
*भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सातवें स्थान पर विराजमान यह ज्योतिर्लिंग सनातन धर्म का एक ऐसा केंद्र है जिसे केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव का स्थायी निवास स्थान माना जाता है।
*यह नगरी, जो भोलेनाथ के त्रिशूल की नोक पर टिकी है, सृष्टि के प्रलय में भी अविनाशी रहती है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम काशी विश्वनाथ के इतिहास, पौराणिक कथाओं, रहस्यों और इससे जुड़े समस्त पहलुओं पर एक व्यापक दृष्टि डालेंगे।
भाग *01: "काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की पौराणिक उत्पत्ति और कथाएं"
*काशी विश्वनाथ की स्थापना से जुड़ी एक से अधिक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जो इस स्थान की दिव्यता को और भी गहरा बनाती हैं।
कथा *01: "शिव-पार्वती का काशी प्रगमन और स्थायी निवास"
*शिव पुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध घटना पर आधारित है। कहा जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के बाद, माता पार्वती अपने पिता के घर में ही निवास कर रही थीं, जहां उनका मन नहीं लगता था। एक दिन, जब भगवान शिव उनसे मिलने आए, तो माता पार्वती ने उनसे अपने साथ चलने का आग्रह किया। भगवान शिव ने उनकी यह इच्छा स्वीकार की और उन्हें अपने साथ काशी ले आए।
*यह स्थान उन्हें इतना अधिक भाया कि वे यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए और तब से काशी ही उनका स्थायी निवास स्थान बन गया। यह कथा भगवान शिव के गृहस्थ जीवन और उनकी संपूर्ण परिवार के प्रति निष्ठा को दर्शाती है।
कथा *02: "शिव के त्रिशूल पर विराजमान काशी की रचना"
*शिव महापुराण में वर्णित एक दूसरी मूलभूत कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब कुछ भी नहीं था, भगवान शिव ने प्रकृति और पुरुष (विष्णु) की रचना की और उन्हें तपस्या करने का आदेश दिया。 तपस्या के लिए कोई उपयुक्त स्थान न पाकर, भगवान शिव ने अंतरिक्ष के तेज और सारभूत सामग्री से पांच कोस की एक भव्य नगरी का निर्माण किया।
*जब प्रलय के समय यह नगरी डूबने लगी, तो भगवान शिव ने इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। बाद में, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना होने पर, भगवान शिव ने इस नगरी को अपने त्रिशूल से उतार कर पृथ्वी पर स्थापित कर दिया और इसे 'काशी' नाम दिया。 इसके बाद, उन्होंने अपने 'अविमुक्त' नामक अंश से ज्योतिर्लिंग की स्थापना की और उसे हमेशा काशी में विद्यमान रहने का आदेश दिया। इस नगरी को 'कर्म के बंधनों का नाश' करने के कारण ही 'काशी' कहा जाता है।
कथा *03: "ब्रह्मा-विष्णु विवाद और ज्योतिर्लिंग का प्रकटन"
*एक अन्य रोचक कथा के अनुसार, एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से ब्रह्मांड में सर्वश्रेष्ठ के बारे में पूछा。 इससे दोनों में होड़ लग गई। तब भगवान शिव एक अंतहीन ज्योति स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए और दोनों को उसके अंत को खोजने को कहा。 भगवान विष्णु ने अंत न पाकर वापस लौट आए, जबकि ब्रह्मा जी ने झूठ बोल दिया कि उन्होंने अंत पा लिया है। भगवान शिव के क्रोध से भैरव की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को दंडित किया। यही ज्योति काशी में स्थापित हुई और काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग कहलाया।
भाग *02: "काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास और निर्माण"
*काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली, संघर्षपूर्ण और पुनरुत्थान की गाथा से भरा है।
*प्राचीनता: इस मंदिर का उल्लेख महाभारत और विभिन्न पुराणों में मिलता है, जो इसकी प्राचीनता को सिद्ध करता है।
* विद्वंस और पुनर्निर्माण: इतिहास में इस मंदिर को कई बार आक्रांताओं द्वारा ध्वस्त किया गया। विशेष रूप से मुगल शासक औरंगजेब ने इसे गिराकर उस स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया।
*वर्तमान मंदिर का निर्माण: वर्तमान में जो भव्य मंदिर हम देखते हैं, उसका निर्माण सन् 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। इस कार्य में तत्कालीन काशी नरेश महाराजा चेत सिंह ने सहयोग दिया था।
*स्वर्ण कलश: बाद में, पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सन् 1835 में मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया, जिसके कारण इसे 'स्वर्ण मंदिर' के नाम से भी जाना जाने लगा।
भाग *03: "काशी को मोक्षदायिनी नगरी क्यों कहा जाता है?
*काशी को 'मोक्षदायिनी नगरी' कहने के पीछे गहन आध्यात्मिक और पौराणिक मान्यताएं हैं।
*01. शिव का सान्निध्य: मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं इस नगरी में निवास करते हैं और प्राण त्यागने वाले प्रत्येक जीव को मोक्ष प्रदान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि काशी में मृत्यु होने पर भगवान शिव मरते हुए व्यक्ति के कान में 'तारक मंत्र' का उपदेश देते हैं, जो सीधे मोक्ष की ओर ले जाता है।
*82. त्रिशूल पर टिकी नगरी: चूंकि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है, इसलिए इसे सांसारिक बंधनों और प्रलय से परे माना जाता है। यह स्थान अनादि और अविनाशी है।
*03. गंगा का महत्व: पवित्र गंगा नदी यहां बहती है। मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान से सभी पाप धुल जाते हैं और आत्मा को शुद्धि मिलती है, जो मोक्ष की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।
*04. पाप नाशनी नगरी: काशी को 'कर्म के बंधनों का नाश' करने वाली नगरी कहा गया है। यहां का वातावरण ही ऐसा माना जाता है कि यह जीव के कर्म बंधनों को काट देता है।
भाग *04: "काशी के प्रमुख घाटों की विस्तृत जानकारी"
*वाराणसी में गंगा नदी के किनारे लगभग 88 घाट हैं। यहां कुछ प्रमुख और अत्यंत महत्वपूर्ण घाटों का विवरण दिया गया है।
*01. दशाश्वमेध घाट
*यह काशी के सबसे प्रमुख और पवित्र घाटों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां दस अश्वमेध यज्ञ किए थे, इसीलिए इसका नाम दशाश्वमेध पड़ा। यह घाट विश्वनाथ मंदिर के निकट है और यहां स्नान करने का विशेष पुण्य माना जाता है। प्रतिदिन होने वाली भव्य गंगा आरती इसी घाट से संचालित होती है, जो लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
*02. मणिकर्णिका घाट
*यह घाट काशी के सबसे पवित्र तथा रहस्यमय घाटों में से एक है और इसे मोक्ष का द्वार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर भगवान विष्णु ने तपस्या की थी और उनके पसीने की बूंदों से एक कुंड का निर्माण हुआ, जो मणिकर्णिका कुंड के नाम से प्रसिद्ध है। सनातन धर्म में विश्वास है कि इस घाट पर अंतिम संस्कार करने और यहां प्राण त्यागने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहां चिताओं की अग्नि लगभग हमेशा जलती रहती है, जो जीवन-मृत्यु के चक्र की निरंतरता का प्रतीक है।
*03. अस्सी घाट
*यह घाट शहर के दक्षिणी छोर पर अस्सी नदी और गंगा नदी के संगम पर स्थित है। यह घाट विशेष रूप से साहित्य और संस्कृति प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है। माना जाता है कि महान संत कबीरदास यहां रहते थे। आज, यह घाट एक सजीव सांस्कृतिक केंद्र है, जहां यात्री, साधु-संत और बुद्धिजीवी एकत्रित होते हैं। यहां का शांत वातावरण इसे ध्यान और विश्राम के लिए एक आदर्श स्थान बनाता है।
*04. हरिश्चंद्र घाट
*इस घाट को 'अधिकारी कब्र' या 'दूसरा चिता घाट' के नाम से भी जाना जाता है। यह घाट राजा हरिश्चंद्र की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था। मणिकर्णिका घाट की तरह, यहां भी अंतिम संस्कार किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर दाह संस्कार करने से व्यक्ति को मोक्ष मिलता है और राजा हरिश्चंद्र के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
*05. तुलसी घाट
*इस घाट का नाम महान कवि संत तुलसीदास के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने यहां रहकर सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथ 'रामचरितमानस' की रचना की थी। कहा जाता है कि तुलसीदास का अंतिम संस्कार भी इसी घाट पर किया गया था। घाट पर एक छोटा मंदिर है जहां तुलसीदास की एक प्रतिमा स्थापित है। यह घाट भक्तों और साहित्य प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है।
"काशी (वाराणसी) के 88 प्रमुख घाटों के नाम हिंदी में इस प्रकार हैं":
*01. अस्सी घाट
*02. गंगा महल घाट
*03. रीवा घाट
*04. तुलसी घाट
*05. बछराज घाट
*06. जैन घाट
*07. जलालपुर घाट
*08. दरभंगा घाट
*09. सोमेश्वर घाट
*010. प्रह्लाद घाट
*011. राणा महल घाट
*012. दिग्पतिया घाट
*013. शिवाला घाट
*014. गुलरिया घाट
*015. हनुमान घाट
*016. कर्ण घाट
*017. केदार घाट
*018. चौसट्टी घाट
*019. मणिकर्णिका घाट
*020. सिंधिया घाट
*021. बंडा घाट
*022. मीर घाट
*023. फूलवाड़ा घा
*024. दशाश्वमेध घाट
*025. प्रयाग घाट
*026. ओंकार घाट
*027. मंगला गौरी घाट
*028. वर्धमान घाट
*029. स्थित घाट
*030. जानकी घाट
*031. पंचकोटी घाट
*032. राजा घाट
*033. आदि केशव घाट
*034. चौकी घाट
*035. क्षेमेश्वर घाट
*036. मान मंदिर घाट
*037. त्रिपुरा भैरवी घाट
*038. मीर घाट (दूसरा)
*039. ललिता घाट
*040. बैजनाथ घाट
*041. शीतला घाट
*042. गंगा घाट
*043. गणेश घाट
*044. राम घाट
*045. जटाशंकर घाट
*046. गदाधर घाट
*047. त्रिलोचन घाट
*048. नन्देश्वर घाट
*049. बालेश्वर घाट
*050. अमरेश्वर घाट
*051. जगन्नाथ घाट
*052. खोरी घाट
*853. क्षमावाणी घाट
*054. बद्री नारायण घाट
*055. त्रिवेणी घाट
*056. शंकठा घाट
*057. गंगा महल घाट (दूसरा)
*058. लक्ष्मी घाट
*059. भोसला घाट
*060. सालम घाट
*061. महा निर्वाणी घाट
*062. श्री पंचगंगा घाट
*063. दुर्गा घाट
*064. ब्रह्मा घाट
*065. बुद्ध घाट
*066. अहिल्याबाई घाट
*067. सांची घाट
*068. पंचगंगा घाट
*069. प्रभु घाट
*070. चेत सिंह घाट
*071. नया घाट
*072. प्रभोधानन्द घाट
*073. राजा भर्तृहरि घाट
*074. गंगा घाट (दूसरा)
*075. मोती घाट
*076. मुंशी घाट
*077. अहिल्या घाट
*078. शीतला घाट (दूसरा)
*079. दरियाबाद घाट
*080. नेपाली घाट
*081. लाल घाट
*082. गैबी घाट
*083. बंगाली घाट
*084. भैरव घाट
*885. फ़तेह सिंह घाट
*086. राणा घाट
*087. तेलिया घाट
*088. राजेंद्र प्रसाद घाट
भाग *05: विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित अन्य देवी-देवता
*काशी विश्वनाथ मंदिर केवल एक ज्योतिर्लिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विशाल परिसर है जहां सनातन धर्म के कई अन्य महत्वपूर्ण देवी-देवताओं के मंदिर स्थापित हैं।
*मां अन्नपूर्णा: मंदिर के निकट ही मां अन्नपूर्णा का भव्य मंदिर है, जिन्हें 'अन्न की देवी' माना जाता है。 उनकी महिमा है कि वे समस्त संसार को अन्न प्रदान करने वाली और भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद मां अन्नपूर्णा के दर्शन करने से भक्त के घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
*काल भैरव: काशी विश्वनाथ के दर्शन को तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक भक्त काल भैरव के दर्शन नहीं कर लेते。 काल भैरव को काशी का 'कोतवाल' (प्रशासक) माना जाता है और ऐसा विश्वास है कि बिना उनकी अनुमति के कोई भी काशी में नहीं रह सकता।
*देवी संकटा: सिंधिया घाट के पास देवी संकटा का एक महत्वपूर्ण मंदिर है, जिन्हें 'संकट विमुक्ति दायिनी' (संकटों को दूर करने वाली) कहा जाता है। मंदिर परिसर में एक विशाल सिंह की प्रतिमा है।
*नवग्रह मंदिर: काशी में नौ ग्रहों के नौ मंदिर हैं, जहां ज्योतिषीय दोषों से मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।
*मृत्युंजय महादेव: काल भैरव मंदिर के निकट ही मृत्युंजय महादेव का मंदिर है। मान्यता है कि इस मंदिर के जल में कई रोगों को नष्ट करने की शक्ति है।
*काशी की गंगा आरती एक अत्यंत भव्य और आकर्षक अनुष्ठान है, जिसकी शुरुआत अपेक्षाकृत हाल के इतिहास में हुई है। इसकी शुरुआत, समय, नियम और महत्व की संपूर्ण जानकारी नीचे दी गई है।
📜 "गंगा आरती का इतिहास और महत्व"
*आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली यह भव्य गंगा आरती की परंपरा सदियों पुरानी नहीं, बल्कि 1991 में शुरू की गई थी।
*आरंभिक चरण: इसकी नींव 1985 में काशी के तीर्थ पुरोहित किशोरी रमण दुबे (बाबू महाराज) और स्वर्गीय मुंडन महाराज ने रखी थी। शुरुआत में, यह आरती केवल गंगा दशहरा और देव दीपावली जैसे विशेष पर्वों पर ही आयोजित की जाती थी।
*नियमित आरती: 1991 में पंडित सतेंद्र मिश्र (मुंडन महाराज) के नेतृत्व में इसे नियमित रूप से शुरू किया गया। शुरुआत में केवल एक पुजारी आरती करते थे, फिर धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़कर तीन, पांच और अब सात हो गई है, जिन्हें मां गंगा के सप्तऋषि का प्रतीक माना जाता है।
*प्रेरणा: माना जाता है कि इस आरती की प्रेरणा हरिद्वार में होने वाली गंगा आरती से मिली थी।
*धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व: गंगा आरती केवल एक दृश्य-आनंद का आयोजन नहीं है। यह गंगा नदी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, उनका आभार जताने और प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शाने का एक प्रतीक है। मान्यता है कि इस आरती में शामिल होने और मंत्रों का श्रवण करने से आत्मिक शुद्धि होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
🕒 "गंगा आरती का समय और स्थान"
*गंगा आरती दिन में दो बार – सुबह और शाम – होती है, लेकिन शाम की आरती सबसे अधिक भव्य और प्रसिद्ध है। समय मौसम के अनुसार परिवर्तित होता है:
*ऋतु सुबह की आरती (अधिकतर अस्सी घाट पर) शाम की आरती (मुख्यतः दशाश्वमेध घाट पर)
*ग्रीष्म ऋतु (मार्च-अक्टूबर) सुबह 5:00 - 5:30 बजे के लगभग शाम 6:45 - 7:30 बजे के लगभग
*सर्दियों का मौसम (नवंबर-फरवरी) सुबह 5:15 - 5:45 बजे के लगभग शाम 5:45 - 6:30 बजे के लगभग
⚖️ "गंगा आरती के नियम और आचरण"
*गंगा आरती में भाग लेते समय कुछ नियमों और शिष्टाचार का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि अनुभव पवित्र और सुखद बना रहे:
"क्या करें":
*पवित्रता का ध्यान रखें: आरती में शामिल होने से पहले स्नान करके जाना चाहिए।
*शांति बनाए रखें: आरती के दौरान मंत्रोच्चार और प्रार्थनाओं में ध्यान भंग न करें।
*सम्मानजनक पोशाक पहनें: मर्यादित और सादे वस्त्र पहनें।
*स्थान की स्वच्छता का ध्यान रखें।
"क्या न करें":
*आरती के बाद नदी में पैर न रखें: आरती के तुरंत बाद नदी में पैर रखना या स्नान करना अनादर माना जाता है, क्योंकि मान्यता है कि उस समय देवी गंगा का वास होता है।
*फ्लैश के साथ फोटोग्राफी न करें: इससे पुजारियों और अन्य भक्तों का ध्यान भंग हो सकता है।
*खाने-पीने या कूड़ा करकट से बचें।
*झूठे VIP टिकटों के ठगी से सावधान रहें: आरती में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क है।
💡 "एक बेहतर अनुभव के लिए सुझाव"
*नौका से दर्शन: आरती का दृश्य नाव पर बैठकर देखना एक अविस्मरणीय और शांतिपूर्ण अनुभव हो सकता है।
*विशेष अवसर: यदि संभव हो तो कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) के अवसर पर काशी आएं। उस दिन सभी घाट दीयों की रोशनी से जगमगा उठते हैं और आरती का दृश्य और भी भव्य हो जाता है। काशी की गंगा आरती आस्था और सौंदर्य का अद्भुत संगम है।
भाग 6: "अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न" (FAQs)
प्रश्न *01: काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव के किस रूप की पूजा होती है?
उत्तर:काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव 'ज्योतिर्लिंग' रूप में पूजे जाते हैं, जो उनके निराकार, अनंत और दिव्य प्रकाश स्वरूप का प्रतीक है。 इसके साथ ही, उन्हें 'विश्वनाथ' या 'विश्वेश्वर' के रूप में भी पूजा जाता है, जिसका अर्थ है 'सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी'। मंदिर के गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग की स्थापना ईशान कोण में हुई है, जो ज्ञान और तंत्र की दिशा मानी जाती है।
प्रश्न *02: क्या विश्वनाथ मंदिर में कोई शक्ति पीठ है? माँ का कौन सा अंग यहां गिरा था?
उत्तर:जी हां, काशी को एक शक्ति पीठ माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने माता सती के दग्ध शरीर को 51 भागों में काटा था, तो उनका 'कर्ण कुंडल' (कान का झुमका) यहां काशी में गिरा था। इस स्थान पर देवी 'विशालाक्षी' एवं 'मणिकर्णी' के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान मणिकर्णिका घाट से जुड़ा हुआ है।
प्रश्न *03: भगवान शिव परिवार के साथ काशी में क्यों निवास करने आए?
उत्तर:इसके पीछे दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। पहली, जो शिव पुराण में वर्णित है, के अनुसार विवाह के बाद माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव उन्हें कैलाश छोड़कर काशी ले आए और यहीं बस गए। दूसरी कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान शिव ने ही काशी की रचना की और संसार के प्राणियों को कर्म बंधन से मुक्ति दिलाने के लिए यहां अपने ज्योतिर्लिंग की स्थापना की।
प्रश्न *04: काशी में और कौन-कौन से प्रसिद्ध धार्मिक मंदिर हैं?
*उत्तर:काशी असंख्य मंदिरों की नगरी है। कुछ अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर हैं:
*दुर्गा मंदिर (मंकी टेम्पल): लाल रंग का यह मंदिर दुर्गा माँ को समर्पित है।
*संकट मोचन मंदिर: भगवान हनुमान जी का यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक माना जाता है।
*बिंदु माधव मंदिर: भगवान विष्णु का यह प्राचीन मंदिर बेहद महत्वपूर्ण है।
*भारत माता मंदिर: इस मंदिर में भारतवर्ष का एक विशाल राहत मानचित्र स्थापित है।
*तुलसी मानस मंदिर: इस मंदिर में संत तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के सभी श्लोक दीवारों पर अंकित हैं।
भाग *07: विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी कुछ अनकही और रोचक बातें
*शिव-शक्ति का दुर्लभ संयोग: काशी एकमात्र ऐसा स्थान है जहां शिव (विश्वनाथ) और शक्ति (अन्नपूर्णा) एक साथ और निकट विद्यमान हैं। मां अन्नपूर्णा जीवन को अन्न देकर पोषित करती हैं और बाबा विश्वनाथ मृत्यु के बाद मोक्ष प्रदान करते हैं। यह संयोग काशी को पूर्णता प्रदान करता है।
*अघोर दिशा में विराजमान: मंदिर में ज्योतिर्लिंग का मुख उत्तर दिशा यानी 'अघोर दिशा' की ओर है। जब भक्त गर्भगृह में प्रवेश करता है, तो सबसे पहले उसे शिव के इसी अघोर रूप के दर्शन होते हैं, जो सभी पापों और बंधनों को नष्ट कर देने वाला माना जाता है।
*महान संतों की साधना स्थली: इस मंदिर में आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे महान संतों ने दर्शन किए और साधना की। कहा जाता है कि संत एकनाथ ने यहीं पर 'श्री एकनाथ भागवत' ग्रंथ की रचना पूरी की थी।
"निष्कर्ष"
*काशी विश्वनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता, संस्कृति और आस्था का केंद्र है। यह वह स्थान है जहाँ जीवन और मृत्यु का चक्र, मोक्ष की परम आशा में विलीन हो जाता है। भगवान शिव का यह धाम हर शिवभक्त के हृदय में बसता है और उनकी इस नगरी की महिमा का वर्णन कर पाना शब्दों में संभव नहीं है। आशा है कि यह ब्लॉग आपको काशी विश्वनाथ के पौराणिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहलुओं को समझने में सहायक रहा होगा। हर हर महादेव!
"डिस्क्लेमर"
*इस ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारियां विभिन्न धार्मिक ग्रंथों (जैसे शिव पुराण), ऐतिहासिक स्रोतों, मान्यताओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर एकत्रित की गई हैं। लेखक ने इस जानकारी को यथासंभव सटीक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है, किंतु किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की पूर्ण सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं देता।
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