कब है गोवर्धन पूजा 2027: पढ़ें अन्नकूट महोत्सव, भैया दूज, यम द्वितीया, चित्रगुप्त पूजा व भाई फोटा

गोवर्धन से चित्रगुप्त तक: 30-31 अक्टूबर 2027 का आध्यात्मिक कैलेंडर

दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व की आभा यम द्वितीया पर पूर्ण होती है, पर उससे ठीक एक दिन पहले गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का उल्लास घर-घर में गूंजता है। 2027 में यह शुभ संयोग 30 अक्टूबर शनिवार को बन रहा है जब हम श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र के अहंकार को तोड़ने और प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाले दिन को मनाएंगे। घरों के आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाएगा, 56 भोग का अन्नकूट लगेगा और गौ धन की पूजा होगी। 

इसके अगले दिन 31 अक्टूबर रविवार को यम द्वितीया, भाई दूज और चित्रगुप्त पूजा का त्रिवेणी संगम होगा। यमुना ने यमराज को तिलक कर भाई बहन के अटूट प्रेम को अमर किया था। इसी दिन कायस्थ समाज अपने आराध्य भगवान चित्रगुप्त की कलम दवात पूजकर लेखनी से जीवन चलाने का संकल्प लेता है। 

यह दो दिन सिर्फ त्योहार नहीं हैं। ये रिश्तों, प्रकृति, कर्म और आस्था का संतुलन हैं। आइए जानते हैं इन पर्वों के पीछे छुपे अनसुलझे रहस्य, वैज्ञानिक आधार और वो टोटके जो सदियों से चले आ रहे हैं।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव 30 अक्टूबर को धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन गौ सेवा करना फलदाई और पूण्य का काम होगा।

कार्तिक मास प्रतिपदा तिथि दिन शनिवार को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव है।

गोवर्धन पूजा के दिन क्या करें गौपालक जानें

बुधवार को सुबह उठकर गोपालक सबसे पहले अपने जानवरों को शुद्ध जल से स्नान कराकर उसके सिर में घी का लेप लगाते हैं। इसके बाद उसके शरीर पर विभिन्न तरह के रंगों से भरे हुए चित्रकारी बनाते हैं। और पैरों में घुंघरू बांध देते हैं। साथ ही तरह-तरह के सजावट के सामान अपने जानवरों के शरीर पर सजाते हैं। पौष्टिक आहार भी देते हैं।

पौराणिक कथाओं की जानकारियां

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव का विस्तार से वर्णन श्रीमद् भागवत पुराण में किया गया है। कथा के अनुसार नंद जी ने सभी ग्वालों से कहे कि अब समय आ गया है। इंद्र को याद कर उन्हें खुश किया जाए। इस विषय पर श्री कृष्ण ने कहा कि संसार की स्थिति, उत्पत्ति और उसके अंत क्रमशः सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण में है।

यह संपूर्ण जगत स्त्री और पुरुष के संजोग से रजोगुण द्वारा उत्पन्न होता है। उसी रजोगुण की प्रेरणा से मेघगण सभी जगहों पर जल बरसाते हैं। जल से अन्न उत्पन्न होता है। उपजे अन्न से ही सभी जीवों की जीविका चलती है। इसमें भला इन्द्र का क्या लेना-देना है। ऐसा श्रीकृष्ण का कहना था।

श्री कृष्ण ने कहा इन्द्र की पूजा करना अनुचित

श्रीकृष्ण ने कहा कि पिताश्री न तो हमारे पास किसी देश का राज्य है। और ना तो बड़े-बड़े नगर ही हमारे अधीन है। हमारे पास गांव या घर भी नहीं है। इसलिए हम लोगों गौओं, ब्राह्मणों और गिरिराज का पूजा करने की तैयारी करें। इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्रियों इकट्ठा की गई है।

उन्हीं से इस यज्ञ का अनुष्ठान होने दें। पूजा के लिए खीर, हलवा, पुआ, पुड़ी आदि से लेकर मूंग की दाल तक बनाए जाएं। ब्रज का सारा दूध एकत्र कर लिया जाए। वेदवादी ब्राह्मणों के द्वारा भांति भांति हवन कराया जाए तथा उन्हें अनेकों प्रकार के अन्न, गाय और दक्षिण दी जाए। अंत में सज धज कर सभी गोपी और गोपियां गोवर्धन की परिक्रमा करें। यह मेरी इच्छा है इसे करने से गौ, ब्राम्हण और गिरिराज को भी प्रिय लगेगी और मुझे भी बहुत पसंद आएगा।

श्रीकृष्ण की इच्छा थी कि इंद्र के घमंड को चूर चूर कर दें। नंद बाबा सहित सभी गोपों ने उनकी बातें सुनकर बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण के कहें अनुसार यज्ञ प्रारंभ किया गया।

श्रीकृष्ण ने धारे गिरिराज का रूप

श्री कृष्ण ने गोप और गोपियों को विश्वास दिलाने के लिए गिरिराज के ऊपर एक दूसरा विशाल शरीर धारण करके प्रकट हो गए। तथा मैं हूं गिरिराज ? इस प्रकार कहते हुए बनाएं गए सारी सामग्री स्वयं खाने लगे। भगवान श्री कृष्ण ने अपने गिरिराज बने स्वरूप को दूसरे व्रजवासियों के साथ स्वयं भी प्रणाम किया और कहने लगे देखो कैसा लीला है। गिरिराज स्वयं प्रकट होकर हम पर कृपा की है।

यह चाहे जैसा रूप धारण कर सकते हैं। जो बनवासी जीव पर्वत का निरादर करते हैं, उन्हें यह नष्ट कर देते हैं। आओ अपना और अपने गौओं का कल्याण एवं रक्षा करने के लिए इस गिरिराज को हम नमस्कार और पूजन करें।

गुस्से में इंद्र ने की भीषण बारिश

जब इंद्र को पता चला कि नंद गांव के लोगों ने मेरी पूजा करनी बंद कर दी गई है। तब नंद बाबा और गोप और गोपियों पर बहुत अधिक क्रोधित हुए। इन्द्र को देवताओं के राजा होने पर बड़ा घमंड था। वह समझते थे कि मैं ही त्रिलोक का ईश्वर हूं।

इन्द्र ने क्रोध से तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों और सांवर्तक नामक गणों को व्रज पर चढ़ाई करने का आज्ञा दे दी। इन्द्र ने गुस्से में भरकर कहा कि ओ ! जंगली इन्सानों को इतना घमंड ? सचमुच यह धन का नाश है। भला देखो तो सही एक साधारण मनुष्य कृष्ण के बल पर उन्होंने मुझे अर्थात देवराज का अपमान कर डाला।

कृष्ण नालायक, बकवादी, अभिमानी, नादान और मूर्ख होने पर भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्यु का ग्रास बनेगा। फिर भी उसी का सहारा लेकर इन अहीरों ने मेरी अवहेलना और घोर बेज्जयती की है।

सात दिनों तक होती रही बारिश,

भगवान ने उंगली पर उठाए रखें पर्वत को

भीषण बारिश होते देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने खेल खेल में एक ही हाथ से गिरिराज गोवर्धन को अखाड़ा कर हाथ की कानी अंगुली पर धारण कर लेते हैं। इसके बाद भगवान ने गोपों से कहा माता जी, पिता जी और ब्रजवासियों तुम लोग अपनी गौवधन सहित सब तरह के सामग्रियों के साथ इस पर्वत के गड्ढे में आकर आराम से बैठ जाओ।

भगवान श्रीकृष्ण के आश्वासन देने पर सब के सब ग्वालों ने अपने-अपने गौधन, आश्रितों, पुरोहित, बच्चों और महिलाओ को अपने साथ लेकर गोवर्धन के गड्ढे में आ घुसे। श्रीकृष्ण ने 7 दिनों तक लगातार उस पर्वत को उठा रखा। एक पग भी वहां से इधर-उधर नहीं हुए। श्रीकृष्ण की योग माया का प्रभाव देखकर इंद्र को आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

इसके बाद मेघों को वर्षा रोकने का आदेश दिया। भीषण तूफान बंद हो गया। सूर्य दिखने लगे। इससे बाल गोपाल काफी खुश हो गए, इसके बाद श्रीकृष्ण ने कहा बचे हुए समस्त सामग्रियों को लेकर आप लोग अपने-अपने घर लौट जाएं क्योंकि सभी नदी-नाले में पानी कम हो गया है।

सात दिनों तक चला अन्नकूट महोत्सव

07 दिनों तक बृजवासी गोवर्धन पर्वत के नीचे आसरा लिए हुए थे। इस दौरान उन्होंने अपने साथ लाए सामग्रियों का एक जगह इकट्ठा कर भोजन बनाकर आपस में मिल बांट कर स्त्री, पुरुष और बच्चें खाने लगे। यह अन्नकूट महामहोत्सव 7 दिनों तक चलता रहा।

भैया दूज मनाने की पौराणिक कथा

भैया दूज के दिन बहनें अपने भाइयों को दीर्घायु की कामना कर व्रत रखती है। साथ ही यह त्योहार भाई बहन के स्नेह को सुदृढ़ बनाने का काम करता है। बहनों का पर्व भैया दूज दीपावली के दो दिन बाद मनाया जाता है। सनातन धर्म में भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक दो पर्व आते हैं।

पहला रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रक्षा बंधन के मौके पर भाई बहन की रक्षा करने की शपथ लेते हैं जबकि दूसरा त्योहार, भाई दूज आता है।

इसमें बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु की कामना करती हैं। भैया दूज को भ्रातृ द्वितीया, भाई फोटा, यम द्वितीया और गोधन भी कहते हैं।

इस त्योहार का प्रमुख कारक भाई और बहन के मधुर संबंध और प्रेमभाव को प्रगाढ़ बनाना है। इस दिन बहनें गोबर से बने यम और यमी की पूजा भी करती है। बहनें भाइयों के स्वस्थ्य तथा दीर्घायु होने की मंगल कामना करके व्रत भी रखतीं हैं।

इस दिन बहनें भाइयों को तेल मलकर यमुना में स्नान कराती हैं। बहनें अपने हाथों से भाइयों को खिलाने पर भाई दीर्घायु होते हैं और जीवन भर कष्टों से मुक्त रहते हैं।

इस दिन बहनों को चाहिए कि भाई को चावल सहित विभिन्न तरह के पकवान खिलाएं। इस दिन बहन के घर भोजन करने का धार्मिक महत्व है।

गोबर से बना याम-यमी को बहनें कुटती हैं

भैया दूज के दिन गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की यम और यमी की प्रतिमा जमीन पर बना कर उसके छाती पर ईंट, पत्थर, रेगनी के कांटा और सुपारी रखकर बहनें उसे मूसलों से तोड़ती है और कुटती हैं। मुसल से कुटते समय पारंपारिक गीत गाते हुए अपने भाई की दीर्घायु और मंगल कामना करती हैं।

अंत में बहने रेगनी के कांटे से अपने जिव्हा मैं छुभाती है और प्रायश्चित करती है। इस दिन यमराज और बहन यमुना की पूजा करने का विधान है।

भैया दूज की धार्मिक और पौराणिक कथा

भगवान भास्कर की पत्नी का नाम छाया है। छाया के पुत्र यमराज और पुत्री यमुना थी। यमुना यम की बहन थी इसलिए उसका नाम यमी पड़ा। यमुना अपने भाई यमराज से बड़ा स्नेह करती थी।

वह उससे बराबर विनती करती कि भाई यमराज उसके घर आए और भोजन करें। अपने कार्य में व्यस्त रहने के कारण यमराज बहन की बात टालते रहते थे। कार्तिक माह शुक्ला पक्ष द्वितीया तिथि के दिन यमुना ने एक बार फिर से यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उन्हें अपने घर आने के लिए विवश कर दिया।

यमराज ने वचनबद्ध होकर अपनी बहन यमुना से मिलने उसेे घर पहुंच गए। अपनेे घर भाई यमराज को आया हुआ देखकर बहन यमुना काफी खुश हुई और खुशी का ठिकाना न रहा है। सबसे पहले यमुना ने भाई केे साथ यमुना नदी में स्नान कर भाई को टीका लगा आशीर्वाद लिया। इसके बाद घर ले जाकर विभिन्न तरह के व्यंजन परोसकरकर भोजन करायी। बहन के सत्कार को देखकर यमराज काफी खुश हुए और वर मांगने को कहा।

यमुना ने कहा कि भाई आप इसी तरह प्रत्येक वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहनें इस दिन अपने भाई को अपने घर में भोजन कराकर माथे पर टीका लगाएं उसे तुम्हारा भय न रहे। ऐसा आशीर्वाद दो। यमराज ने वचन दिया और अपनी बहन यमुना को उपहार देकर यमलोक चल गए।

अनसुलझे पहलू  

गोवर्धन पूजा का पहला रहस्य यह है कि श्रीकृष्ण ने इंद्र पूजा बंद करवाकर गोवर्धन पर्वत को ही क्यों चुना। कई विद्वान मानते हैं कि यह आर्य संस्कृति में कृषि और पशुपालन को यज्ञ से ऊपर रखने का क्रांतिकारी कदम था। अन्नकूट में 56 भोग ही क्यों लगते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि ब्रजवासियों ने 7 दिन तक भूखे रहकर गोवर्धन उठाए रखा तो कृष्ण ने हर पहर के हिसाब से 8 पकवान यानी 7x8=56 भोग खाए। 

यम द्वितीया पर भाई को तिलक करते समय बहनें जो कथा पढ़ती हैं उसमें यमराज मृत्यु के बाद भी बहन यमुना के घर क्यों रुके। यह मृत्यु पर प्रेम की विजय का प्रतीक है। चित्रगुप्त पूजा पर कलम चलाने से पहले उसे तोड़ा क्यों जाता है। कहा जाता है कि पुरानी कलम से लिखे बुरे कर्म खत्म कर नई कलम से नया लेखा शुरू होता है। 

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ये तीनों पर्व लगातार क्यों आते हैं। गौ संरक्षण, परिवार संरक्षण और कर्म संरक्षण। एक संपूर्ण जीवन चक्र का दर्शन इन दो दिनों में समाहित है जिसे हम अक्सर समझ नहीं पाते।

*वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक विवेचना 

*वैज्ञानिक पहलू*: गोवर्धन पूजा शरद ऋतु में आती है जब फसल कट चुकी होती है। गोबर से गोवर्धन बनाना एंटी बैक्टीरियल है और खेतों में खाद का महत्व बताता है। अन्नकूट का प्रसाद सामूहिक भोज फूड शेयरिंग से इम्युनिटी बढ़ाता है। भाई दूज पर तिलक में कुमकुम और अक्षत लगाने से एक्यूप्रेशर पॉइंट सक्रिय होते हैं।

*आध्यात्मिक पहलू*: गोवर्धन अहंकार पर विनम्रता की जीत है। अन्नकूट ईश्वर को कृतज्ञता अर्पण है। यम द्वितीया बताती है कि प्रेम मृत्यु से भी बड़ा है। चित्रगुप्त पूजा कर्म के सिद्धांत को याद दिलाती है कि हर कर्म का लेखा होता है।

*सामाजिक पहलू*: ये पर्व परिवार को जोड़ते हैं। गोवर्धन पर सामूहिक गौ पूजा, अन्नकूट पर भंडारा, भाई दूज पर बहन का मान। चित्रगुप्त पूजा से कलमजीवी वर्ग को सम्मान मिलता है। समाज के हर वर्ग को जोड़ने वाले पर्व हैं।

*आर्थिक पहलू*: दीवाली के बाद बाजार में नई तेजी आती है। मिठाई, कपड़ा, बर्तन, सोना चांदी की खरीद बढ़ती है। गौपालकों की आय बढ़ती है। कायस्थ समाज में बहीखाता पूजन से नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत होती है। ये पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देते हैं।

*पांच प्रश्न और उत्तर 

1. *अन्नकूट में 56 भोग ही क्यों लगाते हैं*  

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत 7 दिन तक उठाया था। ब्रजवासी रोज 8 पहर उन्हें भोजन कराते थे। 7 दिन x 8 पहर = 56। इसलिए 56 भोग का विधान है। यह प्रेम और कृतज्ञता का प्रतीक है।

2. *भाई दूज को यम द्वितीया क्यों कहते हैं*  

   इस दिन यमुना ने भाई यमराज को तिलक किया था। यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन बहन से तिलक कराएगा उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा। इसलिए इसे यम द्वितीया कहते हैं।

3. *चित्रगुप्त पूजा दीवाली के बाद ही क्यों होती है*  

   दीवाली पर लक्ष्मी पूजन के साथ नया वित्तीय वर्ष शुरू होता है। चित्रगुप्त कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले देवता हैं। नए साल का बहीखाता उनकी पूजा से ही शुरू होता है ताकि व्यापार में ईमानदारी बनी रहे।

4. *गोवर्धन पूजा में परिक्रमा का महत्व क्या है*  

   गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा प्रकृति की परिक्रमा है। यह संदेश देता है कि पेड़, पहाड़, नदी और पशु ही हमारे रक्षक हैं। वैज्ञानिक रूप से परिक्रमा से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है।

5. *क्या बहन न हो तो भाई दूज कर सकते हैं*  

   हां। चचेरी, ममेरी बहन, मामी, भाभी या मुंहबोली बहन से भी तिलक कराया जा सकता है। भाव प्रधान है। यदि कोई बहन न हो तो यमुना नदी में स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देने से भी फल मिलता है।

*तीन तरह के टोटके 

*1. गोवर्धन पूजा का धन टोटका*: अन्नकूट के दिन 7 तरह के अनाज मिलाकर गाय को खिलाएं। साथ में गुड़ दें। मान्यता है कि इससे साल भर घर में अन्न धन की कमी नहीं होती। प्रसाद का एक हिस्सा पीपल के नीचे रखें।

*2. भाई दूज का रक्षा टोटका*: बहन भाई को तिलक करते समय थाली में फूल, चावल, कुमकुम के साथ एक सूखा नारियल रखें। तिलक के बाद भाई उस नारियल को बहते जल में प्रवाहित कर दे। यह भाई की लंबी उम्र और संकटों से रक्षा करता है।


*3. चित्रगुप्त पूजा का करियर टोटका*: नई कलम और दवात पूजन के बाद उसी कलम से सफेद कागज पर "श्री चित्रगुप्ताय नमः" 11 बार लिखें। कागज को अपनी किताब या लैपटॉप में रखें। मान्यता है कि इससे नौकरी व्यापार में लेखन संबंधी काम में सफलता मिलती है।

*डिस्क्लेमर 

यह ब्लॉग 30 अक्टूबर 2027 को गोवर्धन पूजा अन्नकूट और 31 अक्टूबर 2027 को यम द्वितीया भाई दूज चित्रगुप्त पूजा के अवसर पर सामान्य जानकारी और सांस्कृतिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई तिथियां पंचांग गणना पर आधारित हैं। स्थानीय परंपरा और पंचांग भेद के कारण तिथि में एक दिन का अंतर संभव है। अपने क्षेत्र के विद्वान या मंदिर से पुष्टि अवश्य कर लें। 

ब्लॉग में वर्णित पौराणिक कथाएं, टोटके और मान्यताएं लोक प्रचलित विश्वास और धर्मग्रंथों पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है बल्कि सांस्कृतिक विरासत से परिचय कराना है। वैज्ञानिक और आर्थिक पहलुओं की व्याख्या सामान्य अध्ययन पर आधारित है। 

यह किसी व्यक्ति, समुदाय, जाति या धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से नहीं लिखा गया है। पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या टोटके को करने से पहले योग्य पुरोहित से परामर्श लें। लेखक और प्रकाशक किसी भी प्रकार के लाभ हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। यह सामग्री केवल शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है।




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