दत्तात्रेय जयंती 2026: 23 दिसंबर को पूजा का शुभ मुहूर्त, पंचांग, राहुकाल और पूजा विधि जानें f

दत्तात्रेय जयंती 2026: 23 दिसंबर को पूजा का शुभ मुहूर्त, पंचांग, राहुकाल और पूजा विधि जानें

दत्तात्रेय जयंती 23 दिसंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। सनातन धर्म में मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव (दत्त जयंती) के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: 23 दिसंबर 2026 को सुबह 10:47 बजे से

पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 24 दिसंबर 2026 को सुबह 06:57 बजे तक

पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 11:59 बजे से दोपहर 02:32 बजे तक

दत्तात्रेय जयंती 2026: त्रिदेव के स्वरूप भगवान दत्तात्रेय और 24 गुरुओं से मिला ज्ञान 

त्रिदेव के स्वरूप भगवान दत्तात्रेय की जयंती कब है?

भगवान दत्तात्रेय को सनातन धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेव के सामूहिक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। दत्तात्रेय जयंती को दत्ता जयंती या दत्त जयंती के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 23 दिसंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर भगवान दत्तात्रेय की पूजा, व्रत, मंत्र-जप और गुरु-पूजन का विशेष महत्व माना जाता है।

पौराणिक परंपरा में भगवान दत्तात्रेय के पिता महर्षि अत्रि और माता माता अनुसूया मानी गई हैं। भगवान दत्तात्रेय को गुरु-तत्व का प्रतीक भी माना जाता है। उनसे जुड़ी सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में 24 गुरुओं का उल्लेख मिलता है। इन गुरुओं में पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, हिरण, मछली, पिंगला आदि से प्राप्त जीवन-शिक्षाएं शामिल हैं।

दत्तात्रेय जयंती के दिन श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं, व्रत का संकल्प लेते हैं और भगवान दत्तात्रेय की धूप, दीप, पुष्प, फल तथा नैवेद्य से पूजा करते हैं। दत्त पादुका की पूजा और दत्तात्रेय मंत्र एवं स्तोत्र का पाठ भी परंपरागत रूप से किया जाता है।

भगवान दत्तात्रेय की दिव्य तस्वीर

23 दिसंबर 2026 दत्तात्रेय जयंती: शुभ-अशुभ मुहूर्त और पूजा का सही समय

दत्तात्रेय जयंती 2026: भगवान दत्तात्रेय की जयंती इस वर्ष 23 दिसंबर 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। यह दिन मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा के साथ विशेष धार्मिक महत्व रखता है। द्रिक पंचांग के अनुसार 23 दिसंबर को पूर्णिमा तिथि सुबह 10:47 बजे से शुरू होगी और 24 दिसंबर सुबह 6:57 बजे तक रहेगी।

भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेव के संयुक्त स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। दत्तात्रेय जयंती के दिन भगवान दत्तात्रेय की पूजा, मंत्र-जप, दत्त पादुका पूजन और गुरु-सेवा का विशेष महत्व माना जाता है।

23 दिसंबर 2026 का पंचांग

पंचांग                     विवरण

दिन                        बुधवार

तिथि                      शुक्ल चतुर्दशी

पूर्णिमा                  सुबह 10:47 बजे तक

नक्षत्र               रोहिणी सुबह 7:56 बजे तक

नक्षत्र बाद में          मृगशीर्ष

योग                 शुभ, शाम 5:15 बजे तक

पर्व               दत्तात्रेय जयंती, मार्गशीर्ष पूर्णिमा

विशेष योग          सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग

दत्तात्रेय जयंती पर पूजा का सही समय

दत्तात्रेय जयंती पर श्रद्धालु प्रातः स्नान करके भगवान दत्तात्रेय की पूजा कर सकते हैं। पूजा में भगवान को धूप, दीप, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें। दत्तात्रेय मंत्र या स्तोत्र का पाठ करना भी परंपरागत रूप से शुभ माना जाता है।

विजय मुहूर्त: दोपहर 2:24 बजे से 3:07 बजे तक।

गोधूलि मुहूर्त: शाम 5:54 बजे से 6:21 बजे तक।

सायाह्न संध्या: शाम 5:57 बजे से 7:17 बजे तक।

अमृत काल: रात 9:12 बजे से 10:36 बजे तक।

निशिता मुहूर्त: रात 12:12 बजे से 1:05 बजे तक।

23 दिसंबर के अशुभ मुहूर्त

धार्मिक पंचांग गणना में कुछ समय ऐसे माने जाते हैं जिनमें महत्वपूर्ण शुभ कार्य शुरू करने से बचने की परंपरा है।

राहुकाल: दोपहर 12:38 बजे से 1:58 बजे तक।

यमगंड: सुबह 8:39 बजे से 9:59 बजे तक।

गुलिक काल: सुबह 11:19 बजे से 12:38 बजे तक।

दुर्मुहूर्त: दोपहर 12:17 बजे से 12:59 बजे तक।

वर्ज्य: दोपहर 12:49 बजे से 2:13 बजे तक।

भद्रा: सुबह 10:47 बजे से रात 8:53 बजे तक।

दत्तात्रेय जयंती पर क्या करें?

दत्तात्रेय जयंती के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और भगवान दत्तात्रेय के सामने व्रत या पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थान पर भगवान दत्तात्रेय की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। धूप और दीप जलाकर फल, फूल तथा नैवेद्य अर्पित करें।

यदि उपलब्ध हो तो दत्त पादुका का पूजन करें। भगवान दत्तात्रेय के मंत्र और स्तोत्र का जाप करें। इस दिन किसी जरूरतमंद को भोजन कराना या अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी धार्मिक दृष्टि से पुण्यकारी माना जाता है।

23 दिसंबर 2026 को दिन कैसा रहेगा?

धार्मिक पंचांग की दृष्टि से 23 दिसंबर का दिन दत्तात्रेय जयंती और पूर्णिमा के कारण आध्यात्मिक साधना, पूजा-पाठ, मंत्र-जप और गुरु-पूजन के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। शुभ योग और अन्य शुभ काल भी पंचांग में दिए गए हैं।

हालांकि किसी कार्य को केवल शुभ या अशुभ मुहूर्त के आधार पर सफल या असफल होने वाला निश्चित परिणाम मानना उचित नहीं है। मुहूर्त धार्मिक परंपरा का हिस्सा है और महत्वपूर्ण कार्यों के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना बेहतर रहता है।

दत्तात्रेय जयंती पर कैसे करें पूजा

दत्तात्रेय जयंती के मौके पर अहले सुबह उठकर स्नानादि करके साफ-सुथरी वस्त्र धारण करें। भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या तस्वीर पर गंगा जल के छिड़काव कर हल्दी, कुमकुम और चंदन का लेप लगाएं। इसके बाद मिठाई और फल का भोग चढ़ाएं। इस मंत्र ऊं श्री गुरुदेव दत्ता या श्री गुरु दत्तात्रेय नमः का जाप करें।

भगवान दत्तात्रेय को तीनों देवताओं का अवतार माना जाता है। कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवों की शक्तियां भगवान दत्तात्रेय में समाहित हैं। भगवान दत्तात्रेय जी के छः भुजाएं और तीन मुंह हैं। इनके पिता ऋषि अत्रि और माता अनुसूया हैं। पौराणिक मान्यता यह है कि भगवान दत्तात्रेय भक्तों के सुमिरन करने मात्र से उनकी सहायता के लिए उपस्थित हो जाते हैं।

भगवान दत्तात्रेय की जयंती पर मंदिरों में विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में श्री दत्तात्रेय भगवान की प्रतिमा स्थापित है।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार ऋषि अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश पृथ्वी लोक पहुंचे। तीनों देवता साधु भेष में अत्रि मुनि के आश्रम पहुंचे। इसके बाद माता अनुसूया के सामने भोजन करने की इच्छा प्रकट की। देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना परमधर्म मानते हुए उनकी बात स्वीकार कर ली और उनके लिए प्रेम पूर्वक और श्रद्धा भाव से भोजन की थाली त्रिदेव के समक्ष परोस दी।

तीनों देवताओं ने सती अनुसूया के समक्ष एक शर्त रखी कि वह निर्वस्त्र होकर खाना खिलाएं। इस पर माता अनुसूया को शक हुआ।

उन्होंने ध्यान लगाकर देखा तो साधुओं के वेश में ब्रह्मा, विष्णु और शिव दिखाई दिए। अनुसूया ने अत्रि मुनि के कमंडल से जल निकालकर उन तीनों साधुओं पर छिड़ दिया।

जल छिड़कने के प्रभाव से तीनों देवता छह महीने के नौनिहाल बन गए। तब माता अनुसूया निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन कराया।

देवताओं को शिशु बन जाने पर मां पार्वती, माता सरस्वती और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर पहुंच गई। इसके बाद माता अनुसूया से माफी मांगी।

फिर त्रिदेव, देवी अनुसूया से प्रसन्न हो जाते हैं। वरदान के रूप में संयुक्त रूप से दत्तात्रेय को उत्पन्न करते हैं और दत्तात्रेय को अपनी तमाम तरह की शक्तियां प्रदान कर देते हैं।

तीनों देवताओं को एक साथ बालक रूप में पुत्र दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़क देती है। इसके बाद तीनों देवताओं अपने पूर्ववत रुप में आ जाते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दत्तात्रेय जयंती के दिन जो भक्त व्रत रखकर पूजा-अर्चना करते हैं। उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता मिलती है और सभी तरह की मनोकामनाएं पूरी होती है।

दत्तात्रेय जयंती पर तीन पारंपरिक उपाय/टोटके

1. दत्त पादुका का पूजन

दत्तात्रेय जयंती के दिन भगवान दत्तात्रेय की पादुका का श्रद्धापूर्वक पूजन किया जा सकता है। पादुका के सामने दीप जलाकर पुष्प अर्पित करें और गुरु-तत्व का स्मरण करते हुए दत्तात्रेय मंत्र का जाप करें। धार्मिक मान्यता में इसे गुरु-कृपा और आध्यात्मिक उन्नति से जोड़ा जाता है।

2. 24 गुरुओं की सीख को जीवन में उतारें

इस दिन केवल पूजा करने के बजाय भगवान दत्तात्रेय से संबंधित 24 गुरुओं की कथाओं या शिक्षाओं का अध्ययन करें। पृथ्वी से धैर्य, जल से निर्मलता और सूर्य से कर्मशीलता जैसी शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लें। यह उपाय किसी चमत्कार की गारंटी नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की धार्मिक परंपरा है।

3. जरूरतमंद को भोजन कराएं

दत्तात्रेय जयंती पर अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र या आवश्यक सामग्री का दान करना शुभ माना जाता है। दान करते समय दिखावे से बचें और श्रद्धा को प्राथमिकता दें। गुरु-परंपरा में सेवा और करुणा को महत्वपूर्ण माना जाता है।

दत्तात्रेय जयंती से जुड़े 05 अनोखे प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न 1: भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव का स्वरूप क्यों कहा जाता है?

उत्तर: धार्मिक परंपरा में भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त स्वरूप के रूप में माना जाता है। इसी कारण उनके स्वरूप में सृष्टि, पालन और संहार से जुड़े त्रिदेव-तत्व का प्रतीकात्मक समन्वय दिखाई देता है।

प्रश्न 2: भगवान दत्तात्रेय के माता-पिता कौन थे?

उत्तर: पौराणिक मान्यता के अनुसार महर्षि अत्रि भगवान दत्तात्रेय के पिता और माता अनुसूया उनकी माता थीं। अनुसूया की पतिव्रता और तपस्या से जुड़ी कथाएं पुराणों में प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 3: भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु कौन हैं?

उत्तर: दत्तात्रेय से जुड़ी परंपरा में प्रकृति और जीव-जगत की विभिन्न वस्तुओं एवं प्राणियों को गुरु माना गया है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, हिरण, मछली, पिंगला आदि से अलग-अलग जीवन शिक्षाएं प्राप्त करने की कथा प्रसिद्ध है। इसका मूल संदेश है कि सीखने वाला व्यक्ति अपने आसपास की दुनिया से भी ज्ञान ग्रहण कर सकता है।

प्रश्न 4: दत्तात्रेय जयंती पर पूजा कैसे करनी चाहिए?

उत्तर: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल पर भगवान दत्तात्रेय का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। दीप और धूप जलाकर पुष्प, फल तथा नैवेद्य अर्पित करें। दत्तात्रेय मंत्र, स्तोत्र या नाम-स्मरण करें। यदि संभव हो तो दत्त पादुका का पूजन भी करें। परिवार की परंपरा या स्थानीय पुरोहित के निर्देश के अनुसार व्रत रखा जा सकता है।

प्रश्न 5: दत्तात्रेय जयंती का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश क्या है?

उत्तर: इस पर्व का महत्वपूर्ण संदेश गुरु-तत्व, आत्मचिंतन और प्रकृति से सीखने की भावना है। 24 गुरुओं की कथा यह संकेत देती है कि जीवन की छोटी-बड़ी घटनाओं और प्रकृति के विभिन्न रूपों से भी मनुष्य सीख सकता है। इसलिए दत्तात्रेय जयंती को केवल पूजा का दिन न मानकर ज्ञान, सेवा और आत्मअनुशासन का अवसर भी माना जा सकता है।

 डिस्क्लेमर

यह लेख भगवान दत्तात्रेय, दत्तात्रेय जयंती, धार्मिक परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और पंचांग संबंधी जानकारी को सामान्य पाठकों तक सरल भाषा में पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई धार्मिक मान्यताएं विभिन्न सनातन परंपराओं, लोक विश्वासों और उपलब्ध धार्मिक साहित्य में वर्णित कथाओं पर आधारित हो सकती हैं। अलग-अलग संप्रदायों, क्षेत्रों और पंचांग पद्धतियों में पूजा-विधि, मंत्र, व्रत के नियम तथा तिथि या मुहूर्त में अंतर संभव है।

लेख में बताए गए तीनों उपाय/टोटके धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार, आर्थिक लाभ की गारंटी, बीमारी का इलाज या निश्चित रूप से समस्या दूर करने वाला उपाय नहीं समझना चाहिए। किसी भी धार्मिक उपाय के नाम पर अत्यधिक धन खर्च करना, भय पैदा करना अथवा किसी व्यक्ति पर दबाव डालना उचित नहीं है। दान अपनी क्षमता के अनुसार ही करें।

पंचांग के समय स्थान, सूर्योदय-सूर्यास्त, अक्षांश-देशांतर और इस्तेमाल की गई पंचांग गणना पद्धति के कारण बदल सकते हैं। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, धार्मिक अनुष्ठान, यात्रा या अन्य महत्वपूर्ण कार्य के लिए अपने स्थानीय पंचांग अथवा योग्य आचार्य से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

इस लेख में भगवान दत्तात्रेय से जुड़ी कथाओं को श्रद्धा और सांस्कृतिक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। पाठक इन्हें धार्मिक परंपरा के संदर्भ में समझें। वेबसाइट किसी धार्मिक मान्यता को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में प्रमाणित करने का दावा नहीं करती। पाठकों से अनुरोध है कि पूजा-व्रत करते समय अपनी स्वास्थ्य स्थिति, आयु और व्यक्तिगत परिस्थितियों का ध्यान रखें तथा आवश्यक होने पर विशेषज्ञ की सलाह लें।

लेखक का उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, संप्रदाय या धार्मिक परंपरा की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।


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