Parivartini Ekadashi 2027 परिवर्तनी एकादशी: कथा, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और नियम

"परिवर्तिनी एकादशी 2027 (11 सितंबर, शनिवार) की संपूर्ण जानकारी। वामन देव की कथा, पूजा विधि, क्या खाएं, क्या न खाएं, अचूक टोटके और वैज्ञानिक महत्व जानें"

Parivartini Ekadashi 2027: Picture of Lord Vishnu

*परिवर्तिनी एकादशी 2027 के पावन अवसर पर, भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की यह दिव्य छवि, त्याग, समर्पण और भगवान की अनंत लीला का स्मरण कराती है। वामन देव ने तीन पग भूमि मांगकर राजा बलि के अहंकार को दूर किया और उन्हें मोक्ष प्रदान किया। यह पर्व हमें धर्म के मार्ग पर चलने और दान के महत्व को सिखाता है।

"परिवर्तनी एकादशी 2027: संपूर्ण जानकारी, कथा, पूजा विधि, नियम और शुभ मुहूर्त"

("Parivartini Ekadashi 2027: Complete Information, Katha, Puja Vidhi, Rules, and Shubh Muhurat")

"परिवर्तिनी एकादशी, जिसे पद्मा एकादशी या पार्श्व एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाई जाती है। यह वह महत्वपूर्ण दिन है जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में अपनी करवट बदलते हैं"।

"एकादशी तिथि की विवरण और जानकारी"

*परिवर्तिनी एकादशी तिथि 11 सितंबर 2027, शनिवार

*एकादशी तिथि का प्रारम्भ 10 सितंबर 2027, शुक्रवार को (शाम 05:00 बजे से शुरू होकर पंचांग के अनुसार)

*एकादशी तिथि का समापन 11 सितंबर 2027, शनिवार को (रात 07:35 बजे तक, पंचांग के अनुसार )

*पारण (व्रत खोलने) का समय 12 सितंबर 2027, रविवार (सूर्योदय के बाद सुबह के 07 बजे लेकर दिन के 11:30 बजे तक  पंचांग के अनुसार। इस दौरान चर मुहूर्त  लाभ मुहूर्त और अमृत मुहूर्त रहेगा)

*नोट: सटीक समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय ज्योतिषीय स्रोत से एकादशी तिथि के आरंभ और समाप्ति समय की पुष्टि करना अनिवार्य है।

☀️ "उस दिन कैसा रहेगा": ज्योतिषीय और ऊर्जावान स्थिति (Astrological and Energetic Status of the Day)

*चूंकि परिवर्तिनी एकादशी 11 सितंबर 2027 को शनिवार के दिन पड़ रही है, इसलिए यह दिन विशेष रूप से फलदायी माना जाएगा।

*वार का प्रभाव (शनिवार): शनिवार के दिन पड़ने से इस व्रत का पुण्य शनि देव की कृपा से और भी बढ़ जाता है। भगवान विष्णु की पूजा से शनि देव से संबंधित कष्टों, जैसे साढ़ेसाती या ढैय्या के नकारात्मक प्रभाव, में कमी आ सकती है।

*ग्रहों की स्थिति: भाद्रपद शुक्ल पक्ष में सूर्य, चंद्रमा, और अन्य ग्रहों की स्थिति सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह समय वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का होता है, जो मन को शांति और प्रकृति को ताजगी प्रदान करता है।

*ऊर्जावान प्रभाव: यह दिन करवट बदलने का होता है, जो सकारात्मक परिवर्तन और नई शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन में आने वाली हर बाधा से मुक्ति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है।

🙏 "पूजा विधि: स्टेप बाय स्टेप मार्गदर्शन" (Step-by-Step Puja Vidhi)

*परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की विशेष पूजा की जाती है। यह पूजा अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव से करनी चाहिए।

*चरण 01: तैयारी (दशमी की शाम से)

*दशमी की शाम: एकादशी के नियम दशमी तिथि की शाम से ही शुरू हो जाते हैं। इस दिन सात्विक भोजन करें और सूर्यास्त के बाद अन्न ग्रहण न करें।

*पूजा सामग्री: भगवान विष्णु (या वामन देव) की मूर्ति/चित्र, एक चौकी, पीला वस्त्र, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), तुलसी दल, पीले फूल (कमल सर्वोत्तम), फल, नैवेद्य (भोग), धूप, दीप, कपूर, चंदन, अक्षत (बिना टूटे चावल, एकादशी में चावल वर्जित होने के कारण इसे केवल तिलक के लिए प्रयोग करें), और व्रत का संकल्प जल।

*चरण 02: संकल्प और स्नान (एकादशी का दिन)

*ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें।

*संकल्प: मंदिर या पूजा स्थल की सफाई करें। भगवान के सामने आसन पर बैठें और हाथ में जल, फूल, और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। कहें: "हे भगवान विष्णु! मैं आज परिवर्तिनी एकादशी का व्रत आपके आशीर्वाद से सफलतापूर्वक पूरा करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। कृपया मेरी पूजा स्वीकार करें और मेरे सभी पापों को नष्ट करें।"

*पूजा स्थल: चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु/वामन देव की प्रतिमा स्थापित करें।

*चरण 03: विधिवत पूजा

*ध्यान और आवाहन: भगवान विष्णु का ध्यान करें और उन्हें आसन ग्रहण करने के लिए आवाहन करें।

*स्नान: सबसे पहले शुद्ध जल से, फिर पंचामृत से स्नान कराएँ, और अंत में फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं।

*वस्त्र और श्रृंगार: भगवान को नए वस्त्र (यदि संभव हो) पहनाएं। उन्हें चंदन का तिलक लगाएं, अक्षत चढ़ाएं (केवल तिलक में), और माला, पीले फूल अर्पित करें।

*दीप और धूप: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूप-कपूर जलाएं।

*नैवेद्य और तुलसी: भगवान को फल, मिठाई, और विशेष रूप से तुलसी दल युक्त पंचामृत या भोग अर्पित करें। तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है।

*मंत्र जाप: 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ॐ नमो नारायणाय नमः' मंत्र का 108 बार जाप करें।

*कथा पाठ: परिवर्तनी एकादशी कादशी की व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।

*आरती: अंत में कपूर से भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक आरती करें।

*चरण 04: करवट परिवर्तन (संध्याकाल)

*करवट: शाम के समय, यदि आपने भगवान विष्णु की शयन मुद्रा वाली प्रतिमा स्थापित की है, तो उन्हें श्रद्धापूर्वक करवट बदलवाएं (दक्षिणा से उत्तरा दिशा की ओर या बाईं से दाईं ओर)। यह इस एकादशी का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।

*चरण 05: जागरण और पारण (द्वादशी)

*रात्रि जागरण (वैकल्पिक): यदि संभव हो, तो रात में जागरण कर भगवान का भजन-कीर्तन करें।

*पारण (व्रत तोड़ना): द्वादशी तिथि को, सूर्योदय के बाद, व्रत खोलें। पारण के समय किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएँ और दान-दक्षिणा दें।

📜 "पौराणिक कथा" (Pauranik Katha 

(यह खंड विस्तृत कथा के लिए है जिसे मैं अगले चरण में तैयार करूंगा, अभी मैं कथा का सार प्रदान कर रहा हूं)

📖 *भगवान वामन और राजा बलि की कथा (The Legend of Lord Vamana and King Bali)

*परिवर्तिनी एकादशी की कथा का सीधा संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार से है और इसका उल्लेख विभिन्न पुराणों, विशेषकर स्कंद पुराण में मिलता है। यह कथा धर्म की रक्षा, दान का महत्व और भगवान की माया को दर्शाती है।

"कथा का सार" (Summary):

*त्रेतायुग में बलि नामक एक महापराक्रमी असुर राजा था। वह यद्यपि असुर कुल का था, पर था अत्यंत दानी, सत्यनिष्ठ और भगवान विष्णु का भक्त। अपनी तपस्या और शक्ति के बल पर उसने इंद्र का स्वर्गलोक जीत लिया और संपूर्ण ब्रह्मांड में अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। देवताओं की पराजय से देवमाता अदिति अत्यंत चिंतित हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की।

*उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया और वामन (बौने ब्राह्मण) का रूप धारण किया। बलि जब भृगु कच्छ में अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे, तब वामन रूप में भगवान विष्णु उनके यज्ञ स्थल पर पहुंचे।

*बलि ने वामन देव का स्वागत किया और उनसे कोई भी दान मांगने को कहा। वामन देव ने केवल तीन पग भूमि माँगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने तुरंत पहचान लिया कि यह वामन कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु हैं और उन्होंने बलि को दान देने से रोका।

*परन्तु बलि ने अपने गुरु की बात नहीं मानी और दान का संकल्प ले लिया। संकल्प लेते ही वामन देव ने विराट रूप धारण कर लिया।

*पहले पग में उन्होंने पृथ्वी और सभी लोक नाप लिए। दूसरे पग में उन्होंने स्वर्गलोक और समस्त ब्रह्मांड को नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना वचन निभाते हुए वामन देव के सामने अपना सिर झुका दिया और कहा कि तीसरा पग मेरे सिर पर रखें।

*भगवान विष्णु ने बलि के सिर पर पग रखकर उन्हें पाताल लोक का चिरकाल के लिए राजा बना दिया। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वह स्वयं पाताल लोक में उनके द्वारपाल बनकर रहेंगे।

*देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं और इसी परिवर्तनी एकादशी के दिन वे अपनी करवट बदलते हैं, और अपने इस वामन रूप में वे राजा बलि के यहाँ पाताल लोक में निवास करते हैं। इसलिए इस दिन वामन देव की पूजा होती है।

🥗 "क्या खाएं और क्या न खाएं" (What to Eat and What Not to Eat)

*एकादशी व्रत के नियम बहुत कड़े होते हैं, जिनमें सात्विक और फलाहार भोजन ही किया जाता है।

✅ "क्या खाएं" (What to Eat)

*श्रेणी अनुमत खाद्य पदार्थ

*अनाज/आटा सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, समा के चावल (मोरधन), राजगिरा (अमरनाथ) का आटा।

*सब्जियां आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला, ककड़ी, गाजर, पालक। (जमीन के नीचे उगने वाली कुछ सब्जियों की मनाही होती है, लेकिन ये सामान्यतः अनुमत हैं)।

*फल सेब, केला, अंगूर, संतरा, अनार, पपीता, नाशपाती। गन्ना या गुड़ का सेवन शुभ माना जाता है।

*डेयरी दूध, दही, छाछ, पनीर (पनीर फाड़ने के लिए फिटकरी का प्रयोग न हो)।

*अन्य सेंधा नमक, काली मिर्च, हरी मिर्च, अदरक, जीरा, सूखा मेवा (बादाम, काजू, किशमिश)। साबूदाना (साबूदाना खिचड़ी, खीर)।

❌ "क्या न खाएं" (What Not to Eat)

*श्रेणी वर्जित खाद्य पदार्थ

*अनाज चावल (पूर्ण रूप से वर्जित), गेहूँ, दाल (चने की दाल, मसूर, उड़द), मैदा।

*मसाले हल्दी, हींग, गर्म मसाले, सरसों, राई, सामान्य नमक।

*सब्जियां प्याज, लहसुन (तामसिक भोजन), बैंगन, टमाटर (कुछ क्षेत्रों में वर्जित), गोभी, शलजम।

*अन्य तेल में बनी चीजें (वनस्पति तेल), मांस-मदिरा, पान, तंबाकू, शहद।

"डिस्क्लेमर" (Disclaimer)

*यह लेख और इसमें दी गई सभी जानकारी केवल सामान्य धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं, शास्त्रों और पंचांग पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों को परिवर्तिनी एकादशी के महत्व, कथा और नियमों से परिचित कराना है।

*सटीकता: यद्यपि इस जानकारी को संकलित करने में अधिकतम सटीकता का ध्यान रखा गया है, फिर भी किसी भी पूजा विधि, व्रत नियम, या ज्योतिषीय गणना को शुरू करने से पहले आपको अपने स्थानीय पुजारी, विद्वान, या विश्वसनीय धार्मिक स्रोत से सलाह लेने की दृढ़ता से सलाह दी जाती है।

*स्वास्थ्य: व्रत के नियमों का पालन व्यक्तिगत स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता पर निर्भर करता है। यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या (जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था, आदि) है, तो उपवास या आहार परिवर्तन से पहले अनिवार्य रूप से अपने चिकित्सक या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।

*विश्वास और व्यक्तिगत आचरण: पूजा और व्रत पूरी तरह से व्यक्तिगत श्रद्धा और विश्वास का विषय है। इस लेख में दिए गए टोटके या उपाय केवल पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं; इन्हें किसी भी प्रकार के चमत्कार या गारंटीशुदा परिणाम के रूप में न समझें। किसी भी प्रकार की हानि या लाभ के लिए लेखक या प्रकाशक जिम्मेदार नहीं होंगे।

*काल गणना: शुभ मुहूर्त और तिथि की गणना विभिन्न पंचांगों के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है। अपने क्षेत्र के लिए सबसे सटीक मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।




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