शिव और सर्प का अबूझ रिश्ता: रहस्य, पौराणिक कथाएं, माउंट आबू के चमत्कार और अचूक टोटके

"भगवान शिव के गले और जटाओं में क्यों विराजते हैं सर्प? जानें शिव और सर्प के पौराणिक रिश्ते का रहस्य, माउंट आबू की अद्भुत घटनाएं, सर्पों की अनोखी दुनिया और कुछ अचूक उपाय। पढ़िए यह ज्ञानवर्धक ब्लॉग"

Picture of the mysterious relationship between Shiva and the snake: A snake wrapped around a Shivalinga

यह भी पढ़ें शिव और सर्प का रिश्ता, भगवान शिव और सांप, नागदेवता, शिव पुराण, माउंट आबू शिव मंदिर, अचलगढ़ मंदिर, शिवलिंग पर सांप, सर्प और भोलेनाथ, पांडव और माउंट आबू, सर्पों की दुनिया, शिव साधना

"शिव और सर्प का अबूझ रिश्ता: रहस्य, रहस्यमय घटनाएं और आध्यात्मिक महत्व"

"नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय..." - भगवान शिव की स्तुति का यह मंत्र उनके स्वरूप का सजीव चित्रण करता है, जहां नाग (सर्प) उनका हार बनता है। भगवान शंकर का चित्रण जब भी हमारे मन में उभरता है, उनकी जटाओं में गंगा, हाथ में त्रिशूल, मस्तक पर चंद्रमा और गले में लिपटा एक विषधर सर्प अवश्य होता है। यह दृश्य हमें आश्चर्यचकित करता है - आखिर इस सृष्टि के आदि-अनादि देवता का इस विषधर जीव से इतना गहरा और 'अबूझ' नाता क्यों है?

*यह रिश्ता सिर्फ पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी, इस कलियुग में, यह अपनी साक्षात उपस्थिति दर्ज कराता है। राजस्थान के माउंट आबू जैसे स्थानों पर घटित होने वाली अद्भुत घटनाएं इस रिश्ते को एक जीवंत वास्तविकता में बदल देती हैं। आइए, इस रहस्यमय और आकर्षक संबंध के हर पहलू को गहराई से समझते हैं।

"भगवान भोलेनाथ और सर्प: पौराणिक संबंध की गहराई"

*शिव और सर्प का संबंध केवल बाह्य आभूषण का नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थों से परिपूर्ण है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और दार्शनिक तथ्य छिपे हैं।

*01. विष का भक्षण और अमृत का प्रतीक

सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन की है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले हलाहल नामक विष निकला। इस विष की अग्नि से पूरी सृष्टि जलने लगी। केवल भगवान शिव ही थे जिन्होंने इस कालकूट विष को अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। कहा जाता है कि इस विष की तीव्रता को नियंत्रित करने के लिए सर्पों ने, जो स्वयं विष के स्वामी हैं, शिव के गले और शरीर को अपनी शीतलता प्रदान की। इस प्रकार, सर्प विष की शक्ति के नियंत्रण और उसके परिवर्तन का प्रतीक बन गए।

*02. ऊर्जा का नियंत्रण (कुंडलिनी शक्ति)

योग और तंत्र शास्त्र में सर्प, कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। यह वह आदि शक्ति है जो मनुष्य की रीढ़ की हड्डी के आधार पर सर्प की भांति कुंडली मारकर सोई रहती है। साधना के माध्यम से जब इस शक्ति को जगाया जाता है, तो यह सुषुम्ना नाड़ी में से होती हुई सहस्रार चक्र (मस्तिष्क) में पहुंचती है। भगवान शिव 'आदि योगी' हैं। उनके शरीर पर लिपटा सर्प इसी कुंडलिनी शक्ति के जागरण और उसके पूर्ण नियंत्रण का द्योतक है। यह दर्शाता है कि शिव ने प्रकृति की सभी आदिम और शक्तिशाली ऊर्जाओं पर विजय प्राप्त कर ली है।

*03. मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र

सर्प अपनी केंचुली उतारकर नया जीवन पाता है। इसलिए वह मृत्यु और पुनर्जन्म के अनंत चक्र का प्रतीक है। भगवान शिव 'महाकाल' हैं, वे समय और मृत्यु के स्वामी हैं। सर्प का उनसे जुड़ाव इस सत्य का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को भी वश में कर लिया है। वे मृत्युंजय हैं। सर्प उनके शरीर पर रहकर यही संदेश देता है कि जो मृत्यु के स्वामी हैं, उनके भक्त के लिए मृत्यु भी एक केंचुली के समान है, जिसे उतारकर नए जीवन में प्रवेश किया जा सकता है।

*04. द्वैत के परे की स्थिति

सर्प विषधर होते हुए भी शिव के लिए एक आभूषण है। यह जीवन के द्वैत (Duality) - अच्छा-बुरा, सुख-दुःख, विष-अमृत - के परे की स्थिति को दर्शाता है। शिव इन सभी विपरीतताओं को आत्मसात करके उन्हें अपने अंग की शोभा बना लेते हैं। सर्प, जो सामान्य मनुष्य के लिए भय का कारण है, वही भोलेनाथ के लिए श्रृंगार का साधन है। यह शिक्षा देता है कि सच्चा साधक संसार की सभी विपरीत परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता, बल्कि उन्हें अपनी शक्ति में बदल लेता है।

*माउंट आबू: "जहां रहस्य साकार हो उठता है"

राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन, माउंट आबू, जिसे 'अर्धकाशी' भी कहा जाता है, शिव और सर्प के इस रहस्यमय संबंध को साकार करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां भगवान शिव के 108 छोटे-बड़े मंदिर हैं, इसीलिए इसे काशी का आधा भाग माना जाता है।

अचलगढ़: दुनिया का एकमात्र मंदिर जहां शिव के अंगूठे की पूजा होती है"

*माउंट आबू का अचलगढ़ किला और मंदिर परिसर इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक sites में से एक है। यहां स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर दुनिया का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान शिव के शिवलिंग की नहीं, बल्कि उनके अंगूठे की पूजा होती है। कथा है कि एक बार एक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया और पाताल लोक में छिप गया। उसका पीछा करते हुए भगवान विष्णु ने उस दैत्य का वध किया, लेकिन वेदों को वापस लाने के लिए एक विशाल यज्ञ की आवश्यकता थी। इस यज्ञ के लिए धरती को स्थिर करने की जरूरत पड़ी, तब भगवान शिव ने इसी स्थान पर अपना अंगूठा धरती में उतारकर इसे स्थिर किया। तभी से इस शिवलिंग रूपी अंगूठे की पूजा होती आ रही है।

"सावन के सोमवार का चमत्कार"

*मेरे द्वारा साझा किया गया प्रसंग कोई पहली घटना नहीं है। माउंट आबू के जंगलों में स्थित कई शिव मंदिरों में सावन के महीने में और शिवरात्रि के अवसर पर सर्पों का शिवलिंग से लिपट जाना एक सामान्य घटना मानी जाती है। स्थानीय लोग और मंदिर के पुजारी बताते हैं कि ये सर्प किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। वे शिवलिंग पर लिपटकर, कभी उस पर चढ़कर, ऐसे बैठे रहते हैं मानो गहरी साधना में लीन हों। हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़, घंटियों की आवाज़ और जयकारों के बीच भी वे विचलित नहीं होते। यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भोलेनाथ ने नाग के रूप में अपने भक्तों को दर्शन दिए हों। पिछले वर्षों में यहां पंचमुखी नाग के दर्शन की चर्चा भी हुई थी, जिसने इस स्थान की रहस्यमयता को और बढ़ा दिया है।

"पांडवों और माउंट आबू का ऐतिहासिक संबंध"

*महाभारत काल में, जब पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास भोगना था, तो उन्होंने अपना कुछ समय माउंट आबू की गुफाओं में भी बिताया था। यहां स्थित 'पांडव गुफा' इस बात का साक्ष्य है। कहा जाता है कि इसी गुफा के निकट एक शिव मंदिर है, जहां पांडवों ने शिव की आराधना की थी। अज्ञातवास के दौरान छिपने के लिए यह स्थान उनके लिए एकदम उपयुक्त था, क्योंकि यह घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इस तरह, माउंट आबू का संबंध न केवल भगवान शिव से, बल्कि महाभारत जैसे महाकाव्य से भी जुड़ जाता है।

"सर्पों की अनोखी दुनिया: कुछ रोचक तथ्य"

*सर्पों के बारे में हमारे मन में अक्सर डर बैठा रहता है, लेकिन यह जीव वास्तव में अद्भुत है।

*संवेदनशीलता: सर्प जमीन के कंपन को महसूस करने में माहिर होते हैं। वे अपनी जीभ से हवा में तैरते रसायनों का पता लगाकर शिकार करते हैं।

*थर्मल विजन: कई सांपों (जैसे अजगर और वाइपर) में इन्फ्रारेड यानी गर्मी से देखने की क्षमता होती है, जिससे वे रात के अंधेरे में भी शिकार का पता लगा लेते हैं।

 *केंचुली उतारना: सर्प अपने बढ़ते शरीर के अनुसार पुरानी त्वचा (केंचुली) उतारकर नई त्वचा धारण करते हैं। यह प्रक्रिया उनके लिए नवजीवन का प्रतीक है।

*पौराणिक महत्व: हिंदू धर्म में सर्पों को नागदेवता के रूप में पूजा जाता है। वासुकी, शेषनाग, तक्षक जैसे नागों का उल्लेख पुराणों में मिलता है और ये देवताओं के आभूषण या आसन बने हैं।

"सर्प और भोलेनाथ: कुछ अचूक टोटके और उपाय"

*मान्यता है कि शिव और नागदेवता की कृपा से सर्प संबंधी भय और समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। कुछ प्रचलित उपाय इस प्रकार हैं:

*01. महामृत्युंजय मंत्र का जाप: "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..." इस मंत्र का नियमित जाप करने से सर्प भय सहित सभी प्रकार के भय दूर होते हैं और आयु में वृद्धि होती है।

*02. नागदेवता को दूध चढ़ाना: श्रावण मास या नाग पंचमी के दिन मिट्टी के सर्प बनाकर उन्हें दूध और चंदन चढ़ाने से नागदोष शांत होता है।

*03. शिवलिंग पर जल चढ़ाना: प्रतिदिन शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और धतूरे के फूल चढ़ाने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से सर्पजनित कष्ट दूर होते हैं।

*04. अस्थि-शिवलिंग की पूजा: कहा जाता है कि जिनके घर में अस्थि-शिवलिंग (हड्डियों से बना शिवलिंग) स्थापित होता है, उस घर में सर्प कभी प्रवेश नहीं करते।

*सावधानी: ये सभी उपाय आस्था और विश्वास पर आधारित हैं। वास्तविक जीवन में यदि कहीं सर्प दिखाई दे, तो उसे मारने का प्रयास न करें, बल्कि सुरक्षित दूरी बनाकर वन विभाग या सर्प विशेषज्ञ को सूचित करें।

"शिव और सर्प के अनसुलझे पहलू"

*इस रिश्ते में कई ऐसे प्रश्न हैं जो आज भी शोध और चिंतन का विषय बने हुए हैं:

*भौतिक विज्ञान बनाम आस्था: क्या वास्तव में सर्प शिवलिंग से किसी आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण आकर्षित होते हैं, या यह महज एक संयोग है? क्या शिवलिंग के आसपास का तापमान या चुंबकीय क्षेत्र सर्पों के लिए अनुकूल होता है?

*माउंट आबू का रहस्य: आखिर क्यों माउंट आबू विशेष रूप से इन घटनाओं का केंद्र है? क्या इसकी भौगोलिक संरचना, वनस्पति या फिर यहां  के प्राचीन मंदिरों में कोई ऐसी ऊर्जा विद्यमान है जो सर्पों को आकर्षित करती है?

*सर्पों का अलौकिक व्यवहार: हजारों लोगों के बीच, शोरगुल के बीच, एक सर्प का घंटों तक बिना डरे शिवलिंग से लिपटे रहना, विज्ञान के लिए एक पहेली बना हुआ है। क्या सर्प वास्तव में किसी दैवीय शक्ति की उपस्थिति को महसूस करते हैं?

*इन प्रश्नों के उत्तर शायद हमारी व्यक्तिगत आस्था और वैज्ञानिक खोज के बीच कहीं छिपे हैं।

"निष्कर्ष"

*शिव और सर्प का रिश्ता केवल एक देवता और एक जीव का रिश्ता नहीं है। यह एक गहन दार्शनिक अवधारणा है जो हमें जीवन के मूल तत्वों - मृत्यु, पुनर्जन्म, ऊर्जा, नियंत्रण और द्वैत के परे जाने की शिक्षा देती है। माउंट आबू जैसे स्थान इस अमूर्त रिश्ते को मूर्त रूप प्रदान करते हैं, हमारी आस्था को और दृढ़ करते हैं। चाहे हम इसे अंधविश्वास मानें या दिव्य चमत्कार, यह तथ्य अटल है कि भगवान शिव का यह 'अबूझ' रिश्ता मानव मन को सदियों से झकझोरता और आकर्षित करता आया है। शायद, इसका सबसे सुंदर पहलू यही है कि यह हमें प्रकृति, देवता और जीवन के गूढ़ रहस्यों के प्रति एक जिज्ञासा और श्रद्धा का भाव बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।

"प्रश्नोत्तरी" (FAQ)

प्रश्न  *01: क्या शिवलिंग पर सर्प का आना एक अशुभ संकेत है?

उत्तर:बिल्कुल नहीं। शिवभक्तों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर सर्प का आना भगवान शिव की कृपा और उनके साक्षात दर्शन का संकेत माना जाता है। इसे एक शुभ और दुर्लभ घटना के रूप में देखा जाता है।

प्रश्न *02: सर्प कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक क्यों है?

उत्तर:जिस प्रकार एक सर्प कुंडली मारकर बैठता है, ठीक उसी प्रकार मानव शरीर के मूलाधार चक्र में कुंडलिनी शक्ति सर्प की भांति सोई रहती है। इसके जागरण पर यह सर्प की तरह ही ऊपर की ओर उठती है। इसलिए योग शास्त्र में सर्प को कुंडलिनी का प्रतीक माना गया है।

प्रश्न *03: माउंट आबू को 'अर्धकाशी' क्यों कहा जाता है?

उत्तर:मान्यता है कि जहाँ काशी (वाराणसी) में भगवान शिव के 108 मुख्य मंदिर हैं, वहीं माउंट आबू में भी उनके 108 छोटे-बड़े मंदिर हैं। इसीलिए इसे काशी का आधा भाग यानी 'अर्धकाशी' कहा जाने लगा।

प्रश्न *04: नाग पंचमी और भगवान शिव का क्या संबंध है?

उत्तर:नाग पंचमी का पर्व नागदेवता को समर्पित है। चूंकि नागदेवता भगवान शिव के आभूषण और भक्त हैं, इसलिए इस दिन शिवलिंग पर दूध चढ़ाना और नागों की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे नाग दोष शांत होता है और शिव की कृपा प्राप्त होती है।

प्रश्न *05: क्या सर्प वास्तव में शिवलिंग के पास की ऊर्जा को महसूस करते हैं?

उत्तर:यह एक रहस्य बना हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, शिवलिंग अक्सर विशेष प्रकार के पत्थरों से बने होते हैं जिनमें चुंबकीय या ऊर्जावान गुण हो सकते हैं। संभव है कि सर्प जैसे संवेदनशील जीव इस ऊर्जा को महसूस करते हों। हालांकि, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, मान्यता है कि सर्प भगवान शिव के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं।

"डिस्क्लेमर" (अस्वीकरण)

*यह ब्लॉग पोस्ट धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक कथाओं, लोक मान्यताओं और ऑनलाइन उपलब्ध सामग्री पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना और पाठकों को शिव एवं सर्प के संबंध में विभिन्न आयामों से अवगत कराना है। यहां बताई गई किसी भी घटना या तथ्य की वैज्ञानिक पुष्टि आवश्यक नहीं है। 

*टोटके और उपाय आस्था पर आधारित हैं, इनके परिणाम की कोई गारंटी नहीं है। वास्तविक जीवन में सर्पों के सामने आने पर सावधानी बरतें और किसी विशेषज्ञ की सहायता लें। लेखक और प्रकाशक किसी भी प्रकार की हानि, क्षति या असुविधा के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी जानकारी को अपनाने से पहले अपने विवेक का प्रयोग अवश्य करें।

एक टिप्पणी भेजें (0)
और नया पुराने