क्या है भक्तियोग: जानें 09 रूप और 08 अंग, अर्थ, प्रकार, फायदे और पूरी जानकारी | Bhakti Yoga in Hindi

भक्ति योग का अभ्यास करता हुआ साधक मंदिर के समीप ध्यान में लीन | Bhakti Yoga Meditation

माला जप और ध्यान के माध्यम से भक्ति योग का अभ्यास करता हुआ साधक

"भक्तियोग क्या है? गीता के अनुसार इसका अर्थ, 09 रूप, 08 अंग और अभ्यास विधि जानें। भक्ति योग के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों की विस्तृत जानकारी प पाएं"।

भक्ति योग: प्रेम और समर्पण का दिव्य मार्ग

आज की तेज़ रफ़्तार और भौतिकतावादी दुनिया में, मन की शांति और आत्मिक तृप्ति की तलाश हर किसी के मन में होती है। ऐसे में, भक्ति योग एक ऐसा सनातन और सरल मार्ग प्रस्तुत करता है जो प्रेम, भक्ति और समर्पण के माध्यम से सीधे ईश्वर से जुड़ने का अवसर देता है। 

यह केवल कर्मकांड या पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रति एक समग्र दृष्टिकोण है जो प्रत्येक क्षण को दिव्यता से भर देता है। चाहे आप आस्तिक हों या नहीं, भक्ति योग की अवधारणा मानवीय भावनाओं की गहराई को छूती है और जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है। इस ब्लॉग में, हम भक्ति योग के सार, उसके प्रकार, अभ्यास की विधियों और इसके दार्शनिक आधार को विस्तार से समझेंगे। आइए, प्रेम और समर्पण के इस पावन पथ पर चलने की शुरुआत करते हैं

नीचे दिए गए विषयों पर विस्तार से पढ़ें रंजीत के ब्लॉग पर 

*01.भक्ति योग क्या है? और भक्ति योग का अर्थ क्या होता है? 

*02.गीता के अनुसार भक्ति योग क्या है? 

*03.भक्ति योग के कितने प्रकार होते हैं? 

*04.भक्ति योग कैसे किया जाता है? 

*05.भक्ति योग के 8 अंग कौन से हैं? 

*06.भक्ति योग के 9 रूप क्या हैं? 

*07.भक्ति योग के जनक कौन हैं? 

*08.भक्ति योग किसने लिखा है? 

*09.भक्ति योग की कितनी विधियां हैं? 

*10.भक्ति योग से संबंधित वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और शारीरिक पहलुओं की विवेचना  

*11.ब्लॉग से संबंधित प्रश्न और उत्तर बनाकर 

*12.अनसूलझे पहलुओं की जानकारी 

भक्ति योग क्या है? और भक्ति योग का अर्थ क्या होता है?

भक्ति योग सनातन दर्शन और आध्यात्मिकता में मोक्ष प्राप्ति के तीन प्रमुख मार्गों में से एक है, जो प्रेम और समर्पण का मार्ग कहलाता है। भक्ति शब्द संस्कृत के 'भज' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'सेवा करना', 'भाग लेना' या 'श्रद्धापूर्वक आराधना करना'। अतः भक्ति योग का सीधा-सा अर्थ है – प्रेमपूर्ण भक्ति के माध्यम से परमात्मा से जुड़ने की क्रिया एवं कला।

कर्म योग जहां कर्म पर और ज्ञान योग जहां बुद्धि पर बल देते हैं, वहीं भक्ति योग हृदय की शुद्ध भावना पर केंद्रित है। इसमें भक्त अपने आराध्य देव या ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण भाव रखते हुए सभी कर्म उन्हें अर्पित कर देता है। यह भावना इतनी गहरी और निःस्वार्थ होती है कि भक्त को ईश्वर के सान्निध्य की अनुभूति होने लगती है और वह संसार के दुःख-सुख से ऊपर उठकर दिव्य आनंद में स्थित हो जाता है।

भक्ति योग का अर्थ केवल मंदिर जाना या कीर्तन करना ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक समग्र तरीका है। इसमें प्रत्येक कर्म, विचार और शब्द ईश्वर को समर्पित होता है। इस मार्ग का सार यह है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को विसर्जित करके परमात्मा की इच्छा में पूर्णतः लीन हो जाता है, तो स्वतः ही वह मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो जाता है। भक्ति योग किसी विशिष्ट धर्म या सम्प्रदाय तक सीमित नहीं है; यह एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक भावना है जो प्रेम के माध्यम से जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ती है।

गीता के अनुसार भक्ति योग क्या है?

श्रीमद्भगवद्गीता, जो भक्ति योग का प्रमुख ग्रंथ मानी जाती है, में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विस्तार से इस मार्ग का उपदेश दिया है। गीता के नवम अध्याय को विशेष रूप से 'राज विद्या-राजगुह्य योग' कहा गया है, जो सर्वोच्च ज्ञान और परम गोपनीय रहस्य के रूप में भक्ति योग का ही वर्णन करता है।

गीता में भक्ति योग को सबसे सरल और सुलभ मार्ग बताया गया है। भगवान कृष्ण कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति, चाहे उसका जन्म या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो, यदि श्रद्धापूर्वक मेरी भक्ति करे, तो वह मुझे प्राप्त कर सकता है (गीता 9.32)। गीता के अनुसार, भक्ति योग का सार है – सर्वभावेन मामं भज (हर भाव से मेरी भक्ति करो)। इसमें भगवान को प्रत्येक वस्तु का स्रोत मानकर, सभी कर्मों का फल उन्हें अर्पित कर देना (कर्मफल त्याग) शामिल है।

गीता में भक्ति के तीन प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं: आर्त (संकट में सहायता के लिए), जिज्ञासु (ज्ञान प्राप्ति हेतु) और अर्थार्थी (लाभ के लिए)। लेकिन सर्वोच्च भक्त वह है जो केवल प्रेम वश, बिना किसी स्वार्थ के भगवान से प्रेम करता है। इस प्रकार गीता का भक्ति योग शास्त्रीय कर्म और गहन प्रेम का अनूठा संगम है।

भक्ति योग के कितने प्रकार होते हैं?

परंपरागत रूप से, भक्ति योग को मुख्यतः दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति।

1. सगुण भक्ति: यह भक्ति का वह स्वरूप है जिसमें भक्त किसी साकार रूप, मूर्ति या देवता (जैसे राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा) को अपना आराध्य मानकर प्रेम और समर्पण भाव से उनकी उपासना करता है। इसमें पूजा, आरती, कीर्तन, भजन, मंदिर दर्शन आदि साधन प्रमुख हैं। अधिकांश भक्ति परंपराएँ, जैसे वैष्णव भक्ति, इसी श्रेणी में आती हैं।

2. निर्गुण भक्ति: इस मार्ग में भक्त निराकार, गुणरहित, निर्विशेष परब्रह्म की उपासना करता है। यह भक्ति ज्ञान के अधिक निकट मानी जाती है, जहां भक्त ईश्वर के सर्वव्यापी और निराकार स्वरूप में लीन हो जाता है। संत कबीर, गुरु नानक देव जी की वाणी इसी निर्गुण भक्ति की अभिव्यक्ति है।

इसके अलावा, भक्ति भाव के स्तर के आधार पर नवधा भक्ति (भक्ति के नौ रूप) का वर्गीकरण भी प्रसिद्ध है, जिसका वर्णन आगे किया गया है। साथ ही, भक्ति को वैधी भक्ति (नियमबद्ध) और रागानुगा भक्ति (प्रेम की स्वाभाविक धारा में बहना) में भी बाँटा जाता है।

भक्ति योग कैसे किया जाता है?

भक्ति योग का अभ्यास बेहद सरल और हृदय से किया जाने वाला साधन है। इसकी शुरुआत श्रद्धा और विश्वास से होती है। मुख्य अभ्यास विधियों में शामिल हैं:

· भगवान का स्मरण व जप: मंत्र जप (जैसे 'ॐ नमः शिवाय' या 'हरे कृष्ण हरे राम') करना या दिन भर में किसी भी समय ईश्वर का नाम लेते रहना।

कीर्तन व भजन: सामूहिक रूप से या अकेले भगवान के गुणगान करते हुए भक्तिपूर्ण गीत गाना।

पूजा-अर्चना: घर या मंदिर में देवताओं की मूर्ति या चित्र के सामने फूल, जल आदि अर्पित कर नियमित पूजा करना।

शास्त्र अध्ययन: गीता, रामायण, भागवत पुराण आदि पवित्र ग्रंथों का पाठ व श्रवण करना।

सत्संग: संतों-महात्माओं की संगति में बैठना और आध्यात्मिक चर्चा सुनना।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी कार्य ईश्वर को समर्पित भाव से किए जाएं और अहंकार का त्याग किया जाए।
भक्ति योग के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता कोलाज: जिसमें साधक, सगुण-निर्गुण उपासना, गीता उपदेश, आधुनिक जीवन में भक्ति और सामूहिक कीर्तन का चित्रण है।

"भक्ति योग केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है जो मन को शांति और हृदय को आनंद से भर देती है।"

भक्ति योग के 8 अंग कौन से हैं?

भक्ति योग की साधना को व्यवस्थित रूप देने के लिए नारद भक्ति सूत्र में भक्ति के आठ अंग बताए गए हैं। ये अंग भक्त के दैनिक जीवन और आचरण को दिशा देते हैं:

1. श्रवण: भगवान की लीलाओं, महिमा और नाम का श्रद्धापूर्वक सुनना।

2. कीर्तन: भगवान के गुणों और कथाओं का गान करना, भजन-कीर्तन करना।

3. स्मरण: मन, वचन और कर्म से निरंतर ईश्वर का स्मरण करना।

4. पादसेवन: भगवान के चरणों की सेवा का भाव रखना; प्रायः गुरु या संतों के चरण स्पर्श से इसकी शुरुआत होती है।

5. अर्चन: मूर्ति या चित्र के रूप में भगवान की पूजा-अर्चना करना।

6. वंदन: भगवान, गुरु, संत और सभी जीवों में ईश्वर के दर्शन करते हुए विनम्र भाव से प्रणाम करना।

7. दास्य: स्वयं को भगवान का दास मानकर सेवा-भाव रखना।

8. सख्य: भगवान को अपना सखा (मित्र) मानकर प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करना।

9. आत्मनिवेदन: स्वयं को पूर्णतः भगवान के चरणों में समर्पित कर देना (कुछ ग्रंथों में यह नवां अंग भी माना जाता है)।

इन आठ अंगों का पालन करके भक्त धीरे-धीरे अपने हृदय को शुद्ध करते हुए परमात्मा के निकट पहुंचता है।

भक्ति योग के 9 रूप क्या हैं?

श्रीमद्भागवत महापुराण में प्रहलाद द्वारा नवधा भक्ति (भक्ति के नौ रूप) का उल्लेख किया गया है। ये भक्ति के विविध और प्रगतिशील सोपान हैं:

1. श्रवणम: भगवान की कथाएं सुनना।

2. कीर्तनम: भगवान के गुणों का गान करना।

3. स्मरणम: भगवान का निरंतर स्मरण करना।

4. पादसेवनम्: भगवान के चरणों की सेवा करना।

5. अर्चनम्: भगवान की मूर्ति की पूजा करना।

6. वंदनम्: भगवान को प्रणाम करना।

7. दास्यम्: भगवान का दास बनना।

8. सख्यम्: भगवान को मित्र मानना।

9. आत्मनिवेदनम्: अपने आपको भगवान को पूर्णतः अर्पित कर देना।

ये नौ रूप भक्ति के विकासक्रम को दर्शाते हैं, जो सुनने से शुरू होकर पूर्ण आत्मसमर्पण पर समाप्त होता है। यह माना जाता है कि इनमें से किसी एक को भी पूर्ण श्रद्धा से करने पर भक्त को ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।

भक्ति योग के जनक कौन हैं?

भक्ति योग की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है और इसके मूल वेदों एवं उपनिषदों में पाए जाते हैं। हालांकि, वैष्णव भक्ति आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और सुव्यवस्थित दार्शनिक आधार प्रदान करने का श्रेय आचार्य शंकर, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और वल्लभाचार्य जैसे दार्शनिक-संतों को जाता है।

इनमें से भी श्री रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) को अक्सर भक्ति आंदोलन का महान प्रणेता माना जाता है, जिन्होंने 'विशिष्टा द्वैत' दर्शन के माध्यम से भक्ति को ज्ञान और कर्म के साथ समन्वित किया। उन्होंने सभी वर्गों के लिए भक्ति के द्वार खोले। इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु (1486-1534 ई.) ने संकीर्तन आंदोलन को बल देकर भक्ति योग को जन-जन तक पहुंचाया। इस प्रकार, भक्ति योग एक सामूहिक आध्यात्मिक विरासत है, जिसके विकास में अनेक संतों का योगदान रहा है।

भक्ति योग किसने लिखा है?

भक्ति योग किसी एक व्यक्ति द्वारा लिखित कोई पुस्तक नहीं है, बल्कि यह एक सदियों पुरानी सनातन आध्यात्मिक परंपरा है। इसके सिद्धांत और विधियां विभिन्न भारतीय धर्मग्रंथों में वर्णित हैं। प्रमुख ग्रंथों में शामिल हैं:

· श्रीमद्भगवद्गीता: इसमें भगवान कृष्ण द्वारा भक्ति योग का स्पष्ट उपदेश दिया गया है।

श्रीमद्भागवत पुराण: इसे भक्ति का प्रमुख ग्रंथ माना जाता है, जिसमें भक्ति के नौ रूप और अनेक भक्तों की कथाएँ हैं।

नारद भक्ति सूत्र: ऋषि नारद द्वारा रचित यह ग्रंथ विशेष रूप से भक्ति के सिद्धांतों, प्रकारों और अंगों पर केंद्रित है।

शांडिल्य भक्ति सूत्र: ऋषि शांडिल्य द्वारा रचित भक्ति का एक और महत्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथ।

· रामचरितमानस, गुरु ग्रंथ साहिब, संत कबीर, मीराबाई, तुलसीदास जी आदि के पद भक्ति योग के साहित्यिक एवं व्यावहारिक स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं।

भक्ति योग की कितनी विधियां हैं?

भक्ति योग में आत्मसमर्पण का भाव प्रमुख है, फिर भी इसे व्यवहार में लाने के लिए अनेक विधियां और साधन प्रचलित हैं। मुख्यतः इन्हें दो श्रेणियों में देखा जा सकता है:

1. वैधी भक्ति (नियमानुसार भक्ति): यह शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए की जाने वाली भक्ति है। इसमें नियमित पूजा-पाठ, मंत्र जप, व्रत, तीर्थयात्रा, दान आदि शामिल हैं। यह विधि शुरुआती साधकों के लिए मार्गदर्शक का काम करती है।

2. रागानुगा भक्ति (प्रेमानुसार भक्ति): यह भक्ति का उच्चतम स्तर है, जहां भक्त शास्त्रीय नियमों से बंधा न होकर, शुद्ध प्रेम की स्वाभाविक धारा में बहता है। इसमें भगवान के प्रति सखा-भाव, वात्सल्य-भाव या माधुर्य-भाव (प्रेमी-प्रेमिका का भाव) जैसी गहन अनुभूतियां होती हैं। मीराबाई और चैतन्य महाप्रभु की भक्ति इसी श्रेणी में आती है।

इनके अतिरिक्त, व्यक्तिगत प्रवृत्ति के आधार पर ज्ञान मिश्रित भक्ति, कर्म मिश्रित भक्ति और शुद्ध भक्ति जैसी विधियां भी प्रसिद्ध हैं। संक्षेप में, भक्ति योग की विधियां उतनी ही विविध हैं, जितने इस मार्ग पर चलने वाले भक्तों के हृदय।
"भक्ति योग का अभ्यास करता हुआ साधक मंदिर के समीप ध्यान में लीन | Bhakti Yoga Meditation"

"यह चित्र भक्ति योग का अभ्यास करते एक साधक को दर्शाता है, जो मंदिर की पवित्र पृष्ठभूमि में माला जप करते हुए ध्यानमग्न है। भक्ति योग आत्मिक शांति, प्रेम और ईश्वर से जुड़ने का मार्ग है"

भक्ति योग: वैज्ञानिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और शारीरिक पहलू

भक्ति योग केवल एक धार्मिक प्रथा नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन पद्धति है, जिसके विविध पहलू आधुनिक संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं।

वैज्ञानिक पहलू: आधुनिक विज्ञान मानता है कि भक्तिपूर्ण गतिविधियां जैसे कीर्तन, मंत्र जप और ध्यान, मस्तिष्क तंत्र पर गहरा प्रभाव डालती हैं। ये अभ्यास तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का स्तर कम करते हुए, हैप्पीनेस हार्मोन्स जैसे सेरोटोनिन और डोपामाइन के स्राव को बढ़ाते हैं। नियमित भक्ति अभ्यास हृदय गति को संतुलित करके, रक्तचाप कम करके और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है।

सामाजिक पहलू: सामूहिक कीर्तन, सत्संग और उत्सव सामाजिक एकजुटता और समरसता को बढ़ावा देते हैं। यह मार्ग जाति, लिंग या वर्ग के भेद से ऊपर उठकर समानता का संदेश देता है, जैसा कि भक्ति आंदोलन के इतिहास में देखा गया। यह सामुदायिक भावना को मजबूत करने का एक शक्तिशाली साधन है।

आध्यात्मिक पहलू: यह भक्ति योग का केंद्रीय आधार है। इसका लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा से मिलन है। भक्ति के माध्यम से व्यक्ति अहंकार के बंधन से मुक्त होकर प्रेम, करुणा और आंतरिक शांति का अनुभव करता है, जो सभी धर्मों का सार्वभौमिक लक्ष्य है।

शारीरिक पहलू: भजन-कीर्तन से श्वसन तंत्र मजबूत होता है। प्रणाम और पूजा में शरीर की सक्रियता रहती है। सबसे बड़ी बात, मानसिक शांति और तनाव में कमी शरीर की स्व-चिकित्सा क्षमता (हीलिंग) को सक्रिय करने में मदद करती है।

भक्ति योग से संबंधित प्रश्नोत्तर (FAQ)

1. क्या भक्ति योग केवल हिंदुओं के लिए है?

नहीं,भक्ति योग किसी विशेष धर्म तक सीमित नहीं है। यह प्रेम और समर्पण का सार्वभौमिक मार्ग है। कोई भी व्यक्ति, किसी भी धर्म का हो, अपने ईश्वर या दिव्य शक्ति के प्रति इस भाव को विकसित कर सकता है।

2. क्या बिना किसी गुरु के भक्ति योग का अभ्यास शुरू कर सकते हैं?

हां,शुरुआत स्वयं से कर सकते हैं। सरल भजन सुनना, मंत्र जप करना या प्रेरणादायक ग्रंथ पढ़ना आरंभ कर सकते हैं। हालांकि, गहन साधना के लिए एक योग्य गुरु का मार्गदर्शन लाभदायक होता है।

3. भक्ति योग और प्रेम में क्या अंतर है?

सांसारिक प्रेम अक्सर स्वार्थ और आसक्ति से जुड़ा होता है, जबकि भक्ति का प्रेम निःस्वार्थ, शुद्ध और पूर्ण समर्पण पर आधारित होता है, जिसमें केवल देना ही होता है, लेने की इच्छा नहीं।

4. आधुनिक व्यस्त जीवन में भक्ति योग कैसे अपनाएं?

दिन में कुछ मिनट भी ईश्वर का स्मरण, मन ही मन प्रणाम या काम शुरू करने से पहले उसे ईश्वर को अर्पित करने के भाव से किया जा सकता है। लंच ब्रेक में एक भजन सुनना भी एक सरल शुरुआत है।

5. क्या भक्ति योग से मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं?

निश्चित रूप से।यह चिंता, अवसाद और एकाकीपन की भावना को कम करने में सहायक है। भक्ति का भाव मन को सकारात्मकता और आशा से भरता है, जिससे मानसिक संतुलन बनता है।

भक्ति योग के अनसुलझे एवं विवादित पहलू

भक्ति योग एक गहन आध्यात्मिक विषय है, फिर भी कुछ पहलू ऐसे हैं जिन पर विद्वानों व साधकों में मतभेद या अनसुलझे प्रश्न बने हुए हैं:

1. सगुण बनाम निर्गुण भक्ति की श्रेष्ठता: एक ओर सगुण उपासक मूर्ति पूजा को साधना का अनिवार्य साधन मानते हैं, वहीं निर्गुण परंपरा इसे बाह्य आडंबर कहती है। कौन सा मार्ग अधिक प्रभावी है, यह एक व्यक्तिगत अनुभूति का विषय बना हुआ है।

2. भक्ति में आचार-विचार की अनिवार्यता: क्या सच्ची भक्ति के लिए शास्त्रीय नियमों, शुद्ध आहार या विशेष वेशभूषा का पालन अनिवार्य है? कई संतों ने इन बाह्य नियमों को गौण बताया है, जबकि परंपरावादी इन्हें महत्व देते हैं।

3. भक्ति और ज्ञान का सही संबंध: क्या भक्ति के शिखर पर पहुंचकर ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है, या ज्ञान के बिना भक्ति अपूर्ण रहती है? इस संबंध में विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों के अलग-अलग मत हैं।

4. भक्ति की सफलता का मापदंड: भक्ति की सफलता का आकलन किस आधार पर हो? क्या यह केवल आंतरिक अनुभूति है या फिर भक्त के चरित्र और कर्मों में परिवर्तन से इसे मापा जा सकता है? इसका कोई सर्वमान्य वैज्ञानिक या सार्वभौमिक मापदंड नहीं है।

डिस्क्लेमर

इस ब्लॉग में प्रस्तुत सभी जानकारी शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय, धार्मिक या कानूनी सलाह नहीं है। भक्ति योग एक आध्यात्मिक साधना है, और इसे किसी योग्य गुरु या आचार्य के मार्गदर्शन में ही अभ्यास करने की सलाह दी जाती है।

लेखक और प्रकाशक किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हानि, चोट या क्षति के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे, जो इस जानकारी के उपयोग या दुरुपयोग से उत्पन्न हो सकती है। धार्मिक मामलों में व्यक्तिगत विश्वास और समझ सर्वोपरि है। किसी भी गंभीर साधना या जीवनशैली परिवर्तन से पहले अपने विवेक का प्रयोग करें तथा आवश्यकतानुसार विशेषज्ञ से परामर्श लें।

इस ब्लॉग में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने हैं, जो विभिन्न ग्रंथों और अनुभवों पर आधारित हैं, तथा ये सभी पाठकों के लिए अनिवार्य रूप से मान्य नहीं हो सकते।


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