हरतालिका तीज़ 2027: भोलेनाथ व माता पार्वती के मिलन का है यह त्योहार f

हरतालिका तीज़ 2027: भोलेनाथ व माता पार्वती के मिलन का है यह त्योहार

 माता पार्वती और भोले शिव का अनोखा तस्वीर

अखंड सौभाग्य और मनवांछित पति की प्राप्ति के लिए कुंवारी और सुहागन महिलाएं हरतालिका तीज करती है। 

हरतालिका तीज 03 सितंबर 2027, दिन शुक्रवार को मनाया जायेगा।

भाद्रपद: मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया तिथि: दोपहर 02:18 बजे तक रहेगा। नक्षत्र: हस्त दिन के 03:00 बज कर 53 मिनट तक इसके बाद चित्रा नक्षत्र शुरू हो जाएगा।

सुबह के समय पूजा करने का शुभ मुहूर्त 

नव

*चर मुहूर्त: सुबह 05:28 बजे से लेकर 07:02 बजे तक

*लाभ मुहूर्त: सुबह 07:02 बजे से लेकर 08:36 बजे तक* 

*अमृत मुहूर्त: सुबह 08: 36 बजे से लेकर 10:10 बजे तक*

*अभिजीत मुहूर्त: जिंदगी 11:27 बजे से लेकर 12:10 बजे* तक 

संध्या समय पूजा करने का शुभ मुहूर्त 

हरतालिका तीज व्रत पूजा करने का उचित समय संध्या के समय होता है। 

*चर मुहूर्त: 04:27 बजे से लेकर 06:01 बजे तक*

गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:01 बजे से लेकर 06:24 बजे तक*

पारण करने का उचित समय

पारण करने का उचित समय सुबह 4 सितंबर 2027 दिन शनिवार तिथि शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि के दिन सूर्योदय से पहले पारण कर लेने चाहिए।

03:57 बजे से लेकर 04:42 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। सुबह 07:02 बजे 08:36 बजे शुभ मुहूर्त। रहेगा। सूर्योदय से पूर्व ही पारण करना चाहिए। 

पारण करते समय क्या करें

पारण करने के पूर्व स्नान कर नया वस्त्र धारण करें। शिव पार्वती का विधि विधान से पूजन करें और व्रत के दौरान होने वाली गलतियों के लिए क्षमा मांगे। अपनी कार्य सिद्धि के लिए एक बार फिर प्रार्थना करें। इसके बाद पूर्व की ओर मुख करके सात्विक भोजन और शुद्ध जल ग्रहण करें।

पूजा सामग्रियों की सूची

हरितालिका तीज के दिन देवी पार्वती और भगवान भोलेनाथ की पूजा करने की विधान है। पूजा करने के दौरान मां पार्वती और भगवान शिव की तस्वीरें, तांबे या पीतल का लोटा, जल कलश के लिए मिट्टी का बर्तन, वस्त्र, आभूषण, सूखे मेवे, तिल जौ, पान, दूध, चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रूई, चंदन, धतूरा, आंकड़े का फूल, बेलपत्र, भांग, घी, गन्ने का रस, गंगाजल, फल, जनेऊ, मिठाई, नारियल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गुड़) अंत मे दक्षिण रख ले।

पूजा करने के पहले लें संकल्प

कैसे करें संकल्प इसे विस्तार से बताता हूं। किसी विशेष मनोकामना के पूरी करने के लिए पूजन से पहले संकल्प लेने की जरूरत पड़ती है। जानें कैसे करें संकल्प पूजा करने से पहले दोनों हाथ को जल से धो लें। इसके बाद हाथ जोड़कर संकल्प लेंं। संकल्प लेने से पहले हाथ में चावल, जल और पुष्प रख लें। संकल्प में जिस दिन पूजा कर रहे हैं उस दिन का नाम, अपना नाम, कौन सी तिथि, विक्रम संवत, देश का नामजगह का नाम और गोत्र का नाम लेकर अपनी इच्छा बोलेें। अब हाथ में लिए हुए सभी चीजों को भगवान के चरणों में अर्पित कर दें।

कैसे करें माता पार्वती और भोलेनाथ की पूजा जाने संपूर्ण विधि

सबसे पहले माता पर्वती की प्रतिमा भगवान शिव की बाई तरफ स्थापित करना चाहिए। इसके बाद शिव पर्वती की पूजा आरंभ करें। शिव

 पार्वती को शुद्ध जल से स्नान कराए। स्नान के बाद गंगाजल से फिर पंचामृत से और इसके बाद एक बार फिर से जल से स्नान कराए। शिव पार्वती को वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद आभूषण और फूलों का माला पहना हैै। अब इत्र लगा कर तिलक करें। ऊं साम्ब शिवाय नमः करते हुए भगवान शिव को अष्टगंध का तिलक लगाएंं। ऊं गौयें नमः करते हुए माता पर्वती को कुमकुम का तिलक लगाएं। अब धूप, दीप और पुष्प अर्पित करें । श्रद्धा अनुसार घी या तेल का दीपक जलााए। आरती के उपरांत परिक्रमा करें। इसके बाद नवैद्ध अर्पित करें। शिव और पार्वती को बिल्वपत्र से पूजन करें। कनेर का पुष्प अर्पित करें। गौरी शंकर के पूजन के समय ऊं उमामहेश्वराम्यां नमः मंत्र का जाप करें।

सबसे पहले माता पार्वती ने की थी भोलेनाथ की पूजा

पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती का जन्म हिमालय राजा के घर में हुई थी। शुरू से हैं माता पार्वती भोलेनाथ के भक्त थीं। उनकी मन में हमेशा भोलेनाथ को पति के रूप में देखने की प्रबल इच्छा रहती थी। 

माता पार्वती ने भोलेनाथ को वर के रूप में पाने के लिए महल में रहते हुए कठिन व्रत करने लगी। पिता ने अपनी पुत्री की भक्ति देखते हुए और नारद जी के कथा अनुसार मां पार्वती के लिए विष्णु भगवान को वर के रूप में स्वीकार करने का मन बना लिया। 

इस बात की जानकारी मिलने पर नारद जी ने क्षीर सागर में विश्राम कर रहे भगवान विष्णु को सुखद समाचार सुनाया और नारदजी पार्वती से विवाह करने के लिए भगवान विष्णु से सहमति प्राप्त कर ली।

जब यह समाचार पर्वती जी को पता चला तो वह विचलित हो गई और अपने सखियों से अपनी मन की बात कही। साथ ही भोलेनाथ को प्राप्ति के लिए उपाय पूछी। 

सखियों ने मां पार्वती को घने जंगल में ले जाकर एक गुफा में छिपा दिया और तपस्या करने का सुझाव दिया। माता पर्वती गुफा में भोलेनाथ की तपस्या करने लगी। जंगल के गुफा में संयोग बस हस्त नक्षत्र, भाद्रपद माह, शुक्ल पक्ष, तृतीय तिथि को बालू का शिवलिंग बनाकर विधि विधान से मां पार्वती ने पूजा अर्चना की। 

भगवान भोलेनाथ माता पार्वती की आराधना, पूजा और हठयोग देखकर काफी प्रसन्न हुए और पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दे दिया।
 इधर माता पर्वती को घर से चले जाने पर पिता हिमालय काफी चिंतित हुए और खोजते हुए गुफा के पास पहुंच गए। 

माता भगवती ने अपनी पूजा और भोलेनाथ से दर्शन और पत्नी के रूप में स्वीकार करने की पूरी कथा कह सुनाई । राजा हिमालय पार्वती से कथा सुनकर काफी प्रसन्न हुए और शिव को दामाद के रूप में स्वीकार करने का वचन दे दिया।है।

हरतालिका तीज की विस्तार से पढ़ें पौराणिक कथा

हरतालिका तीज के व्रत की विस्तार से महत्व और इसकी विधि जितनी कठिन है, इसकी पौराणिक कथा उतनी ही भावपूर्ण और प्रेरणादायी है। 'हरतालिका' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'हरत' अर्थात हरण करना और 'आलिका' अर्थात सखी या सहेली। यह कथा माता पार्वती की उनकी सहेली द्वारा किए गए हरण और भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किए गए अनन्य तप से जुड़ी हुई है।

माता पार्वती का पूर्व जन्म और अटूट संकल्प

शिव पुराण के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती सुखपूर्वक विराजमान थे। तब माता पार्वती ने निष्कपट भाव से भगवान भोलेनाथ से पूछा, "हे महादेव! आपने मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने के लिए कौन सी ऐसी पूजा या तपस्या स्वीकार की थी? किस व्रत के प्रभाव से मुझे आपका यह सानिध्य प्राप्त हुआ? कृपया मुझे उस गुप्त व्रत के बारे में विस्तार से बताएं।"

भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, "हे देवी! तुमने मुझे प्राप्त करने के लिए बाल्यकाल में हिमालय पर्वत पर अत्यंत कठिन तपस्या की थी। वही व्रत 'हरतालिका तीज' के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ। मैं तुम्हें तुम्हारी पूर्व जन्म की उस भक्ति कथा का स्मरण कराता हूँ।"

भगवान शिव ने कथा का आरंभ करते हुए बताया कि माता पार्वती अपने पूर्व जन्म में पर्वतराज हिमाचल और माता मैनावंती की पुत्री के रूप में जन्मी थीं। बाल्यावस्था से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति अनन्य भक्ति थी। वे भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। जब वे विवाह योग्य हुईं, तो उन्होंने अपने मन में केवल शिव का ध्यान धर लिया।

माता पार्वती की उग्र तपस्या

भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने हिमालय की गुफाओं में अत्यंत कठिन तपस्या शुरू की। उन्होंने वर्षों तक अन्न और जल का त्याग कर दिया। वे ग्रीष्म काल में पंचाग्नि तपतीं, वर्षा काल में जलधारा के नीचे बैठकर ध्यान लगातीं और शीत काल में बर्फ से ढके पर्वतों पर नंगे पांव खड़ी होकर साधना करती थीं। वे केवल सूखे पत्ते चबाकर या हवा पीकर तपस्या में लीन रहती थीं।

उनकी इस कठोर और उग्र तपस्या को देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमाचल और माता मैनावंती अत्यंत चिंताकुल हो उठे। वे अपनी सुकोमल पुत्री के इस कठोर कष्ट को देखकर व्याकुल रहते थे और चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह किसी योग्य और ऐश्वर्यशाली देवता से हो जाए।

महर्षि नारद का आगमन और विष्णु जी का विवाह प्रस्ताव रखा

माता पार्वती की तपस्या की चर्चा तीनों लोकों में फैल गई। इसी दौरान एक दिन देवर्षि नारद पर्वतराज हिमाचल के महल में पधारे। राजा हिमाचल ने नारद जी का आदर-सत्कार किया और उनके आगमन का कारण पूछा।

नारद जी ने कहा, "हे राजन! मैं वैकुण्ठपति भगवान श्री हरि विष्णु का संदेश लेकर आया हूं। आपकी पुत्री की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं। यदि आप स्वीकार करें, तो यह अत्यंत सौभाग्य की बात होगी।"

पर्वतराज हिमाचल भगवान विष्णु जैसे परम पूज्य और ऐश्वर्यशाली देवता को अपना दामाद बनाने के प्रस्ताव से अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और नारद जी को आश्वस्त किया कि वे अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु के साथ ही करेंगे। नारद जी यह शुभ समाचार लेकर वैकुण्ठ लौट गए।

माता पार्वती का संताप और सखी द्वारा हरण

जब पर्वतराज हिमाचल ने घर लौटकर माता पार्वती को यह बात बताई कि उनका विवाह भगवान श्री हरि विष्णु से तय कर दिया गया है, तो माता पार्वती अत्यंत दुखी हो गईं। वे अपने कक्ष में जाकर रोने लगीं।

माता पार्वती को अत्यंत व्याकुल और बिलखते देखकर उनकी परम प्रिय सखी उनके पास आई और उनके दुख का कारण पूछा। तब पार्वती जी ने कहा, "हे सखी! मैंने अपने मन, वचन और कर्म से केवल भगवान शिव को अपना पति स्वीकार किया है। परंतु मेरे पिता मेरा विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते हैं। यदि ऐसा हुआ तो मेरे पास अपने प्राण त्यागने के अलावा कोई मार्ग नहीं बचेगा।"

उनकी सखी बुद्धिमान और दूरदर्शी थी। उसने माता पार्वती को सांत्वना दी और कहा, "हे देवी! आपको अपने प्राण त्यागने की आवश्यकता नहीं है। मैं आपको एक ऐसे गहन और दुर्गम वन में ले चलती हूं, जहां आपके पिता या अन्य कोई भी आपको ढूंढ न सके। वहां आप निर्विघ्न होकर भगवान शिव की साधना कर सकती हैं।"

माता पार्वती अपनी सखी के इस सुझाव से सहमत हो गईं। उसी रात, उनकी सखी उन्हें चुपचाप महल से निकालकर एक घने और बीहड़ जंगल की गुफा में ले गई। चूंकि माता पार्वती की सहेली ने उनका हरण (अपहरण) किया था, इसीलिए इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा।

निर्जला व्रत, हस्त नक्षत्र और शिव जी का प्रकटीकरण

घने जंगल में पहुंचकर माता पार्वती ने एक गुफा में आश्रय लिया। वहां भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र का शुभ संयोग बना था। माता पार्वती ने नदी के तट से बालू एकत्र की और उससे भगवान शिव एवं माता पार्वती का शिवलिंग तथा मूर्तियां बनाईं।

उन्होंने बिना जल ग्रहण किए पूर्णतः निर्जला और निराहार रहकर विधि-विधान से शिवजी का पूजन किया। उन्होंने पूरी रात जागकर शिव जी के स्त्रोतों का पाठ किया, भक्ति गीत गाए और रात्रि जागरण किया। उनकी इस निष्काम, कठोर और अनन्य भक्ति से भगवान शिव का आसन डोल उठा।

प्रदोष काल में भगवान शिव स्वयं उस बीहड़ जंगल की गुफा में प्रकट हुए और बोले, "हे देवी! तुम्हारी इस अचल भक्ति और कठिन तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मांगो, तुम क्या वरदान चाहती हो?"

माता पार्वती ने हाथ जोड़कर अत्यंत नम्रता से कहा, "हे प्रभु! यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं, तो कृपा करके मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करें।" भगवान शिव ने 'तथास्तु' कहकर उनकी इच्छा पूर्ण करने का वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गए।

राजा हिमाचल की स्वीकृति और शिव-पार्वती का पावन विवाह

अगले दिन प्रातःकाल, तृतीया तिथि की समाप्ति और चतुर्थी के प्रारंभ में माता पार्वती ने अपनी सखी के साथ पूजा की सामग्रियां नदी में प्रवाहित कीं और अपना व्रत पूरा किया।

दूसरी ओर, पर्वतराज हिमाचल अपनी पुत्री के गायब होने से अत्यंत व्याकुल होकर पूरे राज्य और वनों में खोज करा रहे थे। खोजते-खोजते वे उसी बीहड़ जंगल में पहुंचे जहां माता पार्वती साधना कर रही थीं। उन्होंने अपनी पुत्री को जीवित और सुरक्षित देखकर गले लगा लिया और रोते हुए पूछा, "पुत्री! तुम राजमहल छोड़कर इस दुर्गम वन में क्यों चली आईं?"

माता पार्वती ने अपने पिता से कहा, "पिताजी! मैंने अपने जीवन का सर्वस्व भगवान शिव को समर्पित कर दिया था। यदि आप मेरा विवाह भगवान विष्णु से कराने का हठ न करते, तो मुझे महल छोड़कर यहां न आना पड़ता। अब भगवान शिव ने मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया है। यदि आप मेरा विवाह शिव जी के साथ करने का वचन देंगे, तभी मैं आपके साथ राजमहल वापस चलूंगी।"

पर्वतराज हिमाचल अपनी पुत्री के दृढ़ निश्चय और भगवान शिव के प्रति उनके अगाध प्रेम के आगे नतमस्तक हो गए। उन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से अपनी स्वीकृति दे दी और अत्यंत आदर के साथ माता पार्वती को महल वापस ले आए। इसके पश्चात, पूरे विधि-विधान और वैदिक रीति-रिवाज के साथ माता पार्वती का विवाह भगवान शिव से संपन्न हुआ।

हरतालिका तीज व्रत का महत्व और फल

भगवान शिव ने इस कथा को समाप्त करते हुए कहा, "हे देवी! भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन तुमने जो निर्जला व्रत और पूजन किया था, उसी के प्रभाव से हमारा विवाह संभव हो सका। जो भी स्त्री इस दिन पूरी निष्ठा, श्रद्धा और निर्जला रहकर इस व्रत का पालन करेगी और इस कथा का श्रवण करेगी, उसे मेरी और तुम्हारी संयुक्त कृपा प्राप्त होगी।"

शास्त्रों के अनुसार, हरतालिका तीज का व्रत करने वाली महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। उनके दांपत्य जीवन में आने वाली सभी बाधाएं, क्लेश और कष्ट मिट जाते हैं। जो कुंवारी कन्याएं इस व्रत को रखती हैं, उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद से मनचाहा, योग्य और संस्कारी वर प्राप्त होता है। यह व्रत नारी शक्ति के दृढ़ संकल्प, समर्पण और अटूट प्रेम का अमर प्रतीक है।

हरतालिका तीज: प्रमुख प्रश्न और उत्तर (FAQs)

प्रश्न 1: हरतालिका तीज का व्रत निर्जला ही क्यों रखा जाता है?

उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न और जल का त्याग करके कठोर तपस्या की थी। उनके इसी समर्पण और साधना का सम्मान करने के लिए यह व्रत बिना अन्न और जल ग्रहण किए (निर्जला) रखा जाता है, जिससे साधक में संयम और भक्ति का संचार हो सके।

प्रश्न 2: क्या कुंवारी कन्याएं भी हरतालिका तीज का व्रत रख सकती हैं?

उत्तर: जी हाँ, कुंवारी कन्याएं भी मनचाहा और योग्य वर पाने के लिए यह व्रत रख सकती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भी बाल्यावस्था में कुंवारी रहते हुए ही शिव जी को पाने के लिए यह निर्जला व्रत किया था।

प्रश्न 3: यदि कोई महिला बीमार या गर्भवती है, तो वह व्रत कैसे करे?

उत्तर: शास्त्रों में विशेष परिस्थितियों (बीमारी या गर्भावस्था) में नियमों में छूट का प्रावधान है। ऐसी स्थिति में महिलाएं फल, जल या दूध ग्रहण करके (फलाहार) व्रत रख सकती हैं या फिर अपनी जगह अपने पति या किसी रिश्तेदार से पूजा संपन्न करा सकती हैं।

प्रश्न 4: हरतालिका तीज की पूजा के लिए कौन सा समय सबसे उत्तम माना जाता है?

उत्तर: हरतालिका तीज की पूजा के लिए 'प्रदोष काल' (सूर्यास्त के ठीक बाद का समय) सबसे श्रेष्ठ माना गया है। इसके अलावा, प्रातः काल में हस्त नक्षत्र के दौरान बालू (रेत) से शिव-पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन करना अत्यंत फलदायी होता है।

प्रश्न 5: हरतालिका तीज व्रत का पारण कब और कैसे करना चाहिए?

उत्तर: इस व्रत का पारण अगले दिन (चतुर्थी तिथि को) सूर्योदय के बाद किया जाता है। सुबह स्नान और शिव-पार्वती की अंतिम पूजा के बाद, मूर्तियों का विसर्जन करके जल व प्रसाद ग्रहण कर व्रत पूरा किया जाता है।

हरतालिका तीज के 3 सिद्ध और आसान उपाय

शीघ्र और मनचाहे विवाह हेतु: जिन कुंवारी कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो, वे तीज के दिन माता पार्वती को 16 श्रृंगार की सामग्री और लाल चुनरी अर्पित करें। इसके बाद "ॐ हेमांशु-गौर्ये नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें। पूजा के पश्चात यह श्रृंगार किसी सौभाग्यवती स्त्री को दान कर दें।

दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ाने हेतु: यदि पति-पत्नी के बीच अक्सर तनाव रहता हो, तो तीज की रात शिव-पार्वती को खीर का भोग लगाएं। पूजा के समय शिवलिंग पर चंदन और माता पार्वती को कुमकुम लगाएं। तत्पश्चात उस खीर का प्रसाद पति-पत्नी दोनों मिलकर ग्रहण करें।

अखंड सौभाग्य और समृद्धि हेतु: पूजा की थाली में 5 छोटी इलायची और 5 लौंग रखकर माता पार्वती को अर्पित करें। पूजन समाप्त होने के बाद इन्हें एक लाल सूती कपड़े में बांधकर अपने धन स्थान या तिजोरी में रख दें। मान्यता है कि इससे घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस ब्लॉग लेख में दी गई समस्त जानकारी, पंचांग तिथियां, शुभ मुहूर्त, व्रत की पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताओं का संकलन पारंपरिक ग्रंथों, पंचांगों और लोक मान्यताओं के आधार पर किया गया है। इस सामग्री का मुख्य उद्देश्य पाठकों को केवल सामान्य धार्मिक जानकारी और सांस्कृतिक संदर्भ उपलब्ध कराना है।

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