"वरुथिनी एकादशी 02 मई 2027, दिन रविवार को है। पढ़ें सम्पूर्ण जानकारी - शुभ एवं अशुभ मुहूर्त, पूजा विधि, क्या खाएं, क्या न खाएं, पौराणिक कथा, FAQ, पूजा सामग्री, अद्भुत टोटके और व्रत के महत्व"।
कैप्शन:"वरूथिनी एकादशी 2027 — वह पावन तिथि जब भगवान विष्णु के व्रत और उपासना से जीवन में मिलता है असीम सौभाग्य, आरोग्य और पापों से मुक्ति का वरदान।"
"वरुथिनी एकादशी 2027: तिथि व शुभ मुहूर्त तिथि:"
*02 मई 2027, रविवार व्रत पारण मुहूर्त: 3 मई, प्रातः 05:39 बजे से 08:18 बजे तक (नई दिल्ली)��
*सूर्योदय: 05:39 AM |
*सूर्यास्त: 06:49 PM
*नक्षत्र: पूर्वा भाद्रपद, फिर उत्तर भाद्रपद
*योग: इंद्र योग, फिर वैधृति योग
*शुभ मुहूर्त
*अभिजीत मुहूर्त: 11:53 AM – 12:45 PM
*विजया मुहूर्त: 02:30 PM – 03:23 PM
*गोधूलि: 06:40 PM – 07:04 PM
सायाह्न संध्या: 06:55 PM – 07:58 PM
*अशुभ मुहूर्त
*राहुकाल: 03:36 PM – 05:15 PM
*गुलिक काल: 12:19 PM – 01:58 PM
यमगंड: 09:02 AM – 10:41 AM
*दुर्मुहूर्त: 08:23 AM – 09:15 AM
��"क्या करें & क्या न करें क्या करें"
*01.एक दिन पूर्व (दशमी) एक समय शुद्ध सात्विक भोजन लें।
*02.प्रातः स्नान के उपरांत व्रत का संकल्प लें।
*03.श्रीहरि के वराह अथवा वामन अवतार की पूजा करें।
*04.दिनभर सत्य बोलें, शांत रहें, ब्रह्मचर्य का पालन करें।
*05.रातभर जागरण व भजन-कीर्तन करें। दान, विशेषकर अन्नदान, अवश्य करें।
*06.तुलसी दल से भगवान का पूजन करें।
क्या न करें
*01.कांसे के बर्तन में भोजन/जल ग्रहण न करें।
*02.मसूर की दाल, चने का साग, कोदो, मांस, शहद, दूसरे का अन्न, और मधु ग्रहण न करें।
*03.दो बार भोजन, जुआ, पान, दातुन, चुगली, परनिंदा, क्रोध से बचें।दाढ़ी या बाल काटना वर्जित है।
*04.नींद, झूठ बोलना, व्यर्थ वार्ता से बचें।
*05.अप्राकृतिक/अशिष्ट व्यवहार, ब्रह्मचर्य भंग न करें।
���"वरुथिनी एकादशी : क्या खाएं, क्या न खाएं"
क्या खाएं:
*01.फल, दूध, सूखे मेवे, ताजे मौसमी फल, तिल।
क्या न खाएं:
*02.अनाज, चावल, दालें, मसूर, चना, मांस, लहसुन, प्याज, नमक, तैलीय भोजन, शहद।
विशेष:
*पूरी रात भोजन न करें, केवल एक बार सात्विक फलाहार लें।
��"भगवान विष्णु के किस रूप की होती है पूजा"?
इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के ‘वराह’ (वराह अवतार) या ‘वामन’ अवतार की पूजा करने का विधान है, क्योंकि यह रूप संकटों से रक्षा तथा समृद्धि का आशीर्वाद देता है। कई जगहों पर विष्णु के श्रीहरि स्वरूप की भी उपासना होती है।
��"किस पर सोना चाहिए"?
वरुथिनी एकादशी के दिन भूमि या चटाई पर सोना, और बिस्तर का त्याग श्रेष्ठ माना गया है। इससे संयम और व्रत का फल अधिक मिलता है।
"पूजा विधि" (स्टेप बाय स्टेप)
*01.प्रात: स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें।
*02.व्रत का संकल्प लें, ‘आज वरुथिनी एकादशी का व्रत रखता/रखती हूं’।
*03.पूजा स्थान को साफ करें,
*04.भगवान विष्णु (वराह/वामन स्वरूप) का चित्र/मूर्ति स्थापित करें।
*05.गंगाजल, पंचामृत से स्नान कराएं।वस्त्र, फूल, तुलसी दल अर्पित करें।
*06.घी/तेल का दीपक, धूप, कपूर अर्पित करें।
*07.विधि पूर्वक 11 बार विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता, विष्णु मंत्र का पाठ करें –
*08.("ॐ नमो भगवते वासुदेवाय")।
*09.नैवेद्य में ताजे फल, मिष्ठान्न, सूखे मेवे, तिल व मलाई युक्त दूध चढ़ाएं।
*10.आरती करें – विष्णुजी की, वराह/वामन अवतार सहित।
*11.परिक्रमा व प्रार्थना करें कि ‘हे प्रभु, मेरे पापों का नाश करें, रक्षा करें’।रात्रि जागरण करें व भजन-कीर्तन करें।
+12.अगले दिन द्वादशी को मुहूर्त में उपवास खोलें और ब्राह्मण अथवा गरीब को भोजन एवं वस्त्र दान अवश्य करें।
��"पूजा सामग्री सूची"
तांबे का लोटा, जल का कलश, गाय का दूध, पंचामृत साफ वस्त्र, तुलसी दल, आभूषण, फूल, नारियल, रूई, दीपक, घी/तेल, धूपबत्ती कुमकुम/अष्टगंध, चावल (न चढ़ाएं), तिल, गुड़, मिठाई, पान का पत्ता, पैसा, शहद, आम/केला के पत्ते, मौसमी फल, गंगाजल, गोबर, जनेऊ।
"वरुथिनी एकादशी की पौराणिक कथा"
सनातन धार्मिक ग्रंथों में प्रमुखता से वर्णित है। यह कथा वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को साक्षात भगवान विष्णु के वराह अवतार से संबंधित है, और इसमें व्रत की महिमा, शुभ फल, तथा तप-त्याग की गाथा विस्तारपूर्वक प्रकट होती है।
वरुथिनी एकादशी: राजा मान्धाता, भगवान विष्णु व मोक्ष का संदेश सभी कुछ एक साथ समाहित है। बहुत समय पूर्व की बात है। नर्मदा नदी के तट पर मान्धाता नामक राजा का राज्य था। राजा मान्धाता अत्यंत धार्मिक, न्यायप्रिय, दानशील, तपस्वी तथा भगवद भक्त थे।
उनका जीवन सत्कर्मों, धर्माराधना, तपस्या, तथा प्रभु प्रेम में ही व्यतीत होता था। वे प्रजा का पालन धर्मानुरूप करते, न्याय और सत्य की राह पर चलाना अपना लक्ष्य मानते थे। यद्यपि वे सभी सुख-सुविधाओं से युक्त थे, किन्तु भगवान की कृपा के अभिलाषी एवं मोक्ष की कामना से निरंतर जप, पूजा, तप और दान-पुण्य में रत रहते थे।
एक बार राजा मान्धाता अपने महल से बाहर निकलकर नर्मदा के किनारे एक वन में जाकर एकांतवास करने लगे। वहां वे घोर तपस्या और ध्यान में लीन रहे। मुनियों के मार्गदर्शन में उनका धर्म एवं तप कठोर होता गया। भूमि पर चटाई बिछाकर, एकाग्र मन से वे भगवान नारायण की उपासना में विलीन हो गए।
समय बीतता गया। वर्ष, महीनों में और दिन रात तपस्या के अनुरूप बहने लगे। राजा का तेज अद्भुत हो गया था। इसी बीच, राजा की परीक्षा लेने या उनके पूर्व जन्म के कर्मों का फल देने हेतु एक दिन एक जंगली भालू वहां आ पहुंचा। भालू ने धीरे-धीरे राजा के समीप पहुंचना शुरू किया।
तप में मग्न राजा को इससे कोई डर नहीं लगा। भालू ने राजा के चरणों को चबाना आरंभ कर दिया; खून बहने लगा, पीड़ा बढ़ती गई, परंतु राजा की दृढ़ता देखने योग्य थी। वे न तपस्या से डिगे, न भालू को प्रतिघात दिया। भालू राजा के पैर को मुंह में दबाए हुए उन्हें जंगल की गहराई में खींचता चला गया।
फिर हुआ वह, जिसकी आशा स्वयं राजा मान्धाता को भी नहीं थी। संसार में जब भक्त एवं धर्मात्मा विपत्ति में होते हैं, तब भगवान अवश्य उपस्थित होते हैं। राजा ने अपने अंतःकरण से करूणा भाव से भगवान विष्णु को पुकारा, उनकी कृपा की याचना की।
"हे प्रभु, मेरे तप और धर्म का मर्यादा है, आप ही रक्षक हैं। मुझे कष्टों से मुक्ति दें, मेरे पापों को हर लें।"भगवान श्रीहरि विष्णु भक्त की पुकार न सुनें ऐसा संभव ही नहीं है। तत्काल वे सुदर्शन चक्र सहित प्रकट हुए। अपने तेज एवं चक्र के माध्यम से उन्होंने उस भालू का संहार किया और राजा को मृत्यु के मुख से बचाया।
किन्तु भालू राजा का पैर पहले ही खाने में सफल हो गया था। राजा अत्यंत दुःखी हुए, अपने अधूरे अंग को देख कर वे विचलित हो उठे। अपने भक्त को कष्ट में देखकर भगवान विष्णु बोले, "हे वत्स! दुखी मत हो। यह तुम्हारे पूर्व जन्म का पाप है, जिसके कारण तुम्हें इस जन्म में यह पीड़ा भोगनी पड़ी।
लेकिन तुम्हारा धर्म, तप और व्रत पालन सराहनीय है। यदि तुम मथुरा जाकर वैशाख कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक रखो, मेरी वराह अवतार की प्रतिमा की पूजा करो, तो तुम्हारे सारे दोष दूर हो जाते हैं।
तुम्हारे अंग फिर से पूर्ण हो जाएंगे, तथा तुम स्वर्ग एवं मोक्ष के अधिकारी बनोगे।"राजा मान्धाता ने भगवान विष्णु की आज्ञा शिरोधार्य की। वे मथुरा नगरी पहुंचे, वहां यमुना नदी में स्नान कर शुद्ध चित्त से वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा।
उपवास किया, सत्य, ब्रह्मचर्य, संयम और सात्विकता का पालन किया। विधिवत भगवान श्रीहरि के वराह रूप की प्रतिमा का पूजन, फल, पंचामृत, तुलसी दल, और दीपक आदि से पूजन किया। रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन में डूबे।
अगले दिन द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण करके अन्न-दान, वस्त्र-दान एवं ब्राह्मण पूजन किया। व्रत का फल इतना प्रभावशाली था कि राजा मान्धाता के अंग फिर से पूर्ण स्वस्थ एवं सुंदर हो गए।
उनका तेज सात गुना बढ़ गया। उन्होंने वैराग्य, सहिष्णुता, दया, क्षमा, सत्य और धर्म का रास्ता अपनाया। प्रजा का पालन, संकटों को हरना, जरूरतमंदों के लिए स्वर्ण दान, अन्नदान और कन्यादान - इन दान श्रेष्ठ कर्मों में वे अग्रणी बने।
वरुथिनी एकादशी का व्रत हर प्रकार के पापों का हरण करता है और स्वर्ग लोक की प्राप्ति एवं मोक्ष दिलाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को वरुथिनी एकादशी की कथा सुनाते हुए बताया - "हे युधिष्ठिर! वरुथिनी एकादशी का व्रत कन्यादान एवं दस-हजार वर्ष के तप के बराबर पुण्य देता है।
छाया, वसुंधरा, हाथी, घोड़ा, स्वर्ण और अन्न का दान सभी श्रेष्ठ हैं, किंतु अन्नदान से बढ़कर कोई दान नहीं। अन्नदान देवता, पितर व मनुष्य – सभी की तृप्ति का साधन है। कन्यादान एवं अन्नदान को धर्मशास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
"जो व्यक्ति वरुथिनी एकादशी के दिन लोभ वश कन्या का धन लेता है, उसे प्रलय काल तक नरक में पीड़ा महसूस करनी पड़ती है और अगले जन्म में बिलार के रूप में जन्म लेना पड़ता है। जो व्यक्ति सही भाव से कन्यादान करता है, उसका पुण्य चित्रगुप्त भी नहीं लिख सकते। इसी प्रकारों के पालनकर्ता की आत्मा भगवान विष्णु के लोक में चली जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण ने एकादशी व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य बातों का उल्लेख किया: व्रत के दिन कांसे के बर्तन में भोजन, मांसाहार, मसूर दाल, चने का शाक, कोदों का साग, शहद, दूसरे का अन्न, स्त्री-संग और दूसरी बार भोजन वर्जित है।
व्रतधारी को पान खाना, दातुन करना, चुगली, निंदा, क्रोध तथा असत्य भाषण से बचना चाहिए। जुआ, अप्राकृतिक व्यवहार और अनुचित वार्तालाप भी निषिद्ध है। नमक, तेल और अन्न भी वर्ज्य हैं। इस दिन विष्णु भगवान की पूजा कर के तुलसी दल अर्पित करना चाहिए।
भगवान को तिल का दीपक विशेष प्रिय है, इसी से आरती करें। तिल, मौसमी फल, पंचामृत से नैवेद्य चढ़ाए। पूजा के बाद परिक्रमा करें। श्रीहरि का ध्यान, स्तुति, और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। रात्रि में जागरण, भजन और कीर्तन अत्यंत शुभ होते हैं।
अगले दिन द्वादशी पर व्रत खोलें तथा गरीब, ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा अवश्य दें। इस प्रकार राजा मान्धाता के जीवन में वरुथिनी एकादशी व्रत का अद्भुत प्रभाव दिखाई पड़ा। उनके संकट दूर हो गए, जीवन में सुख, सामर्थ्य एवं वैभव का उदय हुआ। पापों का हरण हुआ, पुण्य बड़े और अंत में मोक्ष की प्राप्ति हुई।
जब धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से वरुथिनी एकादशी के फल का रहस्य पूछा, तब भगवान ने यही कथा सुनाई।राजा मान्धाता के तप, त्याग, निर्धन सेवा, धर्म पालन और व्रत से जुड़े इस कथा से शिक्षा मिलती है कि जीवन में सबसे बड़ा पुण्य सत्य, संयम, दया, ब्रह्मचर्य और प्रभु उपासना है।
वरुथिनी एकादशी व्रत द्वारा व्यक्ति के जीवन के तमाम कष्ट, पाप और अज्ञान नष्ट होते हैं और वो स्वर्ग तथा मोक्ष का अधिकारी बनता है�����.
इस प्रकार वरुथिनी एकादशी की कथा भक्तों को धर्म, तप, संयम, कर्म, दान एवं प्रभु प्रेम का आदर्श देती है। इस कथा का व्रतधारियों द्वारा पाठ करना स्वयं व्रत के संपूर्ण फल की प्राप्ति में सहायक होता है।
"FAQ" (सामान्य प्रश्न-उत्तर)
*Q1: वरुथिनी एकादशी क्यों मनाई जाती है?
*A1: पाप नाश, सौभाग्य, कल्याण और मोक्ष के लिए।
*Q2: व्रत में क्या खाएं और क्या त्यागें?
*Q3: किस रूप की पूजा करें?
*A3: भगवान विष्णु के वराह या वामन अवतार की।
*Q4: ये व्रत कैसे खोलें?
*A4: द्वादशी के दिन, प्रात: मुहूर्त में फल, पंचामृत या दूध से।
*Q5: इस व्रत का क्या फल है?
A5: अनंत पुण्य, कन्यादान एवं दस-हजार स्वर्णदान के फल के समान।
"वरुथिनी एकादशी के अचूक टोटके"
*01.श्रीहरि के समक्ष तिल दीपक जलाकर ‘ॐ वासुदेवाय नमः’ का 108 बार जप करें।
*02.तुलसी दल व तिल का दान करें, आर्थिक संकट दूर होगा।
*03.गरीबों में अन्न-दान करें, शांति व सुख मिलेगा।
*04.घर में विष्णु सहस्रनाम का पाठ कराएं, घर में पॉजिटिव ऊर्जा।
*05.व्रत समाप्ति पर नारियल व दूध दान करें, ऋण मुक्ति होगी।
*06.भगवान को पीला वस्त्र व सौंफ अर्पित करने से विवाह संबंधी बाधाएं दूर होंगी।
"Disclaimer"
यह लेख केवल पारंपरिक, धार्मिक एवं पौराणिक सूत्रों पर आधारित है। वरुथिनी एकादशी व्रत, उसकी विधि, महिमा, कथा आदि से जुड़ी सभी जानकारी प्राचीन ग्रंथों एवं लोकप्रिय पंचांगों के आधार पर दी गई है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा विधि या व्रत के पालन के पहले अपने कुलाचार्य, विद्वान पंडित या धार्मिक आचार्य से परामर्श अवश्य करें। किसी भी पूजा/व्रत में सर्वमान्य परंपराएं भिन्न-भिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों में हो सकती हैं।
इस लेख का उद्देश्य श्रद्धालुओं को सतर्क, जागरूक एवं धार्मिक ज्ञान देना मात्र है, न कि किसी कर्मकांड या मान्यता को बाध्य करना। उपयोगकर्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह प्राप्त जानकारी को अपनी विवेक बुद्धि से अपनाए तथा लागू करे। यह लेख किसी प्रकार से स्वास्थ्य, भोजन, व्यसन त्याग आदि से संबंधित चिकित्सकीय या विशेषज्ञ सलाह नहीं है। किसी भी धार्मिक कृत्य, समाधानों, पूजा विधि आदि का अनुसरण व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास का विषय है।
लेख में बताए गए उपाय, टोटके केवल धार्मिक श्रृद्धा रखने वालों के लिए हैं, वैज्ञानिक या व्यावहारिक परिणामों की कोई गारंटी नहीं है।
