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दुर्गा सप्तशती पाठ विधि और कलश स्थापना का नियम

चैत्र व शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें? जानें दुर्गा सप्तशती पाठ करने की सबसे सरल हिंदी विधि, आवश्यक सामग्री, मंत्र और सावधानियां

नवरात्रि में कलश स्थापना और दुर्गा सप्तशती पाठ: सरल विधि, नियम और पूजा सामग्री

नवरात्रि केवल नौ दिनों का एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा और मन की शुद्धि का एक पावन अवसर है। चैत्र हो या शारदीय नवरात्रि, अधिकांश श्रद्धालु अपने घरों में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर घटस्थापना (कलश स्थापना) करते हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। अक्सर देखा जाता है कि संस्कृत के कठिन श्लोकों और जटिल कर्मकांडों के कारण कई भक्त पाठ करने में झिझकते हैं। सत्य यह है कि माँ भगवती की आराधना में भाषा से अधिक 'समर्पण, भाव और स्वच्छता' का महत्व है। यदि आप संस्कृत के कठिन मंत्रों का उच्चारण सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं, तो आप हिंदी में भी पूरे भक्ति भाव से सप्तशती का पाठ कर सकते हैं।

दुर्गा सप्तशती के १३ अध्यायों में निहित शक्ति केवल श्लोकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर की नकारात्मकता को मिटाने का मार्ग दिखाती है। पाठ शुरू करने से पहले कलश स्थापना की सही सामग्री जुटाना, पुस्तक का पूजन करना, और शापोद्धार व उत्कीलन जैसे आवश्यक नियमों को समझना बेहद जरूरी है। इस लेख में हम बेहद सरल भाषा में जानेंगे कि नवरात्रि के दौरान कलश स्थापना कैसे करें, सप्तशती पाठ का सही क्रम क्या हो और किन सावधानियों का ध्यान रखकर आप माँ जगदम्बा की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं।

दुर्गा सप्तशती पाठ करने में लगने वाली सामग्रियों की सूची

 चैत्र नवरात्र के दिनों बहुत से श्रद्धालु अपने घरों में मां दुर्गे की प्रतिमा स्थापित कर सप्तशती का पाठ या श्रवण करते हैं। वैसे भक्तों को पाठ करने के दौरान कुछ नियम का पालन करना चाहिए। सबसे पहला नियम है शुद्धता, साफ-सफाई और सप्तशती पुस्तक में लिखे हुए श्लोकों का सही ढ़ंग से उच्चारण करना चाहिए। साथ ही स्पष्ट आवाज में सुनाई पड़नी चाहिए। आइए जानें सरल भाषा में कैसे करें पाठ दुर्गा सप्तशती का पाठ।

       दुर्गा पूजा-पाठ की विधि

चैत्र नवरात्रि में दुर्गा पूजा-पाठ की यह विधि यहां सरल भाषा में दी गई है। चैत्र नवरात्रि विशेष अवसरों पर तथा शतचंडी पाठ जैसे वृहद् अनुष्ठानों में विस्तृत विधि का उपयोग किया जाता है।

 उसमें यन्त्रस्थ कलश, गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तर्षि, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी, 49 क्षेत्रपाल तथा अन्यान्य देवताओं की वैदिक विधि विधान से पूजा होती है। अखंड दीप जलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। 


दुर्गा सप्तशती की पुस्तक की सुंदर तस्वीर

देवी का पूजन किस प्रकार करें

देवी भगवती प्रतिमा की अंग-न्यास और अग्न्युत्तारण सहित अन्य विधि के साथ विधिवत्‌ पूजा की जाती है। नवदुर्गा पूजा, ज्योतिःपूजा, बटुक-गणेशादि सहित कुमारी पूजा, अभिषेक, नान्दीश्राद्ध, रक्षाबंधन, पुण्याहवाचन, मंगलपाठ, गुरुपूजा, तीर्थावाहन एवं मंत्र-खान आदि सहित आसनशुद्धि, प्राणायाम, भूतशुद्धि, प्राण-प्रतिष्ठा, अन्तर्मातृकान्यास, बहिर्मातृकान्यास, सृष्टिन्यास, स्थितिन्यास, शक्तिकलान्यास, शिवकलान्यास, हृदयादिन्यास, षोडशान्यास, विलोम-न्यास, तत्त्वन्यास, अक्षरन्यास, व्यापकन्यास, ध्यान, पीठपूजा, विशेषार्घ्य, क्षेत्रकीलन, मन्त्र पूजा, विविध मुद्रा विधि, आवरण पूजा एवं प्रधान पूजा आदि का शास्त्रीय पद्धति के अनुसार अनुष्ठान करना चाहिए है। 

अन्यान्य पूजा-पद्धतियों से करें पूजन

इस प्रकार विस्तृत विधि से पूजा करने की इच्छा रखने वाले भक्तों को अन्यान्य पूजा-पद्धतियों की सहायता से भगवती की आराधना करके पाठ आरंभ करना चाहिए। 

लकड़ी के चौकी पर मां को दे स्थान

पाठ कर्ता पहले स्नान करके पवित्र हो जाना चाहिए। इसके बाद आसन-शुद्धि की क्रिया पूरा करें। तत्पश्चात शुद्ध आसन पर बैठे जाएं। इसके बाद शुद्ध जल, पूजन-सामग्री और दुर्गा सप्तशती की पुस्तक रख लें। पुस्तक को अपने सामने लकड़ी  के शुद्ध आसन (चौकी) पर विराजमान कर दें। ललाट में अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बांध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्त्व-शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। 

इन चार मंत्रों का करें जाप

उस समय निम्नांकित चार मंत्रों को क्रमशः पढ़ें - 
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। 
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। 
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। 

पाठ आरंभ करने के पहले लें संकल्प

चारों मंत्रों का जाप करने के बाद प्राणायाम करके गणेश सहित अन्य देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करे, फिर 'पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ' मंत्र से कुश की पवित्री अपने हाथ की उंगली में धारण करें। इसके बाद हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें।

 नवार्ण मंत्र से पुस्तक स्थापित करें

संकल्प करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें। योनि-मुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करे। फिर मूल नवार्ण मंत्र से पीठ में आदि शक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर दुर्गा सप्तशती पुस्तक को स्थापित करें। 

मंत्र का सात बार जाप करें

इसके बाद शापोद्वार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं। 'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा' - इस मंत्र का आदि और अन्त में सात-सात बार जप करे। यह शापोद्वारमन्त्र कहलाता है। 

मंत्र का 7 और 21 बार करें जाप

इसके अनन्तर उत्कीलन-मंत्र'ॐ ह्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहआ, का जप किया जाता है। इसका जप शुरू और अन्त में 21-21 बार होता है। इस मंत्र जप के पश्चात्‌ शुरू और अन्त में 7-7 बार मृत-संजीवनी विद्या का जप करना चाहिए। 

ऐसे करें दुर्गा पाठ का आरंभ

इस प्रकार शापोद्धार करने के अनंतर अन्तर्मातृकाबहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर भगवती का ध्यान करके रहस्य में बताये अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी का पूजन करें, इसके बाद छः अंगो सहित दुर्गा सप्तशती का पाठ आरम्भ किया जाता है। 

दुर्गा सप्तशती का छह अंग माने गए हैं

कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य - ये ही सप्तशती के छः अंग माने गए हैं। उनके क्रम में भी मतभेद है। चिदम्बर संहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है। किंतु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक-संज्ञा दी गई है। 

जिस प्रकार सब मन्त्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति तथा अंत में कीलक का उच्चारण होता है। उसी प्रकार यहां भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गलारूपा शक्ति का तथा अंत में की‍लक रूप कीलक का है।

क्रमश: पाठ होना चाहिए।

यह विधि अत्यंत सरल मानी गई है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ अर्थात प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ अर्थात द्वितीय अध्याय, तीसरे दिन अर्थात तृतीय अध्याय, तीसरे दिन भी एक पाठ अर्थात चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ करनी चाहिए। अर्थात पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय रहेगा। पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ करें। नवम, दशम अध्याय का पाठ पांचवें दिन करना चाहिए। छठें दिन ग्यारहवां अध्याय का पाठ करें। सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।

शुद्धता का रखें ध्यान

दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के दौरान शुद्धता का पालन करना बेहद जरूरी है। इसलिए स्नान आदि करके साफ वस्त्र पहकर ही पाठ करें। कुशा के आसन या ऊन के बने आसन पर बैठकर ही पाठ करें। दुर्गा सप्तशती पाठ करते समय हाथों से पैर का छुना सख़्त मना है।

पाठ शुरू करने के पहले पुस्तक को करें पूजा

दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करने से पहले पुस्तक को लाल कपड़े के ऊपर रखकर उस पर गंगा जल, अक्षत, प्रसाद और फूल चढ़ाकर पूजा करें। पूजा करने के बाद ही पुस्तक पढ़ना शुरू करें।

पाठ शुरू और अंत करने पर पढ़ें ये मंत्र

नर्वाण मंत्र ''ओं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे'' का जाप करना जरूरी होता है। मंत्र का जप नवरात्रि के दौरान दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले और बाद में नर्वाण मंत्र का जप करें।

श्लोक की शुद्धता ज़रूरी

दुर्गा सप्तशती के पाठ में एक-एक शब्द का उच्चारण साफ और स्पष्ट होना चाहिए। इसमें शब्दों को उल्टा-पुल्टा न बोलें और ना ही शब्दों का हेर-फेर करें। सप्तशती पढ़ते वक्त बहुत जोर-जोर से चिल्लाकर पाठ करना या धीरे-धीरे बोलकर  पाठ करने की मनाही है। इस तरह करें कि आपको और सुनने वालों को एक-एक शब्द स्पष्ट सुनाई दे।

हिंदी भाषा में भी करें पाठ

अगर आप संस्कृत भाषा में दुर्गा सप्तशती के पाठ का उच्चारण ठीक ढंग से और शुद्धता के साथ करने में कठिनाई हो रही है। तो आप संस्कृति भाषा में लिखे श्लोक के नीचे हिंदी भाषा में लिखे अर्थ को ही पढ़ें। लेकिन जो भी पढ़ें उसे सही और स्पष्ट बोलें।

पाठ करते समय मन को शांत और स्थित रखें

दुर्गा सप्तशती का पाठ करते वक्त भुलकर भी जम्हाई नहीं लेनी चाहिए। जम्हाई लेना आलस को दर्शाता है। इस प्रकार आपको पाठ करना सही नहीं होगा और उचित फल भी नहीं मिलेगा। इसलिए मन को शांत और स्थिर रखकर ही दुर्गा सप्तशती पाठ शुरू करें।

कुंजिका स्तोत्र का भी कर सकते हैं पाठ

यदि आपके पास किसी दिन समय की भारी कमी है और आप दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ नहीं कर सकते हैं। इस स्थिति में आप दुर्गा सप्तशती के आखिर में दिए गए कुंजिका स्तोत्र का पाठ निष्ठा पूर्वक करे लें और देवी से अपनी पूजा स्वीकार करने की करवद्ध प्रार्थना करें।

पाठ की समाप्ति पर माफी मांगे मां से

पाठ खत्म हो जाने के बाद आखिर में मां दुर्गा से पूजा करने या पाठ करने में अपनी किसी भी तरह की गलती के लिए मां भगवती से क्षमा-याचना और प्रार्थना जरूर कर लेना चाहिए।

कलश स्थापना में लगने वाली पूजा सामग्री

चैत्र नवरात्र दो अप्रैल दिन शनिवार को कलश स्थापना के साथ 9 दिनों के आराधना का महा महोत्सव का आरंभ हो जाएगा। कलश स्थापना करने के लिए पूजा सामग्री की जरूरत पड़ती है। साथ ही प्रतिपदा तिथि होने के कारण मां शैलपुत्री की पूजा भी की जाती है।

कलश स्थापना करने के पूर्व इन सामग्रियों का खरीदारी कर लेनी चाहिए। कलश स्थापना के लिए जटा वाला नारियल, गाय का गोबर, दूध, दही, पान, सुपारी, रोली, मिट्टी का कलश, सिंदूर, लाल कपड़ा, फूल, उड़हुल फूल का माला, अक्षत, हवन के लिए सूखी लकड़ी, कपूर, जौ, मेवा, मधु, गंगाजल, अगरबत्ती, दीया, गुड़, इत्र, आम का पत्ता, रूई, दूर्वा, सलाई, गुड़, हल्दी, मिठाई और मौसमी फल होना जरूरी है।

दुर्गा सप्तशती और कलश स्थापना के विविध पहलू

*आध्यात्मिक पहलू:

दुर्गा सप्तशती पाठ आत्मा के शोधन का माध्यम है। इसमें वर्णित महिषासुर, शुंभ-निशुंभ का वध केवल पौराणिक कथाएं नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे आंतरिक शत्रुओं के नाश का प्रतीक हैं। नवार्ण मंत्र का जाप और शक्ति उपासना साधक की चेतना को जाग्रत करती है।

*वैज्ञानिक पहलू:

सप्तशती के मंत्रों का स्पष्ट उच्चारण और ध्वनि तरंगें (Sound Waves) वातावरण में सकारात्मक कंपन पैदा करती हैं। नवरात्रि का समय ऋतु परिवर्तन (संधिकाल) का होता है, जहाँ उपवास और नियमबद्ध जीवन शरीर को डिटॉक्स करने का काम करता है। धूप, हवन और कपूर का धुआं हवा में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर पर्यावरण को शुद्ध करता है।

*सामाजिक पहलू:

नवरात्रि समाज में नारी शक्ति के सम्मान और सामूहिकता का संदेश देती है। इस दौरान नौ दिनों तक परिवार और समाज के लोग एक साथ मिलकर पूजा, पाठ और आयोजनों में भाग लेते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव, बंधुत्व और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव मजबूत होता है।

*आर्थिक पहलू:

नवरात्रि का पर्व स्थानीय अर्थव्यवस्था और छोटे व्यापारियों के लिए संजीवनी का काम करता है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, फूल-माला विक्रेता, फल-मेवा व्यापारी, पूजन सामग्री की दुकानें और पीतल/तांबे के बर्तन निर्माताओं का व्यापार इस समय चरम पर होता है, जिससे ग्रामीण व शहरी दोनों अर्थव्यवस्थाओं को बल मिलता है।

सप्तशती पाठ से जुड़े अनसुलझे पहलू

दुर्गा सप्तशती पाठ के संदर्भ में आज भी कई ऐसे व्यावहारिक और शास्त्रीय प्रश्न हैं, जिन पर विद्वानों और आम श्रद्धालुओं के बीच मतभेद देखने को मिलता है:

*संस्कृत बनाम भाषांतर (हिंदी पाठ): शास्त्रीय मत यह मानता है कि संस्कृत बीजाक्षरों की ध्वनियों का ही मूल प्रभाव होता है, जबकि व्यावहारिक दृष्टिकोण यह कहता है कि बिना अर्थ समझे संस्कृत पढ़ने से बेहतर भावपूर्ण हिंदी पाठ है। इस पर कोई एक अंतिम सर्वमान्य राय नहीं है।

*शापोद्धार की अनिवार्यता: सप्तशती को भगवान शिव द्वारा कीलित माना गया है। आम गृहस्थों के लिए शापोद्धार, उत्कीलन और कीलक पाठ की प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाती है कि वे भ्रमित हो जाते हैं कि इसके बिना पाठ फलदायी है या नहीं।

*अंग पाठ का क्रम: चिदंबर संहिता और योगरत्नावली जैसी प्राचीन पुस्तकों में कवच, अर्गला और कीलक का क्रम अलग-अलग बताया गया है। सामान्य पाठक इस असमंजस में रहते हैं कि किस परंपरा का पालन करें।

*कुंजिका स्तोत्र की सीमा: कुछ विद्वान मानते हैं कि केवल 'सिद्ध कुंजिका स्तोत्र' का पाठ पूरी सप्तशती के बराबर है, जबकि अन्य इसे केवल अति-आपातकाल का विकल्प मानते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न *01: क्या संस्कृत न आने पर हिंदी में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है?

उत्तर: जी हां, बिल्कुल। देवी आराधना में भाषा से अधिक निष्ठा, शुद्धता और समर्पण का महत्व है। यदि आप संस्कृत के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर पाते हैं, तो हिंदी अनुवाद को समझकर और स्पष्ट आवाज में पढ़ें।

प्रश्न *02: यदि नवरात्रि में प्रतिदिन पूरा पाठ करने का समय न हो तो क्या करें?

उत्तर: यदि समय की कमी है, तो आप सप्तशती के अंत में दिए गए 'सिद्ध कुंजिका स्तोत्र' का श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते हैं, या अध्याय-वार विभाजन करके ९ दिनों में १३ अध्यायों को पूरा कर सकते हैं।

प्रश्न *03: पाठ करते समय किन मुख्य बातों से बचना चाहिए?

उत्तर: पाठ के दौरान उबासी (जम्हाई) लेने, हाथ से पैर छूने, बहुत जोर से चिल्लाकर या मन ही मन बहुत धीरे बोलने से बचना चाहिए। उच्चारण स्पष्ट और आवाज मध्यम होनी चाहिए।

प्रश्न *04: कलश स्थापना के लिए सबसे मुख्य सामग्रियां क्या हैं?

उत्तर: मिट्टी या धातु का कलश, जटावाला नारियल, आम के पत्ते, जोंव (जौ), जल, रोली, अक्षत, दूर्वा, सिक्का और लाल कपड़ा सबसे अनिवार्य सामग्रियां हैं।

प्रश्न -05: पाठ समाप्त होने के बाद क्या करना आवश्यक है?

उत्तर: पाठ पूरा होने पर देवी की आरती करें और जाने-अनजाने हुई भूल-चूक के लिए क्षमा-याचना स्तोत्र (अपराध क्षमापन स्तोत्र) का पाठ करके माँ दुर्गा से आशीर्वाद मांगें।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख केवल सामान्य जानकारी, धार्मिक मान्यताओं, जनश्रुतियों और पारंपरिक धर्मग्रंथों में दिए गए संदर्भों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना या किसी की व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

लेख में बताई गई पूजा विधि, कलश स्थापना के नियम, मंत्र जाप और अनुष्ठान के तरीके विभिन्न धार्मिक ग्रंथों जैसे 'दुर्गा सप्तशती', 'देवी भागवत पुराण' और जनसामान्य में प्रचलित पद्धतियों से संकलित किए गए हैं। स्थान, क्षेत्र, कुल-परंपरा और स्थानीय पंडितों के अनुसार पूजा विधियों और नियमों में भिन्नता हो सकती है।

पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी भी विशेष अनुष्ठान, शतचंडी पाठ, या गृह-पूजा को करने से पहले अपनी कुल-परंपरा का ध्यान रखें या किसी योग्य एवं विद्वान ज्योतिषाचार्य/कर्मकांडी पुरोहित से व्यक्तिगत मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें। लेख में दिए गए विचार सामान्य अध्ययन पर आधारित हैं। लेखक या प्रकाशक इस लेख में दी गई जानकारी के प्रयोग से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।


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