कार्तिक छठ 2033 नहाए खाए 28 अक्टूबर, खरना 29, संध्या अर्ध्य 30 व प्रातः अर्ध्य 31 अक्टूबर को f

कार्तिक छठ 2033 नहाए खाए 28 अक्टूबर, खरना 29, संध्या अर्ध्य 30 व प्रातः अर्ध्य 31 अक्टूबर को

कार्तिक छठ: 27 अक्टूबर 2033, दिन गुरुवार, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी से शुरू होकर 30 अक्टूबर 2033, दिन शनिवार, कार्तिक मास शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि तक चलेगा। 

नहाए खाए: 27 अक्टूबर 2033, दिन गुरुवार को

खड़ना 28 अक्टूबर: 2033, दिन शुक्रवार को

संध्या का अर्ध्य 29 अक्टूबर: 2033, दिन शनिवार को

सुबह का अर्ध्य: 30 अक्टूबर 2033, दिन शनिवार को

छठ पूजा 2033: नहाय-खाय से पारण तक, जानें 04-दिवसीय महापर्व की विधि, नियम और आध्यात्मिक रहस्य

लोक आस्था, परम पवित्रता और सूर्य उपासना का महापर्व छठ भारतीय संस्कृति की एक अनुपम धरोहर है। यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि प्रकृति, मानव और ईश्वर के तादात्म्य का अनुपम उत्सव है। वर्ष 2033 में यह पावन पर्व 27 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 30 अक्टूबर तक पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। 

36 घंटे के अति कठिन निर्जला व्रत के माध्यम से व्रती भगवान भास्कर और छठी मैया से अपने परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्यता और संतान की दीर्घायु की कामना करते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तिथि तक चलने वाले इस पर्व में नहाय-खाय, खड़ना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य का विशेष विधान है। 

छठ पर्व की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी और कठोर नियम हैं, जहां साक्षात दिखने वाले देवता सूर्य की पूजा ढलते और उगते—दोनों रूपों में की जाती है। आइए, इस पावन महापर्व की विधि, रहस्य और वैज्ञानिकता को विस्तार से समझें।

खड़ना की रात 08:39 बजे के बाद शुरू होगा 24 घंटे का निर्जला व्रत

पहले दिन का अर्ध्य शाम 05:38 बजे से शुरू

सुबह 06:32 बजे के बाद दे उगते सूर्य को अर्घ्य

पवित्रता और आस्था का महापर्व छठ इस बार 28 अक्टूबर से शुरू होकर 31 अक्टूबर तक चलेगा। 36 घंटे निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना करना तथा संतान के दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा इस वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि अर्थात 28 अक्टूबर से शुरू होगा।

छठ पूजा का प्रारंभ चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है। इसके बाद पंचमी तिथि को खरना या रसियाव का आयोजन किया जाता है।

षष्ठी तिथि को छठ पूजा और सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान हैं। अर्घ्य देने के उपरांत व्रतधारी 36 घंटे से निर्जला व्रत का पारण करके व्रत को पूरा करते हैं। छठ पर्व पवित्रता की महता को दर्शाता है।

नहाय-खाय से शुरू करें आस्था का महापर्व छठ

आस्था का महापर्व छठ पर्व का शुभारंभ कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पर्व का पहला दिन कहलाता है, इस दिन को नहाए खाय कहते हैं।

इस वर्ष नहाय-खाय 27 अक्टूबर दिन गुरुवार को पड़ रहा है।

इस दिन सुबह उठकर नदी, तालाब, कुंआ या घर में स्थित नल से स्नान कर शरीर पर गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद आस्था का महापर्व छठ व्रत करने का संकल्प लें।

भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद घर में बड़े बुजुर्गों का चरण स्पर्श करें। पूजा के उपरांत अरवा चावल का भात और लौकी से बने सब्जी का सेवन करें।

चंद्रास्त के बाद शुरू होता है निर्जला व्रत

खड़ना की रात चंद्र अस्त के बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। महा आस्था का पर्व छठ के दूसरे दिन खड़ना करने का विधान है। इस दिन छठ पूजा का दूसरा दिन कहलाता है। 

यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खड़ना पर्व मनाते हैं । इस वर्ष खड़ना 28 अक्टूबर दिन शनिवार को है। खड़ना के दिन सुबह से ही व्रतधारी निर्जला रखकर छठी मैया का श्रवण दिन भर करती है और गीत गाती रहती है।

शाम को स्नान कर नया वस्त्र पहन कर व्रतधारी मिट्टी के बने चूल्हे पर आम की लकड़ी से पीतल के बर्तन में गुड़ के खीर और रोटी बनाती हैं।

 गोधूलि बेला में भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद छठी मैया की पूजा अर्चना करने के उपरांत खीर और रोटी खाती है। 

व्रतधारियोंं को भोजन करने के उपरांत प्रसाद के रूप में लोगों के बीच रसियाव और रोटी वितरण किया जाता है।

मान्यता है इस दिन खड़ना के प्रसाद मांग कर खाने से छठी मैया खुश होती है। आकाश में जब तक चंद्र उदय रहता है व्रतधारी पानी पी सकते हैं। चंद्रमा अस्त हो जाने के बाद 24 घंटेे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।

खड़ना की रात चंद्रास्त शाम 09:05 बजे पर होगा। चंद्रास्त के पूर्व व्रतधारी पेय पदार्थ पी सकते हैं। इसके बाद 32 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा।

तीसरा दिन व्रतधारी सूर्य को सन्ध्या अर्घ्य देती हैं। 
व्रतधारी आस्था के महापर्व के तीसरे दिन 30 अक्टूबर दिन रविवार को छठ पूजा का प्रमुख दिन कहलाता है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन संध्या बेला सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

छठ की पूजा सामग्री दउरा और सूप में सजा कर व्रतधारी छठी मईय की गीत गाते हुए घाट की ओर प्रस्थान करती है। इसके बाद घाट पर पहुंचकर छठी मैया और सूर्य देव का पिंड बनाकर पवित्र जल में स्नान कर, पूजा अर्चना करने के उपरांत भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हैैं।

अर्घ्य देने के दौरान घरवाले जो घाट पर स्नान कर चुके हैं वह भी भगवान भास्कर को जल में दूध मिलाकर अर्घ्य देते हैं। अंत में घाट पर से छठ गीत गाते हुए व्रतधारी घर के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

चौथे दिन उगते सूरज को अमृत मुहूर्त में दें अर्घ्य

आस्था का महापर्व छठ के चौथे दिन उगते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर पारण करते हैं। बहुत से समाज सेवी संस्थाएं घाट पर शिविर लगाकर व्रतधारियों के बीच दूध, आम का दातुन, आम का लकड़ी, चाय, खीर और कॉफी आदि सामग्रियों का वितरण करते हैं। उसी दौरान व्रतधारी भी लोगों के बीच प्रसाद का वितरण करते हैं।

पहले दिन का अर्ध्य शाम 05:09 बजे के बाद

सूर्यास्त शाम 05:09 बजे पर हो जाएगा। व्रतधारियों को अर्घ्य देते समय तीन मुहूर्तों का संयोग मिलेगा। गोधूलि, लाभ और सायाह्य संध्या मुहूर्त रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 05:09 बजे से लेकर 05:35 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार लाभ मुहूर्त शाम 05:09 बजे से लेकर 06:44 बजे बजे तक और सायाह्य संध्या मुहूर्त 05:09 बजे से लेकर 06:25 बजे तक रहेगा। इस दौरान अर्घ्य देना शुभ रहेगा।

सुबह का अर्ध्य 05:49 के बाद

इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य छठ व्रतधारी देते हैं। सूर्योदय सुबह 5:00 बज के 49 मिनट पर होगा। इस दौरान प्रातः मुहूर्त रहेगा। अमृत मुहूर्त 04:33 बजे से लेकर 05:49 बजे तक रहेगा।

छठ पर्व में लगने वाली पूजा सामग्री

आस्था के महापर्व छठ में अनेक तरह के पूजा सामग्री लगती है। कच्चे बांस की दो टोकरी, बांस या पीतल के सूप, जल अर्पण करने के लिए पीतल या तांबा का लोटा, पान पत्ता, गोटा सुपारी, अरवा चावल, सिंदूर, मिट्टी का दीया, शहद, गुड, दूध, धूप अगरबत्ती, शकरकंद, सुथनी, पत्ते सहित पांच गन्ने के पौधे, मूली, अदरक और हल्दी का हरा पौधा, केला, सेवन, संतरा, नाशपाती, शरीफा, पानी फल, आवला, पानी वाला नारियल, ठेकुआ, नया वस्त्र, गाजर, बड़ा नींबू, कपूर, आम का सूखा लकड़ी और दातुन प्रमुख है

जानें छठ व्रत को लेकर पौराणिक कथा

छठ व्रत के संबंध में कई तरह के पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी के अंश को देवसेना कहा जाता है। देवसेना प्राकृतिक का छठा अंश है। इसलिए देवसेना को छठी मैया भी कहा जाता है।

पुराणों के अनुसार छठी देवी को नौनिहालों की रक्षा करने वाली माता तथा लंबी उम्र प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। आज भी देश के कई राज्यों में बच्चों के जन्म के छठे दिन को छठिहार के रूप में मनाया जाता है।

ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी छठ मैया

गांव के तालाब में छठ व्रतधारी अर्ध्य देने के पहले स्नान करते हुए

दूसरी ओर छठी मैया को ब्रह्मा जी का मानस पुत्री कहा जाता है। इसी देवी की पूजा नवरात्रि के षष्ठी तिथि को देवी कात्यायनी माता के रूप में पूजा जाता है। एक मान्यता के अनुसार सूर्य देव की बहन भी छठी मैया को माना जाता है।

महाभारत काल में मिलती है दो कथाएं

दो कथा महाभारत काल से भी जुड़ा है। कर्ण का जन्म सूर्य देव के द्वारा दिए गए वरदान के कारण कुंती के गर्भ से हुआ था। कर्ण को भगवान सूर्य ने कवच और कुंडल भी प्रदान किया था। कर्ण प्रतिदिन सुबह समय कमर भर जल में खड़े होकर घंटों भगवान सूर्य को पूजा करते थे और नदी के जल से भगवान भास्कर को अर्घ्य देते थे। भगवान सूर्य को अर्घ्य दने की परंपरा कर्ण ने हीं शुरू किया था।

दूसरी कथा पांडव से जुड़ा है। पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए थे। द्रोपती ने छठ व्रत कर अपने खोए राज पाठ को पुनः प्राप्त किया था।

रानी के पुत्र प्राप्ति की कथा

छठ व्रत की कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम मालिनी थी। दोनों नि:संतान थे। संतान नहीं होने से राजा और रानी काफी दुखी रहते थे। राजा और रानी ने एक दिन पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से रानी गर्भवती हो गईं। 9 महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी के गर्भ से मृत पुत्र पैदा हुआ। राजा को जब इस बात का पता चला तो वे बहुत ज्यादा दुखी हो गए।

संतान शोक में राजा ने आत्म हत्या करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। परन्तु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक अद्भुत और अलौकिक देवी प्रकट हो गई।

देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्टी माता हूं। मैं सभी नि: संतानों को संतान का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो भक्त सच्चे मन से मेरी पूजा-अर्चना करते हैं, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण कर देती हूं।

अगर तुम मेरी पूजा-अराधना करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र प्रदान करूंगी। देवी की इन बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरी विधि से छठ व्रत किया। राजा और रानी ने ठीक देवी ने जैसे बतायी थी। ठीक वैसे ही चैत्र शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के परिणामस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

छठ महापर्व: वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक पहलू: छठ पूजा के दौरान सूर्य की किरणों के संपर्क में आने से शरीर को प्रचुर मात्रा में विटामिन D प्राप्त होता है। संध्या और उषा काल में जल में खड़े होकर सूर्य अर्घ्य देने से वर्णक्रम (Spectra) के माध्यम से दृष्टि और तंत्रिका तंत्र मजबूत होता है। 36 घंटे का उपवास शरीर के पाचन तंत्र को डिटॉक्सिफाई करता है।

आध्यात्मिक पहलू: यह पर्व प्रत्यक्ष देव 'सूर्य' (ऊर्जा के स्रोत) और प्रकृति की मूल शक्ति 'छठी मैया' (षष्ठी देवी) की आराधना का प्रतीक है। इसमें कर्मकांड की जगह आत्मिक शुद्धि, भक्ति और समर्पण को सर्वोपरि माना गया है।

सामाजिक पहलू: छठ पूजा में कोई पुरोहित या बिचौलिया नहीं होता। राजा हो या रंक, सभी एक ही घाट पर, एक ही तरह के बांस के सूप के साथ जल में खड़े होते हैं। यह पर्व ऊंच-नीच, जाति-पात के भेदभाव को मिटाकर सामाजिक समरसता का संदेश देता है।

आर्थिक पहलू: छठ पर्व स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाता है। बांस के सूप बनाने वाले शिल्पकार, मिट्टी के चूल्हे व दीये बनाने वाले कुम्हार, तथा गन्ना, कंद-मूल और फल बेचने वाले छोटे किसानों की आजीविका को इससे बड़ा प्रोत्साहन मिलता है।

छठ पूजा से जुड़े 03 प्रभावकारी और पारंपरिक उपाय (टोटके)

संतान सुख एवं दीर्घायु हेतु उपाय: खड़ना की रात पूजन के दौरान छठी मैया को 5 हरे पत्ते वाले गन्ने और एक पानी वाला नारियल अर्पित करें। पूजा के बाद इन गन्नों को संतान के सिर के ऊपर से 7 बार उबारकर (वारकर) घाट पर लगाएं। मान्यता है कि इससे संतान पर आने वाले बड़े संकट टल जाते हैं।

आर्थिक तंगी दूर करने का उपाय: संध्या अर्घ्य के समय तांबे के लोटे में जल, गंगाजल, थोड़ा सा कच्चा दूध और लाल चंदन मिलाकर भगवान सूर्य को अर्पित करें। अर्घ्य देते समय "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" का जप करें और मन ही मन अपनी मनोकामना दोहराएं। इससे रुक हुआ धन वापस मिलता है।

आरोग्य और रोग मुक्ति का उपाय: यदि घर में कोई पुराना रोगी हो, तो नहाय-खाय के दिन व्रती अपने हाथों से लौकी की सब्जी बनाकर रोगी को खिलाएं। इसके अतिरिक्त उषा अर्घ्य के बाद सूर्य देव की धूप में बैठकर रोगी के माथे पर कुमकुम का तिलक लगाएं, जिससे असाध्य रोगों में राहत मिलती है।

छठ महापर्व के अनसुलझे और अनोखे पहलू

बिना पुरोहित का महापर्व: भारतीय वैदिक परंपरा में अधिकांश बड़े अनुष्ठानों में पंडित या पुरोहित की आवश्यकता होती है, लेकिन छठ एकमात्र ऐसा महापर्व है जहां भक्त और ईश्वर के बीच कोई मध्यस्थ नहीं होता।

अस्त होते सूर्य की आराधना: दुनिया भर में उगते सूर्य की पूजा का विधान है, परंतु छठ पूजा में पहले ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह जीवन के ढलते पड़ाव और भूतकाल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक है।

पूर्णतः इको-फ्रेंडली उत्सव: इस पर्व में प्लास्टिक या कृत्रिम धातुओं का प्रयोग वर्जित है। केवल मिट्टी, बांस, पीतल और तांबे जैसी प्राकृतिक व पुनर्चक्रण योग्य वस्तुओं का उपयोग किया जाता है।

छठ पूजा से जुड़े 05 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: छठ पूजा में ढलते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

उत्तर: ढलता सूर्य इस बात का प्रतीक है कि जीवन में जो अस्त हुआ है, वह पुनः उदित होगा। यह अतीत के प्रति आभार प्रकट करने और यह संदेश देने के लिए है कि सम्मान केवल उगते हुए का ही नहीं, बल्कि ढलते हुए का भी होना चाहिए।

प्रश्न 2: छठी मैया कौन हैं और सूर्य देव से उनका क्या संबंध है?

उत्तर: ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, छठी मैया प्रकृति की छठी देवी (षष्ठी देवी) और ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं। पौराणिक मान्यताओं में इन्हें सूर्य देव की बहन माना गया है, जो बच्चों की रक्षक और आरोग्य प्रदान करने वाली देवी हैं।

प्रश्न 3: छठ पूजा में बांस के बने सूप और दउरा का ही प्रयोग क्यों होता है?

उत्तर: बांस को वंश वृद्धि, पवित्रता और सुलभता का प्रतीक माना जाता है। बांस के पात्रों का उपयोग समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ होता है और यह प्राकृतिक एवं पर्यावरण-अनुकूल परंपरा को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 4: क्या पुरुष भी छठ पूजा का व्रत रख सकते हैं?

उत्तर: हां, छठ व्रत लिंग-आधारित नहीं है। पुरुष भी उतनी ही निष्ठा, सात्विकता और 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव और छठी मैया की पूजा व पारण कर सकते हैं।

प्रश्न 5: खरना के दिन गुड़ की खीर (रसियाव) ही क्यों बनाई जाती है?

उत्तर: गुड़ और गेहूं सूर्य देव के प्रिय द्रव्य माने गए हैं। खरना का प्रसाद अत्यंत पवित्र माना जाता है, जो 36 घंटे के कठिन उपवास से पहले शरीर को आवश्यक ऊर्जा और सहनशक्ति प्रदान करता है।

महत्वपूर्ण डिस्क्लेमर (Disclaimer & Faith Remedies Note)

सामान्य डिस्क्लेमर: इस आलेख में दिए गए तिथियों के विवरण, सूर्योदय-सूर्यास्त के समय और शुभ मुहूर्त की जानकारी पारंपरिक पंचांगों, धार्मिक ग्रंथों एवं मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग भौगोलिक स्थानों के आधार पर सूर्योदय व सूर्यास्त के स्थानीय समय में आंशिक भिन्नता हो सकती है। व्रत एवं पूजा के नियम अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार ही निभाएं।

उपाय/टोटके डिस्क्लेमर: लेख में बताए गए पारंपरिक उपाय (टोटके) लोक मान्यताओं, जनश्रुतियों और आस्था पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। ये उपाय किसी वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या कानूनी सलाह का विकल्प नहीं हैं। इन उपायों के परिणामों की कोई शत-प्रतिशत गारंटी नहीं दी जाती है; पाठक इन्हें अपनी व्यक्तिगत श्रद्धा और विवेक के आधार पर ही प्रयोग में लाएं।


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