"अक्षय तृतीया 2032 (12 मई) का शुभ मुहूर्त, 12 राशियों की खरीदारी गाइड, अबूझ मुहूर्त का पौराणिक महत्व और धन वृद्धि के अचूक उपाय जानें।"
अक्षय तृतीया 2032: शुभ मुहूर्त, महायोग और इस अबूझ मुहूर्त का पौराणिक महत्व
अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सनातन परंपरा का वह दिव्य दिन है जिसका फल कभी समाप्त नहीं होता—यानी जो सदा 'अक्षय' रहता है। वर्ष 2032 में 12 मई (बुधवार) को मनाई जाने वाली यह अक्षय तृतीया अत्यंत विशेष और फलदायी होने जा रही है। इस पावन तिथि पर सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और विडाल योग का एक दुर्लभ संगम बन रहा है, जो इसे हर प्रकार के शुभ और नए कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी बनाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु के अवतार परशुरामजी और हयग्रीव का प्राकट्य हुआ था, साथ ही ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी इसी तिथि को माना जाता है। धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह दिन नया अध्याय रचने वाला है—इसी दिन त्रेतायुग का शुभारंभ हुआ था, महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और आज भी इसी पावन अवसर पर बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं।
यदि आप विवाह या किसी मांगलिक कार्य के लिए बिना पंचांग देखे सबसे शुभ घड़ी तलाश रहे हैं, तो यह 'अबूझ मुहूर्त' आपके लिए सर्वोत्तम है। वृंदावन में बांके बिहारी जी के चरण दर्शन से लेकर धन-वैभव की अधिष्ठात्री माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा पाने तक, जानिए इस पावन दिन का पूरा महात्म्य और पूजन विधि।
अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि जो विक्रम संवत 2089, दिन रविवार, दिनांक 12 मई को मनाया जाएगा।
अक्षय तृतीया 12 मई को है इस बात की जानकारी गया के आचार्य जीतेंद्र उपाध्याय और टाटानगर के आचार्य गोविन्द झा ने संयुक्त रूप से दी।
अब जानें रंजीत के ब्लॉग पर अक्षय तृतीया के दिन क्या-क्या घटनाएं घटित हुई थी।
*01.अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म हुआ था।
*02.इसी दिन हयग्रीव का अवतार हुआ था।
*03.अक्षय तृतीया के दिन बद्रीनाथ धाम का कपाट खुलते हैं।
*04.इसी दिन परशुराम जी का जन्म हुआ था।
*05.अक्षय तृतीया के दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुई थी।
*06.अक्षय तृतीया के दिन त्रेता युग प्रारम्भ हुआ था।
*07.वृंदावन के बांके बिहारीजी मंदिर में इसी दिन श्रीविग्रह जी के चरणों के दर्शन होते हैं। नहीं तो सालों भर उनके चरण वस्त्र से ढ़के रहते है।
*08.इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष विधान है।
*09.इसी दिन बद्रीनाथ धाम का कपाट खुलते हैं।
*10.अनबूझ मुहूर्त इसी दिन है। निर्भिक होकर करें शादी।
**यहां 2032 में अक्षय तृतीया (12 मई, बुधवार) पर बनने वाले शुभ महा योगों (सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और विडाल योग) के आधार पर 12 राशियों का राशिफल और उनकी खरीदारी से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी गई है:**
अक्षय तृतीया 2032: 12 राशियों का राशिफल और खरीदारी गाइड
मेष राशि (Aries)
दिन कैसा रहेगा: आत्मविश्वास में वृद्धि होगी और रुके हुए काम पूरे होंगे। कार्यक्षेत्र में पद-प्रतिष्ठा बढ़ने के योग हैं।
क्या खरीदें: सोने या तांबे के आभूषण, पीतल के बर्तन या लाल रंग की धातु की वस्तुएं।
2. वृषभ राशि (Taurus)
दिन कैसा रहेगा: भौतिक सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी। माता लक्ष्मी की विशेष कृपा से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी।
क्या खरीदें: चांदी के आभूषण, बर्तन या हीरे के आभूषण। चावल और सफेद वस्त्र खरीदकर लाना भी शुभ रहेगा।
3. मिथुन राशि (Gemini)
दिन कैसा रहेगा: बौद्धिक और व्यापारिक कार्यों में सफलता मिलेगी। नए निवेश और साझेदारी के लिए दिन उत्तम है।
क्या खरीदें: पन्ना रत्न, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, या हरे रंग का कोई वाहन या कपड़े।
4. कर्क राशि (Cancer)
दिन कैसा रहेगा: मानसिक शांति और पारिवारिक सौहार्द बढ़ेगा। नया घर या संपत्ति खरीदने का विचार बन सकता है।
क्या खरीदें: चांदी के सिक्के या मोती की माला। रसोई के लिए मिट्टी का बर्तन (कलश) या सेंधा नमक लाना अत्यंत समृद्धि देगा।
5. सिंह राशि (Leo)
दिन कैसा रहेगा: मान-सम्मान और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि होगी। व्यापार में अचानक लाभ के योग हैं।
क्या खरीदें: सोना, माणिक्य रत्न, तांबे के बर्तन या धार्मिक पुस्तकें।
6. कन्या राशि (Virgo)
दिन कैसा रहेगा: लंबे समय से चली आ रही आर्थिक अड़चनें दूर होंगी। किस्मत का पूरा साथ मिलेगा।
क्या खरीदें: कांसा, नए बही-खाते, स्टेशनरी का सामान या घर के लिए कांसे की थाली/पूजा का पात्र।
7. तुला राशि (Libra)
दिन कैसा रहेगा: कला, फैशन और लग्जरी से जुड़े लोगों के लिए दिन शानदार रहेगा। अचानक धन लाभ हो सकता है।
क्या खरीदें: चांदी, श्रीयंत्र, सजावटी सामान या वाहन।
8. वृश्चिक राशि (Scorpio)
दिन कैसा रहेगा: ऊर्जा और उत्साह में बढ़ोतरी होगी। जीवनसाथी के साथ संबंध मजबूत होंगे।
क्या खरीदें: पीतल, मूंगा, तांबे की पूजा सामग्री या जमीन/प्लाॉट का सौदा करना शुभ रहेगा।
9. धनु राशि (Sagittarius)
दिन कैसा रहेगा: आध्यात्मिक रुझान बढ़ेगा। धार्मिक कार्यों और दान-पुण्य में मन लगेगा।
क्या खरीदें: सोना, हल्दी, चने की दाल, पीला वस्त्र या धार्मिक ग्रंथ।
10. मकर राशि (Capricorn)
दिन कैसा रहेगा: करियर में स्थिरता आएगी और पुराने निवेशों से बड़ा लाभ मिलने के संकेत हैं।
क्या खरीदें: लोहा, स्टील, नया वाहन, या नीलम रत्न। यदि बजट कम है तो तिल या सरसों का तेल खरीदना भी शुभ है।
11. कुंभ राशि (Aquarius)
दिन कैसा रहेगा: आय के नए स्रोत खुलेंगे। दोस्तों और सहयोगियों का पूरा समर्थन मिलेगा।
क्या खरीदें: नया घर/जमीन, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, स्टील के बर्तन या नीले रंग के वस्त्र।
12. मीन राशि (Pisces)
दिन कैसा रहेगा: ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का योग है। व्यापार में लंबे समय के लिए फायदा होगा।
क्या खरीदें: पीला सोना, पुखराज रत्न, केसर, या पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाली पीली कौड़ी और कमलगट्टा।
विशेष टिप: यदि इस दिन सोना-चांदी खरीदने का बजट न हो, तो मिट्टी का मटका/कलश, खड़ा नमक, साबुत धनिया या पीली सरसों खरीदना भी सोने ऐसे के बराबर ही शुभ और फलदायी माना जाता है।
पंचांग के अनुसार जानें अक्षय तृतीया के दिन कैसा रहेगा
वैशाख माह, शुक्ल पक्ष, तृतीया तिथि, विक्रम संवत 2089, दिन बुधवार, दिनांक 12 मई 2032 को अक्षय तृतीया है। अक्षय तृतीया के दिन सूर्योदय सुबह 05:06 बजे पर और सूर्यास्त शाम 06:23 बजे पर होगा।
उसी प्रकार चंद्रोदय सुबह 07:16 बजे पर और चंदास्त रात 09:53 बज के 17 मिनट को होगा। नक्षत्र रोहिणी, योग सौभाग्य सुबह 08:22 बजे तक इसके बाद शोभन हो जाएगा। सूर्य मेष राशि में और चंद्रमा वृषभ राशि में गोचर कर रहे हैं।
अक्षय तृतीया के दिन दिनमान 13 घंटा 11 मिनट का होगा जबकि रात्रि मान 10 घंटा 47 मिनट का रहेगा।
दिनांक 11 मई दिन मंगलवार शाम 06:23 बजे से तृतीया तिथि प्रारंभ हो जाएगी, जो दूसरे दिन अर्थात बुधवार को शाम 06:54 बजे को समाप्त हो जाएगी
सिंधु निर्णय पुराण के अनुसार जिस दिन सूर्योदय होगा। उस दिन को उस तिथि के अनुसार दिनभर माना जायेगा। इस प्रकार तृतीया तिथि 12 मई दिन बुधवार को दिनभर मान्य रहेगा।
अब पढ़े पूजा करने का और आंवले पेड़ के नीचे भोजन करने का शुभ मुहूर्त
अक्षय तृतीया के दिन आंवला वृक्ष के नीचे भोजन करने का सनातनी विधान है। माना जाता है कि आज के दिन कोई भी शुभ कार्य करने से अक्षय हों जाता है अर्थात जिसका क्षय नहीं होता है।
इसीलिए इस दिन को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है। इस दिन सुबह से लेकर दोपहर तक, अनेक शुभ मुहूर्त हैं। जानें विस्तार से।
सुबह 05:06 से लेकर 06:45 बजे तक लाभ मुहूर्त, 06:45 बजे से लेकर 08:24 बजे तक अमृत मुहुर्त और शुभ मुहूर्त 10:03 बजे से लेकर 111:42 बजे तक रहेगा। इसके अलावा चर मुहूर्त दिन के 03:00 बजे से लेकर 04:39 बजे तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त नहीं है जबकि विजय मुहूर्त 01:54 बजे से लेकर 02:46 बजे तक रहेगा। इस दौरान आंवला वृक्ष के नीचे पूजा और भोजन कर सकते है।
पौराणिक कथा में पढ़ें महर्षि परशुराम की जीवनी, भगवान हयग्रीव जी की जीवनी और अमीर वैश्य की कहानियां।
पढ़े परशुराम जी का जीवन कथा
पौरोणिक कथा के अनुसार महर्षि परशुराम जी का जन्म महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि के यहां हुआ था। परशुराम का जन्म पुत्रेष्टि यज्ञ से हुआ था। यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान के फल स्वरूप महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को मध्यप्रदेश इन्दौर जिला के गांव मानपुर के जानापाव पर्वत पर हुआ था।
परशुराम सतयुग के अंत और त्रेता युग के प्रारंभ में ऋषि जमदग्नि के यहां जन्म लिए थे। जो विष्णु के छठवें अवतार माने जाते हैं।
परशुराम भगवान विष्णु के क्रोधावतार हैं
परशुराम भगवान विष्णु के क्रोधावतार हैं। विष्णु पुराण के अनुसार परशुराम का पहला नाम राम था। प्रभु शिव ने उन्हें अपना परशु (फरसा) नामक अस्त्र दिए थे। परशु धारण करने के कारण उनका नाम परशुराम पड़ गया।
शिव के आश्रम में रहकर विद्या अर्जन किया परशुरामजी ने
प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में रहकर प्राप्त किए। ऋषि ऋचीक ने शार्ङ्ग नामक दिव्य अस्त्र और वैष्णव धनुष दिए। कश्यप ब्रह्मर्षि से शास्त्रानुसार अविनाशी वैष्णव मंत्र प्राप्त किए। इसके बाद कैलाश पर्वत के गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में रहकर उन्होंने विद्या प्राप्त कर अति दुर्लभ दिव्यास्त्र, विद्युदभि नामक परशु (फरसा) प्राप्त किए। भगवान भोलेनाथ ने श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु उन्हें प्रदान किए।
पढ़े हयग्रीव की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार उत्तराखंड का पूरा क्षेत्र भगवान भोलेनाथ के आधीन था। एक समय की बात है। एक बार भगवान विष्णु सहस्रकवच धारी दुर्द्धम्भ नाम के राक्षस का वध करने के लिए बद्रीनाथ धाम में नर और नारायण के रूप में तपस्या की थी।
दुर्द्धम्भ को एक हजार कवच का वरदान मिला
इस जगह की महत्ता और अलौकिकता का ही परिणाम है कि यहां एक दिन की तपस्या का फल एक हज़ार वर्ष की तपस्या के फल के समान है। सहस्रकवचधारी दुर्द्धम्भ को भगवान सूर्य ने एक हजार रक्षा कवच धारण करने का वरदान दिए थे। एक कवच भेदने के लिए एक हजार साल तक तपस्या करना पड़ता है। अपने को अमर समझकर दानव ने संपूर्ण लोक में उपद्रव करने लगा।
विष्णु को भाया शिव का निवास स्थान
भगवान विष्णु अपनी तपस्या के लिए सही जगह की खोज कर रहे थे तब उन्हें अलकनंदा नदी के किनारे का यह स्थान बहुत पसंद आया। लेकिन वहा पर भगवान शिव तपस्या कर रहे थे और उनका पूरा परिवार वहां रह रहा था।
चारों धाम का निर्माण चार युग में
जब-जब धरती पर अधर्म का बोझ बढ़ा है, तब-तब अपने भक्तो को कष्ट से उबारने के लिए विश्व के पालन कर्ता भगवान विष्णु ने जन्म लिया है। जिस प्रकार त्रेता युग में रामेश्वर धाम बना था। उसी प्रकार द्वापर युग में द्वारका धाम, कलियुग में जग्गन्नाथ पुरी धाम और सतयुग में बदरीनाथ धाम की महत्ता का वर्णन मिलता है।
एक दिन तपस्या करने का फल हजार दिनों का मिलता है
वहां भगवान विष्णु ने नर और नारायण रूप में तप किया था। बदरीनाथ में एक दिन की तपस्या करने का फल एक हज़ार साल की तपस्या के बराबर माना जाता है। दुर्द्धम्भ राक्षस के वध के लिए भगवान ने यहां एक सौ दिन तक तपस्या नर और नारायण के रूप में की थी।
बद्रीनाथ में होती है सारी मनोकामनाएं पूरी
बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु, बद्री नारायण के रूप में आज भी तप कर रहे है। कहते है यहां जो भी भक्त आता है और सच्चे मन से भगवान बद्रीनाथ का ध्यान करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।
भगवान विष्णु ने बालक रूप धारण किया
भगवान विष्णु को उसी स्थान पर तपस्या करना था परंतु वहां भोलेनाथ के परिवार निवास करते थे। उन्हें वहां से कैसे हटाया जाए यही सोचकर उन्होंने बालक का रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु ने बालक रुप धारण करके रोना शुरु कर दिया। रोते हुए बालक की आवाज सुन कर मां पार्वती बालक को चुप कराने बालक के पास गई।
बालक ने मांगा अलकनंदा का किनारा
तब उन्होनें बालक से कहा कि उसे क्या चाहिए तो बालक ने अलकनंदा किनारे की जगह मांग ली।
भगवान शिव और मां पार्वती ने बालक को वो स्थान दे दिया। इसके बाद भगवान विष्णु अपने असल रुप में आ गए और वहां पर तप करने लगे। तपस्या के दौरान भगवान विष्णु इतने ज्यादा लीन हो गए थे कि उन्हें ये भी ध्यान नहीं रहा कि उनके ऊपर बर्फ जमने लग गई है।
मां लक्ष्मी बन गई बेर का पेड़
ये सब देख भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी को बहुत दुख हुआ और वो एक बेर के पेड़ के रुप में भगवान विष्णु के पास खड़ी हो गई। और सारी बर्फ पेड़ पर गिरने लगी। तपस्या खत्म होने के बाद जब भगवान विष्णु ने देखा की उनकी पत्नी ने सारी बर्फ खुद पर ले ली है तो उन्होनें उस स्थान को बद्रीनाथ धाम का नाम दे दिया।
राजा कनक ने निर्माण कराया था बद्रीनाथ
बद्रीनाथ धाम का निर्माण आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकाराचार्य ने परमार राजा कनक के हाथों करवाया था। इस मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की मूर्ति को लेकर चर्चा है कि उसे आदि गुरु शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी से खोजा था और मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित किया था।
बद्रीनाथ में स्वयं प्रकट प्रतिमा स्थापित है
बद्रीधाम में स्थापित प्रतिमा को भगवान विष्णु के स्वंय प्रकट हुई आठ प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। बद्रीनाथ में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति को पंच बद्री अर्थात भगवान बद्रीनाथ के पांच रुपों को दर्शाता है और उसी प्रतिमाओ कि पूजा की जाती है। इस मंदिर में माता लक्ष्मी और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित है।
जानें हयग्रीव की पौराणिक कथा
जब-जब पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है भगवान किसी न किसी रूप में अवतार अवश्य लेते हैं। जानें हयग्रीव की पौराणिक कथा
हयग्रीव के पौराणिक कथा के अनुसार कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माता भगवतीने उसे अपनी तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दिया। भगवती महामाया ने उससे कहा, ये राक्षस कुलश्रेष्ठ तुम्हारी तपस्या सफल हुई। मैं तुम पर अती प्रसन्न हूं। तुम्हारी जो भी इच्छा हो मैं उसे पूरा करने के लिए तैयार हूं। वर मांगो। राक्षस कुलश्रेष्ठ भगवती की मधुर वाणी सुनकर हयग्रीव बहुत ज्यादा खुश हुआ। और कहा हे ममतामयी देवी भगवती आपको नमस्कार है। आप महामाया हैं। आपकी कृपा से सब कुछ कुछ संभव है। यदि आप मुझ पर अति प्रसन्न हैं तो मुझे अमर होने का वरदान दें।
जिसका जन्म हुआ है उसका मृत्यु निश्चित है
देवी महामाया ने कहा, राक्षस राजा पृथ्वी में जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु होती है। यह परम सत्य है। ईश्वर के इस विधान को कोई नहीं तोड़ सकता। किसी भी सांसारिक व्यक्ति को सदा के लिए अमर होना असंभव है। तुम अमरत्व के अलावा कोई अन्य वर मांग लो।
राक्षस ने कहा मेरी मृत्यु हयग्रीव के हाथों हो
हयग्रीव बोला, तो ठीक है मेरी मृत्यु हयग्रीव के हाथों हो। दूसरे मुझे कोई न मार सकें। देवी महामाया ने कहा ‘ऐसा ही होगा’। यह कह कर भगवती अंतर्ध्यान हो गईं। हयग्रीव के वरदान के प्रभाव से वह अजेय हो गया। त्रिलोक में कोई भी ऐसा नहीं था, जो उस दुष्ट राक्षस को मार सके।
हयग्रीव ने ब्रह्मा जी से वेदों को छीन लिया
हयग्रीव देवताओं तथा ऋषि, मुनियों को सताने लगा। यज्ञादि कर्म-कांड बंद हो गए और सृष्टि की व्यवस्था बिगडऩे लगी। ब्रह्मा सहित अन्य देवी देवताओं ने भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे। उनके धनुष की डोरी चढ़ी हुई थी। भगवान वाण पर सर रखकर सोए हुए थे। ब्रह्मा जी ने उनको जगाने के लिए वम्री नामक एक कीड़ा उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी के आदेश से उस कीड़ा नेे उनके धनुष की प्रत्यंचा काट दी।
विष्णु जी का कटा सिर, मचा हाहाकार
धनुष की प्रत्यंचा कटने से बड़ा भयंकर टंकार और आवाज हुआ और भगवान विष्णु का मस्तक कटकर अदृश्य हो गया। सिर रहित भगवान के धड़ को देखकर देवताओं स्तंभ और दुःखी हो गए। सभी देवी देवताओं ने मिलकर भगवती की स्तुति की। भगवती प्रकट हुई। उन्होंने कहा देवगणों चिंता करने की जरूरत नहीं है।
ब्रह्मा ने घोड़े का मस्तक काटकर विष्णु के धड़ से जोड़ दिया।
ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा मेरी कृपा से तुम्हारा मंगल ही होगा। ब्रह्मा जी एक घोड़े का मस्तक काटकर भगवान के धड़ से जोड़ दें। इससे भगवान का हयग्रीवावतार हुआ। फिर भगवान का हयग्रीव दैत्य से भयानक युद्ध हुआ। अंत में भगवान के हाथों हयग्रीव की मारा गया। हयग्रीव को मारकर भगवान ने वेदों को ब्रह्मा जी दे दिया।
वैश्य की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार किसी राज्य में एक अमीर वैश्य रहता था। अमीर होने के बाद भी वह गरीब था। एक दिन किसी ब्राह्मण ने उसे अक्षय तृतीया व्रत रखने की सलाह दी। वैश्य ने अक्षय तृतीया व्रत रखा गंगा स्नान किया और अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिणा दिया।
कुछ ही दिनों के बाद इसका व्यापार बढ़ने लगा और वह अमीर बन गया। अगले जन्म में वह कुशावती का राजा बना। वह इतना धनी बन गया कि अक्षय तृतीया के दिन त्रीदेव अर्थात ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और शिव भगवान ब्राह्मण का भेष धारण कर यज्ञ में भाग लेते हुए, यज्ञ की शोभा बढ़ाते थे।
अनबूझ मुहूर्त इसी दिन है। निर्भिक होकर करें शादी
अक्षय तृतीया के दिन अनबूझ मुहूर्त रहता है। इस दिन बिना लग्न, मुहूर्त और गणना के विवाह संपन्न हो सकते हैं। जिसका विवाह किसी कुंडली दोष के कारण नहीं हो रहा है। ऐसे जातक भी इस दिन शादी कर सकते हैं। इस दिन वाहन खरीदना, आभूषण खरीदना, घर और जमीन खरीदना काफी शुभ होता है।
अक्षय तृतीया के दिन आंवला वृक्ष के नीचे खाना खाएं
अक्षय तृतीया के दिन आंवला वृक्ष के नीचे भोजन बनाना चाहिए। वहीं पर बैठकर भोजन करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। आंवला वृक्ष के नीचे भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित कर विधि विधान से पूजा करें। ब्राह्मनों को गुप्त दान दें
दान देना सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
अक्षय तृतीया के दिन दान देना अच्छा रहेगा। उस दिन दान करने से मनुष्य को अनंत फल की प्राप्ति होती है।
अक्षय तृतीया पर धन-समृद्धि के लिए 03 प्रभावशाली उपाय (टोटके)
अक्षय तृतीया के अबूझ मुहूर्त में किए गए उपाय शीघ्र फलदायी माने जाते हैं:
कमलगट्टे और कौड़ी का उपाय: इस दिन पूजा के समय माता लक्ष्मी को 11 पीली कौड़ियां और 11 कमलगट्टे अर्पित करें। पूजन के बाद इन्हें लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या धन स्थान पर रखें। इससे पूरे वर्ष धन की आवक बनी रहती है।
गुलाबी कपड़े में एकाक्षी नारियल: अक्षय तृतीया के दिन एकाक्षी नारियल या दक्षिणावर्ती शंख की स्थापना करें। इसे गुलाबी कपड़े में बांधकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से घर में अटका हुआ पैसा वापस आने लगता है।
मिट्टी के कलश और दान का टोटका: इस शुभ दिन एक नए मिट्टी के घड़े में जल, थोड़ा सा गुड़ और तिल डालकर किसी जरूरतमंद को दान करें। मान्यता है कि जल का दान करने से पितृदोष और ग्रहदोष शांत होते हैं तथा घर में सुख-शांति आती है।
अक्षय तृतीया: 05 यूनिक प्रश्न और उत्तर (FAQs)
प्र*01. अक्षय तृतीया को 'अबूझ मुहूर्त' क्यों कहा जाता है?
उ: इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च राशि में होते हैं। इस आकाशीय स्थिति के कारण पूरे दिन का हर पल शुभ होता है, इसलिए बिना पंचांग या मुहूर्त देखे शादी, गृह प्रवेश या नया व्यवसाय शुरू किया जा सकता है।
प्र02. यदि सोना-चांदी खरीदने का बजट न हो, तो कौन सी 3 सस्ती चीजें लाएं?
उ: आप साबुत धनिया, खड़ा (सेंधा) नमक और नया मिट्टी का मटका खरीद सकते हैं। शास्त्रों में इन्हें भी सोने के समान ही पवित्र और धन को आकर्षित करने वाला माना गया है।
प्र*03. इस दिन वृंदावन के श्रीविग्रह जी के चरणों के दर्शन का क्या विशेष महत्व है?
उ: वर्ष में केवल इसी एक दिन वृंदावन में बांके बिहारी जी के श्रीविग्रह के चरणों के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। माना जाता है कि इनके दर्शन मात्र से साधक के समस्त पाप कट जाते हैं और भक्ति का फल 'अक्षय' हो जाता है।
प्र*04. अक्षय तृतीया का महाभारत और त्रेतायुग से क्या ऐतिहासिक संबंध है?
उ: इसी तिथि को त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। साथ ही, इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और पांडवों को सूर्यदेव से 'अक्षय पात्र' प्राप्त हुआ था, जिससे भोजन कभी समाप्त नहीं होता था।
प्र*05. क्या अक्षय तृतीया पर नए काम की शुरुआत के बाद असफलता की संभावना रहती है?
उ: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शुरू किए गए किसी भी धर्म अनुकूल व शुभ कार्य का क्षय (विनाश) नहीं होता। इसलिए इसमें किया गया निवेश, व्यापार या मांगलिक कार्य दीर्घकालिक सफलता देता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख में निहित जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पंचांग, पौराणिक कथाओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। यह सामग्री केवल पाठकों की रुचि, सामान्य ज्ञान और आध्यात्मिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। इस लेख में दिए गए किसी भी तथ्य या दावों की सत्यता की पूर्ण गारंटी हमारा ब्लॉग नहीं लेता है। किसी भी निर्णय या बड़े वित्तीय निवेश से पहले संबंधित विषय के विशेषज्ञों या ज्योतिषियों से परामर्श अवश्य लें।
उपाय/टोटके हेतु विशेष अस्वीकरण:
इस लेख में बताए गए टोटके, उपाय और धार्मिक अनुष्ठान पारंपरिक आस्था और जनश्रुतियों पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना या वैज्ञानिक सिद्धांतों को चुनौती देना नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि ये उपाय हर व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रभावी हों। इन उपायों को अपनाना या न अपनाना पाठक का व्यक्तिगत निर्णय है। किसी भी प्रकार के आर्थिक, शारीरिक या मानसिक नुकसान के लिए लेखक या यह वेबसाइट जिम्मेदार नहीं होगी।