कार्तिक छठ पूजा 2030: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पौराणिक कथा और महत्व – जानें संपूर्ण शेड्यूल f

कार्तिक छठ पूजा 2030: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, पौराणिक कथा और महत्व – जानें संपूर्ण शेड्यूल

 कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा (महापर्व छठ) 01 नवंबर 2030 ( दिन शुक्रवार) को मुख्य छठ पूजा (संध्या अर्घ्य) के रूप में मनाई जाएगी।

चार दिवसीय छठ पूजा 2030 का पूरा ब्यौरा:

नहाय-खाय (चतुर्थी तिथि): 30 अक्टूबर 2030 दिन बुधवार, 

 खड़ना (पंचमी तिथि): 31 अक्टूबर 2030, दिन गुरुवार 

संध्या अर्घ्य / मुख्य छठ पूजा (षष्ठी तिथि): 01 नवंबर 2030, दिन शुक्रवार 

उषा अर्घ्य और पारण (सप्तमी/अष्टमी तिथि): 02 नवंबर 2030, दिन शनिवार

छठ व्रत धारी तालाब में स्नान कर हाथों में सुप लेने का इंतजार करती हुई तस्वीर

छठ पूजा 2030: सूर्य देव को समर्पित महापर्व, जानें तारीख, शुभ योग और 4-दिवसीय ब्यौरा 

वर्ष 2030 का महापर्व छठ एक बार फिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था, त्याग और अटूट विश्वास का प्रतीक बनेगा। यह लोक आस्था का पर्व 1 नवंबर 2030, शुक्रवार को संध्या अर्घ्य के साथ मनाया जाएगा। इस साल यह पर्व और भी खास होगा क्योंकि इस दिन रवि योग, आडल योग और विडाल योग जैसे अत्यंत शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इस पावन अवसर की महिमा को और बढ़ाते हैं ।

चार दिवसीय इस महापर्व की शुरुआत 30 अक्टूबर 2030, बुधवार को 'नहाय-खाय' से होगी। इसके बाद 31 अक्टूबर, गुरुवार को 'लोहंडा और खरना' (पंचमी) का व्रत रखा जाएगा, जहां प्रसाद को शुद्धता से तैयार किया जाता है। पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन 1 नवंबर को 'संध्या अर्घ्य' है, जब डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की रस्म अदा की जाती है। इसके अगले दिन 2 नवंबर, शनिवार को 'उषा अर्घ्य' के बाद व्रती पारण करके व्रत का समापन करेंगे ।

इस बार छठ पूजा पर बनने वाले विशेष योग इसे आध्यात्मिक दृष्टि से और भी फलदायी बनाएंगे। जानिए इस पर्व की पूरी तिथियां और शुभ मुहूर्त, ताकि आप इस महापर्व को विधि-विधान से मना सकें।

पवित्रता और आस्था का महापर्व छठ इस बार 30 नवंबर से शुरू होकर 02 नवंबर तक चलेगा। 36 घंटे निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना करना तथा संतान के दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा इस वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि अर्थात 30 नवंबर से शुरू होगा।

जानें छत पर के पूरे कार्यक्रम

छठ पूजा का प्रारंभ चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है। इसके बाद पंचमी तिथि को खड़ना या रसियाव का आयोजन किया जाता है।

षष्ठी तिथि को छठ पूजा और सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान हैं। अर्घ्य देने के उपरांत व्रतधारी 36 घंटे से निर्जला व्रत का पारण करके व्रत को पूरा करते हैं। छठ पर्व पवित्रता की महता को दर्शाता है।

"चार दिवसीय आस्था का महापर्व छठ नहाय-खाय से शुरू"

आस्था का महापर्व छठ पर्व का शुभारंभ कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पर्व का पहला दिन कहलाता है, इस दिन को नहाए खाय कहते हैं।

इस वर्ष नहाय-खाय 30 नवंबर दिन बुधवार को पड़ रहा है।


इस दिन सुबह उठकर नदी, तालाब, कुंआ या घर में स्थित नल से स्नान कर शरीर पर गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद आस्था का महापर्व छठ व्रत करने का संकल्प लें।

भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद घर में बड़े बुजुर्गों का चरण स्पर्श करें। पूजा के उपरांत अरवा चावल का भात और लौकी से बने सब्जी का सेवन करें।

"चंद्रमा को अस्ताचलगामी होने के बाद शुरू होगा 24 घंटे का निर्जला व्रत"

खड़ना की रात चंद्र अस्त के बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। महा आस्था का पर्व छठ के दूसरे दिन खड़ना करने का विधान है। इस दिन छठ पूजा का दूसरा दिन कहलाता है।

यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खड़ना पर्व मनाते हैं । इस वर्ष खड़ना 31 नवंबर, दिन गुरुवार को है। खड़ना के दिन व्रतधारी स्त्री और पुरुष सुबह से ही निर्जला रखकर छठी मैया का स्मरण दिन भर करती रहती है और पारंपरिक गीत गाती रहती है।

सूर्यास्त होने के बाद स्नान कर नए वस्त्र पहन कर व्रतधारी भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसके बाद मिट्टी के बने चूल्हे पर आम की लकड़ी से पीतल के बर्तन में गुड़ के खीर और रोटी जो बनाती हैं। धूप और दीप से छठी मैया की पूजा अर्चना करने के उपरांत खीर और रोटी खाती है।

छठ व्रतधारियोंं को भोजन करने के उपरांत लोगों के बीच रसियाव और रोटी वितरण प्रसाद के रूप में किया जाता है।

मान्यता है इस दिन खड़ना के प्रसाद मांग कर खाने से छठी मैया खुश होती है। आकाश में जब तक चंद्र उदय रहता है व्रतधारी पानी पी सकते हैं। चंद्रमा अस्त हो जाने के बाद 24 घंटेे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

खड़ना की रात चंद्रास्त शाम 09:32 बजे पर होगा। चंद्रास्त के पूर्व व्रतधारी पेय पदार्थ पी सकते हैं। इसके बाद 32 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा।

"तीसरे दिन डुबते सूर्य को व्रतधारी अर्घ्य देते हैं"

व्रतधारी आस्था के महापर्व के तीसरे दिन 01 नवंबर दिन शनिवार को छठ पूजा का प्रमुख दिन कहलाता है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन संध्या बेला सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

दोपहर खत्म होते ही निकल "पड़ते हैं व्रतधारी छठ घाट के लिए"

छठ की पूजा सामग्रियों को दउरा और सूप में सजा कर व्रतधारी छठी मईय की गीत गाते हुए घाट की ओर प्रस्थान करती है। इसके बाद घाट पर पहुंचकर छठी मैया और सूर्य देव का पिंड बनाकर पवित्र जल में स्नान कर, पूजा अर्चना करने के उपरांत डुबते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हैैं।

अर्घ्य देने के दौरान घरवाले जो घाट पर स्नान कर चुके हैं वह भी भगवान भास्कर को जल में दूध मिलाकर अर्घ्य देते हैं। अंत में घाट पर से छठ गीत गाते हुए व्रतधारी घर के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

"चौथे दिन अमृत मुहूर्त में उगते सूर्य को दें अर्घ्य"

आस्था का महापर्व छठ के चौथे दिन उगते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर पारण करते हैं। सूर्योदय के समय अमृत मुहूर्त का सुख संयोग मिल रहा है। बहुत से समाज सेवी संस्थाएं घाट पर शिविर लगाकर व्रतधारियों के बीच दूध, आम का दातुन, आम का लकड़ी, चाय, खीर और कॉफी आदि सामग्रियों का वितरण करते हैं। उसी दौरान व्रतधारी भी लोगों के बीच ठेकुआ के प्रसाद का वितरण करते हैं।

"पहले दिन का अर्ध्य शाम 05:26 बजे के बाद"

सूर्यास्त शाम 05:08 बजे पर हो जाएगा। व्रतधारियों को अर्घ्य देते समय तीन मुहूर्तों का संयोग मिलेगा। गोधूलि, लाभ और सायाह्य संध्या मुहूर्त रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 05:08 बजे से लेकर 05:33 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार सायाह्य संध्या मुहूर्त 05:08 बजे से लेकर 06:24 बजे तक रहेगा। इस दौरान अर्घ्य देना शुभ रहेगा।

"सुबह का अर्ध्य 06:46 के बाद"

इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य छठ व्रतधारी देते हैं। सूर्योदय सुबह 05:00 बज के 50 मिनट पर होगा। 

छठ पूजा विधि: संध्या और उषा अर्घ्य के बाद की पूरी प्रक्रिया

छठ घाट पर पहुंचने के बाद व्रतधारी सबसे पहले मिट्टी से छठ मैया की पिंडी बनाते हैं और विधि-विधान से उसकी पूजा करते हैं। आइए जानते हैं संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के बाद की पूरी प्रक्रिया:

संध्या अर्घ्य के बाद (01 नवंबर शाम)

घाट पर पहुंचकर सबसे पहले जल एवं पृथ्वी पूजन करें। इसके बाद मिट्टी से छठ मैया की पिंडी बनाएं और उसे पूर्ण श्रद्धा से स्थापित करें।

अब नदी/जलाशय में खड़े होकर 05-10 मिनट का ध्यान करें और मौन प्रार्थना करें । फिर डूबते सूर्य को अर्घ्य देने की प्रक्रिया शुरू करें। इस दौरान बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल, गन्ना, अदरक, नींबू आदि प्रसाद सजाकर सूर्य देव को अर्पित करें।  इस समय हजारों श्रद्धालु जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं - यह दृश्य सामूहिक आस्था का अद्भुत प्रतीक होता है।

संध्या अर्घ्य के बाद घर लौटकर हवन/धूप जलाने की परंपरा है। इस दौरान छठ मैया की पिंडी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। व्रतधारी इस रात निर्जला व्रत रखते हैं और सुबह उषा अर्घ्य की तैयारी में जुट जाते हैं।

उषा अर्घ्य के बाद (02 नवंबर सुबह)

सूर्योदय से पहले ही व्रतधारी परिवार सहित घाट पर पहुंच जाते हैं। सबसे पहले छठ मैया की पिंडी का पुनः पूजन करें। उसके बाद उगते सूर्य को अर्घ्य देने की प्रक्रिया शुरू होती है।

इस दौरान व्रतधारी जल में खड़े होकर सूर्योदय के साथ अर्घ्य अर्पित करते हैं और नए दिन, उजाले और जीवन के लिए आभार व्यक्त करते हैं । यह अनुष्ठान आशा और नई शुरुआत का प्रतीक है।

उषा अर्घ्य के बाद व्रतधारी पारण करते हैं - यानी प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोलते हैं। इसके बाद परिवार और मित्रों के साथ प्रसाद का वितरण किया जाता है। घर लौटकर छठ मैया की पिंडी का विसर्जन किया जाता है और पूरे परिवार के सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

इस प्रकार चार दिनों का यह महापर्व सूर्य देव और छठ मैया के प्रति अटूट विश्वास और कृतज्ञता के साथ संपन्न होता है।

"छठ पर्व में लगने वाली पूजा सामग्री"

आस्था के महापर्व छठ में अनेक तरह के पूजा सामग्री लगती है। कच्चे बांस की दो टोकरी, बांस या पीतल के सूप, जल अर्पण करने के लिए पीतल या तांबा का लोटा, पान पत्ता, गोटा सुपारी, अरवा चावल, सिंदूर, मिट्टी का दीया, शहद, गुड, दूध, धूप अगरबत्ती, शकरकंद, सुथनी, पत्ते सहित पांच गन्ने के पौधे, मूली, अदरख और हल्दी का हरा पौधा, केला, सेवन, संतरा, नाशपाती, शरीफा, पानी फल, आंवला, पानी वाला नारियल, ठेकुआ, नया वस्त्र, गाजर, बड़ा नींबू, कपूर, आम का सुखी लकड़ी और दातुन प्रमुख है

"जानें छठ व्रत को लेकर पौराणिक कथा"

छठ व्रत के संबंध में कई तरह के पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी के अंश को देवसेना कहा जाता है। देवसेना प्राकृतिक का छठा अंश है। इसलिए देवसेना को छठी मैया भी कहा जाता है।

पुराणों के अनुसार छठी देवी को नौनिहालों (बच्चों) की रक्षा करने वाली माता तथा लंबी उम्र प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। आज भी देश के कई राज्यों में नौनिहालों (बच्चों) के जन्म के छठवें दिन को छठिहार के रूप में मनाने की परंपरा है।

"ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी छठी मैया"

पौराणिक कथाओं के अनुसार छठी मैया को ब्रह्माजी का मानस पुत्री भी कहा जाता है। छठी देवी की पूजा नवरात्रा की षष्ठी तिथि को कात्यायनी माता के रूप में मां के भक्त पूजा करते हैं। एक और मान्यता के अनुसार सूर्य देव की बहन भी छठी मैया को माना गया है।

"महाभारत काल में मिलती है छठ पर्व की दो कथाएं"

दो कथा महाभारत काल से भी जुड़े हैं। कर्ण का जन्म सूर्य देव के द्वारा दिए गए वरदान के कारण कुंती के गर्भ से हुआ था। कर्ण को भगवान सूर्य ने कवच और कुंडल भी प्रदान किया था। कर्ण प्रतिदिन सुबह समय कमर भर जल में खड़े होकर घंटों भगवान सूर्य की पूजा करते थे और नदी के जल से भगवान भास्कर को अर्घ्य देते थे। भगवान सूर्य को अर्घ्य दने की परंपरा कर्ण ने हीं शुरू किया था।

दूसरी कथा पांडव से जुड़ा है। पांडव जुए में अपना समस्त राजपाट हार गए थे। द्रोपती ने छठ व्रत कर अपने खोए राज-पाट को पुनः प्राप्त किया था।

"रानी के पुत्र प्राप्ति की कथा"

छठ व्रत की कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम मालिनी थी। दोनों नि:संतान थे। संतान नहीं होने से राजा और रानी काफी दुखी रहते थे। राजा और रानी ने एक दिन पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से रानी गर्भवती हो गईं। 9 महीने बाद संतान सुख प्राप्त करने का समय आया तो रानी के गर्भ से मृत पुत्र पैदा हुआ। राजा को जब इस बात का पता चला तो वे बहुत ज्यादा दुखी हो गए।

संतान शोक में राजा ने आत्म हत्या करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। परन्तु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक अद्भुत और अलौकिक देवी प्रकट हो गई।

देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्टी माता हूं। मैं सभी नि: संतानों को संतान का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो भक्त सच्चे मन से मेरी पूजा-अर्चना करते हैं, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण कर देती हूं।

अगर तुम मेरी पूजा-पाठ और अराधना करोंगे तो मैं तुम्हें पुत्र प्रदान करूंगी। देवी की इन बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरी विधि-विधान और निष्ठा पूर्वक से छठ व्रत किया। राजा और रानी ने ठीक देवी ने जैसे बतायी थी। ठीक वैसे ही चैत्र शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के परिणामस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई

छठ पूजा से जुड़े 5 अनोखे प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न 1: छठ पूजा में डूबते और उगते सूर्य दोनों को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

उत्तर: यह पर्व जीवन चक्र के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। डूबता सूर्य समापन और त्याग का संदेश देता है, तो उगता सूर्य नई शुरुआत और आशा का  वैज्ञानिक दृष्टि से कार्तिक शुक्ल षष्ठी पर सूर्य की पराबैंगनी किरणें अधिक सक्रिय होती हैं, और जल में खड़े होकर अर्घ्य देने से इन किरणों का शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 2: छठ व्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत क्यों रखते हैं?

उत्तर: खड़ना (दूसरे दिन) शाम को भोजन करने के बाद व्रती अगले 36 घंटे बिना पानी के रहते हैं, जो उषा अर्घ्य के बाद पारण के साथ समाप्त होता है । यह आत्म-अनुशासन और शारीरिक सहनशक्ति की पराकाष्ठा है, जो व्रती की सूर्य देव और छठ मैया के प्रति अटूट निष्ठा को दर्शाता है।

प्रश्न 3: छठ पूजा का प्रसाद (ठेकुआ) विशेष क्यों है?

उत्तर: ठेकुआ गेहूं के आटे और गुड़ से बनता है, जिसमें प्याज-लहसुन वर्जित हैं। यह सात्विक भोजन है जो पूर्ण शुद्धता में तैयार किया जाता है। व्रत के दौरान प्रसाद को व्रतधारी के अलावा कोई नहीं छू सकता, और इसे बांस की सूप में सजाकर सूर्य को अर्पित किया जाता है।

प्रश्न 4: छठ पूजा में 'सूप' का क्या महत्व है?

उत्तर: बांस या पीतल की सूप (छाज) पवित्रता और समर्पण का प्रतीक है। इसमें प्रसाद, फल, गन्ना, नींबू, और दीपक रखकर अर्घ्य दिया जाता है। सूप के माध्यम से ही छठ मैया की पूजा होती है - व्रती सूप में प्रसाद भरकर सूर्य देव को अर्पित करती हैं।

प्रश्न 5: क्या छठ पूजा सिर्फ बिहार-उत्तर प्रदेश में ही मनाई जाती है?

उत्तर: हालांकि यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल का पर्व है, अब यह पूरे भारत और विदेशों में प्रवासी समुदायों द्वारा भी धूमधाम से मनाया जाता है। यह वैदिक परंपरा का सबसे प्राचीन निर्जला व्रत है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद और महाभारत में भी मिलता है।

मुहूर्त का समय, सूर्योदय और सूर्यास्त का समय पंचांग से लिया गया है। लेख लिखने का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म का प्रचार प्रसार करना और सनातनियों के बीच धर्म के प्रति जागरूकता प्रदान करना ही हमारा मुख्य उद्देश्य है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस लेख/सामग्री में दी गई सभी तिथियां, योग, मुहूर्त और पूजा-विधियां विभिन्न पंचांगों, धार्मिक ग्रंथों एवं सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं। हालांकि इन्हें सटीकता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, फिर भी सौर-चंद्र गणनाओं, क्षेत्रीय भिन्नताओं, और पंचांगों की भिन्न-भिन्न परंपराओं के कारण तिथियों एवं मुहूर्तों में मामूली अंतर संभव है।

यह सामग्री केवल सूचनात्मक एवं जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या व्रत को करने से पहले कृपया अपने क्षेत्र के स्थानीय पंडित, पुरोहित या आधिकारिक पंचांग से निश्चित दिशा-निर्देश अवश्य प्राप्त कर लें।

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