विजया एकादशी 18 फरवरी 2031, दिन मंगलवार को है।
विजया एकादशी 2031 से जुड़ी मुख्य तिथियां और समय:
*व्रत की तिथि: 18 फरवरी 2031, मंगलवार (स्मार्त और वैष्णव / सामान्य विजया एकादशी)
*एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 फरवरी 2031 को सुबह 11:05 बजे से
*एकादशी तिथि समाप्त: 18 फरवरी 2031 को सुबह 08:27 बजे तक
विजया एकादशी का महत्व:
*पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, यह व्रत शत्रुओं पर विजय दिलाने और हर प्रकार के संकट को दूर करने वाला माना गया है।
*इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है
विजय एकादशी व्रत कर श्रीराम प्रभु ने लंका विजय का नींव रखे थे।
विजया एकादशी 2031: त्रिपुष्कर योग का दुर्लभ महासंयोग, इस दिन एक छोटा सा उपाय चमका देगा आपका भाग्य!
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन जब बात विजया एकादशी 2031 की हो, तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। वर्ष 2031 में विजया एकादशी का पावन पर्व 18 फरवरी 2031, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस साल की एकादशी बेहद असाधारण और चमत्कारी होने वाली है, क्योंकि इस दिन आकाश मंडल में एक अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में त्रिपुष्कर योग कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजया एकादशी का व्रत भक्तों को हर कार्य में विजय दिलाता है और भगवान श्री राम ने भी रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए यह व्रत किया था। वहीं दूसरी ओर, त्रिपुष्कर योग को 'तिगुना फल' देने वाला माना गया है। इसका अर्थ है कि इस शुभ घड़ी में किए गए किसी भी शुभ कार्य, दान, या पूजा-पाठ का पुण्य फल आपको तीन गुना (3x) होकर वापस मिलता है।
यदि आप लंबे समय से करियर, व्यापार या जीवन के किसी मोड़ पर सफलता का इंतजार कर रहे हैं, तो यह महासंयोग आपके बंद किस्मत के ताले खोल सकता है। इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि विजया एकादशी और त्रिपुष्कर योग के इस दुर्लभ मिलन का लाभ आप कैसे उठा सकते हैं।
विजया एकादशी के दिन कैसा रहेगा जानें पंचांग के अनुसार
विजया एकादशी के दिन ऋतु शिशिर, आयन उत्तरायण, तिथि एकादशी, नक्षत्र मूल सुबह 10:53 बजे तक, योग हर्षण सुबह के 07:53 बजे तक रहेगा।
सूर्योदय सुबह 06:49 बजे पर और सूर्यास्त शाम 06:12 बजे तक होगा। चंद्रोदय अहले सुबह 04:30 बजे पर और चंद्रास्त दिन के 01:39 बजे पर होगा। सूर्य कुंभ राशि में और चंद्रमा धनु राशि में है। दिनमान 11 घंटा 12 मिनट का रहेगा जबकि रात्रिमान 12 घंटा 46 मिनट का होगा।
आनंददि योग धुम्र, रात के 10:53 बजे तक इसके बाद धाता/ प्रजापति योग हो जायेगा। होमाहुति राहु, रात 10:43 बजे तक इसके बाद केतु का आगमन होगा। दिशा शूल दक्षिण, राहूवास दक्षिण, अग्निवास पृथ्वी देर रात तक, इसके बाद आकाश, चन्द्र वास पूर्व दिशा में रहेगा।
जानें पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त दिन के 12:13 बजे से लेकर दोपहर 12:58 बजे तक है।
विजया मुहूर्त 02:27 बजे से लेकर 3:12 बजे तक, गोधूलि मुहूर्त 06:00 बजे से लेकर 06:24 बजे तक, सायाह्य संध्या मुहूर्त 06:12 बजे से लेकर 07:28 बजे तक, निशिता मुहूर्त रात 12:09 बजे से लेकर 01:00 बजे तक, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 05:16 बजे से लेकर 06:07 बजे तक और प्रातः संध्या मुहूर्त सुबह 05:42 बजे से लेकर 06:48 बजे तक रहेगा। इस दौरान चारों पहर की पूजा अर्चना करना शुभ होगा।
पंचांग के अनुसार अशुभ महूर्त
पंचांग के अनुसार सुबह 09:47 बजे से लेकर 11:11 बजे तक गुलिक काल, सुबह के 06:59 बजे से लेकर 08:23 बजे तक यमगण्ड काल, दिन के 01:59 बजे से लेकर 03:24 बजे तक राहु काल, 10:43 बजे से लेकर 11:28 बजे तक दुर्मुहूर्त काल और वज्र्य काल सुबह 08:08 बजे से लेकर 09:37 बजे तक रहेगा। इसके बाद शाम 7:27 बजे से लेकर रात 8:56 बजे तक रहेगा। इस दौरान पूजा अर्चना करने से लोगों को बचना चाहिए।
अब जानें शुभ मुहूर्त चौघड़िया पंचांग के अनुसार चारों पहर के लिए
एकादशी व्रत करने वाले व्रतधारियों को चारों पहर की पूजा करना अनिवार्य होता है। तभी व्रत करने से आपको सभी तरह के फल प्राप्त होते हैं। जानें चौघड़िया पंचांग के अनुसार चारों पहर का शुभ मुहूर्त का समय।
चौघड़िया पंचांग के अनुसार सुबह की पूजा करने का शुभ मुहूर्त। सुबह 06:59 बजे से लेकर 08:23 बजे तक शुभ मुहूर्त रहेगा।
दोपहर 11:11 बजे से लेकर 12:35 बजे तक चर मुहूर्त, दिन के 12:35 बजे से लेकर 01:59 बजे तक लाभ मुहूर्त एवं 01:59 बजे से लेकर 03:34 बजे तक अमृत मुहूर्त रहेगा। इस दौरान दो पहर की पूजा लोग कर सकते हैं।
शाम और रात के समय का शुभ मुहूर्त
संध्या के समय चौघड़िया मुहूर्त का आगमन शाम 06:12 बजे से लेकर 07:48 बजे तक अमृत मुहूर्त के रूप में रहेगा।
उसी प्रकार रात 12:35 बजे से लेकर 02:11 बजे तक लाभ मुहूर्त रहेगा। सुबह के समय का मुहूर्त पर सुबह 05:22 बजे से लेकर 06:58 बजे तक अमृत मुहूर्त है। इस दौरान आप तीनों पहर का पूजा अर्चना कर सकते हैं।
कैसे करें व्रत
विजया एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। जो व्यक्ति विजया एकादशी व्रत करना चाहता है उसे व्रत के एक दिन पहले यानी दशमी के दिन एक बार ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए।
विजया एकादशी के दिन लें संकल्प
विजया एकादशी के दिन सबसे पहले व्रत का संकल्प लें। इसके बाद धूप, मौसमी फल, घी एवं पंचामृत आदि से भगवान भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
विजया एकादशी की रात जग्गा करना अर्थात रातभर सोना नहीं चाहिए। सिर्फ भगवान का भजन कीर्तन एवं सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। रात्रि जागरण करना काफी शुभ और फलदाई होता है।
द्वादशी अर्थात पारण के दिन भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान है। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर लोगों के बीच प्रसाद वितरण करना चाहिए। प्रसाद वितरण के बाद ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। अपने क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देना चाहिए। अंत में स्वयं भोजन कर उपवास खोलना चाहिए।
पूजा सामग्रियों की सूची जानें
पूजा सामग्री के रूप में भगवान विष्णु के स्नान कराने के लिए तांबे और पीतल का लोटा या पात्र तांबे या पीतल का लोटा, जल का कलश, दूध, भगवान विष्णु को पहनाने के लिए वस्त्र और आभूषण चाहिए, अरवा चावल, कुमकुम, दीपक, जनेऊ, तिल, फूल, अष्टगंध, तुलसीदाल, प्रसाद के लिए सभी तरह के लिए गेंहू के आटा पंजीरी के लिए,
फल, धूप, मिठाई नारियल, मधु, गंगा जल, सूखे मेवे, गुड़ और पान के पत्ते ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के लिए रुपए रख लें।
विजया एकादशी: चारों पहर की स्टेप-बाय-स्टेप पूजा विधि
विजया एकादशी पर त्रिपुष्कर योग के दौरान रात्रि जागरण और चारों पहर की पूजा करने से अक्षय पुण्य और तिगुनी सफलता मिलती है।
• प्रथम पहर पूजा (शाम 06:00 से रात 09:00):
सबसे पहले तांबे या मिट्टी के कलश पर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। इस पहर में भगवान को पीले फूल, पीले फल और चंदन अर्पित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करते हुए धूप-दीप से आरती करें।
• द्वितीय पहर पूजा (रात 09:00 से मध्यरात्रि 12:00):
इस पहर में भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा अवश्य करें। विष्णु जी को केसर मिश्रित दूध से अभिषेक कराएं। उन्हें मखाने की खीर या सफेद मिठाई का भोग लगाएं। लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें।
• तृतीय पहर पूजा (मध्यरात्रि 12:00 से तड़के 03:00):
यह पहर साधना और मंत्र सिद्धि के लिए सर्वोत्तम है। इस समय भगवान के सामने घी का अखंड दीपक जलाएं। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या 'हरे कृष्ण' महामंत्र का कीर्तन करें। भगवान को कपूर की आरती और तुलसी दल अर्पित करें।
• चतुर्थ पहर पूजा (तड़के 03:00 से सुबह 06:00):
यह ब्रह्ममुहूर्त का समय है। इस अंतिम पहर में शंख और घंटी बजाकर आरती करें। अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें। सुबह सूर्योदय के बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और दान (त्रिपुष्कर योग के कारण जो तिगुना फल देगा) देकर व्रत का पारण करें।
विजया एकादशी और त्रिपुष्कर योग: 5 यूनिक प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1: विजया एकादशी 2031 को त्रिपुष्कर योग में किया गया दान क्यों विशेष है?
उत्तर: त्रिपुष्कर योग में किए गए दान का फल तीन गुना होकर वापस मिलता है। इस दिन सोना, भूमि या तिल का दान करने से पीढ़ियों के दरिद्र दूर होते हैं।
प्रश्न 2: यदि चारों पहर की पूजा न कर पाएं, तो सबसे महत्वपूर्ण पहर कौन सा है?
उत्तर: यदि चारों पहर संभव न हो, तो तीसरा पहर (मध्यरात्रि 12 से 3 बजे) सबसे महत्वपूर्ण है। इसे निशिता काल कहते हैं, जिसमें की गई विष्णु साधना सीधे स्वीकार होती है।
प्रश्न 3: क्या त्रिपुष्कर योग में विजया एकादशी का पारण करने के नियम बदल जाते हैं?
उत्तर: नहीं, पारण हमेशा द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए। 2031 में पारण का समय 19 फरवरी की सुबह है, लेकिन इस योग के कारण पारण के समय ब्राह्मण को दिया गया दान तिगुना फल देगा।
प्रश्न 4: इस महासंयोग में तुलसी पत्र तोड़ने का क्या नियम है?
उत्तर: एकादशी और मंगलवार दोनों दिन तुलसी तोड़ना वर्जित है। चूंकि 18 फरवरी 2031 को मंगलवार है, इसलिए पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (सोमवार) ही तोड़कर रख लें।
प्रश्न 5: क्या इस दिन नया व्यापार शुरू करना शुभ रहेगा?
उत्तर: विजया एकादशी और त्रिपुष्कर योग का संयोग व्यापार शुरू करने के लिए अत्यंत शुभ है। इस दिन शुरू किया गया कार्य तिगुनी गति से तरक्की करता है।
चमत्कारी उपाय और टोटके (तिगुने फल के लिए)
1. कर्ज मुक्ति और धन वृद्धि के लिए: विजया एकादशी की रात (द्वितीय पहर) में एक चांदी के सिक्के पर हल्दी का तिलक लगाएं। इसे भगवान विष्णु के चरणों में रखकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का 108 बार जप करें। त्रिपुष्कर योग के प्रभाव से यह सिक्का अभिमंत्रित हो जाएगा। अगले दिन इसे अपनी तिजोरी में रख लें, घर में कभी धन की कमी नहीं होगी।
2. नौकरी और करियर में विजय के लिए: यदि मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिल रही, तो इस दिन सात साबुत हल्दी की गांठें और एक पीला फूल पीले कपड़े में बांधकर विष्णु मंदिर में अर्पित करें। भगवान राम की विजय कथा का स्मरण करें। इससे आपके करियर की सभी बाधाएं तिगुनी तेजी से समाप्त होंगी।
3. दुर्भाग्य दूर करने के लिए: एकादशी के दिन शाम के समय एक मिट्टी के दीपक में गाय का घी और चुटकी भर केसर डालकर मुख्य द्वार पर जलाएं। दीपक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यह टोटका घर की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर सौभाग्य लाता है।
महत्वपूर्ण डिस्क्लेमर (Disclaimer)
सामान्य एवं उपाय डिस्क्लेमर: इस ब्लॉग में दी गई जानकारी (विजया एकादशी तिथि, मुहूर्त, चारों पहर की पूजा विधि और ज्योतिषीय उपाय/टोटके) पूरी तरह से पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं, सनातन पंचांग और ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित है। यह विवरण केवल पाठकों की सामान्य रुचि और ज्ञानवर्धन के लिए साझा किया गया है। हम (ब्लॉग प्रशासन) इसमें दिए गए उपायों या टोटकों के शत-प्रतिशत सफल होने का कोई वैज्ञानिक दावा या गारंटी नहीं लेते हैं।
इस लेख में बताए गए टोटके और ज्योतिषीय उपाय व्यक्तिगत आस्था का विषय हैं। किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपनी सुविधानुसार किसी योग्य एवं प्रमाणित ज्योतिषाचार्य या कर्मकांड विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। किसी भी पूजा या टोटके के परिणामस्वरूप होने वाले किसी भी प्रकार के मानसिक, शारीरिक या आर्थिक लाभ-हानि के लिए यह ब्लॉग या लेखक जिम्मेदार नहीं होंगे। पाठक अपने विवेक और जिम्मेदारी से ही इन जानकारियों का उपयोग करें।
विजय एकादशी की पौराणिक कथा
एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा - हे श्रीहरि! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले एकादशी व्रत का क्या नाम है। व्रत करने की क्या है विधि ? कृपा करके आप मुझे विस्तार से बताइए।
श्रीहरि ने कहा कि हे धर्मराज - फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का नाम विजया एकादशी व्रत है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को हर काम में सफलता और विजय प्राप्त होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत कहलाता है।
इस विजया एकादशी के महात्म्य श्रवण करने और पठन-पाठन से सभी तरह के पाप नाश हो जाते हैं। एक समय देवर्षि नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा हे पिताश्री ! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी व्रत कथा और पूरे विधान विस्तार से बताइए।
ब्रह्माजी ने कहा हे पुत्र नारद! विजया एकादशी का व्रत सभी तरह के पापों को नाश करने वाला है। विजया एकादशी व्रत करने की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं बताया है।
यह समस्त सनातनी जातकों को विजय प्रदान करती है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी सहित पंचवटी में निवास करने लगे।
वहां पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण बहुत ज्यादा व्याकुल हुए और माता सीताजी की खोज में चल पड़े।
श्री राम और लक्ष्मण वन में घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुंचे तो जटायु उन्हें सीताजी को रावण द्वारा हरण करने की वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। इसके बाद श्री राम और लक्ष्मण का सुग्रीव और हनुमान जी से मिलने के बाद मित्रता हुई।
तत्पश्चात श्री राम ने बाली का वध कर दिए।
हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की मित्रता का वर्णन किया। वहाँ से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।
श्री रामजी ने वानरों की सेना सहित, हनुमान, लक्ष्मन और सुग्रीव की सारी सेना को लेकर से लंका जाने के लिए प्रस्थान किया। जब श्री राम समुद्र से किनारे पहुँचे तब उन्होंने मगरमच्छ सहित भयानक जीव-जंतुओं से भरा उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी चिंतित होकर कहा कि हे भ्राताश्री इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे।
लक्ष्मण जी ने उपाय बताते हुए श्री राम प्रभु से कहा कि हे पुरुषोत्तम, आप श्रृष्टि निर्माता और आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। आप से कुछ छिपा नहीं है। यहां से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के ऋषि रहते हैं। उन्होंने अनेकों ब्रह्मा को देखे हैं, आप उनके पास जाकर समुद्र पार करने का उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामजी वकदालभ्य ऋषि के आश्रम में जाकर उनको श्राद्ध पूर्वक प्रणाम करके बैठ गए।
मुनि वकदालभ्य ने उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए मर्यादा पुरुषोत्तम समझकर श्री राम से पूछा कि हे राम! आपका यहां आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहा कि हे ऋषि वकदालभ्य ! मैं अपनी सेना सहित आप के आश्रम आया हूं और रामण सहित राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूं। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई रास्ता या उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके आश्रम में आया हूं।
वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उत्तम व्रत विधि विधान से करने पर निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप और आपकी पूरीत सेना समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।
इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का एक बड़ा घड़ा बनाएं। उस घड़े को जल से भरकर तथा पांच आम का पल्लव रख, वेदी पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सात तरह के अनाज और घड़े के ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीहरि भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। विजया एकादशी के दिन स्नानादि कर नूतन वस्त्र धारण कर, सभी कार्यों से निवृत्त होकर नैवेद्य, नारियल, धूप, दीप, अक्षत, फल आदि से भगवान की पूजा करें। तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
इसके बाद व्रत रखकर घड़े के समक्ष बैठकर दिन भर व्रत का पालन करें और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठेकर श्रीहरि के नामों का जाप कर जागरण करें।
द्वादशी तिथि के दिन विधि विधान और नियम से पूजन कर उस घड़े को ब्राह्मण को दान दे दें। ऋषि वकदालभ्य ने कहा कि हे राम! यदि तुम भी इस विजया एकादशी व्रत को सेनापतियों ओर प्रिय जनों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय निश्चित होगी। श्री राम ने ऋषि वकदालभ्य के कहे अनुसार इस व्रत को श्रीराम अपने इस वंधुओ के साथ पूरे विधि विधान किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई।
ऋषि ने कहा कि हे राम ! जो कोई व्यक्ति इस व्रत को विधिपूर्वक करेगा, उसे तीनों लोकों में अवश्य विजय होगी।
नारदजी से ब्रह्माजी ने कहा था कि हे पुत्र नारद! जो कोई जातक इस विजया एकादशी व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, वैसे प्राणियों को वाजपेय यज्ञ करने जैसा फल प्राप्त होता है।
डिस्क्लेमर
यह लेख पूरी तरह धार्मिक ग्रंथों और वेद पुराणों पर आधारित है। विद्वानों आचार्यों द्वारा विजया एकादशी के संबंध में जो कहा गया है वहीं इस लेख में लिखा गया है। यह लेख सिर्फ आपको धार्मिक सूचना पहुंचाने का काम करेगा।
