जया एकादशी 2029: प्रेत योनि से मिलेगी मुक्ति f

जया एकादशी 2029: प्रेत योनि से मिलेगी मुक्ति

  भगवान विष्णु का विहंगम तस्वीर गदा और चक्र धारण किए हुए

"जानें जया एकादशी 2029 (26 जनवरी, दिन शुक्रवार) की सही तिथि, व्रत विधि, पूजा सामग्री, भीष्म एकादशी कथा और महत्व। पापों से मुक्ति का पर्व"

जया एकादशी 2029: माघ शुक्ल की अद्भुत संगम में छिपी मुक्ति की कुंजी

26 जनवरी 2029, शुक्रवार को पड़ने वाली जया एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि तीन दुर्लभ योगों का संगम है। माघ शुक्ल की यह एकादशी रवि योग, विडाल योग और रोहिणी व्रत से सज्जित होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन किया गया उपवास और विष्णु भक्ति साधक को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त कर स्वर्ग के द्वार खोल देती है। 

इसे भीष्म एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि पितामह भीष्म ने इसी तिथि पर उत्तरायण की प्रतीक्षा में शरीर त्यागने की इच्छा जताई थी। वहीं पद्म पुराण में इस व्रत को भैमी एकादशी नाम से अर्जुन-भीम संवाद में अमरत्व प्रदान करने वाला बताया गया है। क्या यह प्राचीन व्रत आज के भागदौड़ भरे जीवन में भी उतना ही फलदायी है? आइए जानते हैं।

26 जनवरी, 2029 दिन शुक्रवार, माघ मास, शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। जया एकादशी करने वाले  मनुष्यों को ब्रह्म हत्या और गौ हत्या जैसे भयंकर पाप से मुक्ति मिलती है। साथ ही पिशाच और प्रेत योनि से भी मुक्ति मिल जाती है। इस व्रत को कैसे करें, व्रत करने का महत्व और व्रत करने से होने वाले फैयदे की बात‌ विस्तार से पद्म पुराण में वर्णन किया गया है।

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*रवि योग और विडाल योग 2029

*रोहिणी व्रत एकादशी पर

*तुलसी में जल कब दें

*एकादशी पर क्या न करें

*एकादशी पारण विधि

*भगवान विष्णु मंत्र

*द्वादशी दान महत्व

जया एकादशी के दिन चंद्रमा मिथुन राशि में और सूर्य कुंभ राशि में

माघ मास, शुक्ल पक्ष के दिन पड़ने वाली जया एकादशी आद्रा नक्षत्र, करण बिष्ट, योग आयुष्मान और दिन मंगलवार है। इस दिन चंद्रमा मिथुन राशि में और सूर्य कुंभ राशि में, ऋतु वसंत है। उस दिन सूर्य उत्तरायण दिशा में रहेंगे। विक्रम संवत 2077 है। जया एकादशी के दिन ग्रहों की स्थिति ? सूर्य वक्री है। राशि कुंभ है और राशि का स्वामी शनि है। नक्षत्र शतभिषा है और नक्षत्र का स्वामी राहु है।

जया एकादशी की जाने पौराणिक कथा

भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान 26 एकादशी व्रत की कथा धर्मराज युधिष्ठिर और धनुर्धर अर्जुन को क्रमवार समझाऐ थे। जया एकादशी के संबंध में महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे, श्रीहरी आपने माघ मास के कृष्ण पक्ष के षट्तिला एकादशी के संबंध में विस्तार से वर्णन किए हैं। अब मुझे माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाला जया एकादशी के संबंध में विस्तार से वर्णन करें। एकादशी व्रत करने से मनुष्य को कौन सा फल मिलता है।

धर्मराज ने जया एकादशी के संबंध में पूछे प्रश्न

धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि हे, श्रीहरि आप मनुष्य के अंदर व्याप्त स्वदेज, अंडे, उद्धेज और जरायुज चारों प्रकार के उत्पन्न, पालन और नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ शुक्ल पक्ष एकादशी का वर्णन करें। इस एकादशी का क्या महत्व है ?  इस व्रत करने का क्या है विधि ? उचित समय क्या है ? और इसमें कौन से देवता का पूजन करने चाहिए।

गौहत्या, ब्रह्महत्या व पिशाच योनि से मिलती है मुक्ति

श्रीकृष्ण ने कहा हे, धर्मराज इस एकादशी का नाम जया एकादशी है। इस व्रत को करने से मनुष्य ब्रह्म हत्या और गौ हत्या जैसे महा पापों से मुक्ति पाकर मोक्ष को प्राप्त करता है, तथा इसके प्रभाव से पिशाच और भूत आदि योनियों से मुक्त मिल जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए। अब मैं तुम्हें पद्म पुराण में वर्णित महिमा की एक कथा सुनाता हूं।

अप्सराओं व गंधर्व के साथ विहार करने गए थे इन्द्र

श्रीहरि ने पौराणिक कथाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देवराज इन्द्र स्वर्ग के राजा थे। सभी देवताओं के साथ वे सुख पूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक दिन यह अपने सभी अप्सराओं के साथ नंदन वन में विहार करने गए। वहां अप्सराएं नृत्य और गंधर्व गान कर रहे थे। उसी नृत्य गान में गंधर्व में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उनकी कन्या पुष्पावती और चित्रसेन तथा उसकी पत्नी मालिनी भी उपस्थित थी। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और माल्यवान भी उपस्थित थे। पुष्पावती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम वाण चलाने लगी। उसने अपने रूप, लावण्य और हाव-भाव से मल्लवान को अपने वश में कर लिया।

पुष्पवती ने इंद्र को किया नाराज

पुष्पवती अत्यंत सुंदर थी। वह इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए नृत्य गान प्रस्तुत करने लगी, परंतु मल्वायन पर मोहित हो जाने के कारण उसका चित्त गान में नहीं लग रहा था। उसके ठीक प्रकार से गान और नृत्य में मन नहीं लगने के कारण पुष्पावती और मल्लवान के प्रेम को देवराज इन्द्र समझ गए। 

इन्द्र क्रोधित होकर बोले, अरे मूर्ख तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिए तुम्हें धिक्कार है। मैं श्राप देता हूं तुम दोनों स्त्री और पुरुष के रूप में मृत्यु लोक जाकर पिशाच योनिधारण करों और अपने कर्मों का फल भोगों।

इंद्र का ऐसा श्राप सुनकर दोनों अत्यंत दुःखी हो गए और हिमालय पर्वत पर दुख पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस और स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। वहां पर उन दोनों को महान दुःख हो रहा था उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी।

इन्द्र से श्राप से दोनों पहुंचे हिमालय पर्वत

हिमालय पर्वत होने के कारण यहां अत्यंत ठंड थी। उससे उनके रोंगटे खड़े रहते थे और ठंड में दांत कांपते रहते थे। एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी से कहा पिछले जन्म में हमने ऐसा कौन सा पाप किए थे जिससे हम को यह दुःखदाई पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से अच्छा तो नर्क का दुखदाई जीवन है। हमें किसी प्रकार का पाप नहीं करना है। इस प्रकार विचार करते हुए दोनों दिन बिताने लगे। 

अज्ञान वश दोनों के किया जया एकादशी व्रत

देव योग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नाम की एकादशी आई। उस दिन उन दोनों ने ना कुछ खाया और ना ही पानी पीएं। साथ ही ना कोई पाप ही किया। केवल फल फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और संध्या समय दुखी होकर पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय भगवान भास्कर अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यंत ठंड पड़ रही थी। इस कारण वे दोनों आपस में लिपटे हुए पड़े रहे। उस रात दोनों को नींद भी नहीं आई।

व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्ति मिली

श्री कृष्ण ने कहा हे, धर्मराज युधिष्ठिर जया एकादशी के उपवास और रातभर जागरण करने से दूसरे दिन सुबह होते ही उन दोनों को पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई। अति सुंदर गंधर्व और अप्सरा के रूप धारण कर सुंदर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्ग लोक को प्रस्थान किया। देवता गण दोनों पर पुष्प की बारिश करने लगे। स्वर्ग लोक में जाकर दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। भगवान इंद्र ने दोनों को पहले जैसा रूप देखकर घोर आश्चर्य चकित हुए और पूछने लगे कि तुम दोनों ने अपनी पिशाच योनि से किस तरह  छुटकारा पा सके ? सही सही बताना।

इन्द्र ने दोनों को ईश्वर तुल्य माना

माल्यवान कहा कि हे, देवेंद्र भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी व्रत के प्रभाव से ही हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है। इसके बाद इन्द्र ने कहा कि हे, माल्यवान भगवान श्रीहरि की कृपा और एकादशी व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई। बल्कि हम देवता गण के भी वंदनीय हो गए हो क्योंकि भगवान विष्णु और भोलेनाथ के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं। अतः तुम दोनों धन्य हो। अब आप पुष्पावती के साथ प्रेम पूर्वक जीवन व्यतीत करों।

जया एकादशी व्रत करने से हजार वर्षों तक स्वर्ग की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि युधिष्ठिर जया एकादशी व्रत करने से बुरी से बुरी योनि से मुक्ति मिल जाती है। जो मनुष्य जया एकादशी व्रत किया है उसे मानो सभी तरह के यज्ञ, जप, दान आदि कर लिया है। जो जातक जया एकादशी व्रत करता है, वह अवश्य ही हजार वर्षों तक स्वर्ग में वास करता है। जया एकादशी व्रत को पूरे विधि विधान और निष्ठा से करनी चाहिए।

जया एकादशी व्रत करने का विधान

जया एकादशी व्रत के दिन भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण का पूजा करने का विधान है। जो व्यक्ति जया एकादशी व्रत करना चाहता है उसे व्रत के एक दिन पहले यानी दशमी के दिन एक बार ही शुद्ध शाकाहारी भोजन करना चाहिए। एकादशी के दिन व्रत का संकल्प लेकर धूप, मौसमी फल, घी एवं पंचामृत आदि से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करनी चाहिए। जया एकादशी  की रात सोना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का भजन कीर्तन एवं सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। रात्रि जागरण करना काफी शुभ और फलदाई होता है। द्वादशी अर्थात पारन के दिन भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने का विधान है। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर लोगों के बीच प्रसाद वितरण करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करा क्षमता के अनुसार दान देना चाहिए।  अंत में स्वयं भोजन  कर उपवास खोलना चाहिए। 

. एकादशी की पूजा विधि स्टेप बाय स्टेप 

1. सूर्योदय से पूर्व उठें (ब्रह्म मुहूर्त) और दांत साफ करें (मंजन, पेस्ट न करें, नीम दातुन उत्तम)।

2. स्नान करें — गर्म जल नहीं, ठंडे या हल्के गुनगुने जल से। शरीर पर तेल-साबुन न लगाएं।

3. संकल्प लें: "मैं विष्णु की कृपा से जया एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से करूँगा/करूँगी, पापों से मुक्ति पाऊँगा/पाऊँगी।"

4. तुलसी और विष्णु पूजा: तुलसी में जल चढ़ाएँ। पीले वस्त्र पहनें। भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक, धूप, फूल, रोली, अक्षत चढ़ाएं।

5. मंत्र जाप: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" 108 बार या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

6. कथा पढ़ें: जया एकादशी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।

7. रात्रि जागरण: जागरण करें, भजन-कीर्तन करें। निद्रा से बचें।

8. अगले दिन (द्वादशी): सुबह स्नान करें, पुनः पूजा करें। ब्राह्मण या गरीब को भोजन + दक्षिणा दान करें।

9. पारण: सूर्योदय बाद फल, दूध या थोड़ा सात्विक भोजन लें। अन्न केवल द्वादशी में ही लेना श्रेष्ठ है।

जया एकादशी के दिन विष्णु की कौन सी रूप कि पूजा की जाती है

जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु के "गदाधारी" (शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करने वाले) स्वरूप की पूजा की जाती है । शास्त्रों में इस दिन विष्णु के नारायण, केशव और श्रीधर रूपों की उपासना का भी विशेष महत्व बताया गया है । कुछ मान्यताओं के अनुसार, माघ मास में होने के कारण इस एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव की पूजा का भी विधान है, जो इस पर्व को अन्य एकादशियों से अद्वितीय बनाता है । व्रती पीले वस्त्र धारण कर भगवान को पीले चंदन, पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करते हैं ।

अब जाने कौन मुहूर्त में करें पूजन

अभिजीत मुहूर्त दिन के 11:36 चलेगा 12:20 तक रहेगा

पंचांग और चौघड़िया पंचांग के अनुसार पूजा करने का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त सुबह 06:30 से लेकर 10:30 तक चर मुहूर्त, शुभ मुहूर्त और अमृत मुहूर्त के रूप में है। विजय मुहूर्त 01:45 बजे से लेकर 02:33 बजे तक है। उसी प्रकार गोधूलि मुहूर्त शाम 05:27 बजे से लेकर 05:53 बजे तक, संध्या मुहूर्त 05:29 बजे से लेकर 06:42 बजे तक, मध्य रात्रि का निशिता मुहूर्त 11:32 बजे से लेकर 12:24 बजे तक, ब्रह्मा 04:43 बजे से लेकर 05:35 बजे तक और प्रातः मुहूर्त 05:09 बजे से लेकर 06: 271 बजे तक है। इस दौरान जातक पूजा अर्चना कर सकते हैं।

क्या जया एकादशी वर्तमान समय में फलदाई है और कैसे? 

हां, जया एकादशी वर्तमान समय में भी पूर्णतः फलदाई है, बशर्ते उसे सही भावना और शास्त्र सम्मत विधि से किया जाए। आज के युग में मानसिक तनाव, अशांति और भौतिकता ने आध्यात्मिक पतन बढ़ा दिया है। ऐसे में एकादशी व्रत एक प्राकृतिक डिटॉक्स की तरह काम करता है।

कैसे फलदाई है:

1. मानसिक शुद्धि: एक दिन का उपवास शरीर को विश्राम देकर मन को एकाग्र करता है। इससे इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है, जो आज की भोग-प्रधान जीवनशैली में अति आवश्यक है।

2. आध्यात्मिक ऊर्जा: नियम से भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप और भजन-कीर्तन से नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं। यह अवसाद व चिंता को कम करता है।

3. पाप-नाश: यदि जाने-अनजाने में हुए अपराधों (जैसे क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार) से मुक्ति चाहते हैं, तो यह व्रत गहरे प्रायश्चित का कार्य करता है।

4. शारीरिक लाभ: अन्न त्यागने से पाचन तंत्र सुधरता है, और आजकल की अनियमित खानपान की आदतों को नियंत्रित करने में सहायक होता है।

अतः इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान न समझें; यह सम्पूर्ण स्वास्थ्य (शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक) का समाधान है।

एकादशी को तुलसी में जल देना चाहिए या नहीं? 

हां, एकादशी के दिन तुलसी में जल देना अत्यंत शुभ और आवश्यक है। वास्तव में, एकादशी का व्रत और तुलसी पूजा का अटूट संबंध है।

नियम यह है कि एकादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद सबसे पहले तुलसी के पौधे को जल अर्पित करें। ध्यान रखें कि इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते (क्योंकि द्वादशी को भगवान का श्रृंगार होता है), लेकिन जल देने का कोई निषेध नहीं है। शास्त्र कहते हैं, "तुलसी जल चढ़ाने से विष्णु प्रसन्न होते हैं।"

बल्कि, एकादशी पर तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना और जल अर्पित करना विशेष फलदायी होता है। यह पवित्र जल वातावरण को शुद्ध करता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सिर्फ ध्यान रखें कि संध्या के समय भी तुलसी में जल दे सकते हैं, लेकिन शाम ढलने के बाद तुलसी को स्पर्श न करना कुछ घरानों में नियम है।

क्या हम एकादशी पर साबुन और तेल का उपयोग और कपड़ें धो सकते हैं? 

सनातन धर्म में एकादशी को शरीर पर तेल या साबुन लगाने की सख्त मनाही है। इसे तामसिक क्रिया माना जाता है, क्योंकि तेल और साबुन से काम, क्रोध, लोभ आदि को बल मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन केवल जल से स्नान करना चाहिए। कपड़े धोने की बात करें, तो गंदे कपड़े धोना वर्जित नहीं है, लेकिन इसे निमित्त मात्र समझें। आदर्श यह है कि पहले से धुले हुए, सात्विक (हल्के रंग) वस्त्र पहनें। यदि कपड़े अत्यधिक गंदे हो जाएँ, तो बिना साबुन (केवल पानी से) धो सकते हैं, लेकिन इससे व्रत की भावना भंग होती है। मुख्य उद्देश्य इंद्रियों को वश में करना है, इसलिए तेल, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन आदि से पूरी तरह बचें।

एकादशी के दिन स्त्री को क्या नहीं करना चाहिए? 

एकादशी के दिन स्त्रियों (व सभी व्रतियों) के लिए इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

1. नाखून, बाल न काटें: किसी भी प्रकार का शरीर संवारना वर्जित है। मेंहदी, मेकअप न करें।

2. झूठ न बोलें: क्रोध, गपशप, ईर्ष्या या चुगली से बचें। मौन व्रत या कम बोलना अच्छा है।

3. सिलाई-बुनाई न करें: सुई-धागे का काम (जैसे कढ़ाई, बटन लगाना) निषेध है, क्योंकि यह किसी को कष्ट देने जैसा माना गया है।

4. अनाज, दाल, नमक, हींग न खाएं: ये सभी तामसिक और राजसिक श्रेणी में आते हैं।

5. रत्न या आभूषण न पहनें: सोने-चांदी के भारी आभूषण त्यागें, केवल सात्विक धारण करें।

6. दूसरों को न रुलाएं और न ही किसी का मन दुखाएं: स्त्री को घर की शांति का ध्यान रखना चाहिए।

6. जया एकादशी संबंधित पांच प्रश्न और उत्तर 

प्रश्न 1: जया एकादशी का व्रत किस भगवान को समर्पित है?

उत्तर: यह व्रत भगवान श्री विष्णु (वामन या श्रीधर स्वरूप) को समर्पित है। इसे पद्मनाभ, केशव, माधव नामों से पुकारा जाता है।

प्रश्न 2: जया एकादशी की कथा क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर: पद्म पुराण के अनुसार, स्वर्ग की अप्सरा 'पुष्पवती' और गंधर्व 'माल्यवान' को श्राप मिला था। इस व्रत से उन्हें राक्षस योनि से मुक्ति मिली, इसलिए इसे 'पाप-मोचनी' कहा गया।

प्रश्न 3: क्या जया एकादशी को दान करना अनिवार्य है?

उत्तर: अनिवार्य नहीं, लेकिन द्वादशी (अगले दिन) सुबह ब्राह्मण या गरीबों को सात्विक भोजन, वस्त्र, फल और दक्षिणा देना अनंत फल देता है।

प्रश्न 4: यदि मैं पूरा उपवास न कर पाऊँ तो क्या करूँ?

उत्तर: तो फलाहार (केवल फल, दूध, पानी) करें। मुख्य है मन और इंद्रियों का संयम। बिना अन्न के एक समय फलाहार भी मान्य है।

प्रश्न 5: जया एकादशी का पारण (व्रत खोलना) कब करें?

उत्तर: द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद। सामान्यतः 26 जनवरी को व्रत होगा, तो पारण 27 जनवरी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी समाप्ति तक करें।

7. जया एकादशी के अनसुलझे पहलुओं की जानकारी 

जया एकादशी का एक अनसुलझा पहलू यह है कि आखिर जया (विजय) का सीधा संबंध महाभारत युद्ध से क्यों नहीं जोड़ा जाता, जबकि भीष्म ने इसी से संबद्ध तिथि (माघ शुक्ल) पर प्राण त्यागना चाहा था? दूसरा रहस्य: कुछ घरानों में इसे 'भैमी' कहा जाता है, परंतु भीम ने स्वयं इस व्रत के फल पर शंका जताई थी — यह विरोधाभास अभी भी अनसुलझा है। 

तीसरा, विडाल योग (जो इस व्रत के साथ 2029 में बन रहा है) को शुभ माना जाता है, जबकि 'विडाल' का अर्थ बिल्ली होता है — इस योग का जया एकादशी से अध्यात्मिक संबंध स्पष्ट नहीं। अंत में, तुलसी में जल देने के समय का नियम भिन्न-भिन्न पुराणों में अलग-अलग बताया गया है, जिससे आम श्रद्धालु भ्रमित हो जाते हैं।

9. जया एकादशी संबंधित डिस्क्लेमर 

Disclaimer: यह आलेख केवल धार्मिक मान्यताओं, लोक कथाओं और पुराणों में वर्णित सामान्य सूचनाओं पर आधारित है। 'जया एकादशी', 'भीष्म एकादशी', 'भैमी एकादशी', रवि योग, विडाल योग आदि का उल्लेख विभिन्न सनातन धार्मिक ग्रंथों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, महाभारत) में प्राप्त होता है, लेकिन इनकी सभी व्याख्याएं एक समान नहीं हैं। 

लेख में दी गई तिथि (26 जनवरी 2029), योग, एवं व्रत विधि की जानकारी पंचांगों के सामान्य अध्ययन पर आधारित है। कृपया किसी भी अनुष्ठान, व्रत या पूजा पद्धति को अपनाने से पहले स्वयं के धर्मगुरु, स्थानीय पंचांग या वैदिक विद्वान से परामर्श अवश्य लें। लेखक या प्रकाशक किसी भी व्यक्तिक, धार्मिक, या व्यवहारिक हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। 

यह सामग्री शैक्षणिक और जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है, न कि किसी धार्मिक मान्यता को मान्यता या नकारने हेतु। सभी निर्णय पाठकों के अपने विवेक एवं स्थानीय नियमों के अनुसार होंगे।



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