"गरुड़ पुराण के अनुसार 11वें दिन का श्राद्ध" (एकादशा श्राद्ध): संपूर्ण विधि, महत्व और रहस्य | Antim Sanskar Kriya
byRanjeet Singh-
0
"पुराण में वर्णित 11वें दिन के श्राद्ध (एकादशा श्राद्ध) की संपूर्ण विधि जानें। सेजिया दान, महा ब्राह्मण, पिंडदान, सांड दान का महत्व और प्रेत योनि से मुक्ति का मार्ग। जानें कैसे यह कर्म पितरों को विष्णु लोक प्रदान करते हैं"
कैप्शन:"गरुड़ पुराण में वर्णित 11वें दिन के श्राद्ध (एकादशा श्राद्ध) की पवित्र विधि — जहां पिंडदान, हवन और तर्पण के माध्यम से आत्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर किया जाता है"।
"ग्यारहवें दिन का श्राद्ध, एकादशा श्राद्ध, गरुड़ पुराण श्राद्ध विधि, सेजिया दान क्या है, महा ब्राह्मण, पिंडदान, सांड दान, प्रेत योनि से मुक्ति, अंतिम संस्कार के बाद की रस्में, श्राद्ध कर्म, पितृ दोष, Antim Sanskar
*गरुड़ पुराण का 11वें दिन का श्राद्ध: प्रेत योनि से मुक्ति और पितृों को विष्णु लोक प्रदान करने का परम मार्ग
*हमारे सनातन धर्म में जीवन के चार पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - में से अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति। यह मोक्ष न केवल जीवित व्यक्ति के लिए, बल्कि मृत्यु के पश्चात देह त्याग चुके प्राणी के लिए भी अभीष्ट होता है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु के बाद के जीवन, पुनर्जन्म और पितृ कर्मों का अद्वितीय ग्रंथ है, इस मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को अत्यंत विस्तार से समझाता है।
*मृत्यु के बाद के 16 दिनों (सोलह श्राद्ध) को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इनमें से भी 11वें दिन के श्राद्ध (एकादशा श्राद्ध) का विशेष स्थान है। यह वह दिन है जब आत्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर पितृ लोक में प्रवेश करने के लिए तैयार होती है। यह blog गरुड़ पुराण के आधार पर इस 11वें दिन की समस्त रीति-रिवाजों, दानों और उनके गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालेगा।
"11वें दिन का श्राद्ध क्यों है इतना महत्वपूर्ण"?
*गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा एक सूक्ष्म शरीर धारण कर लेती है, जिसे 'प्रेत' कहा जाता है। यह अवस्था कष्टदायक होती है, जहां आत्मा में इच्छाएं और मोह बना रहता है, किंतु उन्हें पूरा करने के लिए भौतिक शरीर नहीं होता। पहले दस दिनों के विशेष कर्मों द्वारा आत्मा के लिए एक नया 'पितृ शरीर' का निर्माण होता है। 11वें दिन, यह पितृ शरीर पूर्णतः निर्मित हो जाता है और आत्मा अब प्रेत योनि से मुक्त होकर पितृ लोक की यात्रा के योग्य बन जाती है। इसलिए, इस दिन किए जाने वाले कर्म अंतिम और निर्णायक होते हैं, जो आत्मा के भविष्य का मार्गदर्शन करते हैं।
"11वें दिन की संपूर्ण क्रियाएं: एक चरणबद्ध मार्गदर्शन"
*गरुड़ पुराण में इस दिन की जो विस्तृत विधि बताई गई है, वह न केवल एक रस्म है, बल्कि एक दिव्य यज्ञ है जिसमें देवता और पितृ दोनों की तृप्ति का प्रबंध है।
*01. देवताओं की स्थापना और तर्पण:
· मूर्ति स्थापना: इस दिन विष्णु भगवान की स्वर्ण मूर्ति, ब्रह्मा जी की चांदी की मूर्ति, शिव जी की तांबे की मूर्ति और यमराज की लोहे की मूर्ति की स्थापना की जाती है। यह चारों देवता सृष्टि, पालन, संहार और न्याय के प्रतीक हैं। इनकी पूजा का अर्थ है ब्रह्मांड की इन शक्तियों का आह्वान कर उनसे आत्मा के कल्याण की प्रार्थना करना।
*02.दिशाओं में आह्वान:
*पश्चिम: गंगाजल से भरे लोटे पर पीले वस्त्र में विष्णु जी की मूर्ति रखी जाती है। विष्णु मोक्ष के दाता हैं।
*पूर्व: दूध और पानी के लोटे पर सफेद वस्त्र में ब्रह्मा जी की मूर्ति। ब्रह्मा सृष्टि के प्रतीक हैं, नए जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
*उत्तर: शहद और घी के लोटे पर लाल वस्त्र में शिव जी की मूर्ति। शिव संहार के देवता हैं, जो पुराने बंधनों को काटते हैं।
*दक्षिण: वर्षा के जल से भरे लोटे पर काले वस्त्र में यमराज की मूर्ति। दक्षिण दिशा यम की दिशा है, यहां उनकी स्थापना से आत्मा को यमलोक की यात्रा में सहजता मिलती है।
*03. पुत्र का कर्तव्य: जनेऊ धारण और तर्पण
*पुत्र (या कर्ता) को अपने दाहिने कंधे पर पवित्र जनेऊ धारण करनी चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, कुशा घास से बने एक गोल चक्र के मध्य में बैठकर वैदिक मंत्रों के साथ इन सभी देवताओं को जल अर्पित (तर्पण) करना चाहिए। इसके बाद अग्नि में हवन करके भेंट अर्पित की जाती है। यह कर्म आत्मा को दिव्य ऊर्जा और तृप्ति प्रदान करता है।
*04. महत्वपूर्ण दान और उनका गूढ़ रहस्य
*यहां दिए जाने वाले दान केवल भौतिक वस्तुएं नहीं, बल्कि आत्मा के लिए पुण्य के स्रोत हैं।
*गौ दान: एक गाय का दान पितरों के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद की कठिन यात्रा में गौ उन्हें वैतरणी नदी पार कराने में सहायक होती है।
*ब्राह्मण भोज: एक ब्राह्मण के पैर धोकर, उन्हें दूध, मिठाई और सात्विक भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मण यहाँ देवताओं के प्रतिनिधि होते हैं, उन्हें भोजन कराने से देवता और पितृ दोनों तृप्त होते हैं।
*शय्या दान (सेजिया दान): यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण दान है। इसमें मृतात्मा के लिए एक चौकी, बिस्तर, तकिया, कंबल और जीवनयापन के लिए आवश्यक सामग्री जैसे भोजन बनाने के बर्तन (विशेष रूप से लोहे के), दीया, अनाज आदि का दान किया जाता है। इस दान का तात्पर्य है कि पितृ को पितृ लोक में एक सुखद और सुविधाजनक 'घर' प्रदान किया जाए। इसी दान को 'सेजिया दान' कहा जाता है, जो 11वें दिन की एक प्रमुख क्रिया है।
*सांड दान (वृषभ दान): यह शायद सबसे महत्वपूर्ण दानों में से एक है। गरुड़ पुराण कहता है कि एक ऐसे सांड का दान, जिसका पूरा शरीर काले-भूरे रंग का हो, पितरों की अत्यधिक खुशी के लिए करना चाहिए। इस दान का महत्व इतना profound है कि माना जाता है कि यह दान करने वाले के बचपन, जवानी और बुढ़ापे तक के सभी पापों को नष्ट कर देता है। सांड शिव का वाहन है और धर्म का प्रतीक है। यह दान पितृ के लिए पितृ लोक में एक वाहन और सम्मान का प्रतीक है।
"महा ब्राह्मण: यमराज के पंडित की भूमिका"
*11वें दिन की क्रियाओं में महा ब्राह्मण का आगमन एक विशेष घटना है। इन्हें 'यमराज का पंडित' भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये ब्राह्मण यमलोक और पितृलोक के साथ संवाद करने की क्षमता रखते हैं। इनका कर्तव्य होता है कि वे सभी कर्मकांडों को शास्त्रों के अनुसार संपन्न कराएं और पितृ के लिए अर्पित की गई सामग्री को उन तक पहुंचाएं।
*भोजन: 12वें दिन (ब्रह्मभोज के दिन) बनने वाले भोजन का सर्वप्रथम भाग इन्हीं महा ब्राह्मण को परोसा जाता है। यह भोजन पितृों को अर्पित करने से पहले होता है, क्योंकि वे ही उस भोजन को पितृों तक पहुंचाने का माध्यम हैं।
*पिंडदान: महा ब्राह्मण की उपस्थिति में ही 11वें दिन का अंतिम पिंडदान किया जाता है। यह पिंड आत्मा के लिए पितृ शरीर को पूर्णता प्रदान करने वाला अंतिम पिंड होता है।
*बकरी दान: इसी दिन महा ब्राह्मण को एक बकरी का दान भी दिया जाता है, जो उनकी सेवा और पितृ कर्म के निर्वहन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
"16 श्राद्धों का रहस्य और 'लाइ' का दान"
*गरुड़ पुराण पहले 16 श्राद्धों को 'अपवित्र' और अगले 16 (मध्य के) को 'पवित्र' मानता है। 11वें दिन पहले 16 श्राद्ध पूरे होते हैं। इनमें विभिन्न देवताओं को 'लाइ' (तिल और चावल का मिश्रण) का दान किया जाता है। यह क्रम इस प्रकार है:
*यह क्रम दर्शाता है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए सभी दैवीय शक्तियों का आशीर्वाद आवश्यक है।
"विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध"
*अकाल मृत्यु: गरुड़ पुराण स्पष्ट करता है कि अग्नि (जलकर), जल (डूबकर) या आत्महत्या से मृत्यु होने पर भी ये सभी क्रिया-कर्म पूरी श्रद्धा के साथ करने चाहिए। ऐसी आत्माएं अधिक मोह में बंधी होती हैं और इन कर्मों से उन्हें शांति मिलती है।
*सर्पदंश से मृत्यु: सर्पदंश से मृत्यु होने पर, चावल के चूरन से नाग (कोबरा) की छवि बनाकर, चंदन, फूल, धूप, दूध, तिल और चावल आदि से उसकी पूजा की जाती है। यह कर्म हर पखवाड़े के 5वें दिन (कृष्ण पक्ष की पंचमी) किया जाता है, ताकि नाग दोष से मुक्ति मिल सके।
*12वें दिन का महत्व: ब्रह्मभोज और घंट फोड़ना
*11वें दिन की क्रियाएं समाप्त होने के बाद 12वें दिन (ब्रह्मभोज) की तैयारी होती है।
*ब्रह्मभोज: इस दिन एक विशाल और पवित्र भोजन का आयोजन किया जाता है, जिसमें ब्राह्मणों एवं गरीबों को भोजन कराया जाता है। इस भोजन का प्रसाद सबसे पहले महा ब्राह्मण को ही दिया जाता है, जैसा कि पहले बताया गया है।
*घंट फोड़ना: मृत्यु के बाद पीपल के पेड़ पर जो घड़ा (घंट) टांगा जाता है, उसे 12वें दिन एक विशेष रस्म के तहत फोड़ दिया जाता है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ बहुत गहरा है। घड़ा शरीर का प्रतीक है, जो नश्वर है। इसे फोड़ना इस बात का द्योतक है कि अब आत्मा ने इस नश्वर शरीर के मोह को पूर्णतः त्याग दिया है और वह पितृ लोक की ओर प्रस्थान कर रही है। यह एक तरह से आत्मा को मुक्ति देने का, उसके अंतिम बंधन को तोड़ने का कर्म है।
"स्त्री का कर्तव्य: सच्ची अर्धांगिनी की पहचान"
*गरुड़ पुराण में विधवा स्त्री के कर्तव्यों का भी उल्लेख है। जो स्त्री अपने पति के मरणोपरांत दाह संस्कार के 15वें दिन और वार्षिक रस्में पूरी निष्ठा से करती है, उसे 'सच्ची अर्धांगिनी' की संज्ञा दी गई है। ऐसा कहा गया है कि पति के लिए किया गया यह श्राद्ध उसे अथाह खुशी प्रदान करता है और उसकी आत्मा को शांति मिलती है।
"निष्कर्ष: मोक्ष का द्वार"
*गरुड़ पुराण में वर्णित 11वें दिन का श्राद्ध कोई डरावनी रस्म नहीं, बल्कि आत्मा के कल्याण का एक दिव्य, वैज्ञानिक (आध्यात्मिक दृष्टि से) और संपूर्ण मार्ग है। सेजिया दान से लेकर सांड दान तक, महा ब्राह्मण के भोजन से लेकर घंट फोड़ने तक, हर एक क्रिया का एक गहरा अर्थ और उद्देश्य है।
*यह कर्म पुत्र के कर्तव्य का निर्वहन ही नहीं, बल्कि एक ऐसा पुल है जो मृत्यु लोक और पितृ लोक के बीच का संबंध बनाता है, और अंततः आत्मा को प्रेत योनि से मुक्त करके विष्णु लोक की ओर अग्रसर करता है। इन कर्मों के माध्यम से हम अपने पितरों के प्रति अपना अटूट प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करते हैं, और उनकी अनंत यात्रा में उनके साथ खड़े होते हैं।
"डिस्क्लेमर" (Disclaimer)
*यह ब्लॉग पोस्ट प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ गरुड़ पुराण में वर्णित सैद्धांतिक जानकारियों और मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को इस विषय से संबंधित ज्ञान से अवगत कराना मात्र है।
*01. धार्मिक कर्मकांड: इस ब्लॉग में वर्णित सभी रीति-रिवाज, दान और कर्मकांड गरुड़ पुराण के सैद्धांतिक विवरण हैं। व्यवहार में, इन कर्मों को करने का तरीका क्षेत्र, परिवार, जाति और संप्रदाय के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है।
*02. व्यावहारिक पालन: कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या कर्मकांड करने से पहले, पाठकों से अनुरोध है कि वे किसी योग्य पंडित, ज्योतिषी या अपने परिवार के बुजुर्गों से सलाह अवश्य लें। केवल इस ब्लॉग पर दी गई जानकारी के आधार पर कर्मकांड संपन्न करने की सलाह नहीं दी जाती।
*03. आस्था और विज्ञान: यह ब्लॉग धार्मिक आस्था और दार्शनिक मान्यताओं से संबंधित है। इनमें से कई बातों की वैज्ञानिक पुष्टि संभव नहीं हो सकती। पाठकों से अनुरोध है कि इसे अपनी आस्था और विवेक के अनुसार ग्रहण करें।
*04. लेखक की सीमा: ब्लॉग लेखक का उद्देश्य सूचना का प्रसार करना है, न कि धार्मिक मार्गदर्शन देना। लेखक किसी भी तरह के धार्मिक अनुष्ठान के परिणामों की कोई गारंटी नहीं देता है और न ही उसके लिए जिम्मेदार होगा।
*05. सांस्कृतिक संदर्भ: इन मान्यताओं और प्रथाओं का संबंध विशेष रूप से सनातन (हिंदू) धर्म की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से है। अन्य धर्मों या संस्कृतियों में मृत्यु के बाद के विश्वास और रीति-रिवाज भिन्न हो सकते हैं।
इस जानकारी का उपयोग करने और उस पर अमल करने का निर्णय पूर्णतः पाठक का अपना विवेक और विश्वास पर निर्भर करता है।