- तिथि: 04 सितंबर 2027, दिन शनिवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी व्रत है ।
- पर्व का स्वरूप: इस दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान श्रीगणेश की मिट्टी की प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है।
04 सितंबर 2027 को सर्वार्थ सिद्धि योग में मनाएं गणेश चतुर्थी। जानें मूर्ति स्थापना, सटीक पूजा विधि, नियम, खास उपाय और इसके अनसुने रहस्य।
शुभ योगों के महासंगम में गणेश चतुर्थी 2027: जानें स्थापना और पूजन का विशेष महत्व
04 सितंबर 2027, दिन शनिवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का पावन पर्व गणेश चतुर्थी अपार श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। इस वर्ष का यह पर्व बेहद खास है, क्योंकि इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का दुर्लभ महासंयोग बन रहा है।
इस शुभ मुहूर्त में की गई पूजा-अर्चना से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होंगे और जीवन के सारे संकट दूर होंगे। इस दिन घर-घर और सार्वजनिक भव्य पंडालों में गजानन की मिट्टी की सुंदर प्रतिमाओं की स्थापना की जाएगी।
विधि-विधान से प्रथम पूज्य का आह्वान कर 10 दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव की शुरुआत होगी। यह पर्व न केवल रिद्धि-सिद्धि लाने वाला है, बल्कि सर्वार्थ सिद्धि योग में गणपति की आराधना से साधक को यश, कीर्ति और अपार समृद्धि की प्राप्ति होती है।
नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर
*चांद देखना जरूरी, जानें उचित समय?
*पूजा सामग्री की सूची?
*पंचांग के अनुसार कैसा रहेगा दिन?
*अब जाने पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त?
*विवाह समारोह में गणेशजी का न जाना बना संकट?
*देवतागण पत्नी सहित पहुंचे समारोह में?
*विवाह में ना पूछने का कारण गणेश जी ने किया ज्यादा भोजन?
*गणेश बने घर का रखवाला?
*नारदजी ने गणेशजी को भड़काया?
*चूहों की सेना ने रास्ते में खोदें गड्ढें?
रथ के चक्के फस गए गड्ढें में?
*लोहार ने किया गणेश जी का स्मरण?
*गणेश जी के गुणगान करतें देवता चले समारोह से?
गणेश चतुर्थी जो मांगा सो मिला
इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र और सुखी और समृद्धि की कामना कर भगवान गणेश से आराधना और पूजा करती हैं।
चतुर्थी व्रत निर्जला रखने का विधान है अर्थात व्रत के दौरान जल और अन्न कुछ भी ग्रहण नहीं कर सकते हैं।
साल में बारह चतुर्थी व्रत आते हैं। सभी व्रतों का अपना-अपना महत्व है। उसी प्रकार अगहन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी का अपना खास महत्व है।
व्रत में उपवास और कथा पढ़े बिना अधूरा माना जाता है। चतुर्दशी व्रत कथा जानें विस्तार से ?
सनातनी पंचांग के अनुसार पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चतुर्थी कहा जाता है इस संकट चौथ भी कहा जाता है इस तिथि को विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की विधि पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है।
भक्त सूर्योदय से चंद्रोदय तक प्रथम पूज्य गजानंद की भक्ति भाव से आराधना और पूजा करते हैं।
इसके बाद व्रत करने का संकल्प लेकर गणेश जी की पूजा अर्चना शुरू करें। भगवान गणेश को जल, अक्षत, रोली, मोदक, दुर्वा और पंचामृत समर्पित करें।
इस दिन अगर आप तिल का लड्डू का भोग लगाएं तो श्रीगणेश जल्द प्रसन्न होंगे। इसके उपरांत पूजन कर संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा सुनें। उसके बाद गजानन की आरती कर, प्रसाद वितरण करें।
04 सितंबर 2027, दिन शनिवार भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि रात 12:25 बजे तक रहेगा। नक्षत्र चित्रा दिन के 02:49 बजे तक इसके बाद स्वाति नक्षत्र हो जायेगा। प्रथम करण बिष्टि/ भद्रा दिन के 12:25 बजे तक और द्वितीय करण बव है। योग शुक्ल है। शुभ योग संपूर्ण रात्रि रहेगा।
अब जाने पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त
विजय मुहूर्त दिन के 01:49 बजे से लेकर 02:40 बजे तक रहेगा। उसी प्रकार गोधूलि मुहूर्त शाम 06:00 बजे से लेकर 06:23 बजे तक, सायाह्य सांध्य मुहूर्त शाम 06:00 बजे से लेकर 07:09 बजे तक, निशिता मुहूर्त रात्रि 11:21 बजे से लेकर 12:07 बजे तक, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 03:57 बजे से लेकर 04:43 बजे तक और प्रातः संध्या मुहूर्त सुबह 04:20 बजे से लेकर 05:28 ऊ तक रहेगा।
चौघड़िया पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त इस प्रकार है। सुबह 07:02 बजे से लेकर 08:36 बजे तक शुभ मुहूर्त रहेगा। उसी प्रकार चर मुहूर्त दिन के 11:44 बजे से लेकर 01:18 बजे तक लाभ मुहूर्त 01:18 बजे से लेकर 02:52 बजे तक और अमृत मुहूर्त 02:52 बजे से लेकर 04:26 बजे तक रहेगा। संध्या समय लाभ मुहूर्त 6:00 बजे से लेकर 07:24 बजे तक रहेगा।
गणेश चतुर्थी पूजा विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)
*स्थान शुद्धि व संकल्प: प्रातः स्नान के बाद उत्तर या पूर्व दिशा में लकड़ी की चौकी पर लाल/पीला कपड़ा बिछाएं और पूजन का संकल्प लें।
*प्रतिमा स्थापना: मिट्टी की गणेश प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें। गंगाजल से छिड़काव कर 'ॐ गं गणपतये नमः' का जाप करें।
*आह्वान व प्राण प्रतिष्ठा: दीपक और धूप प्रज्वलित करें। अक्षत और पुष्प हाथ में लेकर गणपति का आह्वान करें।
*षोडशोपचार पूजन: प्रतिमा पर रोली, चंदन, हल्दी, सिंदूर, मोली और दूर्वा अर्पित करें। गणेश जी को लाल फूल और शमी के पत्ते विशेष प्रिय हैं।
*नेवेद्य व मोदक अर्पण: भगवान को 21 मोदक या बेसन के लड्डू, ऋतुफल और पान-सुपारी का भोग लगाएं।
*आरती व क्षमा प्रार्थना: अंत में गणेश जी की आरती गाएं, कपूर जलाएं और अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा मांगें।
क्या करें, क्या न करें और आहार नियम
क्या करें
*आचरण व नियम इको-फ्रेंडली (मिट्टी की) प्रतिमा ही स्थापित करें।
*गणपति को प्रतिदिन 21 दूर्वा चढ़ाएं।
*घर में शांति और सात्विक माहौल बनाए रखें।
क्या न करें
*चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन भूलकर भी न करें (कलंक दोष से बचने हेतु)।
*चमड़े की वस्तुओं को पहनकर पूजा न करें।
क्या खाएं
*खान-पान नियम• मोदक, लड्डू, मखाना, साबूदाना, सेंधा नमक का सेवन करें।
*फलाहार, नारियल पानी और सात्विक भोजन ग्रहण करें।• प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा से पूर्णतः परहेज करें।
क्या न खाएं
*बासी या बचा हुआ भोजन गणपति को न चढ़ाएं।
*मांस मदिरा का सेवन न करें
*झूठ न बोले और निंदा न करें
लकड़ी का स्टैंड, भगवान गणेश की एक प्रतिमा, सावा मीटर लाल कपड़ा, जनेऊ (जोड़ा) कलश (तांबे या पीतल का बर्तन), नारियल, पंचामृत (दूध, दही, गुड़, मधु और घी का मिश्रण), पांच प्रकार के सूखे मेवे अर्थात पंचमेवा गंगा जल, रोली, पवित्र लाल धागा, चंदन, चावल, पवित्र घास अर्ऊ दुर्वा, कलावा, इलायची, लौंग, सुपारी, घी, कपूर, मोदक अर्थात दुर्वा और हवन सामग्री।
चांद देखना जरूरी, जानें उचित समय
संकष्टी गणेश चतुर्थी, व्रत और पौराणिक कथा जानें
संकष्टी चतुर्दशी व्रत कथा इस प्रकार है। एक समय की बात है भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विवाह कि तैयारियां चल रही थी। उसमें सभी देवताओं को आमंत्रण पत्र भेजा गया। लेकिन विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य गणेश जी को आमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया।
सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह में भाग लेने आए। लेकिन विवाह समारोह में भगवान गणेश की उपस्थित नहीं देखकर देवताओं ने गणेश जी को नहीं आने का कारण भगवान विष्णु से पूछा।
गणेश जी को सावा मन चावल, सावा मन आटा और सवा मन लड्डू का भोग दिन भर में चाहिए। अगर गणेश जी समारोह में नहीं आए तो बहुत ही अच्छा होगा। दूसरों के घर जाकर इतना सारा भोजन कराना ठीक नहीं है।
इसी दौरान किस देवता ने कहा कि गणेश जी अगर आए तो उनको घर के देखभाल की जिम्मेदारी दी जा सकती है इससे कहा जा सकता है कि आप चूहे पर चढ़कर जाएंगे, तो बारात आगे निकल जाएगी और आप पीछे रह जाएंगे। ऐसे में आप घर की देखभाल करें।
योजना के अनुसार विष्णु जी ने निमंत्रण पर गणेश जी उपस्थित हो गए। उन्होंने घर के देखभाल की जिम्मेदारी दे दी गई।
बारात घर से निकल गया। गणेश जी दरवाजे पर ही बैठ गए या यूं कहें कि बैठे थे। भगवान गणेश को बैठा देखकर नारदजी ने द्वार पर बैठने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि विष्णु भगवान ने उनका अपमान किया है। तब नाराज गणेश जी को नारदजी को एक सुझाव दिया।
गणपति ने सुझाव के तहत अपने चूहों की सेना बरात के आगे भेज दी। जिसने पूरे रास्ते खोद दिए। उसके फलस्वरूप देवताओं के रथों का पहिए मिट्टी में धस गए।
बरात आगे नहीं जा पा रही थी। किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। अब क्या किया जाए। तब देवताओं ने गणेश जी को बुलाने का सुझाव दिया ताकि देवताओं के विध्न को दूर कर सकें।
भगवान शिव के आदेश पर नंदी गजानन को लेकर आए। गणेश जी के आने पर देवताओं ने भगवान गणेश का पूजन किया। तब जाकर पहिया गड्ढे से निकल गए। लेकिन कई पहिया टूट गए थे। उस समय पास एक गांव में लोहार काम कर रहा था। उस लोहार को बुलाया गया।
उसने अपना काम शुरू करने से पहले गणेश जी का मन ही मन श्रमण किया और देखते ही देखते सभी रथों के पहिए ठीक हो कर दिया। उस लोहार ने कहा कि लगता है आप सभी ने शुभ काम करने से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा नहीं की, इसलिए ऐसा संकट आया है।
गणेश चतुर्थी के चार प्रमुख पहलू
*01.आध्यात्मिक पहलू: गणेश जी मूलधार चक्र के अधिष्ठाता देव हैं। उनकी उपासना से साधक की चेतना जागृत होती है और बुद्धि तथा विवेक का संतुलन बनता है।
*02.वैज्ञानिक पहलू: वर्षा ऋतु के अंत में मिट्टी की मूर्तियों को नदियों में विसर्जित करने की परंपरा से जल स्रोतों का पुनर्भरण होता था। दूर्वा और तुलसी जैसी औषधियों का पूजन स्वास्थ्य सुरक्षा और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।
*03.सामाजिक पहलू: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत कर समाज के सभी वर्गों को एक मंच पर लाकर एकजुट करने का सामाजिक कार्य किया था।
*04.आर्थिक पहलू: यह पर्व लाखों मूर्तिकारों, सजावट कारीगरों, फूल-फल विक्रेताओं और स्थानीय व्यापारियों के लिए आजीविका का बड़ा साधन बनता है, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
गणेशोत्सव के अनसुलझे और रहस्यमयी पहलू
गणेश चतुर्थी से जुड़ा सबसे बड़ा अनसुलझा रहस्य 'चंद्र दर्शन दोष' (स्यामंतक मणि की कथा) है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा को देखने पर व्यक्ति पर झूठा कलंक लगता है। पौराणिक और खगोलीय दृष्टि से भाद्रपद चतुर्थी को चंद्रमा का कोण मानव मस्तिष्क में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने वाला माना गया है।
इसके अलावा, गणेश जी का गजमुख (हाथी का सिर) धारण करना प्राचीन भारतीय शल्य चिकित्सा (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) के गूढ़ ज्ञान का प्रतीक है या केवल एक आध्यात्मिक रूपक, यह आज भी शोधकर्ताओं के बीच कौतूहल का विषय है। प्राचीन काल में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक गणेश जैसी आकृतियों का मिलना भी उनके सर्वव्यापी स्वरूप के रहस्यों को दर्शाता है।
गणेश चतुर्थी के तीन विशेष उपाय (टोटके)
*01.धन-समृद्धि हेतु: गणेश चतुर्थी के दिन 5 साबुत हल्दी की गाठें और 11 मोदक गणपति को अर्पित करें। पूजा के बाद हल्दी को पीले कपड़े में बांधकर तिजोरी में रख दें।
*02.कार्य बाधा मुक्ति हेतु: 21 दूर्वा की पत्तियां लें, उन पर लाल चंदन लगाएं और 'ॐ वक्रतुंडाय नमः' बोलते हुए गणेश जी के मस्तक पर चढ़ाएं।
*03.विद्या और एकाग्रता हेतु: अध्ययन कक्ष में गणेश जी की हरी प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और रोज सुबह उन्हें एक छोटी इलायची चढ़ाकर प्रसाद रूप में खाएं।
गणेश चतुर्थी: पांच अनूठे प्रश्न और उत्तर
प्र.*01: गणेश जी को केवल दूर्वा (दूब घास) ही क्यों चढ़ाई जाती है?
उ: पौराणिक कथा के अनुसार, अनलासुर नामक दैत्य को निगलने के बाद गणेश जी के पेट में तेज जलन होने लगी थी। तब ऋषियों ने उन्हें दूर्वा खाने को दी, जिससे उनके शरीर की दाह शांत हुई। तब से उन्हें दूर्वा प्रिय है।
प्र.*02: वर्ष 2027 में शनिवार को गणेश चतुर्थी आने का क्या ज्योतिषीय महत्व है?
उ: शनिवार के दिन सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग के साथ चतुर्थी का आना शनि दोष और ढैय्या से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। इस दिन गणेश पूजन से शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है।
प्र.*03: गणेश विसर्जन की परंपरा के पीछे क्या दर्शन है?
उ: विसर्जन यह सिखाता है कि जो आकार लेता है, उसे अंततः निराकार में लीन होना पड़ता है। यह सृष्टि के नश्वरता और पुनर्जन्म के चक्र का प्रतीक है।
प्र.*04: स्यांतक मणि की कथा का गणेश चतुर्थी से क्या संबंध है?
उ: भगवान श्रीकृष्ण पर स्यामंतक मणि चोरी का झूठा आरोप लगा था, क्योंकि उन्होंने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देख लिया था। बाद में उन्होंने गणेश व्रत रखकर अपने निष्कलंक होने का प्रमाण पाया था।
प्र.*05: गणेश जी का एक दांत टूटा हुआ (एकदंत) क्यों है?
उ: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत ग्रंथ बोलते समय कलम टूट जाने पर गणेश जी ने अपना एक दांत तोड़कर उसे लेखनी बना लिया था ताकि लेखन न रुके।
अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख में दी गई समस्त जानकारियां, तिथियां, शुभ योग, पूजा विधि, नियम, वैज्ञानिक-सामाजिक पहलू और पारंपरिक उपाय (टोटके) धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं, ज्योतिषीय गणनाओं और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। यह सामग्री केवल पाठकों की जानकारी, सांस्कृतिक जागरूकता और धार्मिक रुचि के लिए प्रस्तुत की गई है।
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