क्या है शिवपुराण के अनुसार मोक्ष प्राप्ति का संपूर्ण मार्ग: क्या कलयुग में भी संभव है मुक्ति
byRanjeet Singh-
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शिवपुराण के अनुसार मोक्ष क्या है? जानें मोक्ष के 03 मार्ग, 03 प्रक्रियाएं और 07 चरण। कलयुग में शिवलिंग पूजन व नाम स्मरण कर कैसे पाएं मोक्ष ? मोक्ष का अंतिम लक्ष्य व प्राप्ति के लक्षण। पढ़ें विस्तृत जानकारी"
*शिवपुराण के अनुसार मोक्ष प्राप्ति का संपूर्ण मार्ग: "कलयुग में भी संभव है मुक्ति"
*आपने अक्सर सुना होगा - "मोक्ष की कामना" या "मुक्ति का मार्ग"। पर क्या वाकई समझते हैं कि मोक्ष है क्या? सनातन धर्मशास्त्रों में मोक्ष को मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है, लेकिन आधुनिक दौर में यह शब्द एक रहस्यमय अवधारणा बनकर रह गया है। क्या मोक्ष सिर्फ संन्यासियों और तपस्वियों के लिए है? क्या सामान्य गृहस्थ जीवन जीते हुए भी मुक्ति संभव है? और सबसे बड़ा सवाल - कलयुग में जहां धैर्य की कमी है और भौतिकता हावी है, वहां मोक्ष की प्राप्ति कैसे हो सकती है?
*इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देती है शिवपुराण - भगवान शिव से संबंधित महत्वपूर्ण पुराण, जो मोक्ष के मार्ग को न सिर्फ समझाता है बल्कि इसे हर युग के अनुकूल ढालकर प्रस्तुत करता है। आज के इस भागदौड़ भरे युग में जब मानसिक तनाव, अस्तित्व के संकट और आध्यात्मिक खोज लोगों को परेशान कर रही है, शिवपुराण का मोक्ष मार्ग एक प्रकाश स्तंभ की तरह है।
*मोक्ष का अर्थ महज मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ति नहीं है। यह तो जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति है। शिवपुराण के अनुसार, जब तक जीव आठ प्रकार के बंधनों - प्रकृति, बुद्धि, अहंकार और पांच तन्मात्राओं (सूक्ष्म तत्वों) में जकड़ा रहता है, तब तक वह कर्म के बंधन में फंसा रहता है। मोक्ष इन सभी बंधनों से मुक्ति का नाम है।
*अद्भुत बात यह है कि शिवपुराण कलयुग को मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे सरल युग बताता है! जी हां, सत्य तो यह है कि कलयुग में सच्चे मन से की गई भक्ति और सरल साधना त्रेतायुग के यज्ञों और द्वापरयुग की कठिन तपस्याओं से भी अधिक फलदायी मानी गई है। भगवान शिव स्वयं पार्वती जी को बताते हैं कि इस युग में शिवलिंग पूजन, नाम स्मरण और सच्ची भक्ति ही मुक्ति का सीधा मार्ग है।
*इस विस्तृत ब्लॉग में हम शिवपुराण के आधार पर मोक्ष के हर पहलू को समझेंगे - मोक्ष मार्ग की कथा से लेकर उसके विधान तक, तीन मुख्य मार्गों से लेकर सात चरणों तक, कलयुग में मोक्ष की सरल विधि से लेकर मोक्ष प्राप्ति के लक्षणों तक। यह कोई सैद्धांतिक चर्चा नहीं बल्कि एक व्यावहारिक मार्गदर्शन है उन सभी के लिए जो जीवन के चरम लक्ष्य को समझना और प्राप्त करना चाहते हैं।
*तो आइए, इस पावन यात्रा पर चलते हैं और जानते हैं कि कैसे भगवान शिव की कृपा से कोई भी साधक इस कलयुग में भी मोक्ष रूपी परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
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*शिवपुराण में वर्णित मोक्ष मार्ग की कथा क्या है?
*मोक्ष मार्ग क्या है और क्या है उसका विधान?
*मोक्ष प्राप्ति के तीन मुख्य मार्ग कौन-कौन से बताए गए हैं?
*मोक्ष की तीन प्रक्रियाएं क्या हैं?
*मोक्ष के सात चरण कौन-कौन से हैं?
*कलयुग में मोक्ष की प्राप्ति कैसे होती है?
*मोक्ष के देवता कौन हैं?
*मोक्ष का अंतिम लक्ष्य क्या है?
*कैसे पता चलेगा कि आत्मा ने मोक्ष प्राप्त कर लिया है?
"शिवपुराण में वर्णित मोक्ष मार्ग की कथा"
*शिवपुराण में मोक्ष मार्ग की अनेक कथाएं विस्तार से वर्णित हैं, जिनमें से एक प्रमुख कथा भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद पर आधारित है। एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से प्रश्न किया: "प्रभु, इस संसार में जीव कर्मों के बंधन में बंधा रहता है। उसे इन बंधनों से मुक्ति कैसे मिल सकती है? मोक्ष का वास्तविक मार्ग क्या है?"
*भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया: "हे पार्वती, मोक्ष का मार्ग कोई बाहरी यात्रा नहीं है, यह तो आंतरिक चेतना का जागरण है। जब तक जीव प्रकृति के आठ तत्वों - प्रकृति स्वयं, बुद्धि, अहंकार और पांच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के सूक्ष्म रूप) में बंधा रहता है, तब तक वह मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता।"
*शिव जी ने आगे समझाया: "इन आठ तत्वों को वश में करने का एकमात्र उपाय है मेरी कृपा प्राप्त करना। क्योंकि मैं ही इन सबका स्वामी हूँ। मेरी कृपा से ये सभी तत्व वश में हो जाते हैं और जीव बंधनों से मुक्त हो जाता है।"
*इस पर पार्वती जी ने पूछा: "और प्रभु, आपकी कृपा कैसे प्राप्त हो सकती है?"
*भगवान शिव ने कहा: "मेरी कृपा पाने के अनेक मार्ग हैं, किंतु उनमें से एक सरलतम मार्ग है शिवपुराण का श्रवण और मनन। मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ जो इसे प्रमाणित करती है।"
*भगवान शिव ने एक ऐसे व्यक्ति की कथा सुनाई जो जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रहा। उसने धर्म, नैतिकता और सदाचार का कभी पालन नहीं किया। जीवन के अंतिम समय में जब वह मरणासन्न अवस्था में था, तब संयोगवश उसके कानों में शिवपुराण कथा का एक अंश पड़ा। उस अंश में भगवान शिव की महिमा और उनकी कृपा का वर्णन था।
*मरणासन्न अवस्था में भी उस व्यक्ति ने शिवपुराण के उस अंश को पूरे मन से सुना और भगवान शिव का स्मरण किया। मात्र श्रवण मात्र से ही उसके सारे पाप नष्ट हो गए और अंतिम समय में भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।
*यह कथा सुनाने के बाद भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा: "देखा, हे देवी, शिवपुराण का श्रवण मात्र ही कितना पुण्यदायी है। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से शिवपुराण की कथा सुनता है या पढ़ता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।"
*एक अन्य कथा में, एक साधारण गृहस्थ की कहानी है जिसने नियमित रूप से शिवलिंग की पूजा की और शिव मंत्र का जप किया। उसने कभी कठिन तपस्या नहीं की, न ही वन में जाकर साधना की। वह सामान्य जीवन जीता रहा, परंतु नियमित शिव पूजन और सच्ची भक्ति के कारण भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसे जीवन मुक्ति का वरदान दिया। जीवन मुक्ति का अर्थ है - जीते जी ही सभी बंधनों से मुक्त हो जाना।
*शिवपुराण की इन कथाओं से स्पष्ट संदेश मिलता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या या दुर्गम साधना आवश्यक नहीं है। सच्चे हृदय से की गई भक्ति, शिवपुराण का श्रवण-मनन और नियमित शिव पूजन ही मोक्ष का सरलतम मार्ग है। भगवान शिव सहज भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करते हैं।
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"मोक्ष मार्ग क्या है और क्या है उसका विधान"
*मोक्ष मार्ग वह आध्यात्मिक पथ है जिस पर चलकर जीवात्मा सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाती है। शिवपुराण के अनुसार, मोक्ष मार्ग मूलतः भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का मार्ग है। यह कोई बाहरी यात्रा नहीं बल्कि एक आंतरिक परिवर्तन है जहां जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।
*मोक्ष मार्ग का विधान शिवपुराण में विस्तार से बताया गया है, जिसे हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
*01. प्रारंभिक तैयारी (शुद्धिकरण): मोक्ष मार्ग पर चलने से पहले मन और चित्त की शुद्धि आवश्यक है। इसमें पंचशुद्धि - देह शुद्धि, मन शुद्धि, बुद्धि शुद्धि, आत्म शुद्धि और भाव शुद्धि सम्मिलित है। शिवपुराण में इन शुद्धियों के लिए सात्विक आहार, सत्संग, नैतिक जीवन और नियमित पूजा-अर्चना का सुझाव दिया गया है।
*02. गुरु की खोज: शिवपुराण में गुरु को शिव का ही रूप माना गया है। एक योग्य गुरु की कृपा के बिना मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ना कठिन है। गुरु ही शिष्य को दीक्षा देते हैं और उसके आंतरिक बंधनों को काटते हैं। गुरु ढूंढने के लिए सच्ची लगन और भक्ति आवश्यक है।
*03. शिव भक्ति का अभ्यास: यह मोक्ष मार्ग का मुख्य भाग है। इसमें निम्नलिखित प्रथाएं सम्मिलित हैं:
*शिवलिंग पूजन: प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाना, बिल्व पत्र अर्पित करना और धूप-दीप दिखाना।
*मंत्र जप: 'ॐ नमः शिवाय' महामंत्र का नियमित जप। शिवपुराण के अनुसार, इस मंत्र के जप से सभी पाप नष्ट होते हैं।
*शिव पुराण पाठ: नियमित रूप से शिवपुराण के अध्यायों का पाठ या श्रवण करना।
शिव ध्यान: प्रतिदिन कम से कम एक बार भगवान शिव का ध्यान करना।
*04. आठ बंधनों से मुक्ति का प्रयास: शिवपुराण के अनुसार, जीव आठ तत्वों में बंधा है - प्रकृति, बुद्धि, अहंकार और पांच तन्मात्राएं। मोक्ष मार्ग पर चलते हुए साधक को इन बंधनों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। यह आत्मज्ञान से संभव है जो शिव कृपा से प्राप्त होता है।
*05. कर्मयोग का पालन: मोक्ष मार्ग का अर्थ संसार से पलायन नहीं है। शिवपुराण में कर्मयोग पर बल दिया गया है - अर्थात अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी शिवभक्ति में लीन रहना। यह गृहस्थ जीवन में भी मोक्ष प्राप्ति संभव बनाता है।
*06. अंतिम लक्ष्य - शिव में विलीन होना: मोक्ष मार्ग का अंतिम विधान है शिव में पूर्णतया विलीन हो जाना। इसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं, जहां जीव और शिव में कोई भेद नहीं रह जाता।
*मोक्ष मार्ग का विधान कोई कठोर नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक लचीला एवं व्यावहारिक मार्गदर्शन है जो हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अपना सकता है। शिवपुराण की महानता यही है कि यह मोक्ष को सभी के लिए सुलभ बनाता है।
"मोक्ष प्राप्ति के तीन मुख्य मार्ग"
*शिवपुराण में मोक्ष प्राप्ति के लिए तीन प्रमुख मार्ग बताए गए हैं, जो वास्तव में तीन प्रकार की दीक्षाएं हैं जो गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान की जाती हैं। ये मार्ग साधक की क्षमता और तत्परता के अनुसार चुने जाते हैं:
*01. शाम्भवी दीक्षा: यह सबसे उच्चकोटि की दीक्षा है और सर्वाधिक सूक्ष्म मार्ग माना जाता है। इसमें गुरु मात्र दृष्टिपात, स्पर्श या संभाषण के माध्यम से ही शिष्य को आत्मज्ञान प्रदान कर देता है। इस दीक्षा में किसी बाह्य क्रिया या अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती। गुरु की शक्ति और कृपा से शिष्य के सारे बंधन तत्काल कट जाते हैं। यह मार्ग उच्चस्तरीय साधकों के लिए है जो पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं।
*02. शक्ति दीक्षा: इस मार्ग में गुरु योग बल से शिष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं और उसे ज्ञानदृष्टि प्रदान करते हैं। यह एक मध्यम मार्ग है जहां गुरु और शिष्य के बीच ऊर्जा का सीधा आदान-प्रदान होता है। गुरु अपनी आध्यात्मिक शक्ति से शिष्य के अंदर छिपे ज्ञान को प्रकट कर देता है। इस दीक्षा के लिए शिष्य का शुद्ध और तैयार होना आवश्यक है।
*03. मान्त्री दीक्षा: यह सबसे सामान्य और व्यावहारिक मार्ग है जो अधिकांश साधकों के लिए उपयुक्त है। इसमें मंत्रों, यज्ञों और विधि-विधानों का प्रयोग किया जाता है। गुरु शिष्य को मंत्र दीक्षा देता है, होम कुंड बनवाता है और विधिपूर्वक यज्ञ करवाता है। इस मार्ग में बाह्य क्रियाओं के माध्यम से आंतरिक परिवर्तन लाया जाता है। शिवपुराण में इस मार्ग का विस्तार से वर्णन मिलता है क्योंकि यह आम लोगों के लिए सबसे सुलभ है।
*इन तीनों मार्गों का सार एक ही है - गुरु की कृपा प्राप्त करना। शिवपुराण स्पष्ट करता है कि गुरु के बिना मोक्ष प्राप्ति असंभव है, क्योंकि गुरु ही भगवान शिव का प्रतिनिधि होता है जो शिष्य को सही मार्ग दिखाता है।
"मोक्ष की तीन प्रक्रियाएं"
*शिवपुराण में मोक्ष को एक सीधी प्रक्रिया नहीं बल्कि तीन चरणों में प्राप्त होने वाली मुक्ति बताया गया है। इन्हें तीन प्रकार की मुक्तियां कहा गया है जो भगवान शिव की कृपा की तीव्रता के अनुसार प्राप्त होती हैं:
*01. सालोक्य मुक्ति: यह मोक्ष की प्राथमिक प्रक्रिया है। जब साधक के कर्मजनित शरीर पर नियंत्रण हो जाता है और वह इच्छाओं के वशीभूत नहीं होता, तब उसे भगवान शिव के लोक (कैलाश) में निवास का अवसर प्राप्त होता है। यहाँ वह शिव के समीप रहता है, उनके दर्शन करता है और उनकी सेवा में लीन रहता है। सालोक्य का अर्थ है - शिव के समान लोक में निवास। यह प्रक्रिया अधिकांश भक्तों के लिए प्राप्त होने वाली मुक्ति है।
*02. सार्ष्टि मुक्ति: यह एक उच्चतर प्रक्रिया है। जब साधक की बुद्धि पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाती है और वह माया के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, तब उसे शिव के समान आयुध और शक्तियां प्राप्त होती हैं। सार्ष्टि का अर्थ है - शिव के समान ऐश्वर्य। इस स्तर पर साधक शिव के गणों के समान हो जाता है और उनके साथ कैलाश में निवास करता है। उसे दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं परंतु अभी भी वह शिव से पृथक रहता है।
*03. सायुज्य मुक्ति: यह मोक्ष की परम और अंतिम प्रक्रिया है। जब साधक की प्रकृति भी पूर्ण रूप से वश में हो जाती है और वह अपने अहंकार को पूरी तरह समाप्त कर देता है, तब वह भगवान शिव में पूर्णतया विलीन हो जाता है। सायुज्य का अर्थ है - शिव के साथ पूर्ण मिलन। इस स्तर पर जीव और शिव में कोई अंतर नहीं रह जाता। साधक को शिव के समान ही सर्वज्ञता, पूर्ण तृप्ति और अनंत ऐश्वर्य प्राप्त हो जाते हैं। यह वास्तविक मोक्ष है जहां जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
*इन तीनों प्रक्रियाओं को प्राप्त करने का आधार है - शिव की कृपा की तीव्रता। जितनी गहन भक्ति और समर्पण, उतनी ही उच्च प्रक्रिया की प्राप्ति।
"मोक्ष के सात चरण"
*शिवपुराण में मोक्ष प्राप्ति के लिए सात क्रमिक चरणों का वर्णन मिलता है। ये चरण एक साधक की आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाते हैं जो सामान्य जीवन से शुरू होकर शिव में पूर्ण विलय पर समाप्त होती है। इन सात चरणों को समझना मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
*01. शुद्धि चरण (शुद्धिकरण): यह पहला और आधारभूत चरण है। इसमें साधक अपने शरीर, मन और बुद्धि की शुद्धि करता है। पंच शुद्धि - शरीर शुद्धि, मन शुद्धि, बुद्धि शुद्धि, आत्म शुद्धि और भाव शुद्धि इसी चरण में संपन्न होती है। सात्विक आहार, नैतिक जीवन, सत्संग और नियमित स्नान-ध्यान इस चरण के मुख्य साधन हैं। बिना शुद्धि के आगे की यात्रा संभव नहीं है।
*02. भक्ति चरण (आराधना): शुद्धि के बाद भक्ति का चरण आता है। इसमें साधक शिव की नियमित पूजा-अर्चना करता है। शिवलिंग पूजन, अभिषेक, धूप-दीप, नैवेद्य आदि इसी चरण के अंग हैं। इस चरण का उद्देश्य शिव के प्रति प्रेम और समर्पण विकसित करना है। भक्ति चरण में साधक शिव को अपना सर्वस्व मानने लगता है।
*03. मंत्र चरण (जप-तप): तीसरे चरण में साधक मंत्र साधना में प्रवृत्त होता है। 'ॐ नमः शिवाय' महामंत्र का नियमित जप इस चरण का मुख्य अंग है। शिवपुराण के अनुसार, इस मंत्र के निरंतर जप से सभी पाप नष्ट होते हैं और मन शांत होता है। इस चरण में साधक तपस्या भी कर सकता है जैसे - व्रत, उपवास, मौन आदि।
*04. ज्ञान चरण (आत्मचिंतन): चौथे चरण में साधक आत्मज्ञान की खोज करता है। वह स्वयं को जानने का प्रयास करता है - "मैं कौन हूँ?", "मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है?" इस चरण में शिवपुराण, उपनिषद् और अन्य ज्ञान ग्रंथों का अध्ययन किया जाता है। साधक गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है और आत्मचिंतन करता है।
*05. ध्यान चरण (समाधि): पांचवें चरण में साधक शिव का निरंतर ध्यान करता है। प्रतिदिन कई घंटे ध्यान में बिताए जाते हैं। ध्यान के माध्यम से साधक का चित्त शांत होता है और वह आंतरिक शांति का अनुभव करता है। इस चरण में साधक को समाधि के प्रारंभिक अनुभव होने लगते हैं।
*06. समर्पण चरण (गुरु कृपा): छठे चरण में साधक पूर्ण समर्पण का भाव विकसित करता है। वह स्वयं को और अपने सभी कर्मों को शिव के चरणों में समर्पित कर देता है। इस चरण में गुरु की कृपा विशेष रूप से प्राप्त होती है। साधक गुरु के निर्देशों का पालन करता है और उनकी शरण में रहता है।
*07. विलय चरण (मोक्ष): यह अंतिम और परम चरण है जहां साधक का शिव में पूर्ण विलय हो जाता है। साधक और शिव में कोई भेद नहीं रह जाता। यही वास्तविक मोक्ष है जहां जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। साधक शिव के समान ही सर्वज्ञ और आनंदमय हो जाता है।
*इन सात चरणों की यात्रा कोई कठोर नियम नहीं है, बल्कि एक सहज प्रक्रिया है जो साधक के अभ्यास और शिव कृपा से पूरी होती है। हर साधक अपनी गति से इन चरणों को पार करता है।
"कलयुग में मोक्ष की प्राप्ति कैसे करें"
*कलयुग को अक्सर पतन का युग माना जाता है, परंतु शिवपुराण की आश्चर्यजनक मान्यता है कि कलयुग में मोक्ष प्राप्त करना सबसे सरल है! भगवान शिव स्वयं पार्वती जी को बताते हैं कि इस युग में सच्चे मन से की गई साधना अन्य युगों की कठिन तपस्याओं से भी अधिक फलदायी है। कलयुग में मोक्ष प्राप्ति के कुछ विशेष सरल उपाय हैं:
*01. शिवलिंग पूजन का विशेष महत्व: शिवपुराण में कलयुग के लिए शिवलिंग पूजन को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। एक श्लोक में कहा गया है: "कलौ शिवलिंग पूजायां कोटिजन्मकृतं फलम्"। अर्थात, कलयुग में शिवलिंग की पूजा करने से कोटि जन्मों के पुण्य का फल प्राप्त होता है। नियमित रूप से शिवलिंग पर जल चढ़ाना, बिल्व पत्र अर्पित करना और ओम नमः शिवाय मंत्र का जप करना मोक्ष का सीधा मार्ग है।
*02. नाम स्मरण की शक्ति: कलयुग में भगवान के नाम के स्मरण को विशेष महत्व दिया गया है। "शिव", "शंकर", "महादेव" - इन नामों का निरंतर जप करने से ही मन शुद्ध होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिवपुराण कहता है कि कलयुग में नाम स्मरण ही सबसे बड़ा तप है।
*03. सच्ची भक्ति और दया: इस युग में सरल हृदय से की गई भक्ति सबसे श्रेष्ठ है। बिना दिखावे के, निस्वार्थ भाव से शिव की भक्ति करना। साथ ही, दूसरों पर दया और करुणा करना, परोपकार करना भी मोक्ष का मार्ग है। शिवपुराण के अनुसार, कलयुग में सेवा और दया ही सबसे बड़ी साधना है।
*04. शिवपुराण कथा श्रवण: कलयुग में शिवपुराण की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। यह इस युग की विशेषता है कि जटिल साधनाओं की आवश्यकता नहीं, बस श्रद्धापूर्वक शिवपुराण श्रवण ही पर्याप्त है।
*05. सत्संग और गुरु भक्ति: इस युग में सत्संग का विशेष महत्व है। संतों और साधुओं का सान्निध्य और उनके उपदेश सुनना मोक्ष का सरल मार्ग है। साथ ही, एक सच्चे गुरु की शरण में जाना और उनके निर्देशों का पालन करना।
*शिवपुराण का स्पष्ट संदेश है कि कलयुग में मोक्ष प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या या जटिल साधनाओं की आवश्यकता नहीं है। सच्चे मन से शिवभक्ति और सरल साधना ही इस युग में मुक्ति दिला सकती है।
"मोक्ष के देवता"
*शिवपुराण में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि मोक्ष के एकमात्र दाता भगवान शिव हैं। वे ही संपूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं और उनकी कृपा के बिना कोई भी जीव मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। शिवपुराण में शिव को "मोक्ष दाता", "मुक्तिदाता" और "तारक" कहा गया है।
*शिव का "तारक" नाम इसलिए है क्योंकि वे भक्तों को संसार सागर से पार उतारते हैं। जिस प्रकार नाविक नाव से यात्रियों को नदी पार कराता है, उसी प्रकार शिव भक्तों को जन्म-मरण के सागर से पार कराते हैं। शिवपुराण की एक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपने भक्तों को केवल नाम स्मरण मात्र से ही मोक्ष प्रदान किया है।
*गुरु को भी शिव का ही रूप माना गया है। शिवपुराण कहता है: "गुरुरेव शिवः साक्षात्" - अर्थात गुरु ही साक्षात शिव हैं। गुरु शिव का प्रतिनिधि होता है जो शिष्य को मोक्ष का मार्ग दिखाता है। इसलिए गुरु की कृपा भी शिव की कृपा के समान ही मोक्षदायिनी है।
*शिवपुराण के अनुसार, शिव ही सभी बंधनों के स्वामी हैं। चूंकि जीव आठ तत्वों में बंधा है और शिव इन तत्वों के अधिपति हैं, इसलिए केवल उनकी कृपा से ही ये बंधन टूट सकते हैं। इसीलिए मोक्ष के लिए शिव भक्ति अनिवार्य है।
*मोक्ष का अंतिम लक्ष्य
*मोक्ष का अंतिम लक्ष्य क्या है? क्या यह केवल मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ति है? शिवपुराण के अनुसार, नहीं। मोक्ष का वास्तविक लक्ष्य है जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति पाकर परमात्मा शिव में विलीन हो जाना। इसे समझने के लिए हमें मोक्ष के अंतिम लक्ष्य के तीन पहलुओं को समझना होगा:
*01. सभी बंधनों से पूर्ण मुक्ति: मोक्ष का प्रथम लक्ष्य है आठ प्रकार के बंधनों - प्रकृति, बुद्धि, अहंकार और पांच तन्मात्राओं से पूर्ण मुक्ति। जब तक जीव इन बंधनों में जकड़ा रहता है, तब तक वह कर्म के चक्र में फंसा रहता है। मोक्ष इन सभी बंधनों के समूल नाश का नाम है। यह केवल शारीरिक मुक्ति नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ति है।
*02. कर्मचक्र का सदा के लिए अंत: मोक्ष का दूसरा लक्ष्य है जन्म-मरण के अनवरत चक्र का समापन। सनातन धर्म के अनुसार, जीव अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है। मोक्ष प्राप्ति पर यह चक्र सदा के लिए रुक जाता है। जीव को फिर कभी शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह मृत्यु पर विजय है।
*03. शिव में पूर्ण विलय (सायुज्य): मोक्ष का परम और अंतिम लक्ष्य है भगवान शिव में पूर्णतया विलीन हो जाना। शिवपुराण इसे "सायुज्य मुक्ति" कहता है। इस अवस्था में जीव और शिव में कोई अंतर नहीं रह जाता। जीव को शिव के समान ही सर्वज्ञता, पूर्ण तृप्ति, अनंत ज्ञान और असीम आनंद प्राप्त हो जाता है। वह आत्माराम हो जाता है - अर्थात अपने आत्म स्वरूप में ही पूर्ण रूप से संतुष्ट और आनंदित।
*मोक्ष का यह अंतिम लक्ष्य कोई काल्पनिक अवस्था नहीं है। शिवपुराण में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां भक्तों ने इस लक्ष्य को प्राप्त किया है। यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिए शिव की कृपा ही एकमात्र साधन है, और यह कृपा सच्ची भक्ति से प्राप्त होती है।
"कैसे पता चलेगा कि आत्मा ने मोक्ष प्राप्त कर लिया है"?
*यह एक गहन प्रश्न है: कैसे जानें कि आत्मा ने मोक्ष प्राप्त कर लिया है? शिवपुराण सीधे तौर पर इस प्रश्न का उत्तर नहीं देता, लेकिन यह मोक्ष की अवस्था का विस्तार से वर्णन करता है, जिससे हम मोक्ष प्राप्ति के लक्षणों को समझ सकते हैं। मोक्ष प्राप्त आत्मा में निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं:
“ 01. आठ बंधनों से पूर्ण मुक्ति का अनुभव: मोक्ष प्राप्त आत्मा प्रकृति, बुद्धि, अहंकार और पांच तन्मात्राओं के बंधन से पूरी तरह मुक्त हो जाती है। उसे इनका कोई बंधन नहीं रहता। वह माया के प्रभाव से परे हो जाती है। शिवपुराण के अनुसार, यह मुक्ति शिव कृपा से ही संभव है।
*02. जन्म-मरण के चक्र का समापन: मोक्ष प्राप्त आत्मा का फिर कभी जन्म नहीं होता। उसे नया शरीर धारण नहीं करना पड़ता। यह जन्म-मरण के अनवरत चक्र से सदा के लिए मुक्ति है। शिवपुराण में इसे "संसारचक्र से निवृत्ति" कहा गया है।
*03. शिव के ऐश्वर्य की प्राप्ति: मोक्ष प्राप्त आत्मा को शिव के समान दिव्य गुण प्राप्त हो जाते हैं:
*सर्वज्ञता: वह सब कुछ जानने लगती है।
*पूर्ण तृप्ति: उसे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रहती।
*अनंत आनंद: वह सदा आनंदमय रहती है।
*स्वतंत्रता: वह सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त होती है।
*04. आत्माराम की स्थिति: मोक्ष प्राप्त आत्मा अपने आप में ही पूर्ण हो जाती है। उसे बाह्य वस्तुओं या अनुभवों की आवश्यकता नहीं रहती। वह अपने आत्म स्वरूप में ही आनंदित रहती है। शिवपुराण इसे "आत्मनैव आत्मना तुष्टः" कहता है - अर्थात आत्मा अपने आप में ही संतुष्ट।
*05. शिव में पूर्ण विलय का बोध: मोक्ष प्राप्त आत्मा को शिव से अपने एकत्व का स्पष्ट बोध होता है। उसे अनुभव होता है कि वह और शिव अभिन्न हैं। "शिवोहम्" - मैं शिव हूँ, यह भाव उसमें स्थिर हो जाता है।
*06. सभी द्वंद्वों से मुक्ति: मोक्ष प्राप्त आत्मा सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे सभी द्वंद्वों से परे हो जाती है। उसे इनसे कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह समदृष्टि से सबको देखती है।
*07. सहज समाधि की अवस्था: मोक्ष प्राप्त आत्मा सदा समाधिस्थ रहती है। उसका चित्त सदा शांत और स्थिर रहता है। वह बिना प्रयास के ही ध्यानमग्न रहती है।
*08. लोक कल्याण की भावना: मोक्ष प्राप्त आत्मा में सभी प्राणियों के कल्याण की इच्छा जाग्रत हो जाती है। वह दूसरों को भी मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।
*09. शिव के साथ स्थायी निवास: शिवपुराण के अनुसार, मोक्ष प्राप्त आत्मा शिवलोक (कैलाश) में निवास करती है या शिव में पूरी तरह विलीन हो जाती है।
*ये लक्षण बताते हैं कि मोक्ष प्राप्ति के बाद आत्मा का क्या स्वरूप होता है। परंतु शिवपुराण यह भी स्पष्ट करता है कि मोक्ष प्राप्ति का अनुभव शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यह एक अकथनीय अनुभव है जिसे केवल प्राप्त करने वाला ही जान सकता है। जिस प्रकार स्वाद को शब्दों में नहीं बताया जा सकता, उसे चखकर ही जाना जा सकता है, उसी प्रकार मोक्ष का अनुभव भी केवल प्राप्त करके ही जाना जा सकता है।
*निष्कर्ष: शिवपुराण का मोक्ष मार्ग कोई कठिन या दुर्गम पथ नहीं है। यह एक सरल, सहज और सर्वसुलभ मार्ग है जो भगवान शिव की कृपा से प्रशस्त होता है। कलयुग में तो यह मार्ग और भी सरल हो जाता है - शिवलिंग पूजन, नाम स्मरण और सच्ची भक्ति ही मुक्ति दिला सकती है। आइए, हम भी इस मार्ग पर चलें और जीवन के चरम लक्ष्य - मोक्ष को प्राप्त करें।
"वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विवेचना"
*वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आधुनिक विज्ञान की लेंस से देखें तो मोक्ष की अवधारणा चेतना के अध्ययन से जुड़ती है। क्वांटम भौतिकी और न्यूरोसाइंस में 'चेतना' एक गहन शोध का विषय है। मोक्ष की अवस्था को चेतना का शुद्धतम रूप माना जा सकता है, जहां मस्तिष्क की तरंगें (बीटा से थीटा/अल्फा/डेल्टा) गहरी शांति की अवस्था में पहुंचती हैं। मोक्ष के चरणों को मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में देखा जा सकता है - जहां ध्यान और भक्ति से तनाव कम होता है, कोर्टिसोल स्तर घटता है और आंतरिक शांति बढ़ती है। यह मनोवैज्ञानिक कल्याण (वेल-बीइंग) का चरम रूप है।
*आध्यात्मिक दृष्टिकोण: शिवपुराण का आध्यात्मिक सार है - व्यक्तिगत अनुभूति और दिव्य कृपा। यह मार्ग बाह्य दिखावे से परे, आंतरिक परिवर्तन पर जोर देता है। आध्यात्मिकता में मोक्ष का अर्थ है 'अहं' के भ्रम से मुक्ति और वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार। यह एक प्रायोगिक सत्य है, जो तर्क से परे, अनुभव से ग्रहण किया जाता है। शिवभक्ति इसका साधन है, जो भावना, विश्वास और समर्पण के समन्वय से चित्त को शुद्ध करती है।
*सामाजिक दृष्टिकोण: समाज के संदर्भ में, मोक्ष की अवधारणा व्यक्तिगत मुक्ति और सामाजिक दायित्व के बीच सामंजस्य सिखाती है। शिवपुराण गृहस्थ जीवन में रहकर भी मोक्ष की बात करता है, जो एक संतुलित दृष्टिकोण है। यह पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्यपूर्ण जीवन (धर्म) के साथ आत्मिक उन्नति को बढ़ावा देता है। एक मोक्षार्थी व्यक्ति समाज के लिए अधिक करुणामय, निस्वार्थ और स्थिर प्रभाव छोड़ता है, जिससे सामाजिक सद्भाव को बल मिलता है।
"प्रश्न-उत्तर अनुभाग"
प्रश्न *01: क्या मोक्ष प्राप्ति के लिए संन्यास लेना अनिवार्य है? क्या गृहस्थ जीवन में रहकर भी मोक्ष संभव है?
*उत्तर:बिल्कुल संभव है। शिवपुराण स्पष्ट करता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए वन में जाना या संन्यास लेना आवश्यक नहीं है। भगवान शिव स्वयं एक गृहस्थ के रूप में माता पार्वती और गणेश-कार्तिकेय के साथ कैलाश में निवास करते हैं। पुराण में अनेक गृहस्थ भक्तों की कथाएं हैं, जिन्होंने सामान्य जीवन जीते हुए भक्ति और कर्तव्यपालन से मोक्ष प्राप्त किया। कलयुग में तो गृहस्थ आश्रम को ही विशेष महत्व दिया गया है। कुंती, ध्रुव, प्रह्लाद जैसे अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने गृहस्थ रहते हुए ही परम लक्ष्य प्राप्त किया। मुख्य बात है मन की शुद्धि, भक्ति की निष्ठा और कर्मों में निःस्वार्थ भाव।
प्रश्न *02: क्या मोक्ष और आत्महत्या में कोई संबंध है? क्या मृत्यु को जल्दी लाना मोक्ष है?
*उत्तर:बिल्कुल नहीं। यह एक गंभीर भ्रम है। मोक्ष कर्मों के बंधन से मुक्ति है, जबकि आत्महत्या एक घोर पाप कर्म और अपरिपक्व इच्छामृत्यु है, जो नए बंधन और दुःख देता है। शिवपुराण सिखाता है कि मोक्ष जीवन को पूर्णता से जीकर, धर्म पूर्वक कर्म करते हुए, प्रारब्ध का भोग करते हुए प्राप्त होता है। यह जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सम्यक दृष्टि प्राप्त करने का नाम है। आत्महत्या से तो अधूरे कर्म और वासनाएं बच जाती हैं, जो अगले जन्मों में और कष्टदायी होकर सामने आती हैं।
प्रश्न *03: क्या मोक्ष केवल एक बार प्राप्त होता है, या इसे खोया भी जा सकता है?
*04.उत्तर:शिवपुराण और अन्य शास्त्रों के अनुसार, वास्तविक मोक्ष (सायुज्य) स्थायी और अंतिम होता है। इसे 'खोया' नहीं जा सकता, क्योंकि यह आत्मा का अपने मूल स्वरूप में स्थिर हो जाना है। यह एक ऐसी अवस्था है जहां
'खोने' या 'पाने' वाला कोई अलग व्यक्तित्व शेष नहीं रह जाता। हां, निम्न स्तर की युक्तियां (जैसे सालोक्य) जहां व्यक्तित्व बना रहता है, वहां पतन का सैद्धांतिक अंश हो सकता है, परंतु शिव की परम कृपा से प्राप्त सायुज्य मुक्ति अटल मानी गई है।
"ब्लॉग के अनसुलझे पहलू"
*शिवपुराण पर आधारित यह ब्लॉग मोक्ष के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्ष को रखता है, किंतु कुछ पहलू विवाद, विभिन्न मत या गहन चिंतन के लिए खुले रह जाते हैं:
*01. गुरु की पहचान: ब्लॉग गुरु की अनिवार्यता बताता है, परन्तु आज के युग में सच्चे तत्त्वज्ञ गुरु की प्रामाणिक पहचान कैसे करें? नकली गुरुओं और भौतिकवादी संस्थानों के इस युग में, एक साधारण साधक कैसे निर्णय ले? यह एक बड़ा व्यावहारिक प्रश्न है जिसका कोई सीधा उत्तर नहीं दिया गया है।
*02. मोक्ष की अनुभूति का मापदंड: मोक्ष प्राप्ति के लक्षण बताए गए हैं, पर क्या ये व्यक्तिपरक अनुभूतियां हैं या कोई वस्तु परक प्रमाण हो सकता है? क्या समाज या परंपरा किसी को 'मुक्त' घोषित कर सकती है? इसका कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है।
*03. कर्म और कृपा का द्वंद्व: शिवपुराण शिव की कृपा को मुख्य मानता है। परन्तु पुरुषार्थ (प्रयत्न) और दैव (कृपा) के बीच सही संतुलन क्या है? क्या केवल प्रतीक्षा करनी चाहिए या साधना में जुटे रहना चाहिए? यह दार्शनिक द्वंद्व अनसुलझा रह जाता है।
*04. शिवपुराण के विभिन्न संस्करण: समय के साथ पुराणों के कई संस्करण और भाष्य हुए हैं। विभिन्न परंपराओं में मोक्ष की व्याख्या में मतभेद हो सकते हैं। यह ब्लॉग एक सामान्यीकृत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो हर संप्रदाय के लिए पूर्णतः स्वीकार्य नहीं हो सकता।
"डिस्क्लेमर"
*यह ब्लॉग शिवपुराण एवं सनातन धर्मशास्त्रों में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित एक सूचनात्मक, शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक सामग्री है। पाठकों से निवेदन है कि इसे ध्यानपूर्वक समझें:
*01. धार्मिक विश्वास: यह लेख एक विशेष धार्मिक ग्रंथ (शिवपुराण) के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। मोक्ष की अवधारणा अन्य धर्मों व दर्शनों में भिन्न हो सकती है। इसे किसी अन्य मत पर प्राथमिकता देने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है।
*02. वैज्ञानिक दावा नहीं: वैज्ञानिक विवेचना अनुमानित दृष्टिकोण मात्र है। इस लेख की सामग्री को किसी वैज्ञानिक शोध या प्रमाण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। आध्यात्मिक अनुभूतियां वैज्ञानिक प्रयोगों के दायरे से परे हो सकती हैं।
*03. चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं: मोक्ष या आध्यात्मिक साधना से संबंधित कोई भी जानकारी चिकित्सीय, मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पेशेवर सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी गंभीर संकट या मानसिक समस्या में योग्य चिकित्सक या परामर्शदाता से संपर्क करें।
*04. व्यक्तिगत विवेक: धार्मिक पथ एवं साधना पद्धतियों का चयन पूर्णतः पाठक के व्यक्तिगत विवेक, विश्वास एवं गुरु-मार्गदर्शन पर निर्भर करता है। लेखक या प्रकाशक किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत साधना के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं है।
*05. सामग्री का उद्देश्य: इस ब्लॉग का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार, चिंतन को प्रेरित करना एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचय कराना मात्र है। इसे किसी भी प्रकार के भेदभाव, विवाद या दुरुपयोग के लिए प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए।