देवशयनी एकादशी 21 जुलाई 2029, दिन शनिवार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष को है।
एकादशी तिथि प्रारंभ: 20 जुलाई 2029, दिन शुक्रवार को शाम 04:42 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 21 जुलाई 2029 दिन शनिवार को दोपहर 02:44 बजे
देवशयनी एकादशी 2029 - जब श्रीहरि विष्णु जाते हैं 4 महीने की योगनिद्रा में और शुरू होता है चातुर्मास
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली देवशयनी एकादशी इसका सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है। इसी दिन से सृष्टि के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं, इसलिए इसे 'हरिशयनी' और 'पद्मनाभा' एकादशी भी कहा जाता है।
पंचांग के अनुसार वर्ष 2029 में देवशयनी एकादशी का पावन योग शनिवार, 21 जुलाई को बन रहा है। एकादशी तिथि का प्रारंभ 20 जुलाई, शुक्रवार को शाम 04:42 बजे से होगा और समापन 21 जुलाई, शनिवार को दोपहर 02:44 बजे पर होगा। सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश के बाद आने वाली यह एकादशी विशेष फलदायी मानी जाती है।
इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु चातुर्मास के दौरान पाताल लोक में राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं और फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी को वापस लौटते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान ने शंखासुर का वध करने के बाद अपनी थकान मिटाने के लिए चार मास तक क्षीरसागर में विश्राम किया था।
मान्यता है कि भगवान के सो जाने के बाद अगले चार महीनों तक विवाह, गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं। यह समय आत्म-शुद्धि, भजन, व्रत और साधना का होता है। साल भर में 24 एकादशियां आती हैं, लेकिन अधिकमास लगने पर इनकी संख्या 26 हो जाती है, जिनमें देवशयनी का व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है।
चातुर्मास का आरंभ: इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत होती है।
भगवान विष्णु का योगनिद्रा: इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।
विवाह आदि कार्य रोक: विष्णु जी के सोने के बाद चार महीने तक सभी मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि) बंद रहते हैं।
सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी व्रत विशेष स्थान रखता है
हर वर्ष चौबीस एकादशियां आती हैं। जब अधिकमास या मलमास लगता है। तब इसके बाद इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है
भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी के दिन से चार मास अर्थात चातुर्मास के दौरान पाताल लोक के राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं। इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौट आते हैं
सूर्य के मिथुन राशि में जाने पर देवशयनी एकादशी आती है
देवशयनी दिन से ही चातुर्मास का आरंभ हो जाता है। उसी दिन से भगवान श्री हरि क्षीरसागर में शयन अर्थात विश्राम करते हैं
लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर भगवान विष्णु निंद से जागते है
भगवान जिस दिन जागते हैं उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है
भगवान विष्णु के जागने के साथ ही सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं
देवशयनी एकादशी 2029 व्रत में भूलकर भी न करें ये 10 गलतियां, वरना नहीं मिलेगा व्रत का फल
देवशयनी एकादशी 21 जुलाई 2029 को है। जानिए व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें, कौन से दीपक का क्या फल है, घर में सुख-समृद्धि के लिए केले के पौधे का विशेष उपाय और व्रत के नियम।
*01. देवशयनी एकादशी पर क्यों जरूरी है नियमों का पालन?
देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु 04 महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दिन किया गया व्रत और पूजा सीधे क्षीरसागर तक पहुंचती है। लेकिन अगर व्रत में छोटी-छोटी गलतियां हो जाएं तो इसका पूरा फल नहीं मिलता। इसलिए शास्त्रों में कुछ विशेष नियम बताए गए हैं।
*02. देवशयनी एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये 07 काम
अगर आप चाहते हैं कि आपके व्रत का पूर्ण फल मिले तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
*01. सूर्योदय के बाद न उठें: इस दिन आलस का त्याग करें। सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लें। देर तक सोना अशुभ माना जाता है।
*02. तामसिक भोजन का त्याग: इस दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस, शराब, शहद और बाहर का दिया हुआ दही-भात बिल्कुल न खाएं। साथ ही मूली, पटल और बैंगन की सब्जी भी वर्जित है।
*03. काले और नीले वस्त्र न पहनें: पूजा में हमेशा साफ-सुथरे, सात्विक रंग के वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु को पीला रंग अति प्रिय है, इसलिए पीले वस्त्र पहनना सबसे उत्तम है। काले-नीले कपड़ों से बचें।
*04. कलह और झूठ से बचें: व्रत के दिन घर में शांति का माहौल रखें। झूठ बोलना, लड़ाई-झगड़ा करना और अपशब्द कहना व्रत को भंग कर देता है।
*05. पलंग पर सोना मना है: व्रत करने वाले को जमीन पर या साफ आसन पर सोना चाहिए। पलंग और खटिया पर सोने से बचें।
*06. ब्रह्मचर्य का पालन करें: इस दिन और चातुर्मास के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना सबसे बड़ा तप माना गया है।
*07. मांगलिक कार्य रोक दें: विष्णु जी के शयन के बाद 4 महीने तक विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
*03. घर में सुख-समृद्धि के लिए केले के पौधे का चमत्कारी उपाय
देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु और केले के पौधे का गहरा संबंध है। इस दिन यह उपाय करने से घर में लक्ष्मी स्थिर होती है:
विधि:
*01.सुबह के समय एक छोटे गमले में केले का पौधा लगाएं।
*02.उसे अपने घर की उत्तर या पूर्व दिशा में रखें। रोली-मोली, पीले फल-फूल, केसर, चंदन, धूप-दीप से उसकी पूजा करें।
*03.शुद्ध आसन पर बैठकर हल्दी से स्वस्तिक बनाएं और उस पर गाय के घी का दीपक रखकर पूजा करें।
*04.स्वयं व्रत कथा पढ़ें और परिवार को भी सुनाएं। इस दौरान भगवान विष्णु के 108 नामों का जाप करें।
*05.शाम को फिर से केले के पौधे के नीचे गाय के घी का दीया जलाएं और अपनी मनोकामना भगवान से कहें।
*06.अगले दिन इस पौधे को किसी विष्णु या श्रीकृष्ण मंदिर के पुजारी को दान कर दें।
*04. मनोकामना के अनुसार कौन सा दीपक जलाएं? - इसका विशेष रहस्य
शास्त्रों में दीपक का बहुत महत्व बताया गया है। अपनी इच्छा के अनुसार दीपक चुनें:
- *मधुर वाणी और मीठे रिश्तों के लिए: घी में गुड़ मिलाकर दीपक जलाएं।
- *दीर्घायु और पुत्र-पौत्र की प्राप्ति के लिए: शुद्ध तेल का दीपक जलाएं।
- *शत्रु बाधा और कर्ज से मुक्ति के लिए: सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
- *अखंड सौभाग्य और लक्ष्मी प्राप्ति के लिए: तिल के तेल का दीपक जलाएं।
- *स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिए: भगवान को पीले फूल और तुलसी दल के साथ भोग अर्पित करें।
याद रखें, देवशयनी एकादशी सिर्फ एक व्रत नहीं, बल्कि अपनी आत्मा को शुद्ध करने और अगले चार महीनों तक चलने वाले चातुर्मास के लिए खुद को तैयार करने का संकल्प है।
पौराणिक कथा
पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी के दिन से चार मास अर्थात चातुर्मास के दौरान पाताल लोक के राजा बलि के द्वार पर निवास करते हैं।
पुराण में यह भी उल्लेख किया गया है कि भगवान श्रीहरि ने वामन रूप धारण करके दैत्य राजा बलि के यज्ञ में आएं। तीन पग भूमि दान के रूप में राजा बलि से मांग लिया। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को लांध दिया।
दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक नाप दिया। तीसरे पग में राजा बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए भगवान विष्णु से अपने सिर पर पग रखने को कहा। राजा बलि को इस प्रकार के दान देने से भगवान विष्णु अत्यधिक प्रसन्न होकर पाताल लोक का राजा बना दिया और वर मांगने को भगवान विष्णु ने राजा बलि से कहा।
बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान श्रीहरि आप मेरे महल में नित्य निवास करें। बलि के बंधन में बंधा देख उनकी अर्धांगिनी माता लक्ष्मी ने बलि को भाई बना लिया और बलि से भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन ले लिया।
इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वचन का पालन करते हुए तीनों देवता चार-चार माह पाताल लोक में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठानी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक पाताल लोक में निवास करते हैं।
इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल एकादशी को अपने धाम लौट आते हैं। इस प्रकार द्वार पर निवास करने वाले दिन को 'देवशयनी' एकादशी कहते हैं।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं क्योंकि भगवान विष्णु राजा बलि के महल से आज के दिन ही लौटे थे।
इस चार महीने के दौरान यज्ञोपवीत संस्कार अर्थात जनेऊ संस्कार, शादी विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेश, गोदान, भूमिपूजन सहित जितने भी शुभ कार्य है।
सभी धार्मिक अनुष्ठानों पर पूर्ण विराम लग जाता है। भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है।
हरि का मतलब होता है विष्णु
संस्कृत भाषा में हरि शब्द का मतलब सूर्य, चन्द्रमा, वायु, विष्णु के नाम से है। हरिशयन का मतलब है। इन चार माह के दौरान बादल और वर्षा के कारण सूर्य और चन्द्रमा का तेज काफी क्षीण हो जाना हरि के शयन का ही द्योतक होता है।
इस समय में पित्त और वात स्वरूप अग्नि की गति मध्यम पड़ जाने के कारण शरीर की गति और शक्ति क्षीण हो जाती है।
वर्तमान युग में वैज्ञानिकों ने भी खोजा है कि चातुर्मास्य में अर्थात वर्षा ऋतु में विविध प्रकार के कीटाणु अर्थात सूक्ष्म रोग जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। जल की बहुलता और सूर्य-तेज का भूमि पर अति अल्प मात्रा आना ही इनका कारण है।
दूसरी धार्मिक कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य को श्रीहरि ने मार डाला था। अधिक थकान और नींद के कारण उसी दिन से आरम्भ करके भगवान विष्णु चार मास तक क्षीर सागर में विश्राम करते हैं। इसके बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं।
देवशयनी एकादशी व्रतविधि
एकादशी को प्रातःकाल उठ जाएं। इसके बाद घर की साफ-सफाई करके नित्य कार्य से निवृत्त हो जाएं। स्नान कर पवित्र जल में गंगा जल मिलाकर घर में छिड़काव करें।
पवित्र जगह पर करें विष्णु प्रतिमा स्थापित
घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र जगह पर भगवान विष्णु की सोने, चाँदी, तांबे अथवा पीतल से बने प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद उसका षोड्शोपचार विधि से पूजन करें।
विष्णु को पितांबरी वस्त्र से विभूषित करें
पूजन के दौरान भगवान विष्णु को पीतांबर वस्त्र से विभूषित करें। व्रत कथा सुनने के उपरांत आरती करें और भक्तों के बीच प्रसाद वितरण करें। अंत में सफेद चादर से बने गद्दे और तकिए वाले पलंग पर श्रीहरि विष्णु को सुता देना चाहिए।
व्यक्ति को इन चार महीनों अपनी रुचि के अनुसार शाकाहारी भोजन करें और नित्य भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे।
देवशयनी एकादशी की कथा
एक बार देवऋषि नारद ने भगवान ब्रह्माजी से पूछा पिताश्री देवशयनी एकादशी क्या है और इसे करने का विधान क्या है। ब्रह्माजी ने कहा पुत्र सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा सुख पूर्वक रहते थे।
मनुष्य के भाग्य में क्या लिखा है कोई नहीं जानता
मनुष्य के भविष्य में क्या हो जाएगा, यह कोई नहीं जानता। राजा मान्धाता भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में जल्द ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है।
उनके राज्य में पूरे तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई जिसके कारण राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। इस दुर्भिक्ष अकाल से जनता में त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि धार्मिक में कमी आने लगी।
मुसीबत पड़ने पर लोगों में धार्मिक कार्यों के प्रति रुचि कम हो जाती है। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना और दुःख दर्द की दुहाई दी।
कष्ट निवारण के लिए राजा वन में गए
राजा तो अकाल को लेकर पहले से ही दुःखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है? फिर इस अकाल रूपी कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए।
राजा पहुंच अंगिरा ऋषि के आश्रम में
वन में भ्रमण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंच गए। राजा ने साष्टांग दंडवत किया। ऋषिवर ने आशीर्वाद देकर राजा से कुशल क्षेम पूछा। फिर जंगल में भ्रमण करने और आश्रम में आने का कारण जानना चाहा।
राजा ने अपना कष्ट ऋषि को सुनाया
राजा ने हाथ जोड़कर कहा हे 'महात्मन्! मैं सभी तरह से धर्म का पालन करता हूं। इसके बाद भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूं। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया करके इसका समाधान हमें बताइए।
तब करने का अधिकारी सिर्फ ब्राह्मण
यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा 'हे राजन! सभी युगों में यह सतयुग सबसे उत्तम युग है। इसमें छोटे से पाप करने पर भी बड़ा भयंकर पाप मिलता है।
इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है।
इसके बाद भी आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में बारिश नहीं हो रही है। जब तक इसका मृत्यु नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष अकाल खतै नहीं होगा। अकाल खत्म करने के लिए उसे मारने से ही होगा।
राजा का हृदय एक निरपराध शूद्र तपस्वी को मारने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा- 'हे ऋषिवर मैं उस निरपराधी तपस्वी को मार दूं, यह संभव नहीं है। मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप दूसरा कोई और उपाय बताएं।' महर्षि अंगिरा ने कहा कि 'आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही आपके राज्य में बारिश होगी।'
राजा का कष्ट दूर लौटे अपने नगर में
राजा अपने राज्य लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी (देवशयनी एकादशी) का विधि विधान और पूरी निष्ठा पूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार बारिश हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।
व्रत करने से क्या मिलता है फल
ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होते हैं। यदि व्रती चातुर्मास का पालन विधिपूर्वक करे तो महाफल प्राप्त होता है।
सनातन धर्म में वर्णित सभी व्रतों में आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत सबसे उत्तम और महान माना जाता है। मान्यता है कि इस देवशयनी एकादशी व्रत को करने से भक्तों की सारी मनोकामनाएं और इच्छा पूर्ण होती हैं और उनके सभी पापों का विनाश हो जाता है।
देवशयनी एकादशी पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विधि विधान से पूजा अर्चना करने का विशेष फल मिलता है।
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और 'पद्मनाभा' एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार इसी रात्रि से भगवान का शयन काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चौमासा का प्रारंभ भी कहते है।
ब्लॉग के लिए 5 यूनिक FAQ (प्रश्न-उत्तर)
*प्रश्न 01: देवशयनी एकादशी 2029 पर चातुर्मास में तुलसी की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए?
*उत्तर: बहुत कम लोग जानते हैं कि देवशयनी एकादशी से तुलसी जी भी भगवान विष्णु के साथ 4 महीने के लिए शयन करती हैं। इस दौरान तुलसी के पत्ते तोड़ना और उन पर जल चढ़ाना वर्जित माना जाता है। आप तुलसी के गमले में दिया जला सकते हैं, पर पत्ते देवउठनी एकादशी के बाद ही तोड़ने चाहिए। यही कारण है कि चातुर्मास में तुलसी विवाह नहीं होता।
*प्रश्न 02: क्या देवशयनी एकादशी का व्रत पति-पत्नी दोनों को एक साथ रखना चाहिए?*
*उत्तर: हां, अगर पति-पत्नी एक साथ इस व्रत को रखते हैं तो इसका फल दोगुना हो जाता है। शास्त्रों में इसे 'युगल व्रत' कहा गया है। इससे वैवाहिक जीवन में कलह खत्म होती है और घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। दोनों को एक ही आसन पर बैठकर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।
*प्रश्न 03: केले के पौधे वाले उपाय को करने के बाद पौधा सूख जाए तो क्या करें?
*उत्तर: यदि दान करने से पहले केले का पौधा सूख जाए तो इसे अशुभ न मानें। यह आपके घर के वास्तु दोष या नकारात्मकता को अपने ऊपर लेने का संकेत है। सूखे पौधे को किसी पवित्र नदी या पीपल के पेड़ के नीचे रख दें और नया पौधा लगाकर फिर से वही प्रक्रिया दोहराएं और मंदिर में दान कर दें।
*प्रश्न 04: क्या इस दिन बिना नमक वाला व्रत करना अनिवार्य है?
*उत्तर: देवशयनी एकादशी पर पूर्ण उपवास सबसे उत्तम है, पर जो लोग बीमार हैं वे फलाहार कर सकते हैं। इसमें सेंधा नमक का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन सामान्य नमक, चावल, गेहूं और दाल का प्रयोग पूरी तरह मना है। व्रत में सिर्फ एक बार शाम को फलाहार करना ही शास्त्र सम्मत है।
*प्रश्न 05: चातुर्मास में भगवान विष्णु सच में पाताल लोक में रहते हैं, इसका क्या प्रमाण है?
*उत्तर: इसका प्रमाण भागवत पुराण में मिलता है। जब राजा बलि ने तीनों लोक दान में दे दिए तो भगवान वामन अवतार में प्रसन्न होकर उन्होंने बलि को वरदान दिया कि वे चार महीने पाताल में उसके द्वारपाल बनकर रहेंगे। इसलिए आषाढ़ से कार्तिक तक भगवान पाताल में निवास करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
अस्वीकरण: इस ब्लॉग/लेख में दी गई देवशयनी एकादशी 2029, व्रत विधि, पूजा उपाय और तिथि से संबंधित सभी जानकारी विभिन्न पंचांग, हिंदू धर्मग्रंथों, भागवत पुराण, भविष्य पुराण और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य केवल आपको जानकारी, ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करना है।
हम यह दावा नहीं करते कि यहां दी गई हर जानकारी 100% सटीक ही है, क्योंकि पंचांग और मुहूर्त स्थानीय सूर्योदय और स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकते हैं। इसलिए किसी भी व्रत, उपाय या दान को करने से पहले अपने स्थानीय पुजारी या ज्योतिषाचार्य से एक बार तिथि और शुभ मुहूर्त की पुष्टि अवश्य कर लें।
यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता है। केले के पौधे का उपाय, दीपक जलाने के फल आदि सभी आस्था और विश्वास पर आधारित हैं। इनका किसी भी वैज्ञानिक परिणाम से सीधा संबंध नहीं है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे अपनी श्रद्धा और विवेक के अनुसार ही अपनाएं।
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