"भगवान गणेश की जन्म जगत जननी मां पार्वती की मैल से हुई थी। जन्म की कथा शिव पुराण में विस्तार से लिखी है। इस कथा को विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर"
"क्या आप जानते हैं? भगवान गणेश का जन्म माँ पार्वती के शरीर की मैल और उपटन से हुआ था – शिव पुराण की अनसुनी कथा"
क्या भगवान गणेश, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, का जन्म माँ पार्वती के शरीर की मैल से हुआ था? यदि यह सुनकर आप चौंक गए, तो यह केवल एक रहस्य नहीं, बल्कि शिव पुराण के उस गहन अध्याय का प्रवेशद्वार है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
आमतौर पर यह कथा प्रचलित है कि माँ पार्वती ने हल्दी-चंदन के उबटन से गणेश का निर्माण किया। लेकिन शिव पुराण के एक विरल और प्रामाणिक संस्करण में अत्यंत रोचक विवरण मिलता है – जब माँ पार्वती स्नान कर रही थीं, तब उनकी सखियों जया और विजया ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि पूरा ब्रह्मांड शिव के आदेशों का पालन करता है, परंतु उनका कोई निजी सेवक नहीं है। इसी विचार के बाद, एकांत में, माँ पार्वती ने अपने शरीर की मैल (देह-मल) से एक चेतन, तेजस्वी और परम शुभ पुरुष की रचना की – जो आगे चलकर गणेश कहलाए।
यह कथा न केवल माँ पार्वती के आत्मबल और स्वतंत्रता के संकल्प को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि दिव्यता अपने सांसारिक रूप में भी कैसे प्रकट हो सकती है। गणेश को माँ ने स्वयं अपना पुत्र घोषित किया, वस्त्राभूषण दिए, और द्वारपाल का पद सौंपा। उन्होंने कहा – “मेरी आज्ञा बिना कोई भी भीतर न आए, चाहे वह कोई भी हो।”
इस अनोखी जन्मकथा में यह संदेश छिपा है कि सच्ची भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का जन्म माँ के स्नेह और विश्वास से होता है, न कि केवल रस्मों से। आइए, इस अद्भुत कथा को शिव पुराण के दर्पण से और गहराई से समझें।
मां पार्वती की मैल और उपटन से हुई गणेश का जन्म
जय और विजया नामवाली सखियां पार्वती जी के पास आकर विचार करने लगी। सखियों ने पार्वती जी से कहीं की सभी गण भगवान शिव की आज्ञा मानते हैं। नंदी व भृंगी सहित सभी गणों शिव के ही हैं। उनके आदेश पालक हैं। इसमें हमारा कोई नहीं। यह सभी शिव के आदेशानुसार द्वार पर खड़े रहते हैं। ऐसी स्थिति में आपको भी हमारे लिए एक गण की रचना करनी चाहिए। सखियों ने पार्वती जी से ऐसे सुंदर वचन कहा। तब उन्होंने इसे हितकर माना और वैसा ही करने का विचार किया।
शिव ने देखी पार्वती को अर्धनग्न अवस्था में
तदुपरांत किसी समय जब पार्वती जी स्नान कर रही थी। तब सदा शिव ने नंदी को डरा धमका कर घर के अंदर चले आए। शंकर जी के आते देख कर जगत जननी पर्वती जी उठ कर खड़ी हो गई। उस समय वह अर्धनग्न अवस्था में स्नान कर रही थी। उसी समय उनको बड़ी लज्जा आई । वे आश्चर्यचकित हो गई। इस अवसर पर उन्होंने सखियों के वचन को हितकर माना तथा सुखप्रद मानकर पर्वती जी के मन में विचार किया कि मेरा भी कोई एक ऐसा सेवक होना चाहिए जो परमशुभ, कार्यकुशल और मेरी की आज्ञा में तत्पर रहने वाला हो।
जगत जननी की मैल से हुए गणेश
मन में विचार कर पर्वती जी ने अपने शरीर की मैल से एक ऐसे चेतन पुरुष का निर्माण किया जो संपूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त था। उसके सभी अंग सुंदर और दोष रहित था। उनका वह शरीर विशाल था। परम शुभायमान और महान बल पराक्रम से संपन्न था। देवी ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्र, नाना प्रकार के आभूषण और बहुत सा उत्तम आशीर्वाद देकर कहां तुम मेरे पुत्र हो। मेरे ही अपने हो। तुम्हारे सामान प्यारा मेरा यहां कोई दूसरा नहीं है। उक्त पुरुष ने नमस्कार करके बोला मां आज आपको कौन सा कार्य आन पड़ा है। मैं आपके कथानुसार उसे पूर्ण करूंगा।
जगत जननी पार्वती जी ने कहा तात तुम मेरे पुत्र हो, अपने हो। अब मेरी बात सुनो आज से तुम मेरे द्वारपाल हो जाओ। सत्पुत्र मेरी आज्ञा के बिना कोई भी हठ पूर्वक मेरे महल के भीतर प्रवेश न कर पाए । चाहे कहीं से भी आए हो, कोई भी हो। बेटा यही मेरी आज्ञा है।



