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कैसे हुआ जन्म महर्षि वेदव्यास का: जानें शिव पुराण के अनुसार

शिव पुराण में वर्णित महर्षि वेदव्यास के जन्म की कथा। जानें पराशर, सत्यवती, वेदव्यास की तपस्या और 18 पुराणों की रचना का रहस्य।

महर्षि वेदव्यास के जन्म की कथा बड़ा ही रोचक और ज्ञानवर्धक है। शिव पुराण में विस्तार से वेदव्यास के जन्म की कथा लिखा गया है। वेदव्यास जन्मते ही एक सुंदर नौजवान का रूप धारण कर लिए और मां की आज्ञा से तपस्या करने चल पड़े।

सूतजी ने शौनक जी से पूछें वेदव्यास के जन्म की कथा

शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार शौनक जी बोले हे सूत जी आप मुझे मुनि वेदव्यास की के जन्म की कथा सुनाइए। तब शौनक जी ने प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत जी बोले हैं कि शौनक जी एक दिन की बात है मूनि पराशर जी तीर्थ यात्रा करते हुए यमुना तट पर आ पहुंचे।

 मत्स्यगंधा पर पराशर मुनि मोहित हुए

उस समय मल्लाह भोजन कर रहा था। इसलिए  उसने अपनी पुत्री मत्स्यगंधा को आदेश दिया कि ऋषि पराशर को यमुना पार करके आ जाओ। मत्स्यगंधा पराशर जी को नाव पर बैठाकर यमुना पार ले जा रही थी। मत्स्यगंधा की सुंदरता देखकर पराशर मुनि जी उस पर मोहित हो गए।

 पराशर मुनि की कामवासना जाग गई

जैसे ही उन्होंने यमुनापार की पराशर मुनि ने उसका हाथ पकड़ लिया। तब मत्स्यगंधा ने ऋषि से कहा कि आप रात होने का इंतजार करें। ऋषि पराशर ने अपने योग माया से दिन को रात में बदल दिया। 

 मिलन के उपरांत मत्स्यगंधा ने तीन वर मांगे

दोनों का मिलन हुआ। मिलन के उपरांत मत्स्यगंधा काफी चिंतित हुईं। तब पराशर जी ने उसे वरदान मांगने को कहा।

पहला वर शरीर से गंध समाप्त

 मत्स्यगंधा ने कहा कि ऋषिवर मेरे शरीर से मत्स्य का गंध आती है। लोग मुझसे विवाह करना नहीं चाहते हैं। कृपा करके कुछ उपाय कीजिए कि मेरे शरीर से गंध समाप्त हो जाए।

दूसरा वर बदनामी से बचें

दूसरी बात हम गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इस प्रकार की घटना से बदनामी होगी। मेरे इस कर्म को मेरे माता-पिता सहित कोई भी ना जान सके।

 तीसरा वर तेजस्वी पुत्र हो

तीसरी बात मेरा कन्या धन भी ना जाए और मुझे आपके सामान तपस्वी और शक्तिशाली पुत्र की प्राप्ति हो। तब मत्स्यगंधा की बात सुनकर ऋषि पराशर बोले देवी जैसे आप चाहती हैं वैसा ही होगा और आज से आप मत्स्यगंधा की जगह सत्यवती नाम से प्रसिद्ध होगी। 

नाम सत्यवती हो, पुत्र विष्णु अंश हो

आपके घर से भगवान श्री हरि विष्णु का अंश उत्पन्न होगा। ऋषि पराशर इस प्रकार कह कर वहां चले गए। नियत समय पर सत्यवती ने सूर्य के समान महा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पुत्र जन्म लेते ही जवान हो गया। इसके बाद माता की आज्ञा लेकर पुत्र तपस्या करने चला गया और जाते समय उसने माता से कहा कि कोई भी कष्ट पड़ने पर मुझे अवश्य याद करना।

 जन्म लेते हैं पुत्र तपस्या करने चल पड़ा

सत्यवती अपने घर लौट आई। वह नौजवान  तपस्या में लीन हो गया। वेदों की शाखाओं का अध्ययन करने से उक्त नौजवान वेदव्यास के नाम से प्रसिद्ध हो गया। वेदव्यास तीर्थ स्थानों के भ्रमण के लिए निकल पड़े। 

मन में आया विचारा शिव आराधना से मिलेगा ज्ञान

तीर्थ यात्रा के दौरान एक शिवलिंग का उन्होंने दर्शन किए। दर्शन करने के पश्चात उनके मन में विचार आया कि कोई ऐसा सिद्धिदायक लिंग हो जिसकी आराधना और भक्ति करने से सब विद्या प्राप्त हो जाए और अभीष्ट फलों की प्राप्ति हो। यही सोचकर महर्षि वेदव्यास ध्यान मग्न हो गए। तभी उन्हें ज्ञात हुआ कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाली अतिमुक्त महाक्षेत्र में महेश्वर लिंग स्थापित है। 

वेदव्यास ने कठिन तपस्या आरंभ कर दी

वेदव्यास जी ने गंगा में स्नान करके कठिन व्रत आरंभ कर दिया। उन्होंने सबसे पहले भोजन त्याग दिया। वेदव्यास जी पहले फलाहारी कर पूजन करने लगे। फिर हवा को ग्रहण करते हुए अपना पूजन आरंभ किया। तत्पश्चात उन्होंने निराहार रहकर भगवान शिव की उत्तम तपस्या की।

 शिव जी ने वेदव्यास को दर्शन दिए

उनकी इस दुस्साहसी साधना से भगवान शिव प्रसन्न हुए और वेदव्यास जी को दर्शन दिए। देवाधिदेव महादेव को साक्षात अपने सामने पाकर वेदव्यास जी उनकी स्तुति करने लगें और बोल पड़े हे देवाधिदेव कल्याणकारी शिव आप मन और  वाणी से अगोचर हैं। वेद भी आप की महिमा को पूर्ण रूप से नहीं जानतें। 

आप ही सृष्टि के रचनाकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। हे सर्वशक्तिमान ईश्वर आप ही जन्म-मरण, देश, कुल आदि से रहित है। आप ही तीन लोक के स्वामी हैं। इस प्रकार व्यास जी ने शिवजी की स्तुति की। प्रसन्न हो भोले शिव जी बोले व्यास तुम मनचाहा वर मांगो। 

शिव जी ने मनचाहा वर दिया

तब व्यास जी बोले स्वामी आप तो सर्वज्ञ सर्वेश्वर हैं। आपसे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। तब त्रिलोकीनाथ भगवान शिव भोले मुनिवार मैं तुम्हें कंठ में स्थित होकर तुम्हारी इच्छा के अनुसार इतिहास एवं महा पुराणों की रचना करूंगा।

 स्तुति अष्टक के जाप से सभी कार्य होंगे पूर्ण

तुम्हारे द्वारा प्रयोग में लाए गए स्तुति अष्टक का जो भी शिवलिंग के सामने बैठकर एक वर्ष तक, तीनों काल में मेरी स्तुति करेगा। उसकी सभी तरह के मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। यह कहकर महादेव अंतर्धान हो गए।

 वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना

भगवान शिव की कृपा से वेदव्यास जी ने ब्रह्मा, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, भविष्य, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिंगवाराह, कूर्म, मत्स्य, गरूड़, बामन, ब्रह्मांड, अग्नि, लिंग आदि 18 महा पुराणों की रचना की। यह सभी पुराण  यश देने वाले हैं। इनको श्रद्धा पूर्वक भक्ति भावना से पढ़ने अथवा सुनने से मुक्ति प्राप्त होती है तथा समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्लॉग के अनसुलझे पहलू 

आपकी कथा मुख्यतः शिव पुराण पर आधारित है, लेकिन कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर अलग-अलग पुराणों में मतभेद है। 

पहला, वेदव्यास के जन्म के तुरंत बाद जवान होकर तपस्या करने जाने की बात शिव पुराण में मिलती है, जबकि महाभारत और देवी भागवत में बताया गया है कि वे कुछ समय तक माता सत्यवती के साथ रहे और बाद में संन्यास लिया।

दूसरा, वेदव्यास को अविवाहित कहा जाता है। आपने पत्नी का जिक्र नहीं किया जो सही है, लेकिन उनके नियोग से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर की उत्पत्ति हुई। इस प्रसंग को आपने छोड़ा है।

तीसरा, 18 पुराणों की रचना का श्रेय सभी पुराण वेदव्यास को देते हैं, पर शिव जी से स्तुति अष्टक पाकर रचना करने वाली कथा केवल शिव पुराण में विस्तार से है। अन्य पुराणों में इसे ब्रह्मा की प्रेरणा बताया गया है।

चौथा, वेदव्यास को विष्णु का अंश कहा गया है। वे विष्णु के 17वें अवतार माने जाते हैं। इस अवतारवाद को और स्पष्ट किया जा सकता था। 

 पांच सवालों और उसका जवाब 

*1. वेदव्यास की कितनी पत्नियां थीं और कितने पुत्र कौन थे*  

महर्षि वेदव्यास ने विवाह नहीं किया था। वे आजीवन ब्रह्मचारी रहे। फिर भी धर्म रक्षा के लिए उन्होंने नियोग किया। हस्तिनापुर के राजा विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद उनकी दो पत्नियों अंबिका और अंबालिका और एक दासी से वेदव्यास ने संतान उत्पन्न की। इससे धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म हुआ। इसके अलावा उनकी पत्नी जैसी कोई नहीं थी। अरणी नामक स्त्री से उन्हें पुत्र शुकदेव प्राप्त हुए, जो उनके सबसे प्रिय शिष्य और भागवत के वक्ता बने।

*2. वेदव्यास के माता-पिता कौन थे और पहला नाम क्या था*  

वेदव्यास के पिता महर्षि पराशर और माता सत्यवती थीं। सत्यवती का पहला नाम मत्स्यगंधा था। वे एक मल्लाह की पुत्री थीं। यमुना तट पराशर मुनि से मिलन के बाद उनका नाम सत्यवती पड़ा। वेदव्यास का जन्म एक द्वीप पर हुआ था इसलिए उनका पहला नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा। कृष्ण का अर्थ काला रंग और द्वैपायन का अर्थ द्वीप में जन्मा। बाद में वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास कहलाए।

*3. वेदव्यास जी के गुरु कौन थे*  

वेदव्यास के औपचारिक गुरु उनके पिता पराशर मुनि थे। पराशर से ही उन्होंने वेद और शास्त्रों का ज्ञान पाया। आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। शिव पुराण के अनुसार शिव जी ने उन्हें इतिहास और पुराण रचना का वरदान दिया। शुकदेव, सुमंतु, जैमिनी, पैल जैसे शिष्य बाद में उनके शिष्य बने।

*4. महर्षि वेदव्यास किसके अवतार थे*  

पुराणों के अनुसार वेदव्यास भगवान विष्णु के 17वें अवतार हैं। हर युग में धर्म की स्थापना के लिए विष्णु वेदव्यास के रूप में अवतरित होते हैं और वेदों को शाखाओं में विभाजित करते हैं। द्वापर युग में कृष्ण द्वैपायन के रूप में उन्होंने यही कार्य किया। इसीलिए उन्हें अंशावतार भी कहा जाता है।

*5. व्यास जी की वंशावली क्या है*  

वंश इस प्रकार है। ब्रह्मा > मरीचि > कश्यप > शक्ति > पराशर > कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास। वेदव्यास से शुकदेव हुए। शुकदेव से कोई संतान नहीं मानी जाती क्योंकि वे भी ब्रह्मचारी थे। राजवंश की तरफ से वेदव्यास के नियोग से कौरव और पांडव वंश चले। इस तरह वे कौरव और पांडव दोनों के परदादा हुए।

 डिस्क्लेमर

यह लेख पूरी तरह धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से शिव पुराण, महाभारत और अन्य पुराणों में वर्णित कथाओं पर आधारित है। हिंदू धर्म में कथाओं के कई संस्करण और परंपराएं प्रचलित हैं। एक ही प्रसंग अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय मान्यताओं में थोड़े बहुत अंतर के साथ मिलता है। 

इस ब्लॉग का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि ज्ञान और भक्ति को साझा करना है। यहां दी गई जानकारी को अंतिम सत्य न मानें। यदि आप किसी विशेष अनुष्ठान, व्रत या पाठ करना चाहते हैं तो अपने कुलगुरु या स्थानीय विद्वान से सलाह अवश्य लें।

लेख में दिए गए नाम, तिथि, वंशावली और घटनाएं शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर लिखी गई हैं। फिर भी मानव त्रुटि की संभावना हो सकती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे श्रद्धा और विवेक दोनों के साथ पढ़ें।

यह ब्लॉग शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दिए गए विचार लेखक के अध्ययन और समझ पर आधारित हैं। किसी भी प्रकार के धार्मिक मतभेद या विवाद की स्थिति में शास्त्र और गुरु वाणी को प्रमाण माना जाए। 

आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है। कथा पढ़ने के बाद आपके मन में जो विचार आएं उन्हें ईमेल के माध्यम से साझा करें।


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