"मृत्यु के बाद के 10 दिन: दशगात्र संस्कार, गरुड़ पुराण के नियम, रस्में और महत्व" 10 Din Ke Shradh Ki Purn Jankari

"गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद के पहले 10 दिन (दशगात्र) आत्मा की शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। जानें पूरी विधि, कर्मकांड, श्राद्ध का तरीका, पुत्र की भूमिका, विकल्प और इन दस दिनों में किए जाने वाले सभी आवश्यक कार्यों का हिंदी में विस्तृत विवरण"

According to the Garuda Purana, this is a depiction of the first 10 days after death.

कैप्शन:"गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति हेतु किए जाने वाले दशगात्र संस्कार में पिंडदान और श्राद्ध का महत्व। यह दृश्य आत्मा की मोक्ष यात्रा और परिवार के श्रद्धाभाव का प्रतीक है।"

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"मृत्यु के बाद के 10 दिन: गरुड़ पुराण के अनुसार दशगात्र संस्कार का पूर्ण विवरण और आध्यात्मिक महत्व"

*मृत्यु, जीवन का एक अटल सत्य है, लेकिन सनातन धर्म शास्त्रों के अनुसार, यह शरीर का अंत मात्र है, आत्मा का नहीं। आत्मा एक नए शरीर की यात्रा पर निकलती है और इस संक्रमण काल में उसे दिवंगत प्रियजनों के सहयोग और श्रद्धा की अत्यधिक आवश्यकता होती है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु के बाद की यात्रा और पितृ कर्म का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है, इस संदर्भ में विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान करता है।

*मृत्यु के बाद के पहले दस दिन, जिन्हें 'दशगात्र' या 'अशौच' काल कहा जाता है, अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक माने गए हैं। यह वह अवधि है जब प्रेत-तत्व (सूक्ष्म शरीर) पृथ्वी लोक से पूरी से मुक्त नहीं हुआ होता और उसे अपने नए पथ पर आगे बढ़ने के लिए आध्यात्मिक सहायता की आवश्यकता होती है। यह ब्लॉग गरुड़ पुराण के आधार पर इन दस दिनों की समस्त रस्मों, कर्मकांडों, उनके महत्व और व्यावहारिक पहलुओं का गहन विवरण प्रस्तुत करेगा।

"दशगात्र का आध्यात्मिक महत्व: आत्मा की यात्रा के दस चरण"

गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा एक नया सूक्ष्म शरीर धारण करती है, जिसे 'प्रेत-शरीर' कहते हैं। यह शरीर भौतिक शरीर के समान ही आकृति वाला होता है, लेकिन सूक्ष्म होने के कारण सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देता। इन दस दिनों में, आत्मा को अपने नए अस्तित्व का बोध होता है और वह पितृलोक की यात्रा करती है। मान्यता है कि प्रत्येक दिन आत्मा एक नए लोक (क्षेत्र) से गुजरती है, और उस दिन किया गया कर्मकांड उसे उस यात्रा में सहायता प्रदान करता है।

*इन दस दिनों में दिया जाने वाला 'पिंड दान' (चावल, जौ और तिल से बना एक प्रसाद) आत्मा के नए सूक्ष्म शरीर को पोषण, स्थिरता और बल प्रदान करता है, ताकि वह अपनी यात्रा सफलतापूर्वक पूरी कर सके। इसलिए, ये रस्में केवल एक फॉर्मेलिटी नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए एक सक्रिय आध्यात्मिक सहयोग हैं।

"कौन संपन्न कर सकता है दशगात्र संस्कार? पुत्र की भूमिका और विकल्प"

*गरुड़ पुराण इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देता है। आदर्श रूप से, इन संस्कारों को करने का अधिकार और कर्तव्य मृतक के पुत्र को है।

*पुत्र का कर्तव्य: पुत्र को श्रद्धापूर्वक इन रस्मों का पालन करना चाहिए। उसे शोक में डूबकर अत्यधिक आंसू नहीं बहाने चाहिए, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि मृतक की आत्मा को परिजनों के कड़वे आंसू पीने पड़ते हैं, जिससे उसकी यात्रा में बाधा उत्पन्न होती है। उसे अपने पिता के प्रति श्रद्धा की 'तिल' (जिसे यहां 'लाइ' कहा गया है) की फुल्लियां अर्पित करनी चाहिए।

*यदि पुत्र न हो तो: गरुड़ पुराण और मनुस्मृति में विकल्पों का उल्लेख है। यदि मृतक का कोई पुत्र नहीं है, तो यह दायित्व धर्म-पत्नी, भाई, अन्य रिश्तेदार या एक योग्य ब्राह्मण निभा सकता है।

*मनुस्मृति का सिद्धांत: एक रोचक तथ्य यह है कि मनुस्मृति के अनुसार, यदि एक ही पिता के कई पुत्र हैं, लेकिन उनमें से केवल एक के ही संतान (पोता/पोती) है, तो वही पोता सभी भाइयों (अपने चाचाओं) का पुत्र माना जाता है और वही श्राद्ध आदि का अधिकारी होता है। साथ ही, कई पुत्र होने पर भी दशगात्र संस्कार केवल एक ही पुत्र (आमतौर पर ज्येष्ठ) द्वारा संपन्न कराए जाने चाहिए। ये संस्कार पूरे परिवार के नाम पर होते हैं, न कि व्यक्तिगत रूप से।

*संपत्ति बंटवारे की स्थिति में: यदि पिता की संपत्ति का बंटवारा already हो चुका है, तब भी दस दिनों के श्राद्ध (दशगात्र) की जिम्मेदारी एक ही पुत्र की होती है। हालांकि, बाद में आने वाले वार्षिक श्राद्ध सभी भाई अलग-अलग अपने-अपने घरों में कर सकते हैं।

"दशगात्र काल में पुत्र/कर्ता के लिए आचरण संहिता"

*इन दस दिनों में श्राद्ध करने वाले पुत्र या कर्ता को एक तपस्वी की तरह जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसे निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

*01. ब्रह्मचर्य का पालन: पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करना।

*02. सात्विक आहार: दिन में केवल एक समय भोजन ग्रहण करना, जो सात्विक और साधारण हो। मसालेदार, तामसिक भोजन से परहेज करना।

*03. शयन: जमीन पर सोना और कोमल बिस्तर का त्याग करना।

*04. स्नान: प्रतिदिन सूर्योदय से पहले स्नान करना।

*05. दाढ़ी-मूंछ और केश: इन दस दिनों में दाढ़ी-मूंछ न बनवाना और बाल न कटवाना।

*06. शुद्ध आचरण: क्रोध, ईर्ष्या, चुगली आदि नकारात्मक व्यवहार से दूर रहना।

"दस दिनों की रस्मों का विस्तृत विवरण "(दिनवार)

"प्रथम दिन से नवम दिन तक की दैनिक विधि":

*01. स्नान और शुद्धि: सबसे पहले कर्ता (पुत्र) को किसी पवित्र जल स्रोत (नदी, कुआं, तालाब) या घर पर ही स्नान करना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्नान के दौरान किसी मंत्र का जाप नहीं करना चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।

*02. पूजा स्थल की तैयारी: किसी शांत और स्वच्छ स्थान पर, नहीं तो किसी वृक्ष के नीचे, गोबर से लीपी हुई जमीन पर पूजा का स्थान बनाएं।

*03. प्रतिमा निर्माण: दर्भ (कुशा घास) का उपयोग करके मृतक की एक प्रतीकात्मक प्रतिमा (पुतला) बनाएं। यह प्रतिमा मृतक के सूक्ष्म शरीर का आधार बनती है।

*04. पिंड दान: कुशा घास बिछाकर, उस पर तिल (लाइ) और जल चढ़ाएं। इसके बाद, चावल के आटे या उबले हुए चावल (पक्का खाना) से बना पिंड अर्पित करें। साथ ही धूप, दीप, फूल और फल भी चढ़ाएं। यह पिंड दान आत्मा को उस दिन की यात्रा में शक्ति प्रदान करता है।

*05. गरुड़ पुराण कथा का आयोजन: शाम के समय घर पर गरुड़ पुराण की कथा का आयोजन किया जाता है। परिवारजन और पड़ोसी इसमें शामिल होते हैं। इस कथा को सुनने का बहुत महत्व है क्योंकि यह जीवन-मरण के चक्र, कर्म के सिद्धांत और आत्मा की यात्रा का ज्ञान देकर शोका ग्रस्त मन को शांति और सही दृष्टिकोण प्रदान करती है।

*06. दीपक जलाना: इन दस दिनों तक घर के मुख्य द्वार पर एक दीपक अवश्य जलाया जाता है। यह दीपक मृतक की आत्मा को मार्गदर्शन देता है और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का प्रतीक है।

*07. जल अर्पण (पीपल के वृक्ष पर): इन दस दिनों तक एक मिट्टी का घड़ा (कलश) पीपल के पेड़ पर लटका दिया जाता है। इस घड़े में सुबह-शाम जल दिया जाता है। पीपल के वृक्ष को देवताओं और पितरों का निवास स्थान माना जाता है। इसके माध्यम से लगातार मृतक आत्मा और पूर्वजों के नाम पर जल अर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें तृप्ति मिलती है।

*08. गौ सेवा: प्रतिदिन श्राद्ध कर्म के बाद, कर्ता को स्नान करके, गाय को प्रसाद (हरा चारा या कुछ भोजन) खिलाना चाहिए और उसके बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। गाय को पवित्र और दान देने योग्य माना जाता है।

"सातवें दिन की विशेष रस्म" (सप्तमी):

*सातवें दिन एक विशेष रस्म होती है, जिसमें परिवार की महिलाएं (विशेषकर पत्नी, पुत्रवधू, बेटियां) कुशा घास के ऊपर जल अर्पण करती हैं। यह रस्म मृतक की आत्मा की शांति और परिवार की मंगल कामना के लिए की जाती है।

"दशम दिन (दसवां दिन): मुक्ति और समापन का दिन"

*दसवां दिन अशौच काल के समापन और आत्मा को मुक्ति प्रदान करने का दिन है।

*01. इस दिन कर्ता पूरी तरह से मुंडन (हजामत) करवाता है और नाखून आदि कटवाता है। यह शारीरिक और मानसिक शुद्धि का प्रतीक है।

-02. पीले वस्त्र धारण किए जाते हैं, जो ज्ञान और मोक्ष का प्रतीक हैं।

*03. इस दिन पिंड दान में "मासा" (उड़द की दाल) के लड्डू और अन्य सामग्री विशेष रूप से अर्पित की जाती है।

*04. अंत में, एक विशेष पूजा के माध्यम से आत्मा से प्रार्थना की जाती है कि वह सभी बंधनों से मुक्त होकर, शांतिपूर्वक पितृलोक की ओर प्रस्थान करे और हमें आशीर्वाद देते हुए अपनी यात्रा जारी रखे।

*05. दसवें दिन के बाद, परिवार का अशौच काल (सूतक) समाप्त हो जाता है और वे सामान्य दिनचर्या में धीरे-धीरे लौट आते हैं।

*06. दसवें दिन सभी सगे संबंधी एक जगह  इक्कठा होते हैं। बाल दाढ़ी बनाने के उपरांत सरसों की खली और सरसों का तेल पूरे बदन में लगाते हैं और कुश में जल डालते हैं। पिछले 10 दिनों से तेल मसाला और हल्दी का सेवन नहीं करने वाले परिवार दसवें दिन के बाद समान भोजन करने लगते हैं। 

*07. इस दिन यमराज के पंडित महा ब्रह्मण घाट पद आते हैं और मिट्टी के हड्डी में भोजन बनाते हैं। मृत आत्मा को पिंड देने के बाद बनाए गए भोजन का सेवन करते हैं। महा ब्राह्मण के भोजन करने के उपरांत मृतक के परिजन पिछले साद भजन करते आ रहे हैं महा ब्राह्मण के भोजन करने के उपरांत उनके घर में भी हल्दी और तेल मसाला युक्त भोजन बना शुरू हो जाता है।

*सनातनी परंपरा और संस्कार की एक सुविचारित और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यह केवल शोक प्रकट करने का माध्यम नहीं, बल्कि दिवंगत आत्मा की सहायता करने और जीवित लोगों को मनोवैज्ञानिक सहारा देने का एक सशक्त तंत्र है। गरुड़ पुराण में वर्णित ये रस्में हमें सिखाती हैं कि मृत्यु अंत नहीं है, बल्कि एक परिवर्तन है। इनका पालन करके हम न केवल मृतक की आत्मा की शांति सुनिश्चित करते हैं, बल्कि अपने जीवन को अधिक सार्थक दिशा देने का संकल्प भी लेते हैं। यह एक ऐसा आध्यात्मिक ब्रिज है जो मृत्यु लोक और पितृ लोक के बीच का संबंध स्थापित करता है।

"डिस्क्लेमर":

यह ब्लॉग लेख गरुड़ पुराण और हिंदू धार्मिक मान्यताओं पर आधारित सामान्य जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी या व्यावसायिक सलाह नहीं है। धार्मिक कर्मकांडों का संपादन व्यक्तिगत विश्वास, परिवार की परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों पर निर्भर करता है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को करने से पहले किसी योग्य पंडित या धर्मगुरु से परामर्श अवश्य लें। लेखक या प्रकाशक इस जानकारी के उपयोग या दुरुपयोग से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।


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