विजया एकादशी 2030: फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अद्भुत संयोगों वाली महाविजय
विजया एकादशी 2030 28 फरवरी, गुरुवार को फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष में मनाई जाएगी, जो अपने साथ बसंत ऋतु और उत्तरायण का दिव्य संयोग लेकर आ रही है।
इस बार एकादशी तिथि 27 फरवरी दोपहर 3:19 बजे से आरंभ होकर 28 फरवरी दोपहर 2:04 बजे तक रहेगी, जिससे व्रतियों को पूर्ण दिन का लाभ मिलेगा। सूर्य कुंभ राशि में व चंद्रमा धनु (शाम 6:28 बाद मकर) में होंगे, जबकि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र दोपहर 12:35 तक शुभ फल देगा।
दिनमान 11 घंटा 40 मिनट का रहेगा। चंद्रोदय प्रातः 3:44 बजे होगा, जो रात्रि जागरण को विशेष बनाएगा। इस दिन भगवान विष्णु की चारों पहर पूजा का विधान है, और दशमी को एक ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करने का नियम है।
यह दुर्लभ संयोग व्रत को और भी फलदायी बनाते हैं, क्योंकि विजया एकादशी स्वयं में विजय दिलाने वाली है, और उत्तरायण-बसंत का योग आध्यात्मिक ऊर्जा को चरम पर पहुंचाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए जप-तप व पूजा से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सफलता के नए द्वार खुलते हैं।
विजया एकादशी 28 फरवरी 2030, दिन गुरुवार, फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, एकादशी तिथि को विजया एकादशी मनाई जाएगी।
27 फरवरी दिन शुक्रवार को दिन के 03:19 बजे से शुरू होकर 28 फरवरी दिन गुरुवार दोपहर 02:04 बजे तक एकादशी तिथि रहेगी।
विजया एकादशी के दिन कैसा रहेगा जानें पंचांग के अनुसार
विजया एकादशी के दिन ऋतु बसंत, आयन उत्तरायण, तिथि एकादशी, नक्षत्र पूर्वाषाढ़ दोपहर 12:35 बजे तक, योग व्यतीपात रात के 08:04 बजे तक रहेगा।
विजया एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु की चारों पहर पूजा करने का विधान है। जो व्यक्ति विजया एकादशी व्रत करना चाहता है उसे व्रत के एक दिन पहले यानी दशमी के दिन एक बार ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए।
विजया एकादशी के दिन लें संकल्प
विजया एकादशी के दिन सबसे पहले व्रत का संकल्प लें। इसके बाद धूप, मौसमी फल, घी एवं पंचामृत आदि से भगवान भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
विजया एकादशी की रात जग्गा करना अर्थात रातभर सोना नहीं चाहिए। सिर्फ भगवान का भजन कीर्तन एवं सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। रात्रि जागरण करना काफी शुभ और फलदाई होता है।
द्वादशी अर्थात पारण के दिन भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान है। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर लोगों के बीच प्रसाद वितरण करना चाहिए। प्रसाद वितरण के बाद ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। अपने क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देना चाहिए। अंत में स्वयं भोजन कर उपवास खोलना चाहिए।
पूजा सामग्रियों की सूची जानें
विजया एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
चरण 1: दशमी तिथि को कलश स्थापना
स्वर्ण, चांदी, तांबा या मिट्टी के कलश में जल, अक्षत, सुपारी और पंचपल्लव रखें । कलश को सात अनाजों के ढेर पर स्थापित करें और ऊपर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखें ।
चरण 2: एकादशी प्रातः स्नान एवं संकल्प
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें । व्रत धारण करने का संकल्प लें ।
चरण 3: भगवान विष्णु की पूजा
पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें । तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, धूप, दीप, फल, नारियल और नैवेद्य (खीर या मीठा भोजन) अर्पित करें ।
चरण 4: मंत्र जाप एवं कथा पाठ
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जाप करें । विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और विजया एकादशी कथा अवश्य सुनें या पढ़ें ।
चरण 5: रात्रि जागरण एवं द्वादशी पारण
रात्रि में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें । अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद निर्धारित पारण मुहूर्त (14 फरवरी सुबह) में व्रत खोलें । पारण से पहले दान-दक्षिणा देना अत्यंत लाभकारी है ।
विजय एकादशी की पौराणिक कथा
धर्मराज युधिष्ठिर बोले - हे श्रीहरि! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले एकादशी व्रत का क्या नाम है। व्रत करने की क्या है विधि ? कृपा करके आप मुझे विस्तार से बताइए।
श्रीहरि बोले हे धर्मराज - फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का नाम विजया एकादशी व्रत है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को हर काम में सफलता और विजय प्राप्त होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत कहलाता है।
इस विजया एकादशी के महात्म्य श्रवण करने और पठन-पाठन से सभी तरह के पाप नाश हो जाते हैं। एक समय देवर्षि नारदजी ने ब्रह्माजी से कहा हे पिताश्री ! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी व्रत कथा और पूरे विधान विस्तार से बताइए।
यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी सहित पंचवटी में निवास करने लगे।
वहां पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण बहुत ज्यादा व्याकुल हुए और माता सीताजी की खोज में चल पड़े।
श्री राम और लक्ष्मण वन में घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुंचे तो जटायु उन्हें सीताजी को रावण द्वारा हरण करने की वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। इसके बाद श्री राम और लक्ष्मण का सुग्रीव और हनुमान जी से मिलने के बाद मित्रता हुई। तत्पश्चात श्री राम ने बाली का वध कर दिए।
हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की मित्रता का वर्णन किया। वहां से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।
श्री रामजी ने वानरों की सेना सहित, हनुमान, लक्ष्मन और सुग्रीव की सारी सेना को लेकर से लंका जाने के लिए प्रस्थान किया। जब श्री राम समुद्र से किनारे पहुंचे तब उन्होंने मगरमच्छ सहित भयानक जीव-जंतुओं से भरा उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी चिंतित होकर कहा कि हे भ्राताश्री इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे।
लक्ष्मण जी ने उपाय बताते हुए श्री राम प्रभु से कहा कि हे पुरुषोत्तम, आप श्रृष्टि निर्माता और आदि पुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। आप से कुछ छिपा नहीं है। यहां से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के ऋषि रहते हैं। उन्होंने अनेकों ब्रह्मा को देखे हैं, आप उनके पास जाकर समुद्र पार करने का उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामजी वकदालभ्य ऋषि के आश्रम में जाकर उनको श्राद्ध पूर्वक प्रणाम करके बैठ गए।
मुनि वकदालभ्य ने उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए मर्यादा पुरुषोत्तम समझकर श्री राम से पूछा कि हे राम! आपका यहां आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहा कि हे ऋषि वकदालभ्य ! मैं अपनी सेना सहित आप के आश्रम आया हूं और रामण सहित राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूं। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई रास्ता या उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके आश्रम में आया हूं।
वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उत्तम व्रत विधि विधान से करने पर निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप और आपकी पूरी सेना समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।
इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का एक बड़ा घड़ा बनाएं। उस घड़े को जल से भरकर तथा पांच आम का पल्लव रख, वेदी पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सात तरह के अनाज और घड़े के ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीहरि भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। विजया एकादशी के दिन स्नानादि कर नूतन वस्त्र धारण कर, सभी कार्यों से निवृत्त होकर नैवेद्य, नारियल, धूप, दीप, अक्षत, फल आदि से भगवान की पूजा करें। तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
इसके बाद व्रत रखकर घड़े के समक्ष बैठकर दिन भर व्रत का पालन करें और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठकर श्रीहरि के नामों का जाप कर जागरण करें।
द्वादशी तिथि के दिन विधि विधान और नियम से पूजन कर उस घड़े को ब्राह्मण को दान दे दें। ऋषि वकदालभ्य ने कहा कि हे राम! यदि तुम भी इस विजया एकादशी व्रत को सेनापतियों ओर प्रिय जनों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय निश्चित होगी। श्री राम ने ऋषि वकदालभ्य के कहे अनुसार इस व्रत को श्रीराम अपने इस वंधुओ के साथ पूरे विधि विधान किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई।
नारदजी से ब्रह्माजी ने कहा था कि हे पुत्र नारद! जो कोई जातक इस विजया एकादशी व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, वैसे प्राणियों को वाजपेई यज्ञ करने जैसा फल प्राप्त होता है।
विजया एकादशी: पांच विशिष्ट प्रश्न और उनके उत्तर
1. विजया एकादशी का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह व्रत त्रेतायुग से जुड़ा है जब भगवान राम ने लंका पर विजय पाने से पहले यह व्रत किया था । समुद्र पार करने का मार्ग न मिलने पर ऋषि बकदाल्भ्य के निर्देश पर उन्होंने यह एकादशी रखी और रावण पर विजय प्राप्त की ।
2. 'विजया' नाम का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
'विजया' का शाब्दिक अर्थ 'विजय' है । यह नाम इस व्रत की वह शक्ति दर्शाता है जो भक्तों को जीवन की बाधाओं पर विजय, आंतरिक शक्ति और नकारात्मकताओं पर सफलता प्रदान करती है ।
3. विजया एकादशी में कलश स्थापना का क्या विशेष महत्व है?
दशमी को स्वर्ण, चांदी, तांबा या मिट्टी के कलश की स्थापना की जाती है । इसमें जल, पंचपल्लव, अक्षत, सुपारी रखकर ऊपर सात अनाजों के ढेर पर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करते हैं । द्वादशी को यह कलश विद्वान ब्राह्मण को दान किया जाता है ।
4. विजया एकादशी व्रत किन पापों का नाश करता है?
5. क्या इस व्रत की शुरुआत विजया एकादशी से कर सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार किसी भी व्रत की शुरुआत शुक्ल पक्ष से करना शुभ माना जाता है । इसलिए विजया एकादशी (कृष्ण पक्ष) से व्रत प्रारंभ करने की बजाय आमलकी एकादशी (शुक्ल पक्ष) से शुरू करने की सलाह दी जाती है ।
