सनातनी पंचांग के अनुसार, वर्ष 2032 में चैती छठ पूजा 13 अप्रैल से 16 अप्रैल 2032 तक मनाई जाएगी।
लोक आस्था का यह महापर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है।
चार दिनों तक चलने वाले इस मुख्य अनुष्ठान का पूरा शेड्यूल नीचे दी गई तालिका में देख सकते हैं:
चैती छठ 2032 तिथियां (04 दिवसीय कैलेंडर)
पहला दिन 13 अप्रैल 2032 दिन मंगलवार: नहाय-खाय। इस दिन व्रती नदी या जलाशय में पवित्र स्नान करके शुद्ध सात्विक भोजन (कद्दू-भात और चने की दाल) ग्रहण करते हैं।
दूसरा दिन 14 अप्रैल 2032 दिन बुधवार: खड़ना (लोहंडा) व्रती दिनभर निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को सूर्य देव को गुड़ की खीर और रोटी का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद 36 घंटे का मुख्य निर्जला व्रत शुरू होता है। चंद्र अस्त 10:13 बजे होगा। चंद्र अस्त होने के बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
तीसरा दिन 15 अप्रैल 2032, दिन गुरुवार: संध्या अर्घ्य छठ पूजा का मुख्य दिन। इस दिन शाम को डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को नदी या तालाब के घाट पर जाकर पहला अर्घ्य दिया जाता है। सूर्यास्त 06:06 बजे पर होगा। अर्ध्य देने का समय।
चौथा दिन 16 अप्रैल 2032, दिन शुक्रवार: उषा अर्घ्य (पारण)चैत्र शुक्ल सप्तमी को उगते हुए सूर्य (उदीयमान सूर्य) को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही 36 घंटे का यह कठिन व्रत समाप्त होता है और प्रसाद वितरण के साथ पारण किया जाता है। सूर्योदय 5:24 पर होगा।
13 से 16 अप्रैल तक लोक आस्था का महापर्व छठ: जानें संपूर्ण जानकारी
सनातन धर्म में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है और उनकी उपासना का सबसे बड़ा पर्व है छठ। साल में दो बार मनाए जाने वाले इस महापर्व में से चैती छठ का विशेष महत्व है। सनातनी पंचांग के अनुसार वर्ष 2032 में चैती छठ पूजा का आयोजन 13 अप्रैल से 16 अप्रैल तक होगा। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक पूरे नियम, पवित्रता और आस्था के साथ मनाया जाता है।
चार दिनों तक चलने वाले इस कठिन व्रत में 36 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, जो संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार के कल्याण के लिए समर्पित है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित पूरे भारत में व्रती नदी और तालाबों के घाटों पर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। मान्यता है कि इस दौरान छठी मैया और सूर्य देव की संयुक्त आराधना से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस लेख में हम आपको चैती छठ 2032 का सही कैलेंडर, पूजा विधि और विशेष टोटकों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।
पवित्रता और आस्था का महापर्व छठ इस बार 13 अप्रैल से शुरू होकर 16 अप्रैल तक चलेगा। 36 घंटे निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव की आराधना करना तथा संतान के दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा इस वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि अर्थात 13 अप्रैल से शुरू होगा।
छठ पूजा का प्रारंभ चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है। इसके बाद पंचमी तिथि को खड़ना या रसियाव का आयोजन किया जाता है।
षष्ठी तिथि को छठ पूजा और सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विधान हैं।अर्घ्य देने के उपरांत व्रतधारी 36 घंटे से निर्जला व्रत का पारण करके व्रत को पूरा करते हैं। छठ पर्व पवित्रता की महता को दर्शाता है।
नहाय-खाय से शुरू करें आस्था का महापर्व छठ
आस्था का महापर्व छठ पर्व का शुभारंभ चैत्र मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि से होती है। यह छठ पर्व का पहला दिन होता है, इस दिन को नहाए खाय कहते हैं। इस वर्ष नहाय-खाय 5 अप्रैल दिन मंगलवार को पड़ रहा है।
इस दिन सुबह उठकर नदी, तालाब, कुंआ या घर में स्थित नल से स्नान कर शरीर पर गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद आस्था का महापर्व छठ व्रत करने का संकल्प लें। भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद घर में बड़े बुजुर्गों का चरण स्पर्श करें। पूजा के उपरांत अरवा चावल का भात और लौकी से बने सब्जी का सेवन करें।
चंद्रअस्त के बाद शुरू होता है निर्जला व्रत
खड़ना की रात चंद्र अस्त के बाद निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा। महाआस्था का पर्व छठ के दूसरे दिन खड़ना करने का विधान है। इस दिन छठ पूजा का दूसरा दिन कहलाता है। यह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को खड़ना पर्व मनाते हैं । इस वर्ष खड़ना 14 अप्रैल दिन बुधवार को है। खड़ना के दिन सुबह से ही व्रतधारी निर्जला रखकर छठी मैया का श्रवण दिन भर करती है और गीत गाती रहती है।
शाम को स्नान कर नया वस्त्र पहन कर व्रतधारी मिट्टी के बने चूल्हे पर आम की लकड़ी से पीतल के बर्तन में गुड़ के खीर और रोटी बनाती हैं। गोधूलि बेला में भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद छठी मैया की पूजा अर्चना करने के उपरांत खीर और रोटी खाती है। व्रत धारियोंं को भोजन करने के उपरांत प्रसाद के रूप में लोगों के बीच वितरण किया जाता है।
मान्यता है इस दिन खड़ना के प्रसाद मांग कर खाने से छठी मैया खुश होती है। आकाश में जब तक चंद्र उदय रहता है व्रतधारी पानी पी सकते हैं। चंद्रमा अस्त हो जाने के बाद 24 घंटेे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
तीसरा दिन व्रतधारी सूर्य को सन्ध्या अर्घ्य देती हैं व्रतधारी आस्था के महापर्व के तीसरे दिन 14 अप्रैल दिन गुरुवार को छठ पूजा का प्रमुख दिन कहलाता है, जो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। इस दिन संध्या बेला सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
छठ की पूजा सामग्री दउरा और सूप में सजा कर व्रतधारी छठी मईय की गीत गाते हुए घाट की ओर प्रस्थान करती है। इसके बाद घाट पर पहुंचकर छठी मैया और सूर्य देव का पिंड बनाकर पवित्र जल में स्नान कर, पूजा अर्चना करने के उपरांत भगवान भास्कर को अर्घ्य देती हैैं।
अर्घ्य देने के दौरान घरवाले जो घाट पर स्नान कर चुके हैं वह भी भगवान भास्कर को जल में दूध मिलाकर अर्घ्य देते हैं। अंत में घाट पर से छठ गीत गाते हुए व्रतधारी घर के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।
चौथे दिन उगते सूरज को अर्घ्य देकर महापर्व समाप्त
आस्था का महापर्व छठ के चौथे दिन उगते हुए भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर पारण करते हैं। बहुत से समाज सेवी संस्थाएं घाट पर शिविर लगाकर व्रतधारियों के बीच दूध, आम का दातुन, आम का लकड़ी, चाय, खीर और कॉफी आदि सामग्रियों का वितरण करते हैं। उसी दौरान व्रतधारी भी लोगों के बीच प्रसाद का वितरण करते हैं।
पहले दिन का अर्ध्य शाम 06:06 बजे के बाद
सूर्यास्त शाम 06:06 बजे पर हो जाएगा। व्रतधारियों को अर्घ्य देते समय तीन मुहूर्तों का संयोग मिलेगा। गोधूलि, अमृत और सायाह्य संध्या मुहूर्त रहेगा। गोधूलि मुहूर्त शाम 06:05 बजे से लेकर 06:27 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार अमृत मुहूर्त शाम 06:06 बजे से लेकर 07:38 बजे बजे तक और सायाह्य संध्या मुहूर्त 06:06 बजे से लेकर 07:14 बजे तक रहेगा। इस दौरान अर्घ्य देना शुभ रहेगा।
सुबह का अर्ध्य 05:24 के बाद
इस दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य छठ व्रतधारी देते हैं। सूर्योदय सुबह 05:00 बज के 24 मिनट पर होगा। इस दौरान चर मुहूर्त रहेगा। चर मुहूर्त 05:24 बजे से लेकर 06:39 बजे तक रहेगा।
छठ पर्व में लगने वाली पूजा सामग्री
आस्था के महापर्व छठ में अनेक तरह के पूजा सामग्री लगती है। कच्चे बांस की दो टोकरी, बांस या पीतल के सूप, जल अर्पण करने के लिए पीतल या तांबा का लोटा, पान पत्ता, गोटा सुपारी, अरवा चावल, सिंदूर, मिट्टी का दीया, शहद, गुड, दूध, धूप अगरबत्ती, शकरकंद, सुथनी, पत्ते सहित पांच गन्ने के पौधे, मूली, अदरक और हल्दी का हरा पौधा, केला, सेवन, संतरा, नाशपाती, शरीफा, पानी फल, आवला, पानी वाला नारियल, ठेकुआ, नया वस्त्र, गाजर, बड़ा नींबू, कपूर, आम का सूखा लकड़ी और दातुन प्रमुख है
जानें छठ व्रत को लेकर पौराणिक कथा
छठ व्रत के संबंध में कई तरह के पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी के अंश को देवसेना कहा जाता है। देवसेना प्राकृतिक का छठा अंश है। इसलिए देवसेना को छठी मैया भी कहा जाता है।
पुराणों के अनुसार छठी देवी को नौनिहालों की रक्षा करने वाली माता तथा लंबी उम्र प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। आज भी देश के कई राज्यों में बच्चों के जन्म के छठे दिन को छठिहार के रूप में मनाया जाता है।
ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थी छठ मैया
दूसरी ओर छठी मैया को ब्रह्मा जी का मानस पुत्री कहा जाता है इसी देवी की पूजा नवरात्रि के षष्ठी तिथि को देवी कात्यायनी माता के रूप में पूजा जाता है। एक मान्यता के अनुसार सूर्य देव की बहन भी छठी मैया को माना जाता है।
महाभारत काल में मिलती है दो कथाएं
दो कथा महाभारत काल से भी जुड़ा है। कर्ण का जन्म सूर्य देव के द्वारा दिए गए वरदान के कारण कुंती के गर्भ से हुआ था। कर्ण को भगवान सूर्य ने कवच और कुंडल भी प्रदान किया था। कर्ण प्रतिदिन सुबह समय कमर भर जल में खड़े होकर घंटों भगवान सूर्य को पूजा करते थे और नदी के जल से भगवान भास्कर को अर्घ्य देते थे। भगवान सूर्य को अर्घ्य दने की परंपरा कर्ण ने हीं शुरू किया था।
दूसरी कथा पांडव से जुड़ा है। पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए थे। द्रोपती ने छठ व्रत कर अपने खोए राज पाठ को पुनः प्राप्त किया था।
रानी के पुत्र प्राप्ति की कथा
छठ व्रत की कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम मालिनी थी। दोनों नि:संतान थे। संतान नहीं होने से राजा और रानी काफी दुखी रहते थे। राजा और रानी ने एक दिन पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ के प्रभाव से रानी गर्भवती हो गईं। 9 महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी के गर्भ से मृत पुत्र पैदा हुआ। राजा को जब इस बात का पता चला तो वे बहुत ज्यादा दुखी हो गए।
संतान शोक में राजा ने आत्म हत्या करने का दृढ़ संकल्प कर लिया। परन्तु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक अद्भुत और अलौकिक देवी प्रकट हो गई।
देवी ने राजा से कहा कि मैं षष्टी माता हूं। मैं सभी नि: संतानों को संतान का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो भक्त सच्चे मन से मेरी पूजा-अर्चना करते हैं, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण कर देती हूं।
अगर तुम मेरी पूजा-अराधना करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र प्रदान करूंगी। देवी की इन बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरी विधि से छठ व्रत किया। राजा और रानी ने ठीक देवी ने जैसे बतायी थी। ठीक वैसे ही चैत्र शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के परिणामस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।
अनसुलझे पहलुओं की जानकारी
छठ पूजा से जुड़े कई पहलू आज भी अनसुलझे हैं। पहला, यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते सूर्य की पूजा की जाती है, जबकि सनातन में उगते सूर्य को ही शुभ माना जाता है। इसका कारण आज तक स्पष्ट नहीं है।
दूसरा, इस पूजा में वैदिक मंत्रों की जगह लोक गीतों का प्रयोग क्यों होता है, इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं मिलता।
तीसरा, बांस के सूप और गन्ने का ही प्रसाद में उपयोग क्यों अनिवार्य है, जबकि अन्य फलों की भरमार है।
चौथा, 36 घंटे का निर्जला व्रत बिना किसी पुजारी के स्वयं व्रती ही कैसे पूरा करता है, यह चिकित्सा विज्ञान के लिए भी आश्चर्य है। पांचवा, छठी मैया का उल्लेख प्रमुख पुराणों में कम और लोक कथाओं में ज्यादा क्यों है।
वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की विवेचना
*वैज्ञानिक पहलू: छठ में सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे विज्ञान है। सुबह और शाम की सूर्य की किरणों में पराबैंगनी किरणें कम होती हैं, जो आंखों और त्वचा के लिए लाभदायक हैं। नदी में खड़े होकर अर्घ्य देने से शरीर को विटामिन D मिलता है। ठेकुआ और गुड़ के प्रसाद से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है। 36 घंटे का उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है।
*आध्यात्मिक पहलू: यह आत्मशुद्धि का पर्व है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना सिखाता है कि अंत भी उतना ही सुंदर है जितना उदय। यह अहंकार को समाप्त कर समर्पण सिखाता है। सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं, उनकी पूजा से आत्मबल बढ़ता है।
*सामाजिक पहलू: छठ सबसे बड़ा लोकतांत्रिक पर्व है। इसमें जात-पात, अमीर-गरीब का भेद नहीं। सभी एक ही घाट पर, एक ही जल में पूजा करते हैं। यह प्रवासी बिहारियों को अपने गांव से जोड़ता है। घाट की सफाई सामूहिक रूप से होती है जिससे सामाजिक एकता बढ़ती है।
*आर्थिक पहलू: छठ बिहार की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। इस दौरान बांस के सूप, टोकरी, मिट्टी के चूल्हे, गन्ना, फल और कपड़ों की बिक्री से करोड़ों का व्यापार होता है। कुम्हार, किसान और छोटे व्यापारी इसी पर्व से साल भर की कमाई करते हैं। यह लोकल फॉर वोकल का सबसे बड़ा उदाहरण है।
2. चैती छठ पर किए जाने वाले 3 विशेष टोटके
*टोटका 01: संतान सुख और दीर्घायु के लिए
छठ पूजा संतान के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। संध्या अर्घ्य के दिन बांस के नए सूप में ठेकुआ, 5 प्रकार के फल और एक नारियल रखकर छठी मैया का स्मरण करें। अर्घ्य देते समय "ॐ षष्ठी देव्यै नमः" मंत्र का 11 बार जाप करें और अपने संतान के नाम का उच्चारण करें। मान्यता है इससे संतान को आरोग्य और लंबी आयु प्राप्त होती है।
*टोटका 02: घर में सुख-समृद्धि और कर्ज मुक्ति के लिए
खड़ना की शाम को गुड़ की खीर बनाते समय चूल्हे के पास घी का दीपक जलाएं। खीर में से थोड़ा हिस्सा निकालकर अगले दिन उषा अर्घ्य के बाद किसी गाय को खिलाएं। साथ ही सूर्य देव को अर्घ्य देते समय तांबे के लोटे में जल, रोली और थोड़ा गुड़ मिलाकर "ॐ सूर्याय नमः" मंत्र बोलते हुए अर्पित करें। यह उपाय आर्थिक बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है।
*टोटका 03: आरोग्य और नौकरी में सफलता के लिए
सात तरह के यूनिक प्रश्न और उसका उत्तर
*01. छठी मैया की सवारी कौन है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठी मैया की सवारी *बिल्ली* को माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवी षष्ठी को बिल्ली पर सवार बताया गया है। बिल्ली को उर्वरता, सतर्कता और गृह रक्षा का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह बिल्ली अपने बच्चों की रक्षा करती है, वैसे ही छठी मैया भी शिशुओं और बच्चों की रक्षक हैं। बिहार में कुछ लोक चित्रों में उन्हें मोर पर सवार भी दिखाया जाता है, क्योंकि मोर सूर्य के तेज और कार्तिकेय जी से जुड़ा है, पर शास्त्रीय मान्यता बिल्ली ही है।
*02. छठ माता की उत्पत्ति कैसे हुई थी?
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने स्वयं को दो भागों में विभाजित किया। उनके पुरुष भाग से पुरुष और स्त्री भाग से प्रकृति उत्पन्न हुईं। प्रकृति ने भी स्वयं को छह भागों में बांटा, जिसका छठा अंश षष्ठी देवी कहलाया। इसलिए इन्हें छठी मैया कहा जाता है। ये परमात्मा की मानस पुत्री और बालकों की अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें मातृका शक्ति भी कहा जाता है। भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को युद्ध में विजय दिलाने के लिए इन्हें देवसेना के रूप में प्रकट किया गया था।
*03. सबसे पहले छठ पूजा कहां से शुरू हुई थी और वह कहां है?
छठ पूजा के उद्गम को लेकर सबसे प्रबल मान्यता बिहार से जुड़ी है। माना जाता है कि इसका प्रारंभ *देव सूर्य मंदिर, औरंगाबाद, बिहार* से हुआ था। यह देश के सबसे प्राचीन सूर्य मंदिरों में से एक है। दूसरा मत है कि इसकी शुरुआत *मुंगेर के सीता-चरण और बड़गांव* क्षेत्र से हुई। रामायण काल में माता सीता ने मुंगेर में ही पहली बार सूर्य देव की आराधना की थी। महाभारत काल में अंग देश के राजा कर्ण, जो मुंगेर और भागलपुर के शासक थे, वो रोज गंगा में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। इसलिए इस क्षेत्र को छठ का मूल स्थान माना जाता है। आज भी यहां का गंगा घाट छठ के लिए सबसे पवित्र है।
*04. छठ पूजा सबसे पहले किसने शुरू की थी?
छठ पूजा को लेकर तीन प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार *राजा प्रियव्रत* और उनकी पत्नी मालिनी को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने उन्हें षष्ठी देवी की पूजा करने को कहा, जिससे उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई। तभी से यह व्रत शुरू हुआ। दूसरी कथा त्रेता युग की है, जब वनवास से लौटने के बाद *माता सीता* ने मुंगेर में सूर्य देव की पूजा कर पुत्र प्राप्ति का व्रत किया। तीसरी कथा द्वापर युग की है, जब *दानवीर कर्ण* ने सबसे पहले सूर्य देव की नियमित उपासना शुरू की और *द्रौपदी* ने पांडवों की रक्षा के लिए सूर्य षष्ठी का व्रत किया था। इसलिए छठ को सबसे पहले करने का श्रेय राजा प्रियव्रत को दिया जाता है।
*05. छठ पूजा का दूसरा नाम क्या है?
छठ पूजा को कई नामों से जाना जाता है। शास्त्रों में इसे *सूर्य षष्ठी व्रत, प्रतिहार षष्ठी और डाला छठ* कहा जाता है। क्योंकि यह व्रत कार्तिक और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है, इसलिए इसका नाम षष्ठी पड़ा, जो अपभ्रंश होकर छठ हो गया। बिहार में इसे *छठी मैया की पूजा* भी कहते हैं। चैत्र में होने के कारण इसे *चैती छठ* और कार्तिक में होने के कारण *कार्तिकी छठ* कहा जाता है। नहाय-खाय से शुरू होने के कारण इसे *नहाय-खाय पर्व* भी कहते हैं।
*06. सूर्य और छठी मैया के बीच क्या संबंध है?
शास्त्रों के अनुसार छठी मैया और सूर्य देव के बीच *भाई-बहन* का संबंध है। पौराणिक कथा के अनुसार छठी मैया सूर्य देव की बहन हैं। इसलिए छठ के दिन सूर्य देव की पूजा के साथ उनकी बहन षष्ठी देवी की भी पूजा की जाती है, ताकि भाई अपनी बहन का सम्मान रखे और भक्तों पर कृपा करे। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठी मैया सूर्य की शक्ति, यानी उनकी आभा हैं। बिना आभा के सूर्य अधूरे हैं। इसलिए सूर्य के साथ उनकी शक्ति के रूप में छठी मैया की आराधना करने से सूर्य देव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और संतान सुख देते हैं।
*07. छठी मैया किसकी पत्नी थीं?
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार छठी मैया भगवान शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र *भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं*। इनका वास्तविक नाम *देवसेना* है। जब तारकासुर के वध के लिए देवताओं ने कार्तिकेय को सेनापति बनाया, तो उन्हें देवसेना से विवाह का वरदान मिला। देवसेना ही षष्ठी देवी हैं। इन्हें देवताओं की सेना की रक्षिका और बालकों की माता भी कहा जाता है। इसलिए कार्तिकेय की पत्नी होने के कारण इन्हें देवसेना, स्कंद-पत्नी और षष्ठी मैया के नाम से पूजा जाता है। दक्षिण भारत में इन्हें मुरुगन की पत्नी के रूप में भी पूजा जाता है।
Disclaimer:
* डिस्क्लेमर - (सामान्य + टोटके का डिस्क्लेमर)
इस ब्लॉग/लेख में दी गई चैती छठ पूजा 2032 की तिथियां, मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत से जुड़ी सभी जानकारियां सनातनी पंचांग, विभिन्न धार्मिक वेबसाइटों, पंडितों और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। हमारा उद्देश्य केवल आपको सामान्य जानकारी और धार्मिक-सांस्कृतिक ज्ञान प्रदान करना है। स्थानीय पंचांग, सूर्योदय-सूर्यास्त के समय में अंतर और क्षेत्रीय परंपराओं के कारण तिथियों में एक दिन का मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए किसी भी व्रत को शुरू करने से पहले अपने स्थानीय पुरोहित या पंचांग से तिथि की पुष्टि अवश्य कर लें।
इस लेख में बताए गए टोटके, उपाय और मंत्र केवल ज्योतिषीय आस्था, लोक परंपरा और जनश्रुति पर आधारित हैं। ये किसी भी प्रकार की वैज्ञानिक या चिकित्सीय सलाह नहीं हैं। हम किसी भी टोटके या उपाय की 100% सफलता का दावा नहीं करते हैं। किसी भी उपाय को करने से पहले अपनी आस्था, विवेक और पारिवारिक परंपरा का पालन करें। यदि आपको कोई गंभीर स्वास्थ्य, आर्थिक या मानसिक समस्या है तो कृपया संबंधित विशेषज्ञ जैसे डॉक्टर, वित्तीय सलाहकार या मनोचिकित्सक से संपर्क करें।
यह ब्लॉग अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि भारतीय संस्कृति और लोक आस्था के महापर्व छठ के महत्व को समझाने का एक प्रयास है। इस लेख में दी गई जानकारी का उपयोग करने से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान के लिए लेखक या वेबसाइट जिम्मेदार नहीं होगी। पाठकों से अनुरोध है कि वे धर्म को श्रद्धा और पवित्रता के साथ मनाएं, स्वच्छता का ध्यान रखें और किसी भी जानकारी को अंतिम सत्य मानने से पहले स्वयं विवेक का प्रयोग करें।
