"सोमनाथ ज्योतिर्लिंग": इतिहास, रहस्य और त्रिदेव की श्रेष्ठता की पौराणिक कथा
byRanjeet Singh-
0
"सोमनाथ मंदिर का रहस्यमय इतिहास जानें। कब और कितनी बार टूटा यह मंदिर? क्या है चंद्रदेव का श्राप? त्रिदेव में सर्वश्रेष्ठ कौन? ऋषि की परीक्षा और शिव पुराण की सम्पूर्ण कथा यहाँ पढ़ें। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की पूजा विधि और महत्व"
"विशेष रूप से पढ़ें इन प्रसंगों को मेरे ब्लॉग पर।सोमनाथ मंदिर, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग, त्रिदेव में सर्वश्रेष्ठ कौन, शिव पुराण, चंद्रदेव का श्राप, सोमनाथ मंदिर का इतिहास, सोमनाथ पर आक्रमण, सोमनाथ शक्तिपीठ, ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव, ब्रह्मा, विष्णु। सोमनाथ मंदिर निर्माण, राजा दक्ष, रोहिणी, सोमनाथ की पूजा विधि, 12 ज्योतिर्लिंग, सोमनाथ मंदिर का भोग, देवी सती का हृदय, महमूद गजनवी, सोमनाथ ब्लॉग, हिंदू धर्म"
"सोमनाथ ज्योतिर्लिंग: इतिहास, महिमा और त्रिदेव के रहस्यों का प्रकाश पुंज"
*भारत के गौरवशाली अतीत, आस्था की अमर ज्योति और अदम्य पुनर्निर्माण की अद्भुत मिसाल है - श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में अरब सागर के तट पर विराजमान यह मंदिर न सिर्फ़ 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है, बल्कि यह हिंदू धर्म की resilience और शाश्वतता का प्रतीक भी है। इस ब्लॉग के माध्यम से हम सोमनाथ के पौराणिक महत्व, उसके ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव और उससे जुड़े गहन आध्यात्मिक प्रश्नों का विस्तार से अन्वेषण करेंगे।
भाग *01: पौराणिक उद्भव - "चंद्रदेव का श्राप और मुक्ति की कथा"
*शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना का संबंध चंद्रदेव (सोम) से है। राजा दक्ष ने अपनी 27 कन्याओं (जो 27 नक्षत्रों के रूप में प्रसिद्ध हैं) का विवाह चंद्रदेव से किया था। विवाह के बाद चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों में से रोहिणी पर विशेष स्नेह और आसक्ति रखने लगे, अन्य 26 कन्याओं की उपेक्षा होने लगी।
*जब यह बात राजा दक्ष को ज्ञात हुई, तो उन्होंने चंद्रदेव को समझाया। परंतु, चंद्रदेव पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उनकी रोहिणी के प्रति आसक्ति और बढ़ गई। क्रोधित होकर राजा दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दे दिया कि "जाओ, आज से तुम क्षय रोग से ग्रस्त हो जाओ। तुम्हारा तेज और कला दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जाएगी।"
*श्राप के प्रभाव से चंद्रदेव का तेज फीका पड़ने लगा और वे क्षय रोग से पीड़ित हो गए। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए वे भगवान ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने उन्हें उपाय बताया कि "प्रभास क्षेत्र (वर्तमान सोमनाथ) में जाकर भगवान शिव की तपस्या करो।" चंद्रदेव ने वहाँ जाकर घोर तपस्या की। भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्रदेव को श्राप से मुक्ति का मार्ग दिखाया।
*भगवान शिव ने कहा कि दक्ष का श्राप पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता, किंतु एक मध्यम मार्ग है। एक मास के दो पक्ष होंगे - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। शुक्ल पक्ष में तुम धीरे-धीरे बढ़ोगे (वर्धमान) और कृष्ण पक्ष में घटोगे (क्षीयमाण)। इस प्रकार, तुम्हें निरंतरता प्राप्त होगी। चंद्रदेव ने इस पर सहमति जताई और भगवान शिव की स्तुति की। शिव जी ने उस स्थान पर एक दिव्य ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होकर चंद्रदेव (सोम) का उद्धार किया, इसीलिए यह सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ।
भाग *02: "त्रिदेव में सर्वश्रेष्ठ कौन? एक पौराणिक विमर्श"
*सनातन धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) - यह त्रिदेव सृष्टि के निर्माण, पालन और संहार के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं। प्रश्न उठता है कि इन तीनों में श्रेष्ठ कौन है? पुराणों में इस विषय पर अनेक कथाएं और दार्शनिक चिंतन मिलते हैं।
*शिव पुराण शिव को परम ब्रह्म, निराकार और सगुण साकार का अधिष्ठान मानता है। इसमें विष्णु और ब्रह्मा दोनों को शिव का ही अंश माना गया है। शिव ही वह आदि कारण हैं जिनसे सृष्टि का प्रकटीकरण होता है।
*विष्णु पुराण विष्णु को परम तत्व और सर्वोच्च सत्ता के रूप में प्रतिपादित करता है, जिनकी नाभि से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं और जो शिव को भी आदेश देते हैं।
*वास्तविक दृष्टिकोण: दार्शनिक स्तर पर, यह बहस अक्सर एक ही सत्य के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है। त्रिदेव वास्तव में ब्रह्मांड के तीन मूलभूत सिद्धांतों - उत्पत्ति, स्थिति और लय के प्रतीक हैं। इनमें से किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ कहना, एक ही शरीर के विभिन्न अंगों में से किसी एक को श्रेष्ठ कहने के समान है।
*सभी अपने-अपने स्थान पर अनिवार्य और पूज्य हैं। फिर भी, आम लोकमान्यता और अधिकांश पुराण शिव और विष्णु को ही परम सत्ता का दर्जा देते हैं, जबकि ब्रह्मा जी की पूजा का प्रचलन सीमित है।
भाग *03: "ऋषि की परीक्षा" - "ब्रह्मा, विष्णु और शिव की अंतहीन खोज"
*त्रिदेव की श्रेष्ठता को लेकर एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा है, जो शिव पुराण और लिंग पुराण में मिलती है। एक बार ब्रह्मा और विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि उनमें श्रेष्ठ कौन है। तभी अचानक एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका आदि और अंत देख पाना असंभव था। यह स्तंभ भगवान शिव का ही एक रूप था।
*ब्रह्मा जी ने उस स्तंभ का आदि (ऊपरी छोर) ढूँढने के लिए हंस का रूप धारण किया और ऊपर उड़ चले। विष्णु जी ने अंत (नीचे का छोर) ढूंढने के लिए वराह का रूप धारण किया और नीचे जाने लगे। परंतु, दोनों ही असफल रहे; उन्हें कहीं भी छोर नहीं मिला।
*जब वे लौटे, तो ब्रह्मा जी ने असत्य का सहारा लिया और दावा किया कि उन्होंने ऊपर के छोर पर एक केतकी का फूल पाया है। विष्णु जी ने विनम्रतापूर्वक अपनी असफलता स्वीकार कर ली। तभी उस अग्नि स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने ब्रह्मा जी को असत्य बोलने के लिए दंडित किया और यह शाप दिया कि भविष्य में उनकी पृथ्वी पर कोई पूजा नहीं करेगा। साथ ही, उन्होंने विष्णु जी की सत्यनिष्ठा की प्रशंसा की।
*इस कथा का तात्पर्य यह है कि शिव ही अनंत और अखंड सत्य हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी उनके ही स्वरूप हैं और उनकी सीमाएँ हैं। यह कथा शिव को त्रिदेव में सर्वोच्च स्थान प्रदान करती है।
भाग *04: "तीनों देव एक-दूसरे को किस दृष्टि से देखते थे"?
*पुराणों में त्रिदेव के आपसी संबंधों का बहुत ही सुंदर और समन्वयकारी चित्रण मिलता है।
*भगवान विष्णु की दृष्टि में शिव: विष्णु शिव को अपना आराध्य, परमेश्वर और गुरु मानते हैं। वे हमेशा शिव की स्तुति करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। शिव के प्रति विष्णु की भक्ति के कई उदाहरण हैं, जैसे कि शिव को महादेव, महेश्वर कहकर पुकारना। विष्णु का शांत और पालक स्वभाव शिव के रुद्र और संहारक स्वभाव का पूरक है।
*भगवान शिव की दृष्टि में विष्णु: शिव विष्णु को अपना परम भक्त और सृष्टि का पालनहार मानते हैं। वे विष्णु के गुणों का बखान करते हैं और उन्हें समान आदर देते हैं। शिव हरि (विष्णु) और हर (शिव) को अभिन्न मानते हैं। "हरि हरात्मकम्" - यह मान्यता है कि हरि और हर एक ही हैं।
*ब्रह्मा की दृष्टि में शिव और विष्णु: ब्रह्मा शिव और विष्णु दोनों को ही अपने से श्रेष्ठ मानते हैं। वे सृष्टि रचना से पहले दोनों की स्तुति करते हैं। हालांकि, कुछ कथाओं में ब्रह्मा के अहंकार का भी उल्लेख है, जिसके कारण उन्हें शिव के कोप का सामना करना पड़ा।
*संक्षेप में, त्रिदेव एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और एक दिव्य सामंजस्य में कार्य करते हैं। वे प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी शक्तियां हैं।
भाग *85: "सोमनाथ मंदिर का ऐतिहासिक सफर": "निर्माण, विध्वंस और पुनर्जन्म"
*सोमनाथ मंदिर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली और विनाशकारी दोनों ही रहा है।
*प्रारंभिक निर्माण: मान्यता है कि सोमनाथ मंदिर का प्रथम निर्माण स्वयं चंद्रदेव ने चाँदी में करवाया था। इसके बाद श्री कृष्ण ने इसे चंदन की लकड़ी से बनवाया। ऐतिहासिक रूप से, इस मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में हुआ था। गुजरात के वल्लभी नगर के राजा भीमदेव ने 649 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया।
*आक्रमण और पुनर्निर्माण का चक्र: सोमनाथ मंदिर अपने अपार धन और वैभव के लिए विख्यात था, जिसके कारण यह विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर आ गया। यह मंदिर इतिहास में कम से कम 6 बार ध्वस्त किया गया और हर बार उसे पुनर्निर्मित किया गया।
725 ईस्वी: "सिंध के अरब गवर्नर जुनैद ने पहला बड़ा आक्रमण किया"
*1024 ईस्वी: महमूद गजनवी ने सबसे कुख्यात आक्रमण किया। उसने मंदिर को लूटा, अपार धनराशि लूटी और शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया। किंवदंतियों के अनुसार, शिवलिंग स्वयं ही अदृश्य हो गया था।
*1297 ईस्वी: दिल्ली सल्तनत के जनरल अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने मंदिर को ध्वस्त किया।
*1395 ईस्वी: गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने।
*1706 ईस्वी: मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर को एक बार फिर से गिरवा दिया।
*योगदान देने वाले राजा: इस मंदिर के पुनर्निर्माण में कई हिंदू राजाओं ने योगदान दिया, जिनमें वल्लभी के राजा, मालवा के राजा भोज (सन 1026 के आसपास), सोलंकी राजा कुमारपाल (1169 ईस्वी), महारानी अहिल्याबाई होल्कर (1783 ईस्वी) और महाराजा रणजीत सिंह प्रमुख हैं।
*वर्तमान मंदिर: भारत की स्वतंत्रता के बाद, देश के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 1951 में पूरा हुआ और इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया।
भाग *06: "सोमनाथ मंदिर - पूजा, महत्व और रहस्य"
*शिव के किस रूप की होती है पूजा? सोमनाथ मंदिर में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग रूप की पूजा होती है। यह एक स्वयंभू (स्वयं प्रकट) लिंग है, जो निराकार परब्रह्म का प्रतीक है। यहां शिव का कोई मूर्तिरूप नहीं है, बल्कि उनकी ऊर्जा के प्रतीक के रूप में इस लिंग की पूजा की जाती है।
*पूजा विधि: "यहां की पूजा विधि अत्यंत ही भव्य और आकर्षक है"
*स्नान और अभिषेक: "सुबह की आरती के समय लिंग का दूध, घी, शहद, गंगाजल आदि से अभिषेक किया जाता है,।
*आरती: दिन में तीन बार आरती होती है - मंगला आरती (सुबह), मध्याह्न आरती (दोपहर) और संध्या आरती (शाम)। संध्या आरती के समय मंदिर के शिखर की लाइटिंग और अरब सागर की लहरों का नज़ारा अद्भुत होता है।
*श्रृंगार: लिंग का श्रृंगार रुद्राक्ष, फूलों और चंदन से किया जाता है।
*सोमनाथ महामंत्र: "ॐ नमः शिवाय" और "ॐ सोम सोमनाथाय नमः" का जाप यहां विशेष फलदायी माना जाता है।
*ज्योतिर्लिंगों में संख्या: सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है। इसकी गिनती सबसे पहले होती है।
*क्या सोमनाथ में कोई शक्तिपीठ भी है? जी हां, सोमनाथ मंदिर परिसर में ही एक शक्तिपीठ है, जिसे देवी सती का "हृदय" या "स्तन" यहां गिरा था, ऐसी मान्यता है। इस स्थान पर देवी को भद्रकाली के नाम से पूजा जाता है। इस प्रकार, सोमनाथ एक ही स्थान पर ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों का महत्व रखता है, जो इसे और भी पवित्र बनाता है।
*भगवान का भोग: यहां भगवान शिव को प्रसाद के रूप में बिल्व पत्र, धतूरे के फूल, भांग आदि चढ़ाए जाते हैं। साथ ही, पंचामृत, मिष्ठान्न और फलों का भोग भी लगाया जाता है। मान्यता है कि चंद्रदेव के श्राप से मुक्ति के बाद, यहाँ चढ़ाया गया भोग भक्तों के सभी कष्टों को दूर कर देता है।
"यहां सोमनाथ मंदिर से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न और उनके उत्तर दिए गए हैं"
"सोमनाथ मंदिर से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न" (FAQ)
प्रश्न *01: सोमनाथ मंदिर कहां स्थित है?
उत्तर:सोमनाथ मंदिर भारत के गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में, वेरावल बंदरगाह के पास, अरब सागर के तट पर स्थित है।
प्रश्न *02: सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में किस स्थान पर रखा गया है?
उत्तर:सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम (पहला) स्थान प्राप्त है। ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इसका उल्लेख सबसे पहले होता है।
प्रश्न *03: सोमनाथ मंदिर का मूल निर्माण किसने करवाया था?
उत्तर:पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का सबसे पहला निर्माण स्वयं चंद्रदेव (सोम) ने चांदी से करवाया था। ऐतिहासिक रूप से, इसका प्रारंभिक निर्माण कब हुआ, इसका कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, लेकिन यह अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
प्रश्न *04: सोमनाथ मंदिर पर सबसे कुख्यात आक्रमण किसने और कब किया?
उत्तर:सोमनाथ मंदिर पर सबसे कुख्यात आक्रमण महमूद गजनवी ने 1024 ईस्वी में किया था। उसने मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया और अपार धन संपदा लूटी।
प्रश्न *05: सोमनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप किसने बनवाया?
उत्तर:भारत की स्वतंत्रता के बाद, सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व और संकल्प से इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया गया। वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण कार्य 1951 में पूरा हुआ और इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया।
प्रश्न *06: क्या सोमनाथ मंदिर परिसर में कोई शक्तिपीठ भी है?
उत्तर:हाँ, सोमनाथ मंदिर परिसर में ही एक शक्तिपीठ है। मान्यता है कि यहाँ देवी सती का "हृदय" या "स्तन" गिरा था। इस स्थान पर देवी को भद्रकाली के नाम से पूजा जाता है।
प्रश्न *07: सोमनाथ मंदिर में आरती का समय क्या है?
*उत्तर:सोमनाथ मंदिर में मुख्य रूप से तीन आरतियां होती हैं:
*मंगला आरती: सुबह लगभग 7:00 बजे
*मध्याह्न आरती: दोपहर लगभग 12:00 बजे
*संध्या आरती: शाम लगभग 7:00 बजे (यह समय मौसम के अनुसार बदल सकता है)
(नोट: तीर्थयात्रियों को अद्यतन समय जानने के लिए आधिकारिक वेबसाइट या मंदिर प्रशासन से जांच कर लेनी चाहिए।)
प्रश्न *08: सोमनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय क्या है?
उत्तर:सोमनाथ जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच का है, क्योंकि इस दौरान मौसम सुहावना और समुद्र का दृश्य अत्यंत मनोरम होता है। गर्मियों (अप्रैल-जून) में यहाँ का मौसम काफी गर्म और आर्द्र हो सकता है।
प्रश्न *09: सोमनाथ मंदिर के निकट और कौन-से दर्शनीय स्थल हैं?
उत्तर:सोमनाथ के निकट कई दर्शनीय स्थल हैं, जैसे:
· भालका तीर्थ: वह स्थान जहां भगवान श्री कृष्ण को एक शिकारी का तीर लगा था।
त्रिवेणी घाट: वह स्थान जहां हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का संगम है।
सूर्य मंदिर: मंदिर के निकट स्थित एक प्राचीन मंदिर।
सोमनाथ संग्रहालय: जहां मंदिर के इतिहास से जुड़ी कलाकृतियां रखी गई हैं।
प्रश्न *10: सोमनाथ मंदिर की वास्तुकला किस शैली में है?
उत्तर:वर्तमान सोमनाथ मंदिर चालुक्य वास्तुकला (या सोलंकी शैली) में बना हुआ है। इसके विशाल शिखर (लगभग 150 फुट ऊंचा), सजावटी नक्काशी और भव्य मंडप इसकी खास पहचान हैं।
प्रश्न *11: क्या सोमनाथ मंदिर में रात्रि में होने वाली कोई विशेष घटना है?
उत्तर:हां, सोमनाथ मंदिर में हर रात "साउंड एंड लाइट शो" (ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम) होता है, जिसमें मंदिर के इतिहास और महत्व को हिंदी और अंग्रेजी में एक कलात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है। यह कार्यक्रम पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय है।
प्रश्न *12: सोमनाथ मंदिर के दर्शन की समय सीमा क्या है?
उत्तर:मंदिर सुबह 6:00 बजे से दर्शन के लिए खुलता है और रात्रि 9:30 बजे तक बंद होता है। दर्शन का समय विशेष पर्वों और आयोजनों के दौरान बदल सकता है।
"निष्कर्ष"
*सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अमर चेतना का प्रतीक है। यह वह स्थान है जहां चंद्रदेव ने मुक्ति पाई, जहां त्रिदेव के रहस्य छिपे हैं, और जहां इतिहास ने बार-बार विध्वंस देखा, परंतु आस्था ने हर बार उसे फिर से खड़ा किया। सोमनाथ की यह यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि स्वयं के अंतर्मन में उतरकर शाश्वत सत्य को खोजने की एक आध्यात्मिक यात्रा है।
"डिस्क्लेमर" (अस्वीकरण)
*यह ब्लॉग लेख विभिन्न पौराणिक ग्रंथों (विशेष रूप से शिव पुराण), ऐतिहासिक दस्तावेजों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है। लेख में दी गई जानकारी को शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों से तैयार किया गया है।
* पौराणिक कथाएं: पौराणिक कथाएं और मान्यताएंअलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। यहां प्रस्तुत कथाएं सबसे व्यापक रूप से प्रचलित संस्करणों पर आधारित हैं।
*ऐतिहासिक तथ्य: ऐतिहासिक तिथियों और घटनाओं के बारे में विद्वानों के बीच मतभेद हो सकते हैं। यहां प्रस्तुत ऐतिहासिक विवरण सामान्यतः स्वीकृत इतिहास के अनुरूप हैं।
*धार्मिक मान्यताएं: धार्मिक विश्वास और आस्था व्यक्तिगत अनुभव का विषय है। लेख में दिए गए दार्शनिक विश्लेषण और व्याख्याएं सामान्य ज्ञान को दर्शाती हैं, किसी विशेष समुदाय या मत को बढ़ावा देने का इरादा नहीं है।
*सलाह: किसी भी प्रकार की धार्मिक यात्रा या पूजा-पाठ से पहले, व्यक्तिगत रूप से मंदिर प्रशासन या एक योग्य धार्मिक गुरु से सलाह लेने की सिफारिश की जाती है।
*लेखक और प्रकाशक इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की शत-प्रतिशत सटीकता की गारंटी नहीं देते हैं और किसी भी त्रुटि या चूक के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।