दशहरा के दिन महा सप्तमी महा अष्टमी और महा नवमी की पूजा एक साथ करने की क्या है विधि। साथ में रंजीत के ब्लॉग पर पढ़ें नवरात्रा में मां भवानी की नौ रूपों की 09 दिनों तक विधि विधान से और वैदिक मंत्रों के बीच से पूजा अर्चना करने का विधान।
अगर कोई व्यक्ति 09 दिनों तक व्रत रखने में कठिनाई महसूस करता है। वैसी स्थिति में उसे सिर्फ महासप्तमी, महाष्टमी और महानवमी की व्रत रखें और पूरे विधि विधान से करें। 09 दिनों तक चलने वाले व्रत का फल उसे प्राप्त हो जाता है।
मां भगवती की पूजन क्यों करनी चाहिए
मां भगवती को पूजन करने से चारों प्रकार के पुरुषार्थ मनुष्य को प्राप्त होता है। मसलन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति मनुष्यों को भगवती का अनुष्ठान और पूजा करने से मिलते हैं।
महासप्तमी पूजा विधि (कलश स्थापना और नवपत्रिका प्रवेश)
नव पत्रिका प्रवेश (कोला बौ): सप्तमी की सुबह नौ तरह की पत्तियों (जैसे केला, हल्दी, बेल, अशोक आदि) को मिलाकर एक 'नव पत्रिका' बनाई जाती है। इसे गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और गणेश जी के बगल में स्थापित किया जाता है।
षोडशोपचार पूजा: मां को गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें। इस दिन माँ कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
महाआरती: पूजा के अंत में कपूर से आरती करें और पुष्पांजलि अर्पित करें।
अष्टमी का दिन मां गौरी का दिन है, जिनके बारे में कहा जाता है जो व्यक्ति अष्टमी के दिन अगर दिल से मां को पुकारता है, तो मां भवानी तुरंत अपने भक्त की पीड़ा दूर करती हैं।
महानवमी पूजा विधि (सिद्धिदात्री पूजा और पूर्णता)
महानवमी नवरात्रि का अंतिम दिन होता है, जिसमें माँ 'सिद्धिदात्री' की पूजा की जाती है।
महास्नान और शुद्धि: नवमी के दिन सुबह स्नान के बाद साफ़ वस्त्र धारण करें और माँ की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएँ (यदि संभव हो)।
हवन (सबसे महत्वपूर्ण): महानवमी पर हवन का विशेष विधान है। आम की लकड़ी, कपूर, घी, और सामग्री के साथ 'दुर्गा सप्तशती' के मंत्रों द्वारा आहुति दें। "ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः" का जाप करते हुए आहुति देना फलदायी है।
कन्या पूजन (कुमारी पूजा): कई लोग अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं, लेकिन महानवमी पर कन्या पूजन करना पूर्णता का प्रतीक है। 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोएं, उन्हें हलवा-पूरी और चने का भोग खिलाएं और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें।
क्षमा प्रार्थना और विसर्जन: पूजा के अंत में अनजाने में हुई गलतियों के लिए मां से क्षमा मांगें। यदि आपने कलश स्थापित किया है, तो उसके जल का पूरे घर में छिड़काव करें।
विशेष सुझाव: पूजा के दौरान मन को शांत रखें और सात्विक भोजन का ही सेवन करें। विस्तृत मार्गदर्शन के लिए आप अपने स्थानीय पंडित जी से संपर्क कर सकते हैं।
सिद्धिदात्री मां को शतावरी और नारायणी कहते हैं
महानवमी मां सिद्धिदात्री का दिन होता है। मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप को शतावरी और नारायणी भी कहा जाता है। जो शक्ति का पर्याय हैं। मां के इन दोनों रूप की पूजा करने वाले को कभी भी कोई कष्ट और अकाल मृत्यु नहीं होता हैं। वैसे मनुष्य हमेशा खुश, निरोग और संपन्न रहते है। मां भगवती अपने भक्त के हर कष्ट को दूर करती हैं और उन्हें निरोग रखती हैं। मानव भय से दूर, जीवन के हर सुख को प्राप्त करता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
इस ब्लॉग में दी गई महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी की पूजा विधि, महत्व और धार्मिक जानकारी केवल पाठकों की जागरूकता और सामान्य ज्ञान के लिए साझा की गई है।
धार्मिक आस्था और परंपरा: यहाँ वर्णित जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और लोक परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पूजा विधि और रीति-रिवाजों में भिन्नता हो सकती है।


