महासप्तमी महाअष्टमी और महानवमी की पूजा क्यों है महत्वपूर्ण ? जानें संपूर्ण विधि

मां दुर्गा द्वारा महिषासुर वध की काल्पनिक तस्वीर - महासप्तमी, अष्टमी और नवमी विशेष

 दशहरा के दिन महा सप्तमी महा अष्टमी और महा नवमी की पूजा एक साथ करने की क्या है विधि। साथ में रंजीत के ब्लॉग पर पढ़ें नवरात्रा में मां भवानी की नौ रूपों की 09 दिनों तक विधि विधान  से और वैदिक मंत्रों के बीच  से पूजा अर्चना करने का विधान। 


अगर कोई व्यक्ति 09 दिनों तक व्रत रखने में कठिनाई महसूस करता है।  वैसी स्थिति में उसे सिर्फ महासप्तमी, महाष्टमी और महानवमी की व्रत रखें और पूरे विधि विधान से करें। 09 दिनों तक चलने वाले व्रत का फल उसे प्राप्त हो जाता है। 


भगवती पुराण में कहा गया है कि मां के तीन दिनों के रूप कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजन भक्ति पूर्वक करने से उसे सभी तरह का फल प्राप्त हो जाता है।

मां भगवती की पूजन क्यों करनी चाहिए

पृथ्वी लोक में जितने भी प्रकार के व्रत और दान हैं। इस नवरात्र व्रत के तुल्य नहीं है क्योंकि यह व्रत हमेशा धन-धान्य, ऐश्वर्या और शक्ति प्रदान करने वाला, सुख तथा संतान की वृद्धि करने वाला, आयु तथा आरोग्य प्रदान करने वाला और स्वास्थ्य देने वाला है। 

जिस मनुष्य ने दुख तथा संताप का नाश करने वाली सिद्धियां देने वाली जगत में सर्वश्रेष्ठ शाश्वत तथा कल्याण स्वरूपिणी मां भगवती की उपासना नहीं की है वह इस पृथ्वी लोक पर सदा ही अनेक प्रकार के कष्टों से ग्रस्त दरिद्र तथा रोगों से पीड़ित है। ऐसे लोगों को जरूर नवरात्रि पर्व करनी चाहिए। 

भगवान विष्णु, इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, अग्नि, कुबेर, वरुण सहित समस्त देवी-देवताओं अपने कामनाओं को परिपूर्ण करने के लिए जिन भगवती का ध्यान करते हैं, उस चंडिका का हमें भी ध्यान करना चाहिए। जिन की इच्छा से ब्रह्मा द्वारा विश्व का श्रृजन करते हैं। भगवान विष्णु अनेक विधि अवतार लेते हैं और शंकर भगवान जगत को भस्म सात करते हैं। 

मां भगवती को पूजन करने से चारों प्रकार के पुरुषार्थ मनुष्य को प्राप्त होता है। मसलन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति मनुष्यों को भगवती का अनुष्ठान और पूजा करने से मिलते हैं।


महासप्तमी पूजा विधि (कलश स्थापना और नवपत्रिका प्रवेश)

महासप्तमी के दिन मां दुर्गा के 'कालरात्रि' स्वरूप की पूजा होती है।

नव पत्रिका प्रवेश (कोला बौ): सप्तमी की सुबह नौ तरह की पत्तियों (जैसे केला, हल्दी, बेल, अशोक आदि) को मिलाकर एक 'नव पत्रिका' बनाई जाती है। इसे गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और गणेश जी के बगल में स्थापित किया जाता है।


महासप्तमी संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर मां दुर्गा के आगमन और सुख-समृद्धि का संकल्प लें।


षोडशोपचार पूजा: मां को गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें। इस दिन माँ कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।


महाआरती: पूजा के अंत में कपूर से आरती करें और पुष्पांजलि अर्पित करें।


महाष्टमी को कैसे करें विशेष पूजा
नवरात्रा के दौरान महाष्टमी को महागौरी की आराधना और पूजा की जाती है। अष्टमी तिथि की रात संधी पूजा (निशा पूजा) होती है। 12 बजे के बाद संधि पूजा करने का विधान है। संधी पूजा के दौरान बलि देने की प्रथा है परंतु बदले माहौल में मां के भक्त गन्ना और चालकुमड़ा की बलि देते हैं।

 संधी पूजा में भाग लेने वाले लोग अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। 3 से 5 घंटे तक चलने वाली पूजा में प्रसाद के रूप में सुगंध वाला चंदन, पुष्प की माला, खीर और मौसमी फल चढ़ाएं। 

इस दिन कुमारी कन्याओं को पूजन के साथ भोजन कर यथाशक्ति दान देना चाहिए। अष्टमी तिथि को व्रत रखें और मां से निरोग रहने की कामना करें।

अष्टमी का दिन मां गौरी का दिन है, जिनके बारे में कहा जाता है जो व्यक्ति अष्टमी के दिन अगर दिल से मां को पुकारता है, तो मां भवानी तुरंत अपने भक्त की पीड़ा दूर करती हैं।


आदिशक्ति का महापर्व नवरात्रि इस वक्त पूरे देश में पूरी श्रद्धा, भक्ति, निष्ठा और विश्वास के साथ मनाया जा रहा है। 

 

महानवमी पूजा विधि (सिद्धिदात्री पूजा और पूर्णता)

महानवमी नवरात्रि का अंतिम दिन होता है, जिसमें माँ 'सिद्धिदात्री' की पूजा की जाती है।

महास्नान और शुद्धि: नवमी के दिन सुबह स्नान के बाद साफ़ वस्त्र धारण करें और माँ की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएँ (यदि संभव हो)।

हवन (सबसे महत्वपूर्ण): महानवमी पर हवन का विशेष विधान है। आम की लकड़ी, कपूर, घी, और सामग्री के साथ 'दुर्गा सप्तशती' के मंत्रों द्वारा आहुति दें। "ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः" का जाप करते हुए आहुति देना फलदायी है।

कन्या पूजन (कुमारी पूजा): कई लोग अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं, लेकिन महानवमी पर कन्या पूजन करना पूर्णता का प्रतीक है। 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को घर बुलाकर उनके पैर धोएं, उन्हें हलवा-पूरी और चने का भोग खिलाएं और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें।

क्षमा प्रार्थना और विसर्जन: पूजा के अंत में अनजाने में हुई गलतियों के लिए मां से क्षमा मांगें। यदि आपने कलश स्थापित किया है, तो उसके जल का पूरे घर में छिड़काव करें।

विशेष सुझाव: पूजा के दौरान मन को शांत रखें और सात्विक भोजन का ही सेवन करें। विस्तृत मार्गदर्शन के लिए आप अपने स्थानीय पंडित जी से संपर्क कर सकते हैं।


सिद्धिदात्री मां को शतावरी और नारायणी कहते हैं

महानवमी मां सिद्धिदात्री का दिन होता है। मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप को शतावरी और नारायणी भी कहा जाता है। जो शक्ति का पर्याय हैं। मां के इन दोनों रूप की पूजा करने वाले को कभी भी कोई कष्ट और अकाल मृत्यु नहीं होता हैं। वैसे मनुष्य हमेशा खुश, निरोग और संपन्न रहते है। मां भगवती अपने भक्त के हर कष्ट को दूर करती हैं और उन्हें निरोग रखती हैं।  मानव भय से दूर, जीवन के हर सुख को प्राप्त करता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

इस ब्लॉग में दी गई महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी की पूजा विधि, महत्व और धार्मिक जानकारी केवल पाठकों की जागरूकता और सामान्य ज्ञान के लिए साझा की गई है।

धार्मिक आस्था और परंपरा: यहाँ वर्णित जानकारी प्रचलित धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और लोक परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पूजा विधि और रीति-रिवाजों में भिन्नता हो सकती है।


विशेषज्ञ सलाह: हम यह अनुशंसा करते हैं कि किसी भी विशेष अनुष्ठान, कठिन व्रत या जटिल पूजा विधि को संपन्न करने से पहले आप अपने कुल पुरोहित, योग्य ज्योतिषी या किसी धार्मिक विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

त्रुटि की संभावना: यद्यपि हमने जानकारी की सटीकता सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास किया है, फिर भी इसमें मानवीय त्रुटि या समय के साथ आए परिवर्तनों की संभावना हो सकती है। लेखक या प्रकाशक किसी भी प्रकार की अनजाने में हुई गलती या उससे होने वाली किसी भी असुविधा के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: व्रत के दौरान आहार और स्वास्थ्य नियमों का पालन पाठक अपने विवेक और शारीरिक क्षमता के आधार पर करें।

नोट: इस जानकारी का उपयोग करने से पहले स्थानीय पंचांग और अपनी परंपराओं का मिलान अवश्य कर लें।




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