Sawan Putrada Ekadashi2027:श्रावण पुत्रदा एकादशी कथा, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और संतान प्राप्ति के अचूक उपाय |
byRanjeet Singh-
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"श्रावण पुत्रदा एकादशी 12 अगस्त 2027 (गुरुवार) को है। संतान सुख के लिए करें यह पावन व्रत! जानें संपूर्ण पूजा विधि स्टेप बाय स्टेप, 1500+ शब्दों में पौराणिक कथा, व्रत में क्या खाएं-क्या ना खाएं, अचूक टोटके और सटीक शुभ मुहूर्त की जानकारी"
"श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है, जो संतान की कामना रखने वाले दम्पत्यों के लिए साक्षात् वरदान स्वरूप है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली यह एकादशी, भगवान विष्णु के पालनहार स्वरूप को समर्पित है। इस पावन दिन विधि-विधान से व्रत का पालन करने से न केवल पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन के समस्त पापों का शमन होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है"
यह लेख आपको 12 अगस्त 2027, गुरुवार को पड़ने वाली इस पावन एकादशी की संपूर्ण जानकारी, पौराणिक कथा, पूजा विधि, नियम, शुभ मुहूर्त और उससे जुड़े अचूक टोटके प्रदान करता है।
📅 *श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027: शुभ मुहूर्त और दिन का हाल
*तिथि: श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी
*दिन: गुरुवार
*तारीख: 12 अगस्त 2027
*पंचांग के अनुसार (दिल्ली, भारत के अनुमानित समय
*विवरण समय (लगभग)
*एकादशी तिथि प्रारम्भ 11 अगस्त 2027, दिन बुधवार को रात 12:58 AM (देर रात)
*एकादशी तिथि समाप्त 12 अगस्त 2027, दिन गुरुवार 02:59 AM (देर रात)
*व्रत का दिन 12 अगस्त 2027, गुरुवार
*पारण (व्रत तोड़ने) का समय 13 अगस्त 2027, 05:45 AM से 09:37 AM तक (हरि वासर के बाद)
☀️ *12 अगस्त 2027, गुरुवार: दिन का हाल और शुभ चौघड़िया
*यह एकादशी गुरुवार को पड़ रही है, जो इसे और भी अधिक फलदायी बनाता है। गुरुवार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है, जिससे संतान और वैवाहिक सुख में वृद्धि होती है।
*शुभ मुहूर्त समय (लगभग) महत्व
*ब्रह्म मुहूर्त 04:20 AM से 05:02 AM स्नान, ध्यान और संकल्प के लिए सर्वोत्तम।
*प्रातः पूजा शुभ मुहूर्त 05:45 AM से 07:25 AM सूर्योदय के बाद की पहली पूजा के लिए उत्तम।
*रवि योग 05:45 AM से 11:23 AM इस योग में पूजा-पाठ करने से सभी दोष नष्ट होते हैं।
*अभिजीत मुहूर्त 12:00 PM से 12:54 PM दिन का सबसे शुभ समय, संतान कामना का संकल्प लेने के लिए श्रेष्ठ।
📜"पौराणिक कथा: श्रावण पुत्रदा एकादशी की कहानी"
*पुत्रदा एकादशी की यह कथा पद्मपुराण के अन्तर्गत आती है, जिसका श्रवण मात्र ही वाजपेई यज्ञ के समान फल देता है। यह कथा द्वापर युग के आरंभ में राजा महीजीत और लोमश ऋषि के बीच हुए संवाद पर आधारित है।
👑 "राजा महीजीत और पुत्र वियोग का दुःख"
*प्राचीन काल में महिष्मती नाम की नगरी पर राजा महीजित राज्य करते थे। राजा धर्मज्ञ, न्यायप्रिय और महान थे। उनके राज्य में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, प्रजा सुखी थी और राजा का राजकोष भरा रहता था।
*परंतु, राजा को एक ही दुःख सताता था - संतानहीनता। राजा निःसंतान थे। पुत्र के बिना राजा को राजसी ठाठ-बाट, वैभव और यहाँ तक कि उनका सिंहासन भी कष्टदायक लगता था। वे हमेशा चिंतित रहते थे कि उनके देह त्याग के बाद उनके कुल का नाम कौन आगे बढ़ाएगा, और सबसे महत्वपूर्ण, उन्हें परलोक में तर्पण कौन देगा, जिसके बिना मोक्ष दुर्लभ माना जाता है।
*शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्र के बिना मनुष्य को इस लोक और परलोक दोनों में शांति नहीं मिलती। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने अनेकों यज्ञ, दान-पुण्य और उपाय किए, पर उनका हर प्रयास निष्फल रहा। जैसे-जैसे राजा की आयु बढ़ती गई, उनका दुःख और भी गहरा होता गया।
🧘 "लोमश ऋषि की खोज"
*जब राजा का दुःख असहनीय हो गया, तो उनके मंत्रियों, पुरोहितों और राज्य के वरिष्ठ नागरिकों ने आपस में विचार-विमर्श किया। उन्होंने तय किया कि वे राजा के कष्ट का निवारण जानने के लिए किसी महान तपस्वी और ज्ञानी ऋषि की शरण में जाएंगे।
*सभी मंत्री और शुभचिंतक गहन वन की ओर प्रस्थान किए। कई दिनों तक भटकने के बाद, उन्हें एक शांत आश्रम मिला, जहाँ उन्होंने महामुनि लोमश को देखा। लोमश ऋषि अत्यंत वयोवृद्ध, तेजस्वी और त्रिकालदर्शी थे। उनकी तपस्या की शक्ति इतनी महान थी कि उन्हें ब्रह्मांड की सभी घटनाओं का ज्ञान था।
*सभी ने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे विनती की:
"हे महामुनि! हम महिष्मती नगरी के राजा महीजीत के सेवक हैं। हमारे राजा अत्यंत धर्मात्मा हैं, पर वे संतानहीनता के दुःख से पीड़ित हैं। वे इतने व्याकुल हैं कि अब उन्हें राजपाट भी व्यर्थ लगने लगा है। हे प्रभु! हम आपके पास उनके दुःख के कारण को जानने और उसके निवारण हेतु आए हैं। कृपया अपनी दिव्य दृष्टि से हमें इसका कारण बताएं और हमारे राजा को इस कष्ट से मुक्ति दिलाने का उपाय सुझाएं।"
⚖️ "पूर्वजन्म का कर्मफल": गाय का शाप
*लोमश ऋषि ने मंत्रियों की बातें ध्यान से सुनीं। उन्होंने कुछ समय के लिए आंखें बंद की और अपनी योग शक्ति से राजा के पूर्वजन्म के कर्मों का लेखा-जोखा देखा।
"आंखें खोलने के बाद, लोमश ऋषि ने गंभीर स्वर में बताया":
"हे श्रेष्ठ पुरुषों! तुम्हारे राजा पूर्व जन्म में एक क्रूर, निर्दयी और धनहीन वैश्य थे। वह बहुत कंजूस और स्वार्थी थे। उनके अंदर धर्म और दया का भाव बहुत कम था"
"पूर्व जन्म में, एक बार वह वैश्य (आज के राजा महीजीत) ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन दोपहर में प्यास से व्याकुल होकर भटक रहे थे। उन्हें दूर तक कहीं पानी नहीं मिला। अंततः, वे एक जलाशय के पास पहुंचे"
"उस जलाशय पर एक तत्काल ब्याही हुई (हाल ही में बछड़े को जन्म देने वाली) प्यासी गाय भी जल पी रही थी। वैश्य ने उस गाय के प्रति तनिक भी दया नहीं दिखाई। उसने उस प्यासी और दुर्बल गाय को लाठी मारकर भगा दिया और स्वयं जल पीने लगे। उस प्यासी और बच्चे वाली गौ माता को जल पीने से रोकने के कारण ही राजा को इस जन्म में पुत्र वियोग का दुःख सहना पड़ रहा है।"
"लेकिन, हे मंत्रीगण! उसी दिन प्यास के कारण और जल की खोज में भटकने के कारण, वैश्य ने पूरे दिन अनजाने में कुछ भी नहीं खाया, और रात में वह जल की तलाश में चलता रहा, जिसके कारण उनका निर्जला एकादशी का अनजाने में उपवास और रात्रि जागरण हो गया। निर्जला एकादशी का व्रत अत्यंत पुण्य दायी होता है। उस व्रत के प्रभाव से वैश्य को इस जन्म में राजा का पद और समस्त राजसी वैभव प्राप्त हुआ है, लेकिन गौ माता के शाप के कारण वह पुत्रहीन हैं।"
🎁 "श्रावण पुत्रदा एकादशी का विधान"
*लोमश ऋषि ने आगे कहा:
"चिंता न करें! इस पाप का प्रायश्चित संभव है। इस श्राप से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम मार्ग श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत है, जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं।
"आप सब लोग (मंत्री, पुरोहित और प्रजा) राजा के लिए यह पुत्रदा एकादशी का व्रत करें। आप सब उस व्रत के पुण्य को राजा को अर्पित कर दें। यदि तुम सब सच्चे मन से, पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत और रात्रि जागरण करोगे, तो राजा का पूर्वजन्म का पाप नष्ट हो जाएगा और उन्हें निश्चित रूप से तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।"
*लोमश ऋषि के वचन सुनकर सभी मंत्री और पुरोहित अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि को धन्यवाद दिया और उनका आशीर्वाद लेकर राजधानी लौटे।
🙏 "व्रत का पालन और संतान सुख की प्राप्ति"
*महर्षि लोमश के निर्देशानुसार, श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी आने पर, राजा महीजीत, उनकी रानी, मंत्रीगण और समस्त प्रजा ने मिलकर पूर्ण भक्तिभाव से पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने पूरे दिन निराहार रहकर व्रत का पालन किया और रात भर भगवान विष्णु के नाम का संकीर्तन और जागरण किया।
*द्वादशी तिथि को व्रत के पारण से पूर्व, सभी ने अपने-अपने व्रत का संपूर्ण पुण्यफल राजा महीजीत को सहर्ष अर्पित कर दिया।
*व्रत के इस महान पुण्य और सामूहिक प्रार्थना के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया, और नौ माह पश्चात एक अत्यंत तेजस्वी, स्वस्थ और धर्मात्मा पुत्र को जन्म दिया। राजा महीजीत का सारा दुःख दूर हो गया और राज्य में खुशियों की लहर दौड़ गई।
*तभी से, पुत्र की इच्छा रखने वाले मनुष्य के लिए श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना जाता है। इस व्रत से पापों का शमन और अंत में मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
*संतान सुख की कामना पूरी करने वाली श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि इस प्रकार है:
*चरण 01: व्रत का संकल्प (सुबह का समय)
*स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदी या घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
*वस्त्र: स्वच्छ, धुले हुए पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
*संकल्प: पूजा स्थल पर बैठकर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें:
"हे भगवान विष्णु! मैं (अपना नाम) आज श्रावण पुत्रदा एकादशी का निराहार/फलाहार व्रत आपके आशीर्वाद से संतान प्राप्ति/सुख-शांति के लिए कर रहा/रही हूँ। मेरा यह व्रत निर्विघ्न संपन्न हो।"
*चरण 02: भगवान विष्णु की पूजा (दोपहर तक)
*चौकी स्थापना: एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु (विशेष रूप से बालकृष्ण या संतान गोपाल) की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
*षोडशोपचार: भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएं।
*श्रृंगार: उन्हें पीले वस्त्र, पीला चंदन, हल्दी और पीले फूल (कमल, गेंदा) अर्पित करें।
*भोग: नैवेद्य (भोग) में तुलसी दल अवश्य रखें। बिना तुलसी के विष्णु पूजा अधूरी है।
*पुत्र कामना: एक नारियल, सुपारी और कुछ सिक्के भगवान के चरणों में अर्पित करें। संतान प्राप्ति की कामना मन ही मन दोहराएं।
*जाप: तुलसी की माला से कम से कम 108 बार "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या "संतान गोपाल मंत्र" का जाप करें।
*चरण 03: व्रत कथा और जागरण (शाम और रात)
*कथा श्रवण: शाम को या पूजा के बाद श्रावण पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
*संध्या आरती: शाम को तुलसी के पास और पूजा घर में घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें।
*रात्रि जागरण: यदि संभव हो, तो रात में जागरण करें। भजन-कीर्तन करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
*चरण 04: पारण (अगले दिन, 13 अगस्त 2027)
*दान: द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में (सुबह 05:45 AM के बाद) किसी गरीब या ब्राह्मण को अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, फल और वस्त्र का दान करें।
*पारण: व्रत तोड़ने से पहले भगवान विष्णु को भोग लगाएं और चरणामृत ग्रहण करें। चावल खाकर व्रत का पारण करना शुभ माना जाता है, लेकिन सात्विक भोजन ही करें।
🍽️ श्रावण पुत्रदा एकादशी: "क्या खाएं और क्या ना खाएं"
*एकादशी व्रत का अर्थ है केवल फलाहार पर रहना।
✅ "क्या खाएं" (फलाहार और अनुमन्य आहार)
*फल: सभी प्रकार के ताजे और सूखे फल, मेवे (बादाम, अखरोट)।
*मसाले: हल्दी, हींग, मेथी, धनिया पाउडर, सामान्य नमक।
*सब्जियां: प्याज, लहसुन, बैंगन, गोभी।
*अन्य: शहद, मांसाहार, किसी भी प्रकार का नशा (चाय, कॉफी को भी संयम से लें)।
🕉️ "श्रावण पुत्रदा एकादशी: क्या करें और क्या ना करें" (नियम)
✅ *क्या करें (करण योग्य कार्य)
*व्रत का संकल्प: एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व संकल्प लें।
*विष्णु सहस्रनाम: पूरे दिन में कम से कम एक बार विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
*तुलसी पूजा: शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएं, लेकिन तुलसी को स्पर्श न करें और पत्ते न तोड़ें।
*दान-पुण्य: अपनी कमाई का कुछ हिस्सा गरीबों, पशुओं या मंदिरों में दान करें।
*ब्रह्मचर्य: पूरे दिन (दशमी की रात से द्वादशी के पारण तक) ब्रह्मचर्य का पालन करें।
❌ "क्या ना करें" (वर्जित कार्य)
*अन्न ग्रहण: किसी भी परिस्थिति में अन्न (विशेषकर चावल) का सेवन न करें।
*क्रोध/झूठ: मन में नकारात्मक विचार न लाएं, क्रोध और ईर्ष्या से बचें, और झूठ न बोलें।
*शारीरिक श्रम: अत्यधिक शारीरिक श्रम से बचें और दिन में सोने से बचें।
*बाल/नाखून काटना: एकादशी के दिन दाढ़ी, नाखून और बाल काटना वर्जित है।
*अशुभ विचार: किसी की निंदा या चुगली न करें।
🧘 "श्रावण पुत्रदा एकादशी: किस पर सोना चाहिए"?
*शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत के दौरान भूमि पर शयन करना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।
*महत्व: भूमि पर सोना सादगी, तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। इससे मन सांसारिक भोगों से दूर रहकर भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होता है।
*विकल्प: यदि जमीन पर सोना संभव न हो, तो भी आरामदायक गद्दे या बिस्तर पर न सोएं। आप एक साधारण चटाई या दरी बिछाकर सो सकते हैं, या रात्रि जागरण को महत्व दें।
🔱 *श्रावण पुत्रदा एकादशी में भगवान विष्णु के किस रूप की होती है पूजा?
*इस एकादशी पर विशेष रूप से भगवान विष्णु के बालकृष्ण (संतान गोपाल) स्वरूप की पूजा होती है।
*कारण: 'पुत्रदा' का अर्थ है पुत्र देने वाली। भक्त इस दिन भगवान से एक स्वस्थ, तेजस्वी और धर्मात्मा संतान (पुत्र या पुत्री) की कामना करते हैं। बालकृष्ण का स्वरूप स्वयं संतान सुख का प्रतीक है।
*अर्घ्य: पूजा में संतान गोपाल मंत्र का जाप करते हुए बालकृष्ण की मूर्ति को झूले पर बिठाकर भी पूजा की जाती है।
🌟 "श्रावण पुत्रदा एकादशी के अचूक टोटके" (संतान सुख के लिए)
*संतान प्राप्ति के लिए इस एकादशी पर निम्नलिखित अचूक उपाय किए जाते हैं।
"संतान गोपाल यंत्र की पूजा":
*एकादशी के दिन एक नया संतान गोपाल यंत्र स्थापित करें।
*पूजा के दौरान हल्दी की माला से "संतान गोपाल मंत्र" का कम से कम 108 बार जाप करें।
"पीपल और केले की पूजा":
*पति-पत्नी दोनों मिलकर एकादशी के दिन पीपल के पेड़ की 11 परिक्रमा करें।
*केले के पेड़ (भगवान विष्णु) पर शुद्ध घी का दीपक जलाएं और गुड़, चना चढ़ाएं।
*पीली वस्तु का दान:
*किसी मंदिर में या गरीब दम्पत्ति को पीले वस्त्र, पीली मिठाई (जैसे बेसन के लड्डू), और दक्षिणा गुप्त रूप से दान करें।
*यह दान बृहस्पति ग्रह को मजबूत करता है, जो संतान का कारक है।
गो-सेवा:
*इस दिन गौशाला जाएं और गाय को हरा चारा, गुड़ या आटे की लोई खिलाएं।
*गाय के माथे को छूकर अपनी कामना मन में दोहराएं।
"तुलसी विवाह" (मानसिक):
*यदि घर में तुलसी है, तो शाम को तुलसी के पास 11 दीपक जलाएं। मानसिक रूप से तुलसी माता का विवाह भगवान विष्णु से कराएं और संतान की प्रार्थना करें।
❓ "श्रावण पुत्रदा एकादशी से संबंधित प्रश्न और उत्तर" (FAQs)
प्रश्न (Question) उत्तर (Answer)
*पुत्रदा एकादशी किसे करनी चाहिए? यह व्रत मुख्य रूप से संतान सुख, पुत्र या पुत्री की कामना रखने वाले विवाहित दम्पत्तियों को करना चाहिए।
*एकादशी के दिन चावल क्यों नहीं खाते? मान्यता है कि एकादशी पर चावल खाने से अगले जन्म में कीड़े-मकोड़े की योनि मिलती है। यह महर्षि मेधा से जुड़ी पौराणिक घटना पर आधारित है।
*क्या महिलाएं भी व्रत कर सकती हैं? हाँ, यह व्रत विशेष रूप से संतान कामना के लिए महिलाओं द्वारा ही किया जाता है, लेकिन पति-पत्नी मिलकर करें तो अधिक फलदायी होता है।
*व्रत का पारण कब और कैसे करें? व्रत का पारण द्वादशी तिथि को हरि वासर समाप्त होने के बाद (13 अगस्त को 09:37 AM के बाद) शुभ मुहूर्त में चावल या अन्न खाकर ही किया जाना चाहिए।
*क्या एकादशी के दिन जल पी सकते हैं? हां, फलाहारी व्रत में जल, दूध और फल खाने की अनुमति होती है। निर्जला व्रत केवल विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।
⚠️ "डिस्क्लेमर" (Disclaimer)
*यह ब्लॉग पोस्ट "श्रावण पुत्रदा एकादशी 12 अगस्त 2027" के संबंध में प्रचलित धार्मिक, पौराणिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित जानकारी प्रदान करता है। इस सामग्री का एकमात्र उद्देश्य पाठकों को इस पवित्र व्रत के महत्व, नियमों और कथा से अवगत कराना है।
*धार्मिक मान्यताएं: इस ब्लॉग में दी गई सभी जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और लोक मान्यताओं पर आधारित है। यह व्यक्तिगत आस्था और विश्वास का विषय है।
*ज्योतिष और टोटके: यहां बताए गए "अचूक टोटके" और "उपाय" विशुद्ध रूप से ज्योतिषीय और लोक-परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें अपनाने से पहले, किसी भी गंभीर समस्या के लिए आपको योग्य ज्योतिषी या विद्वान से व्यक्तिगत और विवेकपूर्ण परामर्श अवश्य लेना चाहिए। यह जानकारी किसी भी प्रकार के चमत्कार या 100% गारंटी का दावा नहीं करती है।
*चिकित्सीय सलाह: संतान प्राप्ति या किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए यहां दी गई जानकारी को चिकित्सा सलाह (Medical Advice) का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी निर्णय से पहले, हमेशा योग्य चिकित्सक से सलाह लें।
*सटीकता: पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और अन्य धार्मिक विधानों की सटीकता के लिए हमने उपलब्ध पंचांग के आंकड़ों का उपयोग किया है। आपसे अनुरोध है कि व्रत के दिन अपने स्थानीय, विश्वसनीय पंचांग या पुजारी से अंतिम समय और नियम की पुष्टि अवश्य कर लें।
*व्यक्तिगत जिम्मेदारी: इस ब्लॉग में दी गई जानकारी का पालन करना या न करना पूरी तरह से पाठक की इच्छा और विवेक पर निर्भर करता है। इस जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी परिणाम के लिए लेखक/प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होंगे।
*हमारा निवेदन है कि आप श्रद्धा और विश्वास के साथ इस व्रत को करें। आपकी भक्ति ही आपके लिए सर्वोपरि फलदायक है।